By अपर्णा पाटनी
संकल्प की अजेय शक्ति और अचल तपस्या

नवरात्रि के दूसरे दिन देवी दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की उपासना की जाती है जिन्हें तपस्या, असीम धैर्य और अटल संकल्प की परम अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। संसार माँ के इस रूप को केवल महादेव की प्राप्ति के लिए किए गए उनके कठोर तप के रूप में जानता है। परंतु पुराणों के पन्नों में एक ऐसी रोचक और विस्मृत कथा का वर्णन मिलता है जिसमें यह बताया गया है कि कैसे एक बार स्वयं देवताओं ने उनकी नियति को बदलने का प्रयास किया था। यह कथा उस आंतरिक शक्ति का जीवंत प्रमाण है जो किसी भी बाहरी प्रलोभन अथवा स्वर्ग के ऐश्वर्य के सामने भी नहीं झुकती है।
जब माता पार्वती ने हिमालय के दुर्गम और निर्जन वनों में अपनी घोर तपस्या आरंभ की थी तब उनकी अटूट भक्ति का प्रभाव संपूर्ण ब्रह्मांड में एक कंपन की भांति अनुभव किया जाने लगा था। वह राजसी सुखों का पूर्ण परित्याग कर अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही थीं और अपना अधिकांश समय मौन रहकर गहन ध्यान में व्यतीत करती थीं। युग बीतते गए और उनकी तपस्या की अग्नि निरंतर तीव्र होती गई जिससे स्वर्ग का सिंहासन भी डोलने लगा था।
किंतु इस असाधारण स्थिति ने स्वर्ग के देवताओं को गहरी चिंता में डाल दिया था। देवताओं का मानना था कि भगवान शिव सती के विरह के पश्चात सांसारिक जीवन से पूर्णतः विरक्त होकर महासमाधि में जा चुके हैं। उन्हें यह तीव्र भय सता रहा था कि पार्वती कहीं महादेव के दर्शन की प्रतीक्षा में अपना पूरा यौवन और जीवन व्यर्थ न कर दें। देवराज इंद्र और कुछ अन्य प्रमुख देवताओं के मध्य यह चर्चा होने लगी थी कि क्या यह बेहतर नहीं होगा कि पार्वती को इस कठोर वैराग्य से बाहर निकाला जाए और उनका विवाह किसी ऐसे देवता से कराया जाए जो अधिक पारंपरिक और वैभवशाली जीवन व्यतीत करते हों।
एक प्राचीन पौराणिक प्रसंग के अनुसार देवराज इंद्र के सुझाव पर कुछ दिव्य प्राणी और गंधर्व माता पार्वती के समीप पहुँचे। उन्होंने देखा कि देवी धूल से धूसरित होकर केवल बिल्व पत्रों का आहार कर रही हैं। उन्होंने माता से अत्यंत विनम्रतापूर्वक तर्क दिया कि वह एक महान साम्राज्य की राजकुमारी हैं और उन्हें इस प्रकार का कष्टकारी जीवन शोभा नहीं देता। उन्होंने प्रलोभन देते हुए कहा कि वह स्वर्ग के ऐश्वर्य और समस्त सुख सुविधाओं की स्वामिनी बनने योग्य हैं।
उन्होंने कुछ अत्यंत वैभवशाली और शक्तिशाली देवताओं के नामों का उल्लेख किया जो उनसे विवाह करने के लिए सहर्ष प्रतीक्षारत थे। उस समय वहां अदृश्य रूप में उपस्थित ऋषि मुनि भी यह देखने के लिए अत्यंत उत्सुक थे कि क्या नन्हीं पार्वती इन सांसारिक प्रलोभनों के सामने अपनी एकाग्रता खो देंगी अथवा उनका संकल्प और अधिक सुदृढ़ होकर उभरेगा।
पार्वती ने उन सभी देवताओं और दूतों की बातों को बिना विचलित हुए अत्यंत शांतिपूर्वक सुना। जब उन्होंने बोलना आरंभ किया तो उनकी वाणी में एक अद्भुत दिव्य तेज था जिसने वहां उपस्थित प्रत्येक जन को चकित कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि महादेव के प्रति उनकी भक्ति किसी क्षणिक शारीरिक आकर्षण अथवा सुख की इच्छा पर आधारित नहीं है। यह दो आत्माओं के मध्य का वह शाश्वत आध्यात्मिक संबंध है जो काल और जन्मों की सीमाओं से परे चला आ रहा है।
उन्होंने देवताओं से कहा कि उनका अंतिम लक्ष्य केवल विवाह का बंधन मात्र नहीं है अपितु उस परम चेतना के साथ एकाकार होना है जिसका एकमात्र प्रतिनिधित्व शिव करते हैं। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि चाहे युग बीत जाएं अथवा यह सृष्टि प्रलय में समा जाए वह अपनी तपस्या तब तक जारी रखेंगी जब तक कि वह सफल नहीं हो जातीं। उनका यह संकल्प पत्थर की लकीर की भांति अमिट था जिसने देवताओं के अभिमान को चूर्ण कर दिया।
माँ ब्रह्मचारिणी का यह तेजस्वी उत्तर सुनकर देवताओं को तुरंत अपनी बड़ी भूल का बोध हो गया। उन्होंने अनुभव किया कि वे पार्वती की भक्ति की उस अनंत गहराई को समझने में पूर्णतः विफल रहे थे। जिसे वे एक सामान्य हठ समझ रहे थे वह वास्तव में एक उच्च आध्यात्मिक दृढ़ संकल्प और सत्य की खोज थी। वे समझ गए कि जो आत्मा अपने दैवीय गंतव्य की ओर एक बार कदम बढ़ा देती है उसे संसार की कोई भी मायावी शक्ति मार्ग से विचलित नहीं कर सकती है।
उस महान क्षण के पश्चात देवताओं ने उनकी तपस्या में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करना बंद कर दिया और इसके स्थान पर वे स्वर्ग से पुष्प वर्षा कर उनके तप को अपना आशीर्वाद देने लगे। कुछ समय पश्चात स्वयं महादेव ने उनकी इस अचल निष्ठा को स्वीकार किया और उन्हें अपनी शक्ति के रूप में अंगीकार किया।
यह पौराणिक प्रसंग माँ ब्रह्मचारिणी के चरित्र के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सूक्ष्म पहलू को उजागर करता है। उनकी शक्ति केवल शारीरिक कष्ट सहने अथवा भूखा रहने में नहीं थी अपितु उनके आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ण स्पष्टता में निहित थी। जब स्वयं देवताओं और गुरुओं ने उनके निर्णय पर प्रश्न चिन्ह लगाया तब भी वह अपनी भक्ति में मेरु पर्वत की भांति अडिग रहीं।
यही कारण है कि नवरात्रि के दूसरे दिन भक्त माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं जो हमें मानसिक अनुशासन, एकाग्रता और अपने चुने हुए आध्यात्मिक पथ पर अटूट विश्वास रखने की शिक्षा प्रदान करती हैं। उनकी साधना से व्यक्ति के भीतर की चंचलता समाप्त होती है और स्थिर प्रज्ञ अवस्था की प्राप्ति होती है।
माँ ब्रह्मचारिणी ने देवताओं के विवाह प्रस्ताव को क्यों ठुकरा दिया था?
उन्होंने प्रस्ताव इसलिए ठुकराया क्योंकि शिव के प्रति उनकी निष्ठा परम सत्य की प्राप्ति के लिए थी न कि सांसारिक सुखों के लिए।
देवताओं को पार्वती की तपस्या के विषय में वास्तव में क्या चिंता थी?
देवताओं को भय था कि शिव का वैराग्य कभी समाप्त नहीं होगा और पार्वती की तपस्या निष्फल चली जाएगी जिससे जगत का कल्याण रुक जाएगा।
ब्रह्मचारिणी शब्द का वास्तविक दार्शनिक अर्थ क्या है?
ब्रह्म का अर्थ तपस्या अथवा दिव्य ज्ञान है और चारिणी का अर्थ उस मार्ग पर आचरण करने वाली है अर्थात जो निरंतर सत्य का अन्वेषण करती हैं।
इस कथा से आज के साधकों को क्या मुख्य शिक्षा मिलती है?
यह कथा सिखाती है कि यदि लक्ष्य के प्रति स्पष्टता और संकल्प में दृढ़ता हो तो स्वयं ईश्वर और प्रकृति की शक्तियाँ भी आपके सहायक बन जाते हैं।
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा से किस चक्र का जागरण होता है?
आध्यात्मिक साधना में माँ ब्रह्मचारिणी का वास स्वाधिष्ठान चक्र में माना जाता है जो भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण और सृजनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
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