By पं. नीलेश शर्मा
सृष्टि के आरंभ में प्रकाश और अंधकार के बीच सूक्ष्म संघर्ष का रहस्य

सृष्टि के प्रारंभ का वह क्षण जितना दिव्य था, उतना ही गंभीर भी था। सामान्य रूप से इस प्रसंग को केवल इस तरह याद किया जाता है कि अंधकार समाप्त हुआ और प्रकाश प्रकट हो गया। परंतु इस परिवर्तन के भीतर एक बहुत गहरी परत छिपी हुई है। यह केवल रोशनी के जन्म की कथा नहीं थी। यह उस समय की भी कथा थी जब अस्तित्व की दिशा बदल रही थी, हर शक्ति उस बदलाव को सहज भाव से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। माँ कूष्मांडा ने जब अपनी चेतना से प्रकाश को प्रकट किया तब केवल एक उजाला नहीं फैला बल्कि पूरे ब्रह्मांड के आधार में परिवर्तन शुरू हो गया।
उस समय अंधकार को केवल रिक्तता मान लेना भूल होगी। वह एक निष्क्रिय शून्य नहीं था। उसमें भी अपनी एक प्रकृति, अपनी एक पकड़, अपनी एक व्यवस्था थी। बहुत सी सूक्ष्म शक्तियाँ उसी अंधकार में स्थित थीं। वही उनका क्षेत्र था, वही उनका आवरण था, वही उनका सुरक्षित स्थान भी था। जब माँ कूष्मांडा का प्रकाश फैलने लगा तब यह केवल नया प्रकाश नहीं था बल्कि एक ऐसा परिवर्तन था जिसने उन सभी शक्तियों के अस्तित्व को चुनौती दी जो अंधकार की अवस्था में स्थिर थीं। इसी कारण उस दिन जो हुआ, वह केवल प्रकाश का उत्सव नहीं था। वह एक अदृश्य संघर्ष भी था।
आम धारणा यह है कि अंधकार का अर्थ केवल प्रकाश का अभाव है। लेकिन देवी कथाओं के सूक्ष्म संकेत बताते हैं कि सृष्टि के प्रारंभिक चरण में अंधकार की भी एक सक्रिय भूमिका थी। वह वह क्षेत्र था जहाँ अभी सब कुछ अप्रकट था। संभावनाएँ थीं, पर रूप नहीं था। गति की संभावना थी, पर दिशा नहीं थी। यही वह स्थान था जहाँ कुछ सूक्ष्म ऊर्जाएँ अपने ढंग से सक्रिय थीं। वे प्रकाश के अभाव में ही बनी रह सकती थीं, क्योंकि प्रकाश उनके स्वरूप को बदल देता।
यहीं इस कथा का पहला रहस्य खुलता है। जब माँ कूष्मांडा ने प्रकाश को जन्म दिया तब उन्होंने केवल उजाला नहीं फैलाया बल्कि उस पुराने क्षेत्र की संरचना को भी बदलना शुरू किया जिसमें कुछ शक्तियाँ पहले से स्थिर थीं। इसलिए विरोध स्वाभाविक था। जो शक्ति अंधकार में फलती हो, वह प्रकाश को केवल सुंदरता के रूप में नहीं देखेगी। वह उसे अपने लिए संकट के रूप में भी देख सकती है।
कथा यह नहीं कहती कि वे शक्तियाँ सामान्य अर्थ में केवल दुष्ट थीं। यह कहना अधिक उचित होगा कि वे अंधकार प्रधान ऊर्जाएँ थीं। वे उसी अवस्था में सहज थीं जहाँ अस्पष्टता हो, आच्छादन हो, परिवर्तन धीमा हो। जब प्रकाश अचानक प्रकट हुआ तब उन्हें लगा कि उनका क्षेत्र उनसे छिन रहा है। उनका विरोध इस अर्थ में था कि वे उस नए विस्तार को रोकना चाहती थीं जो उनकी पुरानी स्थिति को भंग कर रहा था।
यह विरोध किसी युद्ध के मैदान जैसा नहीं था। वहाँ कोई तलवारें नहीं थीं, कोई घोषणाएँ नहीं थीं, कोई प्रत्यक्ष टकराव नहीं था। यह संघर्ष बहुत सूक्ष्म स्तर पर था। उन शक्तियों ने प्रकाश को सीमित करने का प्रयास किया। उन्होंने उसके प्रसार को धीमा करने की कोशिश की। जैसे कोई पुरानी आदत नई दिशा को रोकती है, जैसे कोई जड़ता विकास को देर तक टालना चाहती है, वैसे ही इन ऊर्जाओं ने भी उस दिव्य प्रकाश को पूरी तरह फैलने से रोकना चाहा।
माँ कूष्मांडा का प्रकाश केवल बाहर फैलने वाली चमक नहीं था। वह चेतन प्रकाश था। इसलिए विरोध उनसे छिपा नहीं रह सकता था। जैसे ही कुछ शक्तियों ने उस विस्तार को रोकने का प्रयास किया, माँ कूष्मांडा ने उसे तुरंत महसूस किया। उन्होंने यह समझ लिया कि सृष्टि का यह रूपांतरण सभी के लिए सहज नहीं होगा। जहाँ भी नई व्यवस्था जन्म लेती है, वहाँ पुरानी संरचनाएँ पहले प्रतिक्रिया करती हैं। यह प्रतिक्रिया कभी प्रत्यक्ष होती है, कभी बहुत सूक्ष्म।
पर यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि माँ कूष्मांडा ने विरोध देखकर अपना प्रकाश नहीं रोका। उन्होंने उसे कम नहीं किया। उन्होंने कोई क्रोधित प्रतिक्रिया भी नहीं दी। इसके बजाय उन्होंने अपनी ऊर्जा को और अधिक गहरा, स्थिर, मौलिक बना दिया। यह बहुत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संकेत है। जब विरोध बाहर उठे तब उत्तर हमेशा शोर से नहीं दिया जाता। कई बार उत्तर यह होता है कि अपनी ऊर्जा को भीतर से और अधिक सत्य बना लिया जाए।
यदि प्रकाश केवल फैलता, पर स्थिर न होता, तो विरोध करने वाली शक्तियाँ उसे डिगा सकती थीं। इसलिए माँ कूष्मांडा ने अपने प्रकाश को केवल विस्तार नहीं दिया बल्कि उसे स्थिर तेज का रूप दिया। जब प्रकाश स्थिर हो जाता है तब वह केवल चमकता नहीं बल्कि धारण भी करता है। यही वह क्षण था जब उनका प्रकाश केवल सृजन की शुरुआत न रहकर सृष्टि का आधार बनने लगा।
जैसे जैसे उनका प्रकाश गहरा होता गया, विरोध करने वाली शक्तियों की तीव्रता कम होती गई। वे उसे रोक नहीं सकीं। वे केवल कुछ समय तक उसके सामने ठहराव पैदा कर सकीं। अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा। पर यहाँ कथा का अगला रहस्य सामने आता है। वे पूरी तरह नष्ट नहीं हुईं।
नहीं। यही इस कथा का सबसे गहरा और परिपक्व सत्य है। अंधकार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। उसका स्वरूप बदल गया। जो पहले व्यापक और प्रधान अवस्था में था, वह अब पीछे चला गया। कुछ शक्तियाँ छिप गईं। कुछ ने अपना प्रभाव खो दिया। कुछ ने संतुलन के भीतर नई जगह बना ली। इससे यह समझ आता है कि सृष्टि केवल प्रकाश पर नहीं चलती। उसमें अप्रकाशित, मौन, गूढ़ तत्व भी बने रहते हैं।
अंधकार अब खुली सत्ता के रूप में नहीं रहा, पर वह पूरी तरह मिटा भी नहीं। वह संतुलन की एक परत बन गया। यही कारण है कि इस कथा को केवल प्रकाश की विजय के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। यह संतुलन की पुनर्स्थापना की कथा है। प्रकाश ने अपना स्थान पाया, पर अंधकार को भी अस्तित्व से पूरी तरह बाहर नहीं किया गया। उसे उसकी उचित मर्यादा में रखा गया।
भगवान विष्णु ने इस परिवर्तन को बहुत सूक्ष्म रूप से महसूस किया। उन्होंने समझ लिया कि सृष्टि केवल प्रकाश के अत्यधिक विस्तार से नहीं चल सकती। यदि सब कुछ केवल तेज ही हो जाए, तो भी असंतुलन पैदा हो सकता है। इसलिए उन्होंने यह पहचाना कि संरक्षण के लिए प्रकाश और अंधकार दोनों के बीच एक सम्यक लय चाहिए। प्रकाश दिशा देता है, पर गहराई कई बार अंधकार के क्षेत्र से भी आती है।
भगवान शिव ने इस स्थिति को और भी सहजता से स्वीकार किया, क्योंकि वे स्वयं उस शून्य तत्त्व के प्रतीक हैं जहाँ प्रकाश और अंधकार दोनों एक व्यापक मौन में स्थित रहते हैं। उनके लिए यह विरोध आश्चर्य का विषय नहीं था। वे जानते थे कि जब भी कोई नया प्रकाश जन्म लेगा, शून्य और अंधकार की पुरानी परतें एक प्रतिक्रिया अवश्य देंगी। यही सृष्टि का स्वाभाविक धर्म है।
यही वह स्थान है जहाँ यह पुरातन कथा अत्यंत जीवित और प्रासंगिक हो उठती है। हमारे जीवन में भी जब कोई नया प्रकाश जन्म लेता है, कोई नई समझ आती है, कोई सत्य भीतर से प्रकट होता है तब पुरानी आदतें, पुराने भय, पुराने भ्रम, पुराने विचार तुरंत उसका स्वागत नहीं करते। वे उसका विरोध करते हैं। वे उसे रोकना चाहते हैं। वे उसी पुराने अंधकार में रहना अधिक सहज समझते हैं जिसमें वे लंबे समय से टिके हुए थे।
इसलिए जब जीवन में परिवर्तन आता है, तो उसका विरोध होना असामान्य नहीं है। माँ कूष्मांडा की कथा सिखाती है कि इस विरोध को देखकर घबराना नहीं चाहिए। यह कोई विफलता नहीं है। यह संकेत है कि भीतर सचमुच कुछ नया जन्म ले रहा है। यदि प्रकाश कमजोर हो, तो पुरानी परतें उसे दबा देती हैं। यदि प्रकाश स्थिर हो, तो वे धीरे धीरे पीछे हटती हैं और नया संतुलन जन्म लेता है।
इस कथा का एक और गहरा संकेत यही है कि अंधकार को हमेशा शत्रु की तरह नहीं समझना चाहिए। अंधकार का भी अपना स्थान है। बीज अंधकार में अंकुरित होता है। गर्भ का विकास भी अंधकार में होता है। ध्यान की गहराई भी कई बार बाहरी प्रकाश से हटकर मौन में उतरती है। समस्या अंधकार में नहीं है। समस्या तब होती है जब अंधकार प्रकाश के योग्य परिवर्तन को रोकना चाहता है।
माँ कूष्मांडा का प्रकाश अंधकार को मिटाने नहीं आया था। वह उसे उसकी उचित मर्यादा में लाने आया था। यही संतुलन है। यही कारण है कि उनकी कथा हमें केवल उजाला चुनने की नहीं बल्कि उचित संतुलन समझने की शिक्षा देती है।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि वह दिन केवल अंधकार के टूटने का दिन नहीं था। वह वह दिन था जब सृष्टि ने पहली बार यह जाना कि परिवर्तन के साथ विरोध भी जन्म लेता है, फिर भी प्रकाश को रुकना नहीं चाहिए। माँ कूष्मांडा ने यह सिद्ध किया कि जब प्रकाश अपने मूल सत्य में स्थिर हो जाता है तब विरोध करने वाली शक्तियाँ या तो रूपांतरित हो जाती हैं, या अपनी मर्यादा में चली जाती हैं।
यही इस कथा का अंतिम प्रकाश है। सच्ची प्रगति विरोध के अभाव से नहीं होती। सच्ची प्रगति तब होती है जब नया प्रकाश पर्याप्त स्थिर हो, इतना गहरा हो, कि वह विरोध को समझते हुए भी आगे बढ़ सके। माँ कूष्मांडा इसी दिव्य धैर्य, इसी जागृत शक्ति, इसी संतुलित प्रकाश की अधिष्ठात्री हैं।
कुछ शक्तियों ने माँ कूष्मांडा के प्रकाश का विरोध क्यों किया
क्योंकि वे अंधकार प्रधान ऊर्जाएँ थीं, नया प्रकाश उनके पुराने क्षेत्र तथा प्रभाव को बदल रहा था।
क्या यह विरोध किसी युद्ध की तरह था
नहीं। यह बहुत सूक्ष्म स्तर पर हुआ संघर्ष था, जहाँ प्रकाश के प्रसार को सीमित करने की कोशिश की गई।
माँ कूष्मांडा ने इस विरोध का उत्तर कैसे दिया
उन्होंने अपने प्रकाश को रोका नहीं बल्कि उसे और अधिक गहरा, स्थिर और शक्तिशाली बना दिया।
क्या अंधकार पूरी तरह समाप्त हो गया था
नहीं। उसका स्वरूप बदल गया। वह खुली सत्ता के रूप में पीछे हट गया, पर संतुलन के एक भाग के रूप में बना रहा।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
जब नया प्रकाश जन्म लेता है, तो पुरानी परतें उसका विरोध करती हैं। सच्ची प्रगति वही है जो इस विरोध को समझकर भी संतुलित रूप से आगे बढ़े।
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