By पं. अमिताभ शर्मा
दुर्गमासुर और भयानका के वध की पौराणिक कथा

नवरात्रि के पावन पर्व का सातवां दिन माँ कालरात्रि की उपासना के लिए समर्पित है। यह आदि शक्ति का वह अत्यंत उग्र और विनाशकारी स्वरूप है जो ब्रह्मांड से अंधकार को मिटाकर संतुलन स्थापित करता है। यद्यपि उनका स्वरूप देखने में डरावना लगता है परंतु वे अपने भक्तों के लिए रक्षक की भूमिका निभाती हैं। उनके काले रंग के शरीर और बिखरे हुए बालों के पीछे वह शक्ति छिपी है जो अराजकता को समाप्त करती है। पौराणिक कथाओं में माँ कालरात्रि से जुड़े कई प्रसंग मिलते हैं जिनमें से एक अद्भुत कहानी यह बताती है कि कैसे उन्होंने एक बार स्वयं ब्रह्मांड के संपूर्ण ज्ञान की रक्षा की थी।
प्राचीन समय की बात है जब दुर्गमासुर नामक एक शक्तिशाली असुर ने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की और उनसे एक विशेष वरदान प्राप्त कर लिया। इस वरदान के बल पर उसने न केवल महान शक्तियाँ प्राप्त कीं बल्कि उसका अहंकार भी बढ़ गया। दुर्गमासुर ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करना शुरू किया और उसने छल से वेदों को चुरा लिया। वेद वे पवित्र ग्रंथ हैं जिनमें आध्यात्मिक ज्ञान और ब्रह्मांडीय नियम समाहित हैं। वेदों के बिना ऋषियों के लिए यज्ञ और पूजा करना असंभव हो गया। धीरे धीरे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा और वर्षा रुक गई। खेतों में फसलें सूख गईं और चारों ओर हाहाकार मच गया। देवताओं को आभास हुआ कि यदि वेदों को वापस नहीं लाया गया तो ब्रह्मांड का आध्यात्मिक आधार ही नष्ट हो जाएगा।
जब देवता स्वयं उस पवित्र ज्ञान को पुनः प्राप्त करने में विफल रहे तब उन्होंने देवी माँ की सामूहिक आराधना की। उनकी प्रार्थनाओं के उत्तर में माँ कालरात्रि का अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप प्रकट हुआ। उनका स्वरूप इतना भयावह था कि उसे देखकर स्वर्ग भी कांप उठा। उनके श्वास से अग्नि की लपटें निकल रही थीं और उनकी उपस्थिति मात्र से आकाश काला पड़ गया। यह उग्र रूप वास्तव में ब्रह्मांडीय संतुलन को बहाल करने की शक्ति रखता था। माँ कालरात्रि उस असुर के साम्राज्य की ओर बढ़ीं जहाँ उसने चुराए हुए वेदों को छिपा कर रखा था। दुर्गमासुर को अपनी मायावी शक्तियों और रक्षा तंत्र पर बहुत गर्व था।
जैसे ही माता युद्धभूमि में पहुँचीं वहां दिव्य ऊर्जा का संचार होने लगा। माँ कालरात्रि और असुर सेना के मध्य भीषण युद्ध हुआ। माता ने अदम्य शक्ति के साथ हजारों असुरों का अंत कर दिया। अंततः उनका सामना स्वयं दुर्गमासुर से हुआ। असुर ने कई मायावी अस्त्रों से प्रहार किया परंतु माँ कालरात्रि ने हर रक्षा तंत्र को छिन्न भिन्न कर दिया। माता ने अपनी दिव्य शक्ति से उस असुर को पराजित किया और पवित्र वेदों को पुनः प्राप्त कर लिया। जब वेदों को ऋषियों को वापस सौंपा गया तब पुनः अनुष्ठान प्रारंभ हुए और पृथ्वी पर वर्षा हुई।
माँ कालरात्रि से जुड़ी एक और रोचक कथा भयानका नामक असुर की है जो प्राणियों के भय को अपना भोजन बनाता था। प्राचीन समय में यह असुर लोगों के मन में जितना अधिक डर पैदा करता था उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ती जाती थी। गाँव और वन धीरे धीरे अंधकार में डूबने लगे क्योंकि उस असुर ने ऋषियों और साधारण जनमानस को आतंकित कर दिया था। देवताओं ने अनुभव किया कि उसे साधारण अस्त्रों से हराना संभव नहीं है क्योंकि उसकी शक्ति का स्रोत ही भय था।
देवताओं की पुकार पर जब माँ कालरात्रि प्रकट हुईं तो उनकी उपस्थिति इतनी प्रचंड थी कि पहली बार असुर सेना ने स्वयं भय का अनुभव किया। जब भयानका ने माता पर आक्रमण किया तो उसे लगा कि अन्य लोगों की तरह माता भी भयभीत होंगी। परंतु माँ कालरात्रि पूरी तरह निर्भय रहीं। आहार के रूप में भय न मिलने के कारण असुर की शक्ति तेजी से घटने लगी। माता के आगे बढ़ने के साथ ही उसकी ताकत गायब होने लगी। अंततः माँ कालरात्रि ने उस असुर को पराजित कर दुनिया को उस आतंक से मुक्त कराया।
ये कथाएं माँ कालरात्रि के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करती हैं। वे उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अज्ञानता को हटाकर बुद्धि और ज्ञान को बहाल करती हैं। जैसे माता ने असुर से वेदों को वापस लिया वैसे ही भक्त यह विश्वास रखते हैं कि वे मनुष्य के मन से भ्रम और अंधकार को दूर करती हैं। नवरात्रि के सातवें दिन लोग साहस और स्पष्टता के लिए उनकी पूजा करते हैं। उनकी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि जब भी अंधकार ज्ञान और सत्य को चुनौती देता है तब देवी माँ प्रकाश और संतुलन स्थापित करने के लिए प्रकट होती हैं।
माँ कालरात्रि ने वेदों की रक्षा कैसे की?
माता ने दुर्गमासुर नामक असुर को युद्ध में पराजित किया जिसने वेदों को चुरा लिया था और उन्हें वापस ऋषियों को सौंप दिया।
असुर भयानका की शक्ति का स्रोत क्या था?
भयानका असुर लोगों के मन में व्याप्त डर से अपनी शक्ति प्राप्त करता था और जितना लोग डरते थे वह उतना ही ताकतवर होता था।
माँ कालरात्रि का स्वरूप क्या दर्शाता है?
उनका स्वरूप यह दर्शाता है कि दिव्य शक्ति अज्ञानता और भय का नाश करने वाली है चाहे वह कितना भी गहरा क्यों न हो।
नवरात्रि के सातवें दिन माता की पूजा क्यों होती है?
भक्त अपने जीवन से नकारात्मक शक्तियों बाधाओं और मानसिक भय को दूर करने के लिए इस दिन माता की विशेष आराधना करते हैं।
वेदों के लुप्त होने से प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ा था?
वेदों के अभाव में अनुष्ठान रुक गए थे जिससे वर्षा बंद हो गई थी और संपूर्ण पृथ्वी पर अकाल तथा अराजकता फैल गई थी।
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