माँ कात्यायनी की उत्पत्ति और महिषासुर का अंत

By पं. अमिताभ शर्मा

नवरात्रि के छठे दिन की प्रेरक पौराणिक कथा

माँ कात्यायनी की कथा: साहस और विजय का प्रतीक

नवरात्रि के पावन पर्व का छठा दिन शक्ति की देवी माँ कात्यायनी को समर्पित है। यह देवी का वह अत्यंत प्रभावशाली और योद्धा स्वरूप है जिसकी रचना विशेष रूप से एक ऐसे संकट को समाप्त करने के लिए हुई थी जिसने स्वर्ग और पृथ्वी पर हाहाकार मचा दिया था। माँ कात्यायनी का प्राकट्य देवताओं के संचित क्रोध और उनकी सामूहिक इच्छाशक्ति का परिणाम माना जाता है। उनकी कथा केवल एक असुर के अंत की कहानी नहीं है बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि जब अधर्म अपनी सीमाओं को लांघने लगता है तब दैवीय न्याय किस प्रकार प्रकट होता है।

जब महिषासुर ने जीत लिया था देवलोक

प्राचीन काल की बात है जब महिषासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया कि संसार का कोई भी पुरुष या देवता उसका वध नहीं कर पाएगा। इस वरदान ने महिषासुर के भीतर अहंकार भर दिया और वह स्वयं को अमर मानने लगा। उसने अपनी विशाल सेना के साथ तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया। उसने देवताओं को पराजित कर दिया और स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया। स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि सभी देवता अपने ही राज्य से बाहर कर दिए गए और वे असहाय होकर भटकने लगे।

देवताओं के क्रोध से देवी का प्राकट्य

जब देवता महिषासुर को हराने में पूरी तरह विफल हो गए तब वे अपनी व्यथा लेकर त्रिदेवों अर्थात् ब्रह्मा विष्णु और शिव के पास पहुँचे। देवताओं की दुर्दशा सुनकर त्रिदेवों के भीतर गहरा क्रोध उत्पन्न हुआ। उसी समय सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य और तेजस्वी ऊर्जा बाहर निकलने लगी। यह समस्त ऊर्जाएं मिलकर एक पुंज बन गईं और उसने एक अत्यंत सुंदर और शक्तिशाली देवी का रूप धारण कर लिया। ऋषि कात्यायन ने सबसे पहले इस देवी की पूजा की थी और वे उनके आश्रम में प्रकट हुई थीं इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। उनका स्वरूप करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी था जो दुष्टों के मन में भय उत्पन्न करने वाला था।

दिव्य अस्त्रों और शस्त्रों का अर्पण

देवी को युद्ध के लिए तैयार करने हेतु सभी देवताओं ने अपने अपने प्रमुख शस्त्र उन्हें प्रदान किए। उनकी शक्ति को बढ़ाने के लिए भगवान शिव ने अपना त्रिशूल दिया और भगवान विष्णु ने अपना चक्र उन्हें भेंट किया। देवराज इंद्र ने अपना वज्र और अन्य देवताओं ने भी तलवार ढाल और धनुष जैसे दिव्य अस्त्र माँ को अर्पित किए। इन शक्तिशाली आयुधों से सुसज्जित होकर और सिंह पर सवार होकर माँ कात्यायनी महिषासुर का अंत करने के लिए निकल पड़ीं।

देवता प्रदान किया गया शस्त्र
भगवान शिव त्रिशूल
भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र
देवराज इंद्र वज्र
वरुण देव शंख

महिषासुर और माँ कात्यायनी का भीषण युद्ध

जब महिषासुर ने एक देवी को सिंह पर सवार होकर युद्ध भूमि की ओर आते देखा तो वह ठहाके मार कर हँसने लगा। उसे अपने वरदान पर पूरा भरोसा था कि कोई स्त्री उसका क्या बिगाड़ पाएगी। परंतु जैसे ही युद्ध आरंभ हुआ महिषासुर का भ्रम टूटने लगा। माँ कात्यायनी ने अद्भुत पराक्रम और कौशल का प्रदर्शन किया। यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा जिसने पूरे ब्रह्मांड को हिला कर रख दिया। अंततः माता ने अपने त्रिशूल के एक ही प्रहार से महिषासुर के हृदय को भेद दिया और उस अहंकारी असुर का वध कर दिया।

ब्रह्मांड में शांति की पुनर्स्थापना

महिषासुर की मृत्यु के साथ ही देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिल गया और चारों ओर शांति व्याप्त हो गई। सभी ऋषि मुनियों और देवताओं ने माँ की स्तुति की और उन्हें ब्रह्मांड की रक्षक के रूप में सम्मान दिया। माँ कात्यायनी का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो सत्य और धर्म की शक्ति उसे पराजित करने में हमेशा सक्षम होती है। वे आज भी अपने भक्तों के जीवन से बाधाओं और शत्रुओं का नाश करती हैं।

माँ कात्यायनी का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा?
चूंकि ऋषि कात्यायन ने उनकी कठिन तपस्या की थी और वे उनके आश्रम में प्रकट हुई थीं इसलिए उन्हें कात्यायनी कहा जाता है।

माता का वाहन क्या है?
माँ कात्यायनी सिंह पर सवार होती हैं जो अदम्य साहस और शक्ति का प्रतीक है।

महिषासुर को क्या वरदान प्राप्त था?
महिषासुर को वरदान था कि कोई भी पुरुष या देवता उसे नहीं मार पाएगा जिसके कारण वह बहुत अभिमानी हो गया था।

नवरात्रि के किस दिन माँ कात्यायनी की पूजा होती है?
नवरात्रि के छठे दिन माँ कात्यायनी की विशेष पूजा और अर्चना की जाती है।

माँ कात्यायनी भक्तों को क्या आशीर्वाद देती हैं?
वे अपने भक्तों को साहस और निर्भयता का आशीर्वाद देती हैं तथा जीवन के सभी शत्रुओं और विघ्नों को दूर करती हैं।

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पं. अमिताभ शर्मा

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