By पं. अभिषेक शर्मा
जब देवताओं ने अपनी सीमाएँ पहचानी और सामूहिक चेतना से जन्मी शक्ति

जब अधर्म धीरे धीरे अपनी सीमाएँ पार करने लगता है तब संकट केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं रहता। उसका कंपन देवताओं तक पहुँचता है, यज्ञों की स्थिरता को प्रभावित करता है, मनों में असुरक्षा भरता है और उस संतुलन को हिला देता है जिस पर सृष्टि की गति टिकी होती है। उसी प्रकार का एक समय आया जब असुरों का प्रभाव इतना व्यापक हो गया कि देवताओं के लिए यह स्पष्ट हो गया कि सामान्य प्रयास अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं। अस्त्र मौजूद थे, अनुभव मौजूद था, तप से अर्जित तेज भी था, फिर भी कहीं न कहीं एक ऐसी कमी थी जिसे शब्दों में कहना कठिन था। यह कमी केवल शक्ति की नहीं थी बल्कि उस पूर्ण उत्तर की थी जो अधर्म के बढ़ते अंधकार को एक ही बार में दिशा बदलने पर विवश कर सके।
देवताओं ने उस समय केवल भय का अनुभव नहीं किया बल्कि अपनी सीमाओं का भी अनुभव किया। यह स्वीकार करना सरल नहीं था कि वर्षों से धारण की गई सामर्थ्य के बाद भी एक ऐसी घड़ी आ सकती है जहाँ समाधान उनके हाथों से बाहर जाता हुआ प्रतीत हो। पर यही वह क्षण था जहाँ दैवी व्यवस्था का एक गहरा नियम सामने आता है। जब व्यक्तिगत शक्तियाँ पर्याप्त नहीं रहतीं तब सामूहिक दिव्य चेतना एक नए रूप को जन्म देती है। माँ कात्यायनी का प्रकट होना उसी नियम की दिव्य अभिव्यक्ति था।
उस समय ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित अनेक देवता एकत्र हुए। यह कोई साधारण मंत्रणा नहीं थी कि किस अस्त्र का प्रयोग किया जाए, किस दिशा से आक्रमण हो या किस देवता को कौन सा दायित्व दिया जाए। उसके भीतर एक गहरी बेचैनी थी। देवताओं ने यह अनुभव कर लिया था कि समस्या किसी एक असुर, किसी एक युद्ध या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अधर्म अब एक ऐसे रूप में फैल चुका था जहाँ उसे रोकने के लिए केवल पराक्रम नहीं बल्कि मूल शक्ति के प्रकट होने की आवश्यकता थी।
भगवान ब्रह्मा के भीतर सृजन की स्मृति थी, विष्णु के भीतर संरक्षण की स्थिर बुद्धि थी और शिव के भीतर संहार तथा शून्य की गहरी दृष्टि थी। फिर भी उस समय तीनों ने अनुभव किया कि उन्हें किसी ऐसी शक्ति को आमंत्रित करना होगा जो इन सबके सार को धारण कर सके और उससे भी आगे जा सके। यह बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से स्पष्ट होता है कि माँ कात्यायनी का प्रकट होना केवल देवताओं की सहायता नहीं था बल्कि स्वयं दैवी व्यवस्था का एक नया उत्तर था।
जब देवताओं की संयुक्त ऊर्जा एकत्र होने लगी तब जो घटित हुआ वह किसी साधारण तेज का प्रकट होना नहीं था। वह प्रकाश था, पर केवल प्रकाश नहीं था। उसमें संकल्प था, उसमें धर्म की पीड़ा थी, उसमें रक्षा की आवश्यकता थी और उसमें वह अदृश्य निर्णय भी था जो तब जन्म लेता है जब सृष्टि किसी गहरे असंतुलन से गुजर रही हो। उस तेज ने पहले दिशा को भरा, फिर आकाश को बदला, फिर वातावरण की गति को रूपांतरित किया। ऐसा लगने लगा जैसे समूचा अस्तित्व किसी बड़ी घटना की प्रतीक्षा में ठहर गया हो।
धीरे धीरे उस प्रकाश ने आकार लेना प्रारंभ किया। यह आकार त्वरित भी था और गंभीर भी। उसमें कोई उतावलापन नहीं था, मानो वह रूप पहले से ही अस्तित्व में था और अब केवल प्रकट होने का समय आया हो। यही वह क्षण था जब माँ कात्यायनी का स्वरूप सामने आने लगा। देवताओं ने अनेक अवतार देखे थे, अनेक देवियों के महिमा रूप का अनुभव किया था, पर इस बार जो उपस्थित हुआ उसमें कुछ अलग था। उसमें शक्ति थी, पर साथ ही ऐसी गहराई भी थी जिसे तुरंत समझ लेना संभव नहीं था।
उनके चेहरे पर अद्भुत स्थिरता थी। वह स्थिरता कठोर नहीं थी, परंतु कोमल भी नहीं थी। वह ऐसी थी जिसे देखकर अनुभव हो कि यह शक्ति विचलित नहीं हो सकती। उनकी आँखों में असाधारण तीव्रता थी, पर वह केवल क्रोध की तीव्रता नहीं थी। उसमें निर्णय की स्पष्टता थी, धर्म की रक्षा का संकल्प था और अधर्म को उसकी अंतिम सीमा तक देखने की क्षमता भी थी। यही कारण है कि देवता उन्हें देखकर एक क्षण के लिए मौन हो गए।
उन्होंने जिस शक्ति को बुलाया था, वह उनकी अपेक्षा से अधिक व्यापक थी। यह केवल युद्ध के लिए खड़ी की गई देवी नहीं थीं। यह वह शक्ति थी जो युद्ध, धर्म, संकल्प, दंड और करुणा सबको एक साथ धारण करती है। देवताओं ने उसी क्षण यह अनुभव करना शुरू किया कि वे जिस रूप के सामने खड़े हैं, उसका प्रभाव केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहेगा। यह शक्ति केवल शत्रु का विनाश नहीं करेगी बल्कि देवताओं को भी शक्ति के वास्तविक अर्थ का बोध कराएगी।
हाँ और यही इस कथा का अत्यंत गहरा पक्ष है। असुरों ने माँ कात्यायनी को तुरंत देखा हो या न देखा हो, पर उन्होंने उस परिवर्तन को अवश्य महसूस किया जो वातावरण में फैल चुका था। उन्हें अनुभव होने लगा कि कुछ ऐसा घटित हुआ है जो पहले कभी नहीं हुआ। उनके लिए यह केवल एक नई चुनौती प्रतीत हो सकती थी, पर उनके भीतर कहीं एक सूक्ष्म बेचैनी भी जन्म लेने लगी थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि दैवी शक्ति जब अपने पूर्ण निर्णय रूप में प्रकट होती है तब उसका प्रभाव केवल बाहरी नहीं होता, वह चेतना के स्तर पर भी अनुभव किया जाता है।
जब माँ कात्यायनी की दृष्टि पहली बार उस दिशा में गई जहाँ असुरों की शक्ति फैल रही थी तब उनके भीतर जो कंपन उठा वह साधारण भय नहीं था। वह ऐसा अनुभव था मानो कोई शक्ति उन्हें उनके ही भीतर के सत्य के सामने खड़ा कर रही हो। यही कारण है कि कई असुरों का आत्मविश्वास उसी समय से भीतर ही भीतर डगमगाने लगा। यह युद्ध का बाहरी आरंभ नहीं था, पर उसकी आंतरिक शुरुआत अवश्य थी।
देवताओं के लिए यह अनुभव केवल आश्वासन का नहीं था, यह शिक्षा का भी था। वे यह समझने लगे कि सच्ची शक्ति केवल अस्त्रों की संख्या, तप की अवधि या युद्धक कौशल में नहीं होती। कई बार वह ऐसी उपस्थिति में होती है जो बिना कुछ किए भी सब कुछ बदलने लगती है। माँ कात्यायनी ने कोई घोषणा नहीं की, उन्होंने किसी प्रकार का बाहरी प्रदर्शन नहीं किया, फिर भी उनका मात्र प्रकट होना ही पर्याप्त था। इससे देवताओं को यह समझ आया कि शक्ति का सर्वोच्च रूप स्वयं को सिद्ध करने में नहीं बल्कि अपने आप स्पष्ट हो जाने में है।
उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि जब सभी दैवी शक्तियाँ एक होकर किसी एक उद्देश्य के लिए समर्पित होती हैं तब जो शक्ति प्रकट होती है वह किसी एक देवता की सीमा में बंधी नहीं रहती। वह एक पूर्ण समाधान बन जाती है। माँ कात्यायनी उसी पूर्णता का रूप थीं। इसीलिए देवता उनकी शक्ति का संपूर्ण अनुमान उसी क्षण नहीं लगा सके, क्योंकि वे किसी एक परिचित परिभाषा में समाने वाली शक्ति नहीं थीं।
बहुत बार माँ कात्यायनी को केवल असुर संहारिणी के रूप में देखा जाता है। यह सत्य है कि उनका एक प्रमुख स्वरूप अधर्म के विरुद्ध खड़ा होने वाला है। परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। उनका प्रकट होना यह भी सिद्ध करता है कि वे केवल विनाश की शक्ति नहीं बल्कि संतुलन की पुनर्स्थापक शक्ति हैं। वे उस बिंदु पर आती हैं जहाँ व्यवस्था स्वयं को बचा नहीं पाती और उसे मूल शक्ति के हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
यही कारण है कि उनके स्वरूप में केवल क्रोध नहीं था बल्कि एक गहरी संयमित ऊर्जा भी थी। उनके भीतर जो तीव्रता थी, वह अनियंत्रित नहीं थी। वह शुद्ध उद्देश्य से जुड़ी हुई थी। इसलिए उनका प्रकट होना भयावह होने के साथ साथ आश्वस्तकारी भी था। देवताओं के लिए वह आश्वासन था। असुरों के लिए वह चुनौती थी। और सृष्टि के लिए वह संतुलन का पुनर्जन्म था।
यह प्रसंग केवल एक पौराणिक घटना नहीं है। यह मनुष्य जीवन के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। जीवन में कई बार ऐसा समय आता है जब व्यक्ति के पास अनुभव होता है, संसाधन होते हैं, प्रयास होते हैं, फिर भी वह अनुभव करता है कि कुछ मूलभूत कमी बनी हुई है। उसी समय बाहर नहीं, भीतर से एक नई शक्ति की आवश्यकता जन्म लेती है। यह शक्ति कई बार ज्ञान के रूप में आती है, कई बार साहस के रूप में, कई बार निर्णय के रूप में और कई बार मौन स्पष्टता के रूप में।
माँ कात्यायनी का प्रकट होना हमें यह सिखाता है कि जब परिस्थिति अत्यधिक जटिल हो जाए तब समाधान हमेशा बाहर की हलचल में नहीं मिलता। कई बार वह भीतर संचित शक्ति के एक नए रूप के रूप में प्रकट होता है। उस समय व्यक्ति स्वयं भी अपनी क्षमता का पूरा अनुमान नहीं लगा पाता। जैसे देवता माँ कात्यायनी की संपूर्ण शक्ति को तुरंत न समझ सके, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर छिपी दिव्य शक्ति का पूरा आकलन पहले क्षण में नहीं कर पाता।
इस कथा का एक सबसे बड़ा सूत्र यही है कि सच्ची शक्ति को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। उसे ऊँचे स्वर, प्रदर्शन या बाहरी स्वीकृति की ज़रूरत नहीं होती। जब वह प्रकट होती है, तो उसकी उपस्थिति ही पर्याप्त होती है। माँ कात्यायनी ने यह सिद्ध किया। उनका प्रकट होना ही देवताओं के लिए शिक्षा बन गया, असुरों के लिए अस्थिरता और धर्म के लिए आशा।
यह हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में अपनी शक्ति को हर समय साबित करना आवश्यक नहीं है। यदि भीतर स्पष्टता है, यदि उद्देश्य शुद्ध है और यदि संकल्प सच्चा है, तो एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति की उपस्थिति ही बहुत कुछ कह देती है। यही माँ कात्यायनी की लीला का गहरा बोध है।
अंततः स्पष्ट हो जाता है कि माँ कात्यायनी का प्रकट होना केवल एक दैवी घटना नहीं था बल्कि शक्ति के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन था। उस दिन देवताओं ने जाना कि शक्ति का अर्थ केवल बल नहीं बल्कि गहराई भी है। केवल तेज नहीं बल्कि संयम भी है। केवल आक्रमण नहीं बल्कि अंतिम स्पष्ट उत्तर भी है। इसीलिए वे उनकी संपूर्ण क्षमता का अनुमान उसी क्षण नहीं लगा सके। वे उस शक्ति के सामने खड़े थे जो उनके परिचित अनुभव से कहीं अधिक बड़ी थी।
माँ कात्यायनी का वह प्रथम प्राकट्य हमें यह सिखाता है कि जब धर्म के पक्ष में, सत्य के पक्ष में और संतुलन के पक्ष में सामूहिक संकल्प जागता है तब जो शक्ति प्रकट होती है वह साधारण नहीं होती। वह केवल संकट का समाधान नहीं लाती, वह शक्ति की हमारी समझ को भी बदल देती है। यही वह गहरा रहस्य है जो उस क्षण में छिपा था, जब माँ कात्यायनी प्रकट हुईं और देवता भी उनकी वास्तविक शक्ति का संपूर्ण अनुमान नहीं लगा सके।
माँ कात्यायनी का प्रकट होना क्यों आवश्यक हुआ था
क्योंकि असुरों का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि सामान्य दैवी प्रयास पर्याप्त नहीं रह गए थे और संतुलन के लिए मूल शक्ति का प्रकट होना आवश्यक हो गया था।
देवता उनकी शक्ति का अनुमान तुरंत क्यों नहीं लगा सके
क्योंकि माँ कात्यायनी केवल एक युद्ध रूप नहीं थीं। वे सामूहिक दैवी संकल्प की पूर्ण अभिव्यक्ति थीं, जिसकी गहराई तत्काल समझ पाना कठिन था।
क्या असुरों ने भी उनके प्रकट होने का प्रभाव महसूस किया
हाँ। उन्होंने उस सूक्ष्म परिवर्तन और बेचैनी को अनुभव किया, जिसने उनके आत्मविश्वास को भीतर से हिलाना शुरू कर दिया।
क्या माँ कात्यायनी केवल विनाश की शक्ति हैं
नहीं। वे संतुलन की पुनर्स्थापक, धर्म की रक्षिका और शुद्ध संकल्प की दिव्य अभिव्यक्ति हैं।
इस कथा का मुख्य संदेश क्या है
सच्ची शक्ति को बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जब वह प्रकट होती है, तो उसकी उपस्थिति ही दिशा बदलने के लिए पर्याप्त होती है।
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