By पं. अमिताभ शर्मा
देवताओं ने दिव्य शक्ति की निष्पक्षता को उस समय समझा

सृष्टि का वह समय अत्यंत उथल पुथल से भरा हुआ था। देवता और असुर केवल बाहरी युद्ध में ही नहीं बल्कि विचार, इच्छा और चेतना के स्तर पर भी आमने सामने थे। एक ओर देवता थे, जो धर्म, मर्यादा और संतुलन की रक्षा में लगे थे। दूसरी ओर असुर थे, जो अधिकार, विस्तार और अपने प्रभाव को स्थापित करने की तीव्र इच्छा से प्रेरित थे। चारों दिशाओं में संघर्ष का ताप था। हर पक्ष अपनी शक्ति को अंतिम सत्य मान रहा था। फिर भी इसी तीव्र वातावरण के भीतर एक ऐसा प्रश्न जन्म ले रहा था, जिसने पूरे प्रसंग को बदल दिया।
यह प्रश्न किसी देवता के भीतर नहीं बल्कि एक असुर के भीतर उठा। वह असुर अपने कुल से भिन्न स्वभाव का था। वह केवल विजय नहीं चाहता था। वह यह भी समझना चाहता था कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है। क्या शक्ति केवल देवताओं की संपत्ति है। क्या देवी की कृपा केवल एक पक्ष के लिए सुरक्षित है। क्या सिद्धियाँ केवल उन्हीं को मिल सकती हैं जिन्हें संसार पहले से धर्मपक्ष कहता है। यह प्रश्न उसके भीतर धीरे धीरे गहराता गया।
युद्धभूमि में रहते हुए भी वह असुर भीतर से बेचैन था। उसने देखा कि देवता बार बार माँ सिद्धिदात्री की आराधना करते हैं और देवी की कृपा से अपने कार्यों को सिद्धि तक पहुँचाते हैं। उसने यह भी देखा कि जहाँ केवल बल काम नहीं आता, वहाँ देवी की कृपा देवताओं को दिशा देती है। उसके भीतर यह विचार बार बार उठने लगा कि यदि शक्ति सच में दिव्य है, तो क्या वह सच में पक्ष चुनती है या केवल पात्रता को पहचानती है।
यह साधारण प्रश्न नहीं था। क्योंकि किसी असुर के भीतर ऐसा विचार उठना ही एक आंतरिक परिवर्तन का संकेत था। वह पहली बार अपने कुल के स्वभाव से परे जाकर सोच रहा था। उसके भीतर केवल इच्छा नहीं थी। वहाँ एक प्रकार की सत्य की भूख भी थी। वह यह जानना चाहता था कि क्या देवी का मार्ग केवल जन्म, पहचान और पक्ष से तय होता है, या चेतना की तैयारी से।
यह निर्णय उसके लिए सरल नहीं था। वह जानता था कि देवता उसे विरोधी मानते हैं। वह यह भी जानता था कि यदि वह देवी की शरण में जाएगा, तो यह केवल बाहरी कदम नहीं होगा बल्कि उसके भीतर के अहंकार की पहली पराजय होगी। फिर भी उसने यह साहस किया।
एक दिन वह युद्ध और सभा दोनों से दूर होकर अकेले माँ सिद्धिदात्री की शरण में गया। उसने कोई आडंबर नहीं किया। उसके साथ न सेना थी, न गर्व, न चुनौती। वह अकेला गया और पहली बार वह अपने नाम, अपने कुल और अपने पक्ष से अधिक अपने प्रश्न के साथ देवी के सामने खड़ा हुआ।
यही इस कथा का निर्णायक मोड़ था।
जब देवताओं को यह ज्ञात हुआ कि एक असुर भी माँ सिद्धिदात्री की शरण में गया है, तो वे आश्चर्य में पड़ गए। उनके लिए यह केवल अप्रत्याशित नहीं था बल्कि असहज करने वाला भी था। उनके भीतर यह प्रश्न उठा कि क्या एक विरोधी भी उसी देवी की शरण पा सकता है जिनकी कृपा से वे स्वयं समर्थ होते आए हैं।
कुछ देवताओं को लगा कि यह छल भी हो सकता है। कुछ को लगा कि यह देवी की परीक्षा लेने जैसा दुस्साहस है। कुछ के भीतर यह सूक्ष्म भय भी उठा कि यदि देवी ने उसे भी कृपा दे दी, तो संतुलन बदल जाएगा। यह वही क्षण था जहाँ देवताओं को अपने भीतर के छिपे हुए आग्रह भी देखने थे। वे देवी की निष्पक्षता को जानते थे, पर उसे इस रूप में देखने के लिए अभी तैयार नहीं थे।
जब वह असुर माँ सिद्धिदात्री के सामने पहुँचा, तो उसने न विजय माँगी, न शत्रु नाश, न राज्य विस्तार और न अद्भुत वरदान। उसने केवल इतना कहा कि वह सत्य को जानना चाहता है। वह यह समझना चाहता है कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है। वह यह जानना चाहता है कि क्या सिद्धि किसी पक्ष की दासी है या वह केवल उसी को प्राप्त होती है जो उसे सही रूप में धारण कर सके।
उसकी यह प्रार्थना ही सब कुछ बदल देने वाली थी।
यहाँ उसकी नीयत सबसे महत्वपूर्ण थी। वह शक्ति को हथियार की तरह नहीं माँग रहा था। वह पहले उसकी प्रकृति को जानना चाहता था। यही वह सूक्ष्म अंतर था जिसने उसे साधारण असुरों से अलग खड़ा कर दिया।
माँ सिद्धिदात्री ने उसकी ओर देखा और उसके भीतर के भाव को तुरंत जान लिया। देवी के लिए बाहरी रूप अंतिम सत्य नहीं होता। वे चेतना के स्तर पर देखती हैं। उन्होंने यह देखा कि उसके भीतर अभी भी अतीत का संस्कार है, लेकिन उसके भीतर एक वास्तविक जिज्ञासा भी जाग चुकी है। वहाँ केवल लालसा नहीं है। वहाँ पहली बार आत्मबोध की संभावना भी है।
देवी के सामने यही निर्णायक था। वह असुर अपने पक्ष के साथ आया था, पर केवल अपने पक्ष के लिए नहीं आया था। वह एक ऐसे प्रश्न के साथ आया था जो उसे भीतर से बदल सकता था।
हाँ, माँ सिद्धिदात्री ने उसे सिद्धियाँ प्रदान कीं, लेकिन इस घटना का अर्थ केवल इतना नहीं है कि देवी ने एक असुर पर कृपा कर दी। यहाँ समझने की बात यह है कि उन्होंने उसे केवल शक्ति नहीं दी। उन्होंने उसे ऐसी शक्ति दी जो उसके भीतर के दृष्टिकोण को बदलने लगी। यह शक्ति दंड या पक्ष परिवर्तन का साधन नहीं थी। यह चेतना परिवर्तन का साधन थी।
देवी ने उसे वही दिया जिसके योग्य वह उस क्षण हुआ था। सिद्धि उसके भीतर आई, लेकिन उसके साथ उसके भीतर की दृष्टि भी बदलने लगी। अब वह पहले जैसा नहीं रहा। उसकी इच्छाएँ ढीली पड़ने लगीं। उसका क्रोध कम होने लगा। उसका संघर्ष केंद्रित रहा, पर उसका उद्देश्य बदलने लगा। वह अब केवल टकराव का भाग नहीं था, वह संतुलन का अर्थ भी समझने लगा था।
देवताओं ने पहली बार देखा कि शक्ति का आधार पक्ष नहीं, पात्रता है। यह उनके लिए चौंकाने वाला अनुभव था। वे जानते थे कि देवी निष्पक्ष हैं, पर इस निष्पक्षता को इस प्रकार प्रकट होते देखना उनके लिए एक नई शिक्षा थी।
उन्हें यह समझ में आया कि दिव्य शक्ति किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। वह उस चेतना के पास जाती है जो उसे ग्रहण करने योग्य हो। यदि कोई असुर भी अपने भीतर वास्तविक परिवर्तन, विनम्रता और सत्य की इच्छा लेकर आए, तो देवी उसे भी अनदेखा नहीं करतीं। यह समझ देवताओं के लिए उतनी ही बड़ी परीक्षा थी जितनी उस असुर के लिए।
नहीं। यही इस कथा का सबसे बड़ा सत्य है। शक्ति ने पक्ष नहीं बदला था। उसने केवल यह प्रकट किया था कि वह मूल रूप से कभी किसी पक्ष की बंधक थी ही नहीं। शक्ति हमेशा से निष्पक्ष थी। मनुष्य और देवता अपने अपने अनुभवों के आधार पर उसे एक पक्ष से जोड़ देते हैं, पर देवी का स्वरूप उससे कहीं अधिक व्यापक होता है।
माँ सिद्धिदात्री ने उस दिन यह नहीं दिखाया कि असुर देवताओं से ऊपर हो गया। उन्होंने यह भी नहीं दिखाया कि देवताओं का विशेषाधिकार छिन गया। उन्होंने केवल यह स्पष्ट किया कि दिव्य कृपा जन्म, कुल, पहचान या पक्ष से नहीं बल्कि चेतना की तैयारी से मिलती है।
भगवान शिव इस पूरे प्रसंग को साक्षी भाव से देख रहे थे। उनका मौन इस बात का संकेत था कि यही सृष्टि का वास्तविक नियम है। शिव जानते हैं कि शक्ति को बाँधा नहीं जा सकता। वह वहाँ प्रवाहित होती है जहाँ उसका सही ग्रहण संभव हो। यही कारण है कि शिव का मौन इस कथा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह मौन सहमति का भी है, ज्ञान का भी और सृष्टि के उस शाश्वत नियम का भी जो पक्षपात से परे है।
यह कथा केवल देवता और असुर के भेद की नहीं है। यह हमारे भीतर मौजूद दो अवस्थाओं की भी कथा है। हमारे भीतर भी एक भाग है जो अधिकार चाहता है, नियंत्रण चाहता है, बाहरी विजय चाहता है। और हमारे भीतर ही एक दूसरा भाग है जो सत्य, संतुलन और वास्तविक शक्ति की प्रकृति को समझना चाहता है। जब भीतर का दूसरा भाग जागता है, तभी हम वास्तव में देवी की शरण में जाते हैं।
माँ सिद्धिदात्री हमें यह सिखाती हैं कि सच्ची शक्ति कभी पक्षपाती नहीं होती। वह उस व्यक्ति तक पहुँचती है जो उसे सही भाव से स्वीकार कर सके। यदि भीतर नीयत शुद्ध हो, यदि जिज्ञासा वास्तविक हो, यदि अहंकार थोड़ी देर के लिए भी झुक जाए, तो परिवर्तन संभव है। और यदि परिवर्तन संभव है, तो कृपा भी संभव है।
मानव जीवन में भी हम लोगों को जल्दी से अच्छे और बुरे, अपने और पराए, योग्य और अयोग्य की श्रेणियों में बाँट देते हैं। पर यह कथा बताती है कि बाहरी पहचान अंतिम सत्य नहीं होती। कई बार जिसे संसार विरोधी मानता है, उसके भीतर भी सत्य की प्यास जन्म ले सकती है। और कई बार जिसे संसार धार्मिक मानता है, उसके भीतर भी सूक्ष्म आग्रह छिपे रह सकते हैं।
माँ सिद्धिदात्री का संदेश यही है कि चेतना का स्तर ही वास्तविक पहचान है। यदि भीतर परिवर्तन की तैयारी है, तो मार्ग खुल सकता है। यदि भीतर केवल दावा है, तो वरदान भी दूर रह सकता है।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि उस दिन शक्ति ने पक्ष नहीं बदला था। उसने केवल अपनी निष्पक्षता को प्रकट किया था। देवताओं ने सीखा कि देवी की कृपा को अधिकार नहीं समझना चाहिए। असुर ने जाना कि देवी की शरण केवल प्रार्थना नहीं, परिवर्तन की शुरुआत है। और सृष्टि ने देखा कि सच्ची शक्ति वहाँ जाती है जहाँ उसे सही रूप में धारण किया जा सके।
यही इस कथा का सबसे गहरा संदेश है। माँ सिद्धिदात्री हमें यह सिखाती हैं कि दिव्य शक्ति का मार्ग खुला है, पर उसमें प्रवेश केवल वही कर सकता है जो अपने भीतर के अहंकार को पीछे छोड़कर सत्य के साथ देवी के सामने खड़ा हो सके।
क्या सच में एक असुर माँ सिद्धिदात्री की शरण में गया था
इस कथा का संकेत यही है कि एक असुर ने बाहरी पक्ष से ऊपर उठकर देवी की शरण ली और सत्य को जानने की इच्छा प्रकट की।
क्या माँ सिद्धिदात्री ने उसे सिद्धियाँ दीं
हाँ, देवी ने उसे सिद्धियाँ प्रदान कीं, लेकिन उनके साथ उसके भीतर दृष्टि और चेतना का परिवर्तन भी शुरू हुआ।
क्या इससे देवताओं की शक्ति कम हो गई थी
नहीं। इससे केवल यह स्पष्ट हुआ कि दिव्य शक्ति किसी पक्ष की संपत्ति नहीं है।
इस कथा में देवताओं ने क्या सीखा
उन्होंने सीखा कि शक्ति का आधार जन्म या पक्ष नहीं बल्कि पात्रता और चेतना है।
यह कथा मनुष्य जीवन को क्या सिखाती है
यह सिखाती है कि सच्ची कृपा वहाँ आती है जहाँ नीयत शुद्ध हो, अहंकार झुका हो और सत्य को जानने की वास्तविक इच्छा हो।
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