माँ चंद्रघंटा और असुर सेना का संहार

By पं. अभिषेक शर्मा

दिव्य घंटे की गर्जना और अजेय साहस की गाथा

माँ चंद्रघंटा की कहानी: दिव्य घंटे की गूँज और असुरों का नाश

नवरात्रि के पावन पर्व का तीसरा चरण देवी दुर्गा के अत्यंत तेजस्वी और वीर स्वरूप माँ चंद्रघंटा को समर्पित है। उनका यह नाम उनके मस्तक पर सुशोभित उस दिव्य आधे चंद्रमा के कारण पड़ा है जो एक भारी प्राचीन घंटे के समान प्रतीत होता है। पौराणिक आख्यानों में यह वर्णित है कि जब यह अलौकिक घंटा बजता है तो उसकी प्रतिध्वनि मात्र से ही ब्रह्मांड की समस्त नकारात्मक ऊर्जाओं का अंत हो जाता है। यद्यपि भक्त उन्हें शांति और सौम्यता की प्रतिमूर्ति के रूप में पूजते हैं किंतु उनकी वीरता की वह गाथा आज भी रोंगटे खड़े कर देती है जब उन्होंने केवल अपने नाद की शक्ति से एक ऐसी असुर सेना का समूल विनाश कर दिया था जिसे कोई भी देवता पराजित नहीं कर पा रहा था।

जब स्वर्ग के द्वार पर असुरों का भीषण हाहाकार मच गया

देवी पार्वती और भगवान शिव के पवित्र विवाह के पश्चात कुछ समय के लिए स्वर्गलोक में शांति स्थापित हुई थी परंतु यह स्थिरता अधिक समय तक टिक न सकी। महिषासुर के अत्यंत क्रूर सेनापति धुम्रलोचन ने अपनी अजेय शक्ति के मद में चूर होकर देवताओं के निवास स्थान पर अचानक आक्रमण कर दिया। धुम्रलोचन के साथ उसके हज़ारों खूंखार असुर योद्धा थे जो केवल शारीरिक बल में ही नहीं बल्कि मायावी शक्तियों में भी निपुण थे। ये असुर इतने निर्दयी थे कि उन्होंने देवताओं के उपवनों को उजाड़ दिया और ऋषियों के आश्रमों को अपवित्र करना शुरू कर दिया। स्वर्ग के रक्षक देवराज इंद्र ने अपनी सेना के साथ वीरतापूर्वक युद्ध किया परंतु असुरों की बढ़ती संख्या और उनकी मायावी चालों ने देवताओं को पीछे हटने पर विवश कर दिया। जब चारों ओर अधर्म का अंधकार और मृत्यु का भय व्याप्त हो गया तब समस्त देवों ने व्याकुल होकर आदि शक्ति का आह्वान किया।

माँ चंद्रघंटा का भव्य योद्धा स्वरूप और पराक्रम

देवताओं की करुण पुकार सुनकर देवी पार्वती ने एक अत्यंत दीप्तिमान और उग्र रूप धारण किया जो माँ चंद्रघंटा कहलाया। उनका शरीर तपते हुए स्वर्ण के समान चमक रहा था और उनके नेत्रों में धर्म की रक्षा का संकल्प झलकता था। वे एक विशाल और पराक्रमी सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि के मध्य प्रकट हुईं जिसकी भीषण दहाड़ से ही धरती का केंद्र डोलने लगा था। माँ की दस भुजाएं थीं जिनमें उन्होंने भगवान शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, अग्नि का बाण और इंद्र का वज्र जैसे महाशक्तिशाली शस्त्र धारण किए हुए थे। उनकी सबसे विशेष पहचान उनके मस्तक पर स्थित वह दिव्य घंटाकार अर्धचंद्र था। यह कोई साधारण आभूषण नहीं था बल्कि इसमें ब्रह्मांड की समस्त ध्वनियों का सार और शत्रुओं के लिए काल का आवाहन समाहित था।

वह क्षण जब दिव्य घंटे की गूँज ने युद्ध की दिशा बदल दी

जैसे ही धुम्रलोचन की विशाल असुर सेना माँ चंद्रघंटा के समीप पहुँची तो धुम्रलोचन ने देवी की एकाग्रता और उनकी कोमलता को देखकर अट्टहास किया। असुरों का यह मानना था कि एक अकेली नारी उनकी लाखों की मायावी सेना का सामना कभी नहीं कर पाएगी। देवी ने अपनी मंद मुस्कान के साथ अपने मस्तक पर स्थित उस अलौकिक घंटे को जागृत किया। अचानक उस घंटे से एक ऐसी भीषण और तीव्र गर्जना निकली जिसकी कल्पना भी असुरों ने अपने बुरे स्वप्न में नहीं की थी। वह ध्वनि किसी सामान्य घंटे की नहीं थी बल्कि वह प्रलय के समय कड़कने वाली आकाशीय बिजली जैसी थी। उस दिव्य नाद की तरंगें इतनी प्रभावशाली थीं कि उन्होंने असुरों की सोचने समझने की शक्ति छीन ली। असुर अपने ही अस्त्रों से एक दूसरे पर वार करने लगे क्योंकि उस ध्वनि ने उनके मस्तिष्क में भ्रम उत्पन्न कर दिया था।

असुर सेना का समूल विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना

उस भीषण अव्यवस्था और कोलाहल का पूर्ण लाभ उठाते हुए माँ चंद्रघंटा ने अपने शस्त्रों से प्रहार करना आरंभ किया। उनका सिंह युद्धभूमि में प्रकाश की गति से दौड़ने लगा और माँ की तलवार ने अधर्मियों के शीश काटना शुरू कर दिए। धुम्रलोचन ने अपनी माया से काले बादलों का निर्माण किया और विषैली वर्षा करने का प्रयास किया परंतु माँ के घंटे की ध्वनि ने उन बादलों को आकाश में ही तितर-बितर कर दिया। जैसे ही माँ ने अपना त्रिशूल घुमाया असुरों के सेनापति एक-एक कर भूमि पर गिरने लगे। धुम्रलोचन ने अंत में अपनी संपूर्ण शक्ति बटोरकर प्रहार किया किंतु माँ के सिंह ने उसे दबोच लिया और देवी ने अपने खड्ग से उसका अंत कर दिया। कुछ ही घंटों में वह अजेय मानी जाने वाली असुर सेना राख के ढेर में बदल गई। माँ के इस पराक्रमी रूप को देखकर देवताओं ने हर्षोल्लास के साथ स्वर्ग से पारिजात के पुष्पों की वर्षा की और ब्रह्मांड में देवी की विजय का शंखनाद हुआ।

माँ चंद्रघंटा का संदेश और उनकी वीरता का रहस्य

यह महान कथा हमें यह बोध कराती है कि माँ चंद्रघंटा वह शक्ति हैं जो अपने शरणागत के जीवन से हर प्रकार के भय को जड़ से उखाड़ फेंकती हैं। उनके मस्तक का घंटा उस जाग्रत चेतना का प्रतीक है जो हमारे भीतर की कायरता और अज्ञानता को नष्ट करती है। माँ का यह योद्धा स्वरूप हमें यह प्रेरणा देता है कि शांति का अर्थ कायरता नहीं है और जब बात धर्म की रक्षा की आए तो हमें अत्यंत कठोर और वीर होना चाहिए। उनकी कथा हमें याद दिलाती है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाले की ध्वनि में इतनी शक्ति होती है कि वह संसार की सबसे बड़ी असुर शक्तियों को भी दिशाहीन कर सकती है। देवी का यह रूप हमें आत्मविश्वास के साथ अपनी चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।

माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटा किस बात का प्रतीक है?
देवी के मस्तक पर स्थित घंटा उनके अदम्य साहस और उस दिव्य नाद का प्रतीक है जो नकारात्मकता का नाश करता है।

असुरों के विरुद्ध युद्ध में देवी का वाहन कौन था?
इस युद्ध में माँ चंद्रघंटा का वाहन एक अत्यंत शक्तिशाली सिंह था जिसकी दहाड़ से ही शत्रुओं का मनोबल टूट गया था।

माँ चंद्रघंटा ने धुम्रलोचन का अंत कैसे किया?
देवी ने अपने खड्ग के प्रहार और दिव्य घंटे की भीषण ध्वनि से धुम्रलोचन की माया को नष्ट कर उसका वध किया।

घंटे की ध्वनि का असुरों पर क्या प्रभाव पड़ा?
घंटे की प्रचंड ध्वनि ने असुरों को भ्रमित कर दिया और उनकी मायावी शक्तियों को पूर्णतः निष्प्रभावी बना दिया।

माँ चंद्रघंटा की कथा से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
यह कथा सिखाती है कि धर्म की रक्षा के लिए सौम्यता के साथ-साथ वीरता और दृढ़ संकल्प का होना अनिवार्य है।

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पं. अभिषेक शर्मा

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