By पं. संजीव शर्मा
सृष्टि के प्रारंभ में शिव का मौन और माँ कूष्मांडा की दिव्य उपस्थिति

सृष्टि के आदि क्षणों की कल्पना करते ही मन एक ऐसे विस्तार में पहुँच जाता है जहाँ न दिशा स्पष्ट है, न समय की धारा पहचानी जा सकती है, न ही कोई स्थापित व्यवस्था दिखाई देती है। केवल एक अनंत शून्य है, एक गहन मौन है, उसी मौन के भीतर छिपी हुई वह संभावना है जिससे आगे चलकर पूरा ब्रह्मांड जन्म लेने वाला है। इसी सूक्ष्म और गहन क्षण में माँ कूष्मांडा की चेतना प्रकट होती है। पर इस कथा का एक और उतना ही गहरा पक्ष है। उस समय एक और दिव्य उपस्थिति वहाँ पहले से विद्यमान थी, वह थे भगवान शिव। वे सब देख रहे थे, सब जान रहे थे, फिर भी मौन थे। यही मौन इस पूरी कथा का सबसे बड़ा रहस्य बन जाता है।
जब माँ कूष्मांडा की शक्ति ने शून्य में पहली हलचल उत्पन्न की तब वह केवल प्रकाश का जन्म नहीं था। वह सृजन के बीज का सक्रिय होना था। पहले एक सूक्ष्म कंपन उत्पन्न हुआ, फिर वही कंपन प्रकाश की दिशा में बढ़ा, धीरे धीरे सृष्टि का आधार आकार लेने लगा। यह वह क्षण था जहाँ कोई भी महाशक्ति सक्रिय हो सकती थी। यदि कोई चाहता, तो उस प्रक्रिया में अपना प्रभाव जोड़ सकता था। फिर भी भगवान शिव ने ऐसा नहीं किया। उनका यह मौन केवल देखने का मौन नहीं था बल्कि एक बहुत गहरी आध्यात्मिक समझ से जन्मा हुआ मौन था।
देवताओं और ऋषियों के लिए यह समझना सहज नहीं था कि जब सृष्टि का प्रारंभिक विस्तार हो रहा है तब भगवान शिव जैसे महातत्व क्यों मौन हैं। यदि वे चाहते, तो अपनी उपस्थिति से उस प्रक्रिया को दिशा दे सकते थे। यदि वे चाहते, तो सृजन की लय में अपना स्पर्श जोड़ सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यही प्रश्न इस कथा को गहरा बनाता है। क्या यह उदासीनता थी। क्या यह दूरी थी। क्या यह केवल साक्षी भाव था। या फिर इसके पीछे एक ऐसा निर्णय छिपा था जो केवल वही ले सकते थे जो सृष्टि के मूल नियम को भलीभाँति जानते हों।
धीरे धीरे यह स्पष्ट होता है कि भगवान शिव का मौन निष्क्रियता नहीं था। वह एक सचेत निर्णय था। वे जानते थे कि सृष्टि की हर प्रक्रिया का अपना एक समय, अपना एक क्रम, अपना एक धर्म होता है। यदि उस क्षण वे सक्रिय हस्तक्षेप करते, तो माँ कूष्मांडा की ऊर्जा का स्वाभाविक विस्तार प्रभावित हो सकता था। कुछ प्रक्रियाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें अपने पूर्ण स्वरूप में प्रकट होने के लिए स्थान, समय, अवरोध रहित प्रवाह चाहिए होता है। भगवान शिव ने वही स्थान प्रदान किया।
हाँ, यही इस कथा की सबसे महत्वपूर्ण परत है। भगवान शिव का मौन अज्ञान का नहीं था। वह पूर्ण जागरूकता का मौन था। वे उस हर परिवर्तन को अनुभव कर रहे थे जो शून्य में घटित हो रहा था। वे उस कंपन को पहचान रहे थे जिससे प्रकाश जन्म ले रहा था। वे यह भी समझ रहे थे कि माँ कूष्मांडा की ऊर्जा केवल एक देवी की शक्ति नहीं बल्कि स्वयं सृजन की मूल प्रेरणा है। इसलिए उनका मौन असमर्थता का नहीं बल्कि पूर्ण स्वीकृति का संकेत था।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि हर शक्ति का धर्म समान नहीं होता। कुछ शक्तियाँ आरंभ करती हैं, कुछ संरक्षित करती हैं, कुछ संतुलित करती हैं, कुछ उचित समय पर विघटन के माध्यम से पुनर्संतुलन लाती हैं। उस क्षण माँ कूष्मांडा का धर्म था सृजन। भगवान शिव ने इस सत्य को पहचाना और उस दिव्य प्रक्रिया को बिना विघ्न अपने पूर्ण रूप में घटित होने दिया। यही कारण है कि उनका मौन वस्तुतः सृजन के प्रति सम्मान था।
भगवान शिव को अनेक परंपराओं में शून्य, विरक्ति, पूर्ण मौन, आधारहीन आधार का प्रतीक माना गया है। वे उस स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ सब कुछ संभव है, पर अभी कुछ भी रूप में बंधा नहीं है। यदि माँ कूष्मांडा सृजन की सक्रिय ज्योति हैं, तो शिव उस ज्योति से पहले की अनंत शांति हैं। जब शून्य के भीतर सृष्टि जन्म लेती है तब शून्य का स्थिर रहना आवश्यक होता है। यदि वही आधार सक्रिय होकर प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने लगे, तो सृजन की स्वाभाविक लय बदल सकती है।
इसीलिए भगवान शिव का मौन केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, वह उनके तत्त्व धर्म का भी हिस्सा था। वे जानते थे कि उस क्षण उनका कार्य करना नहीं बल्कि धारण करना है। वे उस शून्य को स्थिर बनाए रखने वाले आधार थे जिसमें माँ कूष्मांडा की ऊर्जा सहज रूप से फैल सके। यदि हम इस दृष्टि से देखें, तो समझ में आता है कि उनका मौन वस्तुतः सृजन के लिए आवश्यक आधारभूमि था।
इस कथा का एक अत्यंत सुंदर और सूक्ष्म भाग यह भी है कि माँ कूष्मांडा ने भगवान शिव के मौन को न तो दूरी समझा, न निष्क्रियता, न उदासीनता। उन्होंने उसे सहयोग के रूप में अनुभव किया। यह ऐसा सहयोग था जिसमें कोई शब्द नहीं थे, कोई संकेत नहीं थे, कोई प्रत्यक्ष क्रिया नहीं थी, फिर भी एक शक्ति दूसरी शक्ति को उसके कार्य के लिए पूरा स्थान दे रही थी।
यह एक अत्यंत परिपक्व दैवी संबंध का संकेत है। जहाँ सामान्य जगत में लोग समर्थन को केवल सक्रिय सहभागिता से जोड़ते हैं, वहाँ इस कथा में समर्थन मौन अनुमति के रूप में प्रकट होता है। माँ कूष्मांडा जानती थीं कि उनका कार्य तभी पूर्ण होगा जब उसे अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए। भगवान शिव का मौन उन्हें वही स्वतंत्रता दे रहा था। इसलिए यह मौन दूरी नहीं बल्कि गहन सामंजस्य था।
आरंभ में देवताओं के लिए यह दृश्य रहस्यमय था। वे देख रहे थे कि एक ओर माँ कूष्मांडा की ऊर्जा विस्तार ले रही है, दूसरी ओर भगवान शिव स्थिर और मौन हैं। पर जैसे जैसे सृष्टि क्रमबद्ध होती गई, उन्हें समझ आने लगा कि इस मौन का अपना अर्थ है। उन्हें अनुभव हुआ कि हर शक्ति को हर समय सक्रिय होने की आवश्यकता नहीं होती। कभी कभी सबसे बड़ी शक्ति वही होती है जो सही समय पर स्वयं को रोक सके।
यही इस कथा का एक विशाल आध्यात्मिक संदेश है। हम प्रायः सोचते हैं कि शक्ति का प्रमाण क्रिया में है। लेकिन देवताओं ने इस प्रसंग के माध्यम से जाना कि अक्रिया भी शक्ति हो सकती है, यदि वह जागरूकता से जन्मी हो। भगवान शिव ने यह दिखाया कि जहाँ सृजन अपने धर्म में प्रवाहित हो रहा हो, वहाँ मौन रहना भी उतना ही आवश्यक हो सकता है जितना किसी अन्य समय सक्रिय होना।
यह प्रश्न केवल इस कथा के लिए नहीं, जीवन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बहुत बार मनुष्य यह मान लेता है कि जो कुछ घट रहा है, उसमें तुरंत हस्तक्षेप करना ही उसका कर्तव्य है। परंतु हर परिवर्तन को हमारी दखल की आवश्यकता नहीं होती। कुछ प्रक्रियाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें अपने समय और अपने क्रम में घटित होने देना ही सबसे उचित होता है। यदि हम उन्हें अधीरता में रोकें, मोड़ें, या अपनी इच्छा से बदलना चाहें, तो वे अधूरी रह सकती हैं।
भगवान शिव का मौन यही सिखाता है कि सही समय की पहचान ही वास्तविक बुद्धि है। जहाँ आवश्यक हो वहाँ क्रिया करें, पर जहाँ प्रक्रिया स्वयं अपने सत्य में बढ़ रही हो, वहाँ धैर्य रखें। यह धैर्य कमजोरी नहीं होता। यह एक उच्चतर प्रकार का संतुलन ज्ञान होता है।
मनुष्य के जीवन में भी कई ऐसे क्षण आते हैं जब भीतर या बाहर कुछ नया जन्म ले रहा होता है। कोई विचार, कोई संबंध, कोई परिवर्तन, कोई रचनात्मक दिशा, कोई आध्यात्मिक अनुभव, या जीवन की कोई नई अवस्था। ऐसे समय कई लोग अधीर होकर उसे नियंत्रित करना चाहते हैं। वे जल्दी निर्णय लेना चाहते हैं, जल्दी निष्कर्ष चाहते हैं, जल्दी हस्तक्षेप करना चाहते हैं। परंतु हर अंकुर को तुरंत छूना उचित नहीं होता। कुछ चीजें मौन संरक्षण चाहती हैं।
भगवान शिव की यह कथा हमें सिखाती है कि जब जीवन में कोई गहरी प्रक्रिया जन्म ले रही हो तब हर बार सक्रिय होकर उसे दिशा देना आवश्यक नहीं। कभी कभी केवल उपस्थित रहना, देखना, समझना, उसे अपना स्वाभाविक विस्तार लेने देना ही सर्वोत्तम सहयोग होता है। यही मौन कई बार किसी भी शब्द से अधिक सहायक सिद्ध होता है।
हाँ, यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है। यदि हम सृष्टि को केवल प्रकाश का जन्म मानें, तो कथा अधूरी रह जाती है। सृष्टि के लिए प्रकाश जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है वह स्थिर आधार जिसमें प्रकाश फैल सके। माँ कूष्मांडा की चेतना ने प्रकाश दिया, पर भगवान शिव के मौन ने उस प्रकाश को फैलने के लिए अवकाश दिया। इस अर्थ में शिव का मौन भी सृष्टि की प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग था।
सृजन अकेले नहीं होता। उसके पीछे कई सूक्ष्म आयाम काम करते हैं। कोई सक्रिय होकर जन्म देता है, कोई मौन रहकर जन्म को संभव बनाता है। भगवान शिव का मौन इसी दूसरे आयाम का दिव्य उदाहरण है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि कभी कभी पीछे हटना ही सबसे बड़ी भागीदारी होती है।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान शिव का मौन कोई निष्क्रियता नहीं था। वह संतुलित चेतना, सही समय की पहचान, सृजन के धर्म के प्रति सम्मान का रूप था। उन्होंने यह नहीं सोचा कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए ताकि उनकी शक्ति प्रकट हो। उन्होंने यह पहचाना कि उस क्षण सबसे बड़ा कार्य यही है कि वे मौन रहें और माँ कूष्मांडा की ऊर्जा को अपने पूर्ण स्वरूप में प्रकट होने दें।
यही इस कथा का सबसे बड़ा प्रकाश है। सच्ची शक्ति केवल कार्य करने में नहीं बल्कि यह जानने में भी है कि कब मौन रहना है। कब स्वयं को रोकना है। कब किसी दूसरी शक्ति को उसका पूर्ण विस्तार लेने देना है। भगवान शिव इसी दिव्य बुद्धि के प्रतीक बनकर सामने आते हैं।
भगवान शिव मौन क्यों रहे जब माँ कूष्मांडा प्रकट हुईं
क्योंकि वे जानते थे कि सृजन की उस प्रक्रिया को बिना हस्तक्षेप अपने पूर्ण स्वरूप में घटित होना चाहिए।
क्या शिव का मौन उदासीनता था
नहीं, वह पूर्ण जागरूकता और सृजन के धर्म के प्रति सम्मान से जन्मा हुआ मौन था।
क्या शिव सब कुछ महसूस कर रहे थे
हाँ, वे भीतर से पूरी तरह जागरूक थे और सृष्टि में घट रहे हर परिवर्तन को अनुभव कर रहे थे।
माँ कूष्मांडा ने इस मौन को कैसे देखा
उन्होंने इसे दूरी नहीं बल्कि एक ऐसे मौन सहयोग के रूप में अनुभव किया जिसमें उन्हें अपना कार्य पूर्ण रूप से करने का अवकाश मिला।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह कि हर समय सक्रिय होना आवश्यक नहीं। कई बार सही समय पर मौन रहना ही सबसे बड़ी शक्ति और सबसे गहरी बुद्धि होती है।
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