By पं. नरेंद्र शर्मा
अधर्म के बढ़ते प्रभाव के समय माँ कात्यायनी की शक्ति ने संतुलन बहाल किया

रात्रि को सामान्यतः शांति, विश्राम और मौन का समय माना जाता है। पर हर रात एक सी नहीं होती। कुछ रातें ऐसी भी होती हैं जिनमें बाहर सब कुछ शांत दिखाई देता है, लेकिन भीतर अदृश्य रूप से एक ऐसा परिवर्तन जन्म ले रहा होता है जो आने वाले समय की दिशा बदल देता है। देवताओं और असुरों के बीच चल रहे उस महान संघर्ष में भी एक ऐसी ही रात आई, जब युद्ध रुक सा गया था, दिशाएँ ठहर गई थीं और एक गहरा मौन चारों ओर फैल गया था। पर वह मौन रिक्त नहीं था। उसके भीतर एक ऐसी दैवी तीव्रता उठ रही थी जिसका स्पर्श केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं था। वही वह रात थी जब माँ कात्यायनी का क्रोध अपने जागृत स्वरूप में प्रकट हुआ।
उस समय तक असुरों की शक्ति केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रही थी। उनका प्रभाव मनों पर भी पड़ने लगा था। वे केवल बाहरी पराजय नहीं देना चाहते थे बल्कि धर्म के आत्मविश्वास को भी हिलाना चाहते थे। देवताओं ने अनेक प्रयास किए थे, अनेक बार प्रतिरोध किया था, पर यह स्पष्ट हो चुका था कि अब स्थिति सामान्य दैवी हस्तक्षेप से आगे निकल चुकी है। संतुलन केवल डगमगाया नहीं था, वह टूटने की ओर बढ़ रहा था। ऐसे समय में शक्ति का शांत रहना संभव तो था, लेकिन पर्याप्त नहीं था। कुछ ऐसा आवश्यक था जो अधर्म को उसके मूल तक चुनौती दे सके।
रात्रि असामान्य रूप से स्थिर थी। न रणभेरी की ध्वनि थी, न शस्त्रों की टकराहट, न किसी सेना का उन्माद। देवताओं के बीच भी एक गहरी प्रतीक्षा थी। वे अनुभव कर रहे थे कि कोई निर्णायक परिवर्तन निकट है, पर उसका स्वरूप क्या होगा, यह वे स्पष्ट रूप से नहीं जानते थे। असुरों के भीतर भी एक अजीब सी बेचैनी थी, यद्यपि वे उसे स्वीकार नहीं करना चाहते थे। उनके लिए यह मौन असुविधाजनक था, क्योंकि युद्ध का शोर उन्हें आत्मविश्वास देता था, लेकिन यह मौन उन्हें अपने भीतर लौटने को विवश कर रहा था।
ऐसे ही समय में माँ कात्यायनी ध्यानमग्न थीं। उनका बाहरी स्वरूप शांत था, पर उनकी आभा में सूक्ष्म परिवर्तन होने लगा था। यह परिवर्तन पहले किसी को स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दिया, पर उसका प्रभाव वातावरण में फैलने लगा। जैसे जैसे रात्रि गहराती गई, वैसे वैसे उनकी ऊर्जा सघन, गंभीर और अधिक तीव्र होती गई। ऐसा लगने लगा मानो सृष्टि स्वयं अपने भीतर किसी विशाल निर्णय को धारण कर रही हो।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात समझने योग्य है। माँ कात्यायनी का क्रोध मनुष्यों के सामान्य क्रोध जैसा नहीं था। वह न तो आहत अहंकार से उत्पन्न था, न आवेग से, न ही तात्कालिक प्रतिक्रिया से। वह जागृत संकल्प था। यह वह क्रोध था जो तब प्रकट होता है जब धर्म को बचाना आवश्यक हो, जब संतुलन को पुनर्स्थापित करना अनिवार्य हो और जब अधर्म अपनी सीमा भूलकर सृष्टि की गति को दूषित करने लगे।
इसलिए यह क्रोध विनाशकारी होकर भी अंधा नहीं था। उसमें दिशा थी। उसमें उद्देश्य था। उसमें नियंत्रण था। यह वही बिंदु है जो माँ कात्यायनी के स्वरूप को अद्वितीय बनाता है। उनका क्रोध किसी को नष्ट करने की व्यक्तिगत इच्छा नहीं था बल्कि असंतुलन को समाप्त करने का दैवी संकल्प था।
कहा जाता है कि उस रात देवताओं ने सबसे पहले उस ऊर्जा का अनुभव किया जो सामान्य नहीं थी। उन्हें लगा जैसे आकाश के भीतर कोई सूक्ष्म कंपन भर गया हो। वायु का प्रवाह बदल गया था। दिशाओं में एक प्रकार की गंभीरता उतर आई थी। यह भय का वातावरण नहीं था बल्कि किसी ऐसे सत्य की उपस्थिति थी जो अब छिपा नहीं रहने वाला था। देवताओं ने समझ लिया कि माँ कात्यायनी के भीतर जो शक्ति अब तक संयमित रूप में थी, वही अब अपने अधिक प्रखर स्वरूप में प्रकट होने जा रही है।
वे विस्मित भी थे और स्थिर भी। उन्होंने पहले भी देवी के अनेक रूपों का अनुभव किया था, पर इस बार जो घट रहा था उसमें गहराई अधिक थी। यह केवल युद्ध के लिए शक्ति का जागना नहीं था। यह धर्म की ओर से अंतिम और स्पष्ट उत्तर का उठना था। उनके भीतर श्रद्धा के साथ साथ एक नया साहस जागने लगा, क्योंकि उन्होंने पहचान लिया कि अब संतुलन स्वयं बोलने वाला है।
असुरों के लिए यह रात और भी विचित्र थी। वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह परिवर्तन किस कारण से हो रहा है। उन्होंने पहले भी अनेक युद्ध देखे थे, देवताओं के क्रोध का भी सामना किया था, लेकिन यह अनुभव बिल्कुल भिन्न था। यह कोई ऐसा बाहरी आक्रमण नहीं था जिसका उत्तर तलवार या बल से दिया जा सके। यह एक ऐसी उपस्थिति थी जो उनके मन के भीतर तक पहुँच रही थी।
उनका आत्मविश्वास, जो अब तक कठोर और अचल प्रतीत होता था, धीरे धीरे दरकने लगा। कुछ असुरों ने अपने भीतर अनजाना भय महसूस किया। कुछ के विचार भ्रमित होने लगे। कुछ को लगा कि अभी तक वे जिस शक्ति का सामना कर रहे थे, वह देवी का केवल एक अंश था, जबकि अब उनके सामने उनका अधिक पूर्ण रूप खुलने वाला है। यही बोध सबसे अधिक विचलित करने वाला था।
जब विरोधी यह अनुभव कर ले कि सामने की शक्ति केवल प्रहार करने वाली नहीं बल्कि उसके भीतर छिपे असत्य को भी पहचान लेने वाली है तब उसका मन पहले ही कमजोर होने लगता है। यही स्थिति उस रात असुरों की थी। युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था, पर उनकी भीतरी स्थिरता टूटने लगी थी।
इस कथन को केवल भौतिक अर्थ में नहीं समझना चाहिए। जब कहा जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड कांप उठा, तो उसका अर्थ केवल इतना नहीं कि धरती हिली या दिशाएँ डोल गईं। उसका अर्थ यह है कि अस्तित्व के विभिन्न स्तरों पर एक तीव्र परिवर्तन का अनुभव हुआ। देवताओं ने अपनी चेतना में उसे महसूस किया। असुरों ने अपनी बेचैनी में उसे महसूस किया। प्रकृति ने अपनी गति में उसे महसूस किया। समय तक कुछ क्षणों के लिए जैसे गंभीर हो उठा।
ऐसे क्षणों में शक्ति केवल बाहर प्रकट नहीं होती, वह चेतना के स्तर पर भी काम करती है। माँ कात्यायनी का जागृत क्रोध उसी प्रकार का था। वह केवल युद्धभूमि पर उपस्थित नहीं था, वह उस पूरी ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित कर रहा था जिसमें युद्ध, निर्णय, भय, साहस और धर्म सब एक साथ सक्रिय थे।
युद्ध की दिशा सदैव अंतिम प्रहार से नहीं बदलती। कई बार वह उस क्षण बदल जाती है जब एक पक्ष का मन टूटने लगे और दूसरे पक्ष का संकल्प स्पष्ट हो जाए। उस रात माँ कात्यायनी के क्रोध ने यही किया। देवताओं के भीतर विश्वास जागा और असुरों के भीतर अस्थिरता। यह परिवर्तन बाहरी रूप से धीमा लग सकता था, पर उसकी वास्तविक तीव्रता अत्यंत गहरी थी।
कुछ असुरों ने उसी रात अनुभव कर लिया कि अब आगे बढ़ना पहले जैसा सरल नहीं रहेगा। कुछ ने पहली बार अपने भाग्य पर संदेह किया। कुछ ने अपने ही साथियों की शक्ति पर प्रश्न करना शुरू किया। वहीं दूसरी ओर देवताओं ने समझ लिया कि यह वह क्षण है जब शक्ति केवल रक्षा नहीं कर रही बल्कि धर्म की दिशा को फिर से स्थापित करने के लिए सक्रिय हो चुकी है।
इस प्रकार युद्ध की दिशा बदलने का आरंभ उसी रात हो चुका था। बाहरी विजय बाद में दिखाई दी, पर निर्णायक मोड़ उसी मौन, तीव्र और जागृत रात में आ गया था।
नहीं। इसका गहरा संबंध मनुष्य जीवन से भी है। हमारे भीतर भी ऐसे क्षण आते हैं जब कोई भावना लंबे समय तक शांत रहती है, पर भीतर ही भीतर एक निर्णय पक रहा होता है। हम प्रायः क्रोध को केवल नकारात्मक मान लेते हैं, इसलिए या तो उसे दबा देते हैं या उसे गलत दिशा में बहने देते हैं। लेकिन माँ कात्यायनी का यह स्वरूप सिखाता है कि हर क्रोध विनाशकारी नहीं होता। जब क्रोध का स्रोत सत्य, धर्म, सीमा और संतुलन हो तब वही क्रोध दैवी शक्ति बन सकता है।
जीवन में कई बार अन्याय को चुपचाप सहते रहना शांति नहीं होता बल्कि असंतुलन को बढ़ाना होता है। वहीं हर बात पर आवेश में प्रतिक्रिया देना भी शक्ति नहीं होता। माँ कात्यायनी हमें यह सिखाती हैं कि सही समय पर, सही कारण से, पूर्ण स्पष्टता के साथ जागा हुआ क्रोध ही वास्तविक शक्ति है। वह केवल तोड़ता नहीं बल्कि एक नया संतुलन स्थापित करता है।
आध्यात्मिक रूप से देखें तो माँ कात्यायनी का यह जागृत क्रोध हमारे भीतर की उस शक्ति का प्रतीक है जो असत्य, भ्रम, भय और अधर्म को अब और स्थान नहीं देना चाहती। लंबे समय तक साधक अपने भीतर की अशुद्धियों को देखता है, समझता है, सहता है। पर एक समय ऐसा आता है जब भीतर से एक स्पष्ट निर्णय उठता है कि अब परिवर्तन आवश्यक है। वही भीतर का निर्णायक संकल्प माँ कात्यायनी के जागृत क्रोध का आध्यात्मिक अर्थ है।
यह हमें सिखाता है कि आध्यात्मिकता केवल कोमलता नहीं है। उसमें दृढ़ता भी है। उसमें करुणा है, पर सीमा भी है। उसमें शांति है, पर आवश्यकता पड़ने पर तीव्रता भी है। यही सम्पूर्णता देवी को देवी बनाती है।
अंततः स्पष्ट हो जाता है कि उस रात माँ कात्यायनी का क्रोध कोई साधारण भाव नहीं था। वह धर्म की ओर से दिया गया एक अंतिम, स्पष्ट और नियंत्रित उत्तर था। उसने देवताओं को नया साहस दिया, असुरों को भीतर से तोड़ना शुरू किया और सम्पूर्ण अस्तित्व को यह दिखा दिया कि शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप केवल शांत रहना नहीं बल्कि सही समय पर जागना भी है।
माँ कात्यायनी का यह रूप हमें यह सिखाता है कि जब हम अपने भीतर की शक्ति को समझते हैं तब हम उससे डरते नहीं, उसे दिशा देते हैं। और जब शक्ति दिशा में बदल जाती है तब वह केवल विनाश नहीं करती, वह नया संतुलन भी स्थापित करती है। यही वह सत्य है जो उस रात प्रकट हुआ, जब माँ कात्यायनी का क्रोध जागा और सम्पूर्ण ब्रह्मांड उसकी तीव्रता से कांप उठा।
क्या माँ कात्यायनी का क्रोध साधारण क्रोध था
नहीं। वह आवेग नहीं बल्कि धर्म की रक्षा और संतुलन की पुनर्स्थापना के लिए जागा हुआ नियंत्रित दैवी संकल्प था।
देवताओं ने उस रात क्या अनुभव किया
उन्होंने एक असाधारण दैवी ऊर्जा का अनुभव किया जिसने उन्हें यह बोध दिया कि शक्ति अब अपने अधिक प्रखर रूप में सक्रिय हो चुकी है।
असुर क्यों विचलित हुए
क्योंकि माँ कात्यायनी की जागृत उपस्थिति ने उनके भीतर छिपे भय, संदेह और अस्थिरता को सामने ला दिया।
क्या इस कथा का संबंध हमारे जीवन से भी है
हाँ। यह सिखाती है कि सही कारण से, सही समय पर जागा हुआ नियंत्रित क्रोध भी संतुलन स्थापित करने वाली शक्ति बन सकता है।
इस प्रसंग का मुख्य संदेश क्या है
सच्ची शक्ति केवल शांति में नहीं बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दिशा युक्त तीव्रता में भी प्रकट होती है।
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