माँ कात्यायनी का दिव्य रूप और अरुणासुर वध

By पं. नीलेश शर्मा

एक नन्ही बालिका के रूप में देवी का रहस्य

माँ कात्यायनी और अरुणासुर की पौराणिक कहानी

नवरात्रि के पावन पर्व का छठा दिन शक्ति की देवी माँ कात्यायनी की आराधना का दिन है। देवी का यह स्वरूप शत्रुओं का विनाश करने वाली एक वीरांगना के रूप में जगत प्रसिद्ध है। यद्यपि महिषासुर के साथ उनके भीषण युद्ध की कथाएं अधिकांश श्रद्धालु जानते हैं परंतु उनके जीवन से जुड़ी एक और अत्यंत रोचक कथा प्रचलित है। यह कथा हमें बताती है कि किस प्रकार देवी ने एक अत्यंत साधारण और कोमल बालिका का रूप धारण किया ताकि एक अभिमानी असुर के अहंकार को कुचला जा सके। यह कहानी दिव्य शक्ति की उस महिमा का वर्णन करती है जिसे केवल विनम्रता से ही समझा जा सकता है।

जब अरुणासुर ने मचाया था हाहाकार

प्राचीन काल में जब देवताओं द्वारा कई असुर पराजित हो चुके थे तब अरुणासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दानव ने ऋषियों और दिव्य प्राणियों को परेशान करना शुरू कर दिया था। उसने कठोर तपस्या के बल पर एक विशेष वरदान प्राप्त किया था जिसने उसे अजेय बना दिया था। इस असुर का मानना था कि कोई भी स्त्री उसे कभी पराजित नहीं कर सकती। अपने इसी अहंकार के कारण उसने पवित्र स्थानों पर आक्रमण करना और ऋषियों की शांति भंग करना शुरू कर दिया था। स्थिति को बिगड़ते देख सभी देवता अत्यंत चिंतित हो गए और उन्होंने देवी माँ से सहायता की प्रार्थना की।

हिमालय के वनों में वह रहस्यमयी बालिका

एक दिन जब अरुणासुर हिमालय के समीप जंगलों में विचरण कर रहा था तब उसने नदी के किनारे बैठी एक अत्यंत सुंदर और कोमल बालिका को देखा। वह बालिका अत्यंत शांत भाव से वहां बैठी थी। असुर यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि उसे सामने देखने के बाद भी वह बालिका रत्ती भर भी भयभीत नहीं थी। जिज्ञासा और मनोरंजन के भाव से वह उसके पास गया और पूछने लगा कि वह उससे डर क्यों नहीं रही है। उस बालिका ने केवल मुस्कुराहट के साथ उत्तर दिया कि उसे किसी ऐसे व्यक्ति से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है जो ब्रह्मांड की वास्तविक शक्ति को नहीं समझता। असुर उसकी बातों पर जोर जोर से हंसने लगा।

देवी का प्राकट्य और असुर का भ्रम

जैसे ही उस असुर ने उस बालिका का उपहास करना शुरू किया वैसे ही उसका स्वरूप अचानक बदलने लगा। उनके शरीर के चारों ओर एक अत्यंत तेजस्वी प्रकाश फैल गया। वह शांत दिखने वाली नन्ही बालिका क्षण भर में माँ कात्यायनी के अत्यंत शक्तिशाली और उग्र रूप में परिवर्तित हो गई। उनके शरीर से दिव्य ऊर्जा का संचार होने लगा और पूरा जंगल कांपने लगा। जब माता अपने वाहन सिंह पर सवार होकर प्रकट हुईं तब असुर को यह आभास हुआ कि वह साक्षात जगतजननी से बात कर रहा था। उसकी हंसी अब भय में बदल चुकी थी।

वह युद्ध जिसने ऋषियों को संकट मुक्त किया

अरुणासुर ने अपनी मायावी शक्तियों और हथियारों से माता पर आक्रमण करने का प्रयास किया। परंतु माँ कात्यायनी उसकी कल्पना से कहीं अधिक शक्तिशाली थीं। माता ने अत्यंत तीव्र गति और कौशल के साथ उस असुर के सभी हथियारों को नष्ट कर दिया। अंत में देवी ने अपने दिव्य त्रिशूल का प्रयोग करते हुए उस असुर का वध किया और उस संकट को समाप्त किया जो लंबे समय से ऋषियों को पीड़ा दे रहा था। यह युद्ध सिद्ध करता है कि देवी की शक्ति के सामने कोई भी आसुरी माया टिक नहीं सकती।

इस पौराणिक कथा से प्राप्त शिक्षा

यह कथा माँ कात्यायनी के बारे में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य को प्रकट करती है। असुर का मानना था कि शक्ति केवल एक डरावने और विशाल रूप में ही प्रकट हो सकती है। अपने इसी अहंकार के कारण वह माता को पहचानने में विफल रहा जब वे उसके सामने आई थीं। यह कहानी भक्तों को याद दिलाती है कि ईश्वरीय शक्ति किसी भी रूप में प्रकट हो सकती है चाहे वह कितना भी साधारण क्यों न हो। हमें कभी भी किसी को उसकी कोमलता के आधार पर कमजोर नहीं समझना चाहिए।

माँ कात्यायनी की पूजा का महत्व

नवरात्रि के छठे दिन भक्त साहस और न्याय की प्राप्ति के लिए माँ कात्यायनी की पूजा करते हैं। उनकी कथाएं दर्शाती हैं कि जब भी अहंकार और बुराई अत्यधिक शक्तिशाली हो जाती है तब देवी माँ संतुलन बहाल करने और विश्व की रक्षा करने के लिए प्रकट होती हैं। उनका आशीर्वाद भक्तों को बाधाओं को दूर करने और चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

माँ कात्यायनी की महिमा से जुड़े कुछ प्रश्न

माँ कात्यायनी ने बालिका का रूप क्यों धारण किया था?
माता ने अरुणासुर के उस अहंकार को तोड़ने के लिए बालिका का रूप लिया था जिसके अनुसार कोई स्त्री उसे नहीं मार सकती थी।

अरुणासुर कौन था?
अरुणासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने ऋषियों को प्रताड़ित किया था और जिसे अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था।

माँ कात्यायनी का वाहन क्या है?
माँ कात्यायनी सिंह पर सवारी करती हैं जो अदम्य साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

माता ने असुर का वध किस अस्त्र से किया था?
देवी ने अपने दिव्य त्रिशूल का प्रहार करके अरुणासुर का अंत किया था।

नवरात्रि के छठे दिन की पूजा से क्या मिलता है?
इस दिन की पूजा से भक्तों को निर्भयता और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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पं. नीलेश शर्मा

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