By पं. नीलेश शर्मा
शून्यता से जीवन तक की एक दिव्य गाथा

नवरात्रि के पावन उत्सव का चतुर्थ चरण माँ कूष्मांड को समर्पित है। देवी का यह स्वरूप अत्यंत दीप्तिमान और ममतामयी है जिन्हें संपूर्ण चराचर जगत की आदि-शक्ति माना जाता है। जहाँ देवी के अन्य रूप असुरों के संहार और न्याय के लिए विख्यात हैं वहीं माँ कूष्मांड का अस्तित्व कुछ और ही असाधारण और अलौकिक कार्य के लिए जाना जाता है। प्राचीन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब इस संसार का कोई अस्तित्व नहीं था तब देवी ने केवल अपनी एक मंद मुस्कान से इस अनंत ब्रह्मांड की रचना की थी। उनकी यह मुस्कान ही वह प्रथम बीज थी जिससे जीवन और प्रकाश का अंकुरण हुआ।
सृष्टि की रचना से बहुत पहले का समय अत्यंत भयावह और शांत था। उस समय न सूर्य का अस्तित्व था और न ही चंद्रमा की शीतलता थी। आकाश में तारे नहीं थे और कहीं भी जीवन का कोई नामोनिशान नहीं था। संपूर्ण ब्रह्मांड केवल एक घने और अंतहीन अंधकार से भरा हुआ था जिसे तम कहा जाता था। वहां न कोई गति थी और न ही किसी प्रकार की ध्वनि सुनाई देती थी। यहाँ तक कि देवताओं और दानवों का भी उस समय तक प्राकट्य नहीं हुआ था। सब कुछ केवल एक मौन शून्यता के रूप में विद्यमान था। इसी ब्रह्मांडीय अंधकार के केंद्र से एक अत्यंत शक्तिशाली दिव्य ऊर्जा पुंज का उदय हुआ। यह ऊर्जा धीरे-धीरे एक अत्यंत मनमोहक और तेजस्वी देवी के स्वरूप में ढलने लगी जिन्हें आज हम माँ कूष्मांड के नाम से जानते हैं।
देवी का यह प्राकट्य किसी भौतिक क्रिया का परिणाम नहीं था अपितु यह उनकी स्वयं की इच्छा का परिणाम था। उन्होंने देखा कि यह शून्य अधूरा है और इसे जीवन की आवश्यकता है। उनके भीतर से एक ऐसी करुणा जागी जिसने जड़ता को चेतनता में बदलने का संकल्प लिया। वे उस अंधकार के सागर में एक सुनहरे सूर्य की भांति चमक रही थीं। उनके मुखमंडल का तेज इतना प्रबल था कि वह किसी भी सीमा को पार करने की क्षमता रखता था। यही वह क्षण था जब ब्रह्मांड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना घटने वाली थी।
देवी ने इस विशाल ब्रह्मांड का निर्माण किसी युद्ध या प्रचंड भौतिक बल के माध्यम से नहीं किया। उन्होंने एक अत्यंत सरल किंतु चमत्कारी क्रिया की। उन्होंने मंद-मंद मुस्कुराना आरंभ किया। जैसे ही उनकी वह दिव्य मुस्कान अंधकार के उस सन्नाटे में फैली वैसे ही शून्यता के भीतर प्रकाश का एक प्रचंड विस्फोट हुआ। उस अलौकिक प्रकाश से एक ब्रह्मांडीय अंडे का जन्म हुआ जिसे ब्रह्मांडीय अण्ड कहा जाता है। इसी अण्ड से सृष्टि की समस्त रचनाओं का विस्तार शुरू हुआ। तारे, ग्रह, नक्षत्र, आकाशगंगाएं और अंततः सूक्ष्म जीव धीरे-धीरे अस्तित्व में आने लगे।
उनकी मुस्कान से निकलने वाली तरंगों ने अंतरिक्ष के खालीपन को भर दिया। जैसे-जैसे उनकी मुस्कान गहरी होती गई वैसे-वैसे तत्वों का निर्माण होने लगा। अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी जैसे पंचतत्वों ने आकार लेना शुरू किया। चूँकि उन्होंने इस ब्रह्मांडीय गोले का सृजन अपनी मुस्कान और कोख से किया था इसलिए उन्हें कूष्मांड कहा गया। इस मुस्कान ने न केवल जीवन दिया बल्कि ब्रह्मांड को एक व्यवस्था प्रदान की ताकि सब कुछ एक नियम के तहत चल सके। उनकी इस कोमलता में ही ब्रह्मांड का सारा रहस्य छिपा हुआ है।
माँ कूष्मांड के विषय में एक अन्य अत्यंत रोचक और विस्मयकारी मान्यता प्रचलित है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मांड की रचना करने के पश्चात देवी ने सूर्य के सबसे आंतरिक केंद्र में निवास करने का निर्णय लिया। यह माना जाता है कि सूर्य की वह प्रचंड ऊर्जा और तीव्रता सीधे माँ की दिव्य शक्ति से ही प्रवाहित होती है। संसार का कोई भी अन्य देवता या दिव्य प्राणी सूर्य के उस भीषण ताप को सहन करने में समर्थ नहीं है परंतु माँ कूष्मांड वहां अत्यंत सहजता के साथ निवास करती हैं।
वे वहीं से संपूर्ण ब्रह्मांड को निरंतर ऊर्जा और जीवन प्रदान करती रहती हैं। बिना उनकी अनुमति के सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर जीवन का संचार नहीं कर सकता है। उन्हें सूर्यलोक निवासिनी भी कहा जाता है क्योंकि उनका तेज सूर्य के तेज के समान ही प्रभावशाली है। उनकी उपस्थिति ही सूर्य को वह सामर्थ्य प्रदान करती है कि वह अरबों वर्षों तक बिना थके प्रकाश फैलाता रहे। यदि माँ एक क्षण के लिए भी अपनी शक्ति वापस ले लें तो संपूर्ण ब्रह्मांड पुनः उसी प्राचीन अंधकार में विलीन हो जाएगा।
माँ कूष्मांड को अक्सर आठ भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उनकी प्रत्येक भुजा में एक पवित्र वस्तु सुशोभित है जो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने वाले विभिन्न बलों का प्रतिनिधित्व करती है। वे अपने हाथों में धनुष, बाण, चक्र और गदा जैसे अस्त्र धारण करती हैं जो धर्म की रक्षा का संदेश देते हैं। एक हाथ में वे कमंडल और दूसरे में अमृत कलश रखती हैं जो जीवन के पोषण और अमरता का प्रतीक है। माँ के हाथ में एक जप माला भी होती है जो समस्त सिद्धियों और निधियों का केंद्र मानी जाती है। वे एक शक्तिशाली सिंह पर सवार होकर विचरण करती हैं जो अदम्य साहस और ब्रह्मांडीय अधिकार का प्रतीक है।
उनकी यह आठ भुजाएं आठों दिशाओं की रक्षा करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि उनके द्वारा रचित ब्रह्मांड में कहीं भी असंतुलन पैदा न हो। उनका वाहन सिंह यह दर्शाता है कि सृजन के लिए जितनी कोमलता आवश्यक है उतनी ही शक्ति भी अनिवार्य है।
नवरात्रि का चौथा दिन उस क्षण का प्रतिनिधित्व करता है जब दिव्य ऊर्जा भक्त के आध्यात्मिक पथ को प्रकाशित करना आरंभ करती है। पिछले दिनों के कठिन अनुशासन और भक्ति के पश्चात साधक के भीतर आंतरिक शक्ति और जागरण का अनुभव होने लगता है। माँ कूष्मांड इसी जागरण की ऊर्जा का स्वरूप हैं। उनकी साधना करने से मनुष्य के भीतर की सुप्त शक्तियां जागृत होती हैं और उसका मन सूर्य के समान तेजस्वी होने लगता है।
जो साधक निष्काम भाव से उनकी शरण में जाता है माँ उसे रोग, शोक और भय से मुक्त कर एक नई चेतना प्रदान करती हैं। योग शास्त्र के अनुसार माँ का संबंध अनाहत चक्र से है जो हृदय में स्थित है। जब भक्त का मन इस चक्र में पहुँचता है तो उसे संपूर्ण ब्रह्मांड की एकता का आभास होने लगता है। माँ उसे सिखाती हैं कि कैसे अपनी आंतरिक मुस्कान से वह अपने जीवन के दुखों को समाप्त कर सकता है।
माँ कूष्मांड की यह कथा एक अत्यंत सुंदर आध्यात्मिक सत्य को उजागर करती है। यह ब्रह्मांड किसी संघर्ष से नहीं बल्कि दिव्य आनंद की एक छोटी सी चिंगारी से शुरू हुआ था। उनकी वह मुस्कान भक्तों को यह स्मरण कराती है कि सृजन का आधार सकारात्मक ऊर्जा, प्रकाश और आशा है। जब भी आपके जीवन में अंधकार छा जाए तो माँ की उस मुस्कान का ध्यान करना चाहिए क्योंकि एक नन्हीं सी दिव्य किरण ही पूरे ब्रह्मांड को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखती है।
वे हमें सिखाती हैं कि रचनात्मकता के लिए मन का प्रसन्न होना और हृदय में करुणा का होना अनिवार्य है। उनकी मुस्कान यह भी बताती है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग कठिन परिश्रम के साथ-साथ प्रसन्नता से भी भरा होना चाहिए। वे उस शक्ति की प्रतीक हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराने का साहस देती है।
माँ कूष्मांड का नाम कैसे पड़ा?
कू का अर्थ छोटा, उष्म का अर्थ ऊर्जा और अण्ड का अर्थ ब्रह्मांडीय गोला है। अपनी मुस्कान से ब्रह्मांड बनाने के कारण उन्हें कूष्मांड कहा गया।
देवी सूर्य के भीतर क्यों निवास करती हैं?
वे सूर्य को ऊर्जा प्रदान करने वाली मूल शक्ति हैं और केवल वही सूर्य के प्रचंड ताप को सहन करने की क्षमता रखती हैं।
माँ कूष्मांड की पूजा से क्या लाभ मिलता है?
उनकी आराधना से उत्तम स्वास्थ्य, आयु, यश और बल की प्राप्ति होती है। वे मानसिक विकारों को दूर कर बुद्धि को निर्मल बनाती हैं।
वे किस वाहन पर सवारी करती हैं?
माँ कूष्मांड सिंह पर सवारी करती हैं जो निर्भयता और शक्ति का संदेश देता है।
माँ कूष्मांड का प्रिय भोग क्या है?
देवी को कुम्हड़े (पेठा) की बलि या उससे बनी मिठाई अत्यंत प्रिय है क्योंकि इसका आकार भी ब्रह्मांडीय अण्ड जैसा माना जाता है।
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