By पं. संजीव शर्मा
जब देवी ने असुर क्रोधासुर को परास्त किया

नवरात्रि के चतुर्थ पावन दिवस पर देवी के उस अत्यंत तेजस्वी स्वरूप की आराधना की जाती है जिन्हें हम माँ कूष्मांड के नाम से जानते हैं। यह वह दिव्य शक्ति हैं जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान मात्र से ब्रह्मांड की रचना की थी। अधिकतर भक्त उन्हें सृष्टि की सृजनकर्ता के रूप में पूजते हैं परंतु पुराणों के पन्नों में एक ऐसी विस्मृत कथा भी अंकित है जो उनके रक्षक स्वरूप को उजागर करती है। यह कहानी उस समय की है जब एक शक्तिशाली असुर ने स्वयं सूर्य देव की ऊर्जा को हस्तगत करने का प्रयास किया और संपूर्ण चराचर जगत को पुनः अंधकार के गर्त में धकेलने की योजना बनाई।
जब माँ कूष्मांड ने इस शून्य ब्रह्मांड की रचना की और सूर्य को अपनी दिव्य ऊर्जा से प्रदीप्त किया तब चारों ओर प्रकाश और जीवन का संचार हुआ। सूर्य की ऊष्मा ने वनस्पतियों को जीवन दिया और नक्षत्रों को उनकी गति प्रदान की। परंतु इस अपार शक्ति ने क्रोधासुर नामक एक अत्यंत विनाशकारी असुर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। क्रोधासुर को यह आभास हो गया कि सूर्य केवल एक चमकता हुआ तारा नहीं है अपितु यह संपूर्ण ब्रह्मांड की प्राण शक्ति का केंद्र है। उसने यह निष्कर्ष निकाला कि जो कोई भी सूर्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेगा वह पूरे ब्रह्मांड का स्वामी बन जाएगा। लोभ और अहंकार के वश में होकर उसने सूर्य की उस दिव्य शक्ति को बंदी बनाने का निर्णय लिया।
क्रोधासुर ने अलौकिक शक्तियां प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने आकाश मार्ग से यात्रा करने और सूर्य के अत्यंत समीप पहुँचने का सामर्थ्य प्राप्त कर लिया। जैसे ही वह उस धधकते हुए नक्षत्र के निकट पहुँचा उसने अपनी मायावी शक्तियों से सूर्य की ऊर्जा को सोखना आरंभ कर दिया। धीरे धीरे सूर्य देव की आभा फीकी पड़ने लगी। ब्रह्मांड का प्रकाश मंद होने लगा और चारों ओर फिर से वही आदिम अंधकार फैलने लगा जो सृष्टि के आरंभ से पहले विद्यमान था। देवताओं ने अनुभव किया कि यदि सूर्य की ऊर्जा पूरी तरह समाप्त हो गई तो जीवन का अस्तित्व ही मिट जाएगा।
सृष्टि पर आए इस घोर संकट को देखकर समस्त देवगण व्याकुल हो उठे और उन्होंने आदि शक्ति की शरण ली। देवताओं की आर्त्त पुकार सुनकर माँ कूष्मांड एक अत्यंत जाज्वल्यमान स्वरूप में प्रकट हुईं। उनके चारों ओर कोटि सूर्यों के समान प्रकाश का एक दिव्य पुंज विद्यमान था। अपने पराक्रमी सिंह पर सवार होकर देवी युद्धभूमि की ओर बढ़ीं। उनके आठ हाथों में सुशोभित शस्त्र और जप माला ब्रह्मांडीय संतुलन के रक्षक प्रतीत हो रहे थे। जैसे ही वह सूर्य के निकट पहुँचीं आकाश उनकी दिव्य ऊर्जा से भर गया।
क्रोधासुर ने चोरी की हुई सौर ऊर्जा का प्रयोग स्वयं देवी के विरुद्ध करने का कुत्सित प्रयास किया। उसने अग्नि की प्रचंड लपटों से माँ पर प्रहार किया। परंतु वह असुर एक आधारभूत सत्य भूल गया था कि सूर्य की वह समस्त ऊर्जा स्वयं माँ कूष्मांड की ही देन थी। देवी ने अपनी एक मंद मुस्कान बिखेरी और उनके भीतर से निकलने वाले दिव्य प्रकाश ने असुर के प्रहार को क्षण भर में छिन्न भिन्न कर दिया। माँ ने अपनी शक्ति से उस चुराई गई ऊर्जा को पुनः सूर्य में स्थापित कर दिया जिससे सूर्य देव पहले से भी अधिक तेजस्वी होकर चमकने लगे। मात्र कुछ ही क्षणों में माँ कूष्मांड ने उस असुर का अहंकार नष्ट कर उसे परास्त कर दिया और ब्रह्मांड के संतुलन को पुनः स्थापित किया।
इस महायुद्ध के उपरांत सूर्य अपनी पूर्ण भव्यता के साथ पुनः प्रकाशित हुआ और समस्त लोकों में शांति व्याप्त हो गई। देवताओं ने यह अनुभव किया कि माँ कूष्मांड न केवल इस जगत की सृजनकर्ता हैं अपितु वह इसकी ऊर्जा की परम संरक्षिका भी हैं। उनकी इसी दिव्य सामर्थ्य के कारण उन्हें वह देवी माना जाता है जो अपने भक्तों को आरोग्य, बल और लंबी आयु प्रदान करती हैं। वह सूर्य मंडल के भीतर निवास करने वाली एकमात्र शक्ति हैं जिनके तेज से सूर्य को भी प्रकाश प्राप्त होता है।
भक्त माँ कूष्मांड की पूजा समृद्धि और आंतरिक प्रकाश प्राप्त करने के लिए करते हैं। जैसे उन्होंने प्राचीन काल में सूर्य की रक्षा की थी वैसे ही भक्तों का यह विश्वास है कि वह उनके जीवन से नकारात्मकता के अंधकार को दूर कर सुरक्षा का कवच प्रदान करती हैं। उनकी साधना से व्यक्ति के भीतर की ऊर्जा जाग्रत होती है और वह कठिन से कठिन बाधाओं को पार करने का साहस प्राप्त करता है। माँ का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि सृजन और संरक्षण एक ही शक्ति के दो पहलू हैं।
माँ कूष्मांड ने सूर्य की रक्षा कैसे की थी?
उन्होंने अपनी दिव्य ऊर्जा से असुर द्वारा सोखी गई सौर शक्ति को मुक्त कराया और उसे पुनः सूर्य में स्थापित कर ब्रह्मांड को अंधकार से बचाया।
असुर क्रोधासुर सूर्य को क्यों नियंत्रित करना चाहता था?
वह जानता था कि सूर्य ब्रह्मांड की ऊर्जा का मुख्य स्रोत है और उसे नियंत्रित करके वह पूरे संसार पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता था।
माँ कूष्मांड को सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री क्यों माना जाता है?
माना जाता है कि वह सूर्य के केंद्र में निवास करती हैं और सूर्य की समस्त चमक तथा ऊष्मा वास्तव में माँ की अपनी शक्ति का ही विस्तार है।
माँ कूष्मांड की पूजा से स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
देवी की साधना करने से शरीर में जीवनी शक्ति का संचार होता है जिससे असाध्य रोगों का नाश होता है और व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
इस कथा का मुख्य आध्यात्मिक संदेश क्या है?
यह कथा सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो वह उस मूल दैवीय स्रोत को कभी पराजित नहीं कर सकती जहाँ से समस्त ऊर्जा का जन्म हुआ है।
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