By अपर्णा पाटनी
सृष्टि के आरंभ में माँ कूष्मांडा की दिव्य ऊर्जा और उसके रहस्य

माँ कूष्मांडा का स्वरूप केवल देवी शक्ति का एक उज्ज्वल रूप नहीं है बल्कि वह उस आदिशक्ति का केंद्र है जिससे सृष्टि का प्रकाश, गति और संतुलन जन्म लेता है। उनके बारे में कहा जाता है कि जब वे अपने पूर्ण तेज में प्रकट होती हैं तब देवताओं के लिए भी उन्हें सीधे देख पाना सहज नहीं होता। यह बात केवल भक्ति भाव में कही गई अतिशयोक्ति नहीं है। इसके पीछे एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। यह रहस्य केवल प्रकाश की तीव्रता से जुड़ा नहीं है बल्कि उस चेतना से जुड़ा है जो उस प्रकाश के भीतर कार्य कर रही होती है।
सृष्टि के आरंभिक क्षणों में जब माँ कूष्मांडा की ऊर्जा शून्य में फैलनी शुरू हुई तब देवताओं ने पहली बार उस दिव्य विस्तार को अनुभव किया। वे जानना चाहते थे कि यह कैसी शक्ति है जो अंधकार को हटाकर केवल प्रकाश ही नहीं बल्कि जीवन की संभावना भी उत्पन्न कर रही है। पर जैसे ही उन्होंने उस तेज की ओर अपनी दृष्टि स्थिर करने का प्रयास किया, उनके भीतर एक विचित्र कंपन पैदा हुआ। वे समझ गए कि यह कोई साधारण आभा नहीं है। यह वह मूल प्रकाश है जिसके सामने उनकी अपनी सत्ता भी सीमित प्रतीत होती है।
सामान्य प्रकाश आंखों को चकाचौंध कर सकता है, लेकिन माँ कूष्मांडा का तेज केवल नेत्रों को नहीं बल्कि अंतर चेतना को भी स्पर्श करता है। यही कारण है कि देवताओं का विचलित होना केवल दृश्य असुविधा नहीं था। वह एक गहरी अनुभूति थी। यह वह प्रकाश था जो सृष्टि को बाहर से प्रकाशित नहीं कर रहा था बल्कि अस्तित्व के मूल नियमों को भीतर से सक्रिय कर रहा था। जो भी उसके सामने खड़ा होता, उसे अपनी सीमित सत्ता और उस असीम शक्ति के बीच का अंतर तुरंत अनुभव होने लगता।
यही कारण था कि देवता अधिक देर तक उस तेज पर दृष्टि स्थिर नहीं रख पाते थे। उन्हें यह भय नहीं था कि वे जल जाएंगे। उन्हें यह अनुभव हो रहा था कि यदि वे उस प्रकाश में अधिक देर तक स्थिर रहे, तो उनकी अपनी पृथक पहचान उस महान चेतना में विलीन होने लगेगी। यह भय शरीर का भय नहीं था। यह उस स्थिति का भय था जहाँ सीमित सत्ता अपने सामने अनंत सत्ता को पहचान लेती है।
इस प्रश्न का उत्तर बहुत महत्वपूर्ण है। देवताओं की प्रतिक्रिया को यदि केवल भय कहा जाए, तो बात अधूरी रह जाएगी। वह भय के साथ साथ श्रद्धा, विनम्रता, स्वयं की सीमा की पहचान भी थी। जब कोई शक्ति अपने से कहीं अधिक विशाल, अधिक प्राचीन और अधिक गहन सत्ता के सामने खड़ी होती है तब उसके भीतर स्वाभाविक रूप से एक ऐसा भाव जागता है जिसमें आकर्षण भी होता है और संकोच भी।
माँ कूष्मांडा का तेज ऐसा ही था। वह भयभीत करने के लिए नहीं था बल्कि यह दिखाने के लिए था कि सृष्टि का मूल प्रकाश किसी साधारण अनुभव की वस्तु नहीं है। उसे पाने के लिए केवल आंखें पर्याप्त नहीं हैं। उसके लिए चेतना की तैयारी चाहिए। देवताओं ने इस सत्य को अनुभव किया और इसलिए उनकी दृष्टि स्वयं झुक जाती थी।
कथा कहती है कि भगवान ब्रह्मा ने एक बार इस तेज को समझने का गंभीर प्रयास किया। सृजन से जुड़े होने के कारण उनके भीतर यह स्वाभाविक जिज्ञासा थी कि जिस शक्ति से सृष्टि का मूल प्रकाश उत्पन्न हुआ है, उसका स्वरूप क्या है। उन्होंने अपनी पूरी चेतना को केंद्रित किया और उस प्रकाश की ओर देखने का प्रयास किया। कुछ क्षणों तक वे उस दिव्य आभा को धारण कर सके। उन्होंने उसके भीतर केवल चमक नहीं बल्कि एक अद्भुत सृजन स्पंदन महसूस किया।
लेकिन थोड़ी ही देर में उन्हें ज्ञात हो गया कि यह वह शक्ति नहीं है जिसे पूरी तरह दृष्टि में बाँधा जा सके। ब्रह्मा ने अपनी दृष्टि हटा ली, क्योंकि उन्होंने समझ लिया कि यह केवल देखे जाने योग्य प्रकाश नहीं बल्कि अनुभव किए जाने योग्य चेतना है। यह प्रसंग यह भी बताता है कि सृजनकर्ता होने पर भी हर शक्ति के ऊपर एक और मूल शक्ति होती है, ब्रह्मा ने उस सत्य को विनम्रता से स्वीकार किया।
भगवान विष्णु का दृष्टिकोण अलग था। उन्होंने इस प्रकाश को देखने की जिद नहीं की। उन्होंने इसे स्वीकार करने का मार्ग चुना। उनकी प्रकृति ही संतुलन, समरसता और संरक्षण से जुड़ी है। उन्होंने यह समझ लिया कि इस तेज को आंखों से पकड़ने की आवश्यकता नहीं है। उससे जुड़ने के लिए चेतना को उसकी लय में रखना अधिक आवश्यक है।
इसलिए विष्णु ने अपनी अंतर चेतना को उस दिव्य ऊर्जा के साथ सामंजस्य में रखा। इस प्रकार उन्हें उस तेज का अर्थ समझने में सहायता मिली। उन्होंने जाना कि माँ कूष्मांडा का प्रकाश केवल चकाचौंध नहीं बल्कि पालन योग्य लय भी है। यहीं से यह संकेत मिलता है कि कुछ सत्य सीधे देखने से नहीं बल्कि शांत होकर स्वीकार करने से समझे जाते हैं।
भगवान शिव का दृष्टिकोण सबसे अधिक गहरा और विशिष्ट माना जाता है। उन्होंने उस तेज को देखने का प्रयास नहीं किया। इसका कारण यह नहीं था कि वे देख नहीं सकते थे। कारण यह था कि वे पहले से जानते थे कि यह ऊर्जा क्या है। शिव स्वयं शून्य, मौन, अदृश्य आधार के प्रतीक हैं। जब शून्य सृष्टि के प्रकाश को पहचान लेता है तब उसे बाहर से देखने की आवश्यकता नहीं रहती। वह उसे उसके मूल स्वरूप में जानता है।
शिव का यह दृष्टिकोण हमें बहुत गहरी शिक्षा देता है। कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें अनुभव करने के लिए आंखों की नहीं बल्कि अंतर पहचान की आवश्यकता होती है। शिव का मौन यह बताता है कि जब चेतना पर्याप्त गहरी हो जाती है तब देखने की आवश्यकता कम हो जाती है और जानना ही पर्याप्त हो जाता है।
यह कथा यहीं तक सीमित नहीं है कि देवता उन्हें क्यों नहीं देख पाए। इसका एक और गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। माँ कूष्मांडा का तेज केवल बाहर फैला हुआ प्रकाश नहीं है। वह उस मूल चेतना का प्रतीक है जो प्रत्येक जीव, प्रत्येक तत्व, प्रत्येक अनुभव के भीतर सूक्ष्म रूप में उपस्थित है। हम भी उसे पूरी तरह नहीं देख पाते, क्योंकि हमारी अपनी चेतना अभी उतनी स्थिर, निर्मल और विस्तृत नहीं है।
जो भीतर अस्थिर है, वह उस पूर्ण स्थिर प्रकाश को कैसे धारण करेगा। जो अभी अपने ही मन के उतार चढ़ाव से मुक्त नहीं हुआ, वह उस मूल ऊर्जा को कैसे पूरी तरह सह सकेगा। इस दृष्टि से देवताओं का अनुभव केवल एक पुरानी कथा नहीं बल्कि एक जीवित आध्यात्मिक संकेत है। यह हमें बताता है कि उच्चतम सत्य को देखने से पहले स्वयं को भी उतना ही शुद्ध और स्थिर बनाना पड़ता है।
कई परंपराओं में यह संकेत मिलता है कि माँ कूष्मांडा का यह प्रखर तेज किसी को भयभीत करने के लिए नहीं था। यह एक प्रकार की दैवी परीक्षा था। जो उस प्रकाश को बिना विचलित हुए धारण कर सके, वही सृष्टि के कार्य में सही भूमिका निभाने योग्य माना जा सकता था। इसलिए देवताओं के लिए यह केवल दर्शन नहीं बल्कि अपने अपने स्वभाव, सीमा, तैयारी को जानने का क्षण भी था।
यह परीक्षा बाहरी नहीं थी। किसी से कुछ पूछा नहीं गया। कोई शर्त नहीं रखी गई। केवल प्रकाश सामने था, प्रत्येक देवता ने अपने स्वभाव के अनुसार उससे संबंध बनाया। ब्रह्मा ने समझने की चेष्टा की। विष्णु ने स्वीकार करने का मार्ग चुना। शिव ने मौन पहचान में रहना उचित समझा। यही इस कथा की अद्भुत सुंदरता है।
मानव जीवन में भी कई गहरी सच्चाइयाँ ऐसी होती हैं जिन्हें केवल बौद्धिक दृष्टि से नहीं पकड़ा जा सकता। प्रेम, मृत्यु, आत्मा, समय, ईश्वर, शून्य, मौन, अंतर्ज्ञान जैसे अनुभवों को हम केवल आंखों या तर्क से पूरी तरह नहीं समझ सकते। हम उन्हें अधिकतर तभी समझना शुरू करते हैं जब हमारी चेतना कुछ शांत, कुछ विनम्र और कुछ गहरी होती है।
माँ कूष्मांडा की यह कथा हमें यह सिखाती है कि हर सत्य को सीधे पकड़ना संभव नहीं होता। कुछ सच्चाइयाँ ऐसी होती हैं जिन्हें केवल अनुभव, स्वीकार, अंतर दृष्टि से जाना जा सकता है। यदि हम उन्हें तुरंत परिभाषित करना चाहें, तो वे हाथ से निकल जाती हैं। यदि हम उनके सामने शांत होकर खड़े हों, तो वे धीरे धीरे अपने को प्रकट करती हैं।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई देवता माँ कूष्मांडा के तेज को सीधे इसलिए नहीं देख पाया, क्योंकि वह केवल प्रकाश नहीं था। वह आदिशक्ति की चेतन उपस्थिति थी। उसके सामने खड़े होकर अपनी सीमित सत्ता को सुरक्षित रखना आसान नहीं था। देवताओं का झुक जाना उनकी कमजोरी नहीं था। वह उनकी गहरी समझ थी। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ शक्तियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें पूरी तरह दृष्टि में बाँधना संभव नहीं, केवल उनके आगे विनम्र होना संभव है।
माँ कूष्मांडा हमें यह सिखाती हैं कि सच्ची शक्ति को देखने के लिए केवल आंखें नहीं बल्कि चेतना की तैयारी चाहिए। और जब चेतना तैयार हो जाती है तब देखने और जानने के बीच का अंतर भी धीरे धीरे मिटने लगता है।
देवता माँ कूष्मांडा के तेज को सीधे क्यों नहीं देख पाए
क्योंकि उनका तेज केवल दृश्य प्रकाश नहीं था बल्कि ऐसी चेतन शक्ति था जो स्वयं देखने वाले की चेतना को भी प्रभावित कर सकता था।
क्या देवताओं का झुक जाना भय था
यह केवल भय नहीं था बल्कि श्रद्धा, विनम्रता और अपनी सीमाओं की गहरी पहचान का भाव भी था।
ब्रह्मा ने उनके तेज से क्या सीखा
उन्होंने जाना कि सृष्टि के मूल प्रकाश को पूरी तरह आंखों से नहीं बल्कि गहरी अनुभूति से समझा जा सकता है।
विष्णु और शिव का दृष्टिकोण अलग क्यों था
विष्णु ने इस ऊर्जा को स्वीकार कर उसकी लय को समझा, जबकि शिव ने उसे देखने की बजाय उसके मूल स्वरूप को भीतर से पहचाना।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह कि कुछ उच्चतम सत्य केवल आंखों से नहीं देखे जा सकते। उन्हें चेतना, विनम्रता और अनुभव से जाना जाता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, मुहूर्त
इनके क्लाइंट: म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें