By पं. सुव्रत शर्मा
बिना शस्त्रों के अचल भक्ति की विजय

नवरात्रि के दूसरे दिन देवी दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की उपासना की जाती है। यह रूप तपस्या, असीम धैर्य और अटूट भक्ति का साक्षात प्रमाण है। देवी का यह नाम दो शब्दों से मिलकर बना है जिसमें ब्रह्मा का अर्थ तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली है। संसार माँ के इस रूप को केवल शिव की प्राप्ति के लिए किए गए संघर्ष के रूप में देखता है परंतु इस कालखंड की एक ऐसी रोमांचक घटना है जिसने देवताओं के भाग्य और संपूर्ण सृष्टि की दिशा को बदल दिया था। यह कथा उस आंतरिक शक्ति की है जो काम के बाणों से भी अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुई।
कथा उस समय की है जब तारकासुर नामक असुर ने अपनी शक्तियों के अहंकार में तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उसे यह विशेष वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल भगवान शिव का पुत्र ही कर सकता है। सती के आत्मदाह के उपरांत शिव घोर समाधि में लीन हो चुके थे और उन्हें संसार या विवाह में कोई रुचि नहीं रह गई थी। देवताओं को भय था कि यदि शिव ने विवाह नहीं किया तो तारकासुर का विनाश कभी नहीं होगा। इसी समय पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में माँ पार्वती ब्रह्मचारिणी स्वरूप में शिव को प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या कर रही थीं।
देवताओं ने विवश होकर प्रेम और इच्छा के देवता कामदेव का आह्वान किया। इंद्र ने कामदेव को आज्ञा दी कि वे शिव की समाधि को भंग करें ताकि उनका ध्यान समीप ही तपस्या कर रही ब्रह्मचारिणी माता की ओर जाए। कामदेव जानते थे कि महादेव के क्रोध का सामना करना मृत्यु को निमंत्रण देना है परंतु धर्म की रक्षा हेतु उन्होंने यह जोखिम उठाया। कामदेव ने वसंत ऋतु का मायाजाल फैलाया और संपूर्ण कैलाश को सुगंधित पुष्पों से भर दिया ताकि शिव के मन में संसार के प्रति आकर्षण जागृत हो।
एक शुभ दोपहर जब माँ ब्रह्मचारिणी पूर्ण निष्ठा के साथ मंत्रों का जाप कर रही थीं कामदेव ने अपने पुष्प बाण को शिव के हृदय की ओर छोड़ दिया। बाण लगते ही शिव की समाधि में बाधा आई और उन्होंने अपनी आँखें खोलीं। जैसे ही महादेव ने अपने ध्यान भंग होने का कारण देखा उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने तत्काल अपना तीसरा नेत्र खोला जिससे दिव्य अग्नि की एक प्रचंड ज्वाला निकली और कामदेव क्षण भर में जलकर राख हो गए। देवताओं में भगदड़ मच गई और वे भय से कांपने लगे क्योंकि उन्हें लगा कि अब सृष्टि का अंत निकट है।
इस भयानक विनाश के बीच जो सबसे विस्मयकारी बात थी वह थी माँ ब्रह्मचारिणी की अचल स्थिरता। उनके सामने कामदेव भस्म हो गए और शिव का रौद्र रूप दिखाई दे रहा था परंतु देवी ने अपनी पलकें तक नहीं झपकाईं। उनकी साधना में न तो भय था और न ही कोई विक्षेप। शिव ने गौर किया कि जहाँ देवता तक डर कर भाग गए वहां यह देवी पर्वत की भांति अडिग है।
महादेव को यह आभास हो गया कि यह कोई साधारण मानवी नहीं बल्कि उनकी ही आदि शक्ति है। माँ ब्रह्मचारिणी का यह मौन प्रभाव कामदेव के हज़ारों बाणों से भी अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। बिना कोई शस्त्र उठाए माँ की तपस्या ने महादेव के वैराग्य को पिघलाना शुरू कर दिया। उनके संकल्प ने यह सिद्ध कर दिया कि जब भक्ति शुद्ध हो तो विनाशकारी अग्नि भी साधक का मार्ग नहीं रोक सकती। माँ की इसी निष्ठा ने अंततः शिव को विवाह के लिए मौन स्वीकृति देने पर विवश कर दिया।
माँ ब्रह्मचारिणी की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची सफलता बाहरी युक्तियों या छल से नहीं बल्कि आंतरिक दृढ़ता से प्राप्त होती है। कामदेव ने जो कार्य शस्त्रों और मोह से करना चाहा माँ ने उसे अपनी साधना और मौन से पूर्ण किया। नवरात्रि का दूसरा दिन हमें यही संदेश देता है कि संसार में कितनी भी उथल पुथल क्यों न मची हो यदि हमारा लक्ष्य स्पष्ट है और संकल्प अटूट है तो स्वयं ईश्वर को भी झुकना पड़ता है। माँ का यह रूप स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करता है जिससे व्यक्ति अपनी भावनाओं पर विजय प्राप्त करता है और जीवन के कठिन संघर्षों में भी शांत बना रहता है।
माँ ब्रह्मचारिणी के हाथ में क्या सुशोभित है?
माँ ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल है जो तपस्या का प्रतीक है।
कामदेव को भस्म करने के बाद शिव ने क्या किया?
कामदेव को भस्म करने के बाद शिव ने देवी की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्मचारी का वेश धारण किया और उनकी निष्ठा की जाँच की।
ब्रह्मचारिणी स्वरूप का मुख्य रंग क्या है?
देवी को सफेद रंग अत्यंत प्रिय है जो शुद्धता और शांति का परिचायक है।
तारकासुर का वध अंततः किसने किया?
शिव और पार्वती के मिलन के उपरांत भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ जिन्होंने तारकासुर का अंत किया।
माँ को अपर्णा क्यों कहा जाता है?
तपस्या के दौरान जब देवी ने सूखे पत्ते तक खाना छोड़ दिया तब उन्हें अपर्णा के नाम से पुकारा गया।
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