By पं. नरेंद्र शर्मा
दिव्य नाद से अजेय बुराई का अंत

नवरात्रि के तीसरे चरण की गाथा माँ चंद्रघंटा के उस स्वरूप को समर्पित है जहाँ कोमलता और वीरता का एक अद्भुत संगम दिखाई देता है। उनके मस्तक पर सुशोभित घंटे के आकार का वह अर्धचंद्र केवल एक आभूषण नहीं बल्कि ब्रह्मांड की समस्त ध्वनियों का केंद्र माना जाता है। पौराणिक आख्यानों में एक ऐसी घटना का वर्णन मिलता है जिसने सिद्ध कर दिया था कि जहाँ भौतिक शस्त्र विफल हो जाते हैं वहाँ दिव्य नाद की शक्ति ब्रह्मांड का भाग्य बदलने की क्षमता रखती है। यह कथा उस समय की है जब हिमालय की शांति एक ऐसे असुर द्वारा भंग की जा रही थी जिसे कोई भी अस्त्र स्पर्श तक नहीं कर पा रहा था।
प्राचीन काल में धूम्रकेतु नामक एक अत्यंत क्रूर असुर ने अपनी आसुरी शक्तियों के बल पर तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उस असुर को ब्रह्मा जी से एक अत्यंत विशिष्ट वरदान प्राप्त था जिसके अनुसार कोई भी भौतिक शस्त्र उसे क्षति नहीं पहुँचा सकता था। जब भी देवता उस पर तलवारों अथवा बाणों से प्रहार करते तो वह असुर अपनी मायावी शक्ति से उन शस्त्रों को निष्प्रभावी कर देता था। इस अजेय होने के अहंकार में उसने ऋषियों के आश्रमों को अपवित्र करना और यज्ञों में बाधा डालना शुरू कर दिया। स्वर्ग के रक्षक देवराज इंद्र भी अपनी पूरी सेना के साथ उस असुर के सामने विवश खड़े थे क्योंकि उनकी सैन्य शक्ति उस पर कोई प्रभाव नहीं डाल पा रही थी।
असुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर समस्त ऋषि मुनि हिमालय के वनों में एकत्रित हुए और उन्होंने आदि शक्ति का आर्त्त स्वर में आह्वान किया। ऋषियों ने माँ से प्रार्थना की कि वे एक ऐसी शक्ति के रूप में प्रकट हों जो उस सूक्ष्म माया का अंत कर सके जिसे लोहे या पत्थर के शस्त्रों द्वारा काटना असंभव था। उनकी निष्कपट पुकार सुनकर देवी पार्वती ने एक अत्यंत दीप्तिमान योद्धा का रूप धारण किया जो माँ चंद्रघंटा कहलाया। वे एक पराक्रमी सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि में प्रविष्ट हुईं और उनके दसों हाथों में दिव्य अस्त्र सुशोभित थे परंतु उनके तेज का वास्तविक आधार उनके मस्तक का वह दिव्य घंटा था।
जैसे ही धूम्रकेतु ने देवी को युद्धभूमि में देखा तो वह अट्टहास करने लगा। उसने उपहास करते हुए कहा कि जब इंद्र के वज्र ने उसका कुछ नहीं बिगाड़ा तो एक नारी के ये शस्त्र उसे कैसे मार पाएंगे। युद्ध आरंभ हुआ और देवी ने कई दिव्य बाण चलाए किंतु धूम्रकेतु की काया फिर से वैसी ही हो जाती थी। असुर ने अपनी माया से चारों ओर काले धुएं का जाल फैला दिया जिससे देवताओं को कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया। तभी माँ चंद्रघंटा ने कुछ ऐसा किया जिसकी कल्पना भी उस मायावी असुर ने नहीं की थी। देवी ने अपने हाथों के शस्त्रों को एक ओर रखा और अपने मस्तक पर स्थित उस घंटाकार अर्धचंद्र पर एक दिव्य प्रहार किया।
अचानक पूरे ब्रह्मांड में एक ऐसी भीषण और तीव्र प्रतिध्वनि गूँजी जिसने असुर के मस्तिष्क को सुन्न कर दिया। वह ध्वनि किसी सामान्य घंटा बजने जैसी नहीं थी बल्कि उसमें ब्रह्मांड के सृजन और प्रलय का वह नाद समाहित था जिसे ब्रह्म नाद कहा जाता है। उस दिव्य ध्वनि की कंपन तरंगे इतनी प्रचंड थीं कि उन्होंने धूम्रकेतु के शरीर के भीतर की उस मायावी ऊर्जा को छिन्न-भिन्न कर दिया जो उसे शस्त्रों से बचाती थी। असुर का शरीर उस ध्वनि के प्रभाव से कांपने लगा और वह अपनी दिशा भूल गया। जैसे ही ध्वनि ने असुर के रक्षा कवच को सूक्ष्म स्तर पर तोड़ा माँ ने बिना समय गंवाए उसे परास्त कर दिया।
हिमालय की कंदराएं उस भीषण कोलाहल से मुक्त होकर पुनः शांत हो गईं। ऋषियों ने अनुभव किया कि जो कार्य हज़ारों शस्त्र नहीं कर पाए वह माँ के एक दिव्य नाद ने कर दिखाया। देवताओं ने पुष्प वर्षा करते हुए स्वीकार किया कि देवी का यह स्वरूप न केवल शत्रुओं का वध करता है बल्कि अपनी गूँज से पूरे जगत की नकारात्मकता को भी जड़ से समाप्त कर देता है। माँ चंद्रघंटा की यह विजय हमें स्मरण कराती है कि कभी-कभी मौन और ध्वनि की शक्ति भौतिक बल से कहीं अधिक प्रभावशाली होती है। यह कथा हमें आत्मविश्वास के साथ अपनी चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देती है।
असुर धूम्रकेतु शस्त्रों से क्यों नहीं मर सकता था?
धूम्रकेतु को एक विशिष्ट वरदान प्राप्त था जिसके कारण कोई भी भौतिक अस्त्र या शस्त्र उसके शरीर को नष्ट करने में पूरी तरह असमर्थ था।
माँ चंद्रघंटा ने असुर का अंत करने के लिए किस शक्ति का प्रयोग किया?
माँ ने अपने मस्तक पर स्थित दिव्य घंटे की प्रचंड ध्वनि का प्रयोग किया जिसने असुर की माया और उसके रक्षा कवच को जड़ से हिला दिया।
देवी के मस्तक पर स्थित घंटा किस बात का संकेत देता है?
यह घंटा उस जाग्रत चेतना और दिव्य नाद का संकेत देता है जो अज्ञानता के अंधकार और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने की क्षमता रखती है।
युद्ध के दौरान असुर धूम्रकेतु ने देवी का उपहास क्यों किया?
असुर को अपने वरदान पर अत्यधिक अहंकार था और उसे लगा कि शस्त्रों के माध्यम से देवी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगी।
इस कथा का मुख्य सार क्या है?
यह कथा बताती है कि जहाँ भौतिक बल काम नहीं आता वहाँ सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति और संकल्प की गूँज असंभव को भी संभव बना देती है।
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