By पं. संजीव शर्मा
असुर रक्तवीर के विनाश की पौराणिक कहानी

नवरात्रि के पावन पर्व का सातवां दिन माँ कालरात्रि को समर्पित है जो माँ दुर्गा का सबसे भयावह और शक्तिशाली स्वरूप हैं। कालरात्रि का अर्थ है वह काली रात जो स्वयं अंधकार का नाश कर देती है। यद्यपि माता का यह रूप देखने में अत्यंत विकराल लगता है परंतु उन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है क्योंकि वे अपने भक्तों के लिए सदा शुभ फल लेकर आती हैं और उनकी रक्षा करती हैं। पौराणिक कथाओं में एक अत्यंत प्रभावशाली वृत्तांत मिलता है जो यह बताता है कि माता ने किस प्रकार उस असुर का अंत किया जो अंधकार का स्वामी बन बैठा था। यह कहानी दिव्य शक्ति की उस विजय का प्रतीक है जहाँ अज्ञान और भय का कोई स्थान नहीं रहता।
प्राचीन समय की बात है जब रक्तवीर नामक एक शक्तिशाली असुर ने ब्रह्मांड के एक विशाल हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। उसने अपनी कठोर तपस्या के बल पर ऐसी मायावी शक्तियां प्राप्त की थीं जिससे वह छाया और अंधकार को नियंत्रित कर सकता था। इन शक्तियों के घमंड में चूर होकर उसने ऋषियों और दिव्य प्राणियों पर आक्रमण करना प्रारंभ कर दिया। उसने संपूर्ण क्षेत्रों को घने अंधकार से ढंक दिया जिससे लोगों का शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करना असंभव हो गया। देवताओं ने भी उसे युद्ध में पराजित करने का प्रयास किया परंतु रात्रि के समय उस असुर की शक्ति और भी अधिक बढ़ जाती थी। अंततः असहाय होकर देवताओं ने आदि शक्ति की शरण ली।
देवताओं की करुण पुकार सुनकर देवी माँ ने एक अत्यंत शक्तिशाली रूप धारण किया जिसे माँ कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। उनका रंग रात के आकाश के समान काला था और उनके बाल बिखरे हुए थे। माता के श्वास से अग्नि की लपटें निकल रही थीं और उनका वाहन एक गर्दभ था। उनके हाथों में खड्ग और कांटा जैसे शक्तिशाली अस्त्र थे जो शत्रुओं के मन में भय उत्पन्न करने वाले थे। माता की उपस्थिति मात्र से ही उस असुर के चारों ओर फैला हुआ मायावी अंधकार छंटने लगा। उनका यह तेजस्वी रूप बुराई के अंत का संकेत था।
असुर रक्तवीर का यह विश्वास था कि रात का अंधकार उसे अजेय बनाता है। अपने बल पर भरोसा करते हुए उसने माता को पूर्ण अंधकार में युद्ध करने की चुनौती दी। उसे लगा कि वह अपनी छाया शक्तियों से माता को भ्रमित कर देगा। परंतु वह यह भूल गया कि माँ कालरात्रि स्वयं काल की रात्रि हैं और अंधकार में ही वे सबसे अधिक शक्तिशाली होती हैं। जैसे ही युद्ध प्रारंभ हुआ पूरा रणक्षेत्र दिव्य ऊर्जा से भर गया। माता उस घने अंधेरे में भी बड़ी सहजता से विचरण कर रही थीं और असुर के हर वार का उत्तर दे रही थीं।
असुर ने कई मायावी भ्रम उत्पन्न किए और छाया के जाल बुने परंतु माता ने अपनी दृष्टि मात्र से हर माया को छिन्न भिन्न कर दिया। अंत में देवी ने सीधे असुर पर प्रहार किया और अपनी असीम शक्ति के एक पुंज से उसकी सभी शक्तियों को नष्ट कर दिया। माता ने उस पापी का वध किया जिसके साथ ही दुनिया को घेरे हुए काले बादल हमेशा के लिए समाप्त हो गए। प्रकाश की किरणें फिर से चारों ओर फैल गईं और देवताओं ने हर्षित होकर माता की जय जयकार की। माता ने सिद्ध कर दिया कि सत्य का प्रकाश कभी नहीं बुझ सकता।
यह कथा हमें सिखाती है कि माँ कालरात्रि भय और नकारात्मकता को दूर करने वाली देवी हैं। उनका स्वरूप भले ही डरावना हो परंतु वे अपने बच्चों के जीवन से उस अंधकार को मिटा देती हैं जो उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। सप्तमी के दिन भक्त माता से साहस और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद मांगते हैं।
माँ कालरात्रि को शुभंकरी क्यों कहा जाता है?
उनका नाम शुभंकरी इसलिए है क्योंकि वे अपने भक्तों का सदा कल्याण करती हैं और उन्हें कभी भी अशुभ फल नहीं प्रदान करती हैं।
माता का वाहन क्या है?
माँ कालरात्रि का वाहन एक गधा अर्थात् गर्दभ है जो उनकी सादगी और शक्ति का संतुलन दर्शाता है।
असुर रक्तवीर की सबसे बड़ी शक्ति क्या थी?
रक्तवीर के पास छाया और अंधकार को नियंत्रित करने की मायावी शक्ति थी जिससे वह रात में अजेय हो जाता था।
माँ कालरात्रि के हाथों में कौन से अस्त्र हैं?
माता के एक हाथ में लोहे का कांटा और दूसरे हाथ में खड्ग अर्थात् तलवार है जिससे वे असुरों का नाश करती हैं।
क्या माता का स्वरूप केवल भय पैदा करने वाला है?
नहीं माता का स्वरूप केवल दुष्टों के लिए डरावना है जबकि भक्तों के लिए वह अत्यंत ममतामयी और सुरक्षा प्रदान करने वाला है।
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