By पं. अभिषेक शर्मा
सृष्टि की सूक्ष्म संतुलन और दिव्य रहस्य का अद्भुत लोक

माँ कूष्मांडा की कथाओं में सृष्टि, प्रकाश, चेतना और संतुलन का ऐसा गहरा मेल दिखाई देता है जो उन्हें केवल एक सृजनमयी देवी नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था की सूक्ष्म नियामक के रूप में भी सामने लाता है। सामान्य रूप से हम देवलोक, असुरलोक, पृथ्वीलोक और अनेक सूक्ष्म लोकों का उल्लेख सुनते हैं, पर कुछ प्राचीन संकेत एक ऐसे रहस्य की ओर इशारा करते हैं जो इन सबसे अलग है। कहा जाता है कि माँ कूष्मांडा ने एक ऐसा गुप्त लोक निर्मित किया था जिसे न देवता पूरी तरह जानते थे और न असुर उसकी सीमा तक पहुँच सके। यह विचार पहली दृष्टि में आश्चर्यजनक लगता है, पर इसके भीतर एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक अर्थ छिपा है।
यह कथा केवल किसी छिपे हुए स्थान की नहीं है। यह उस सूक्ष्म केंद्र की कथा है जहाँ सृष्टि का बाहरी शोर शांत हो जाता है और केवल मूल चेतना, संतुलन और शुद्ध ऊर्जा रह जाती है। जब सृष्टि का विस्तार हो रहा था तब हर शक्ति अपने अपने स्तर पर सक्रिय थी। देवता अपने लोकों की व्यवस्था में लगे थे। असुर अपनी सामर्थ्य को बढ़ाने में लगे थे। त्रिदेव अपने अपने धर्म में स्थित थे। पर उसी बीच माँ कूष्मांडा ने एक ऐसा कार्य किया जो किसी की सामान्य दृष्टि में नहीं आया। यह कार्य सृजन से भी अधिक सूक्ष्म था, क्योंकि यह सृजन के भीतर संतुलन का छिपा हुआ आधार तैयार करने से जुड़ा था।
यह प्रश्न स्वाभाविक है। यदि कोई लोक था, तो देवता उसे क्यों नहीं जानते थे। यदि वह बना, तो उसका स्थान कहाँ था। और यदि असुर उसे पा नहीं सके, तो वह किस प्रकार का लोक रहा होगा। यही वह बिंदु है जहाँ इस कथा को बाहरी अर्थों से आगे बढ़कर समझना आवश्यक हो जाता है।
यह लोक साधारण अर्थ में किसी भौतिक क्षेत्र जैसा नहीं था। यह ऐसा स्थान नहीं था जिसे दिशा, दूरी, मार्ग या गति से पाया जा सके। कुछ परंपराएँ संकेत देती हैं कि माँ कूष्मांडा ने अपनी चेतना का एक सूक्ष्म अंश अलग किया और उसे एक ऐसे आयाम में स्थापित किया जहाँ केवल शुद्ध ऊर्जा और अपरिवर्तित संतुलन विद्यमान रहे। वहाँ रूप नहीं था, संघर्ष नहीं था, अधिकार की इच्छा नहीं थी, न ही वहाँ सत्ता की कोई होड़ थी। वहाँ जो था, वह केवल स्थिरता, शांति, मूल संतुलन था।
इस दृष्टि से देखें तो यह गुप्त लोक कोई भौतिक लोक कम और एक अधिदैविक चेतना क्षेत्र अधिक प्रतीत होता है। यही कारण है कि उसे जानना केवल स्थान की जानकारी का विषय नहीं था। उसे केवल वही छू सकता था जिसकी चेतना उसी स्तर तक परिष्कृत हो।
यह इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। जब देवलोक, असुरलोक और अन्य लोक पहले से बने हुए थे तब एक और गुप्त लोक क्यों आवश्यक हुआ। इसका उत्तर सृष्टि के मूल नियम में छिपा है। जहाँ विस्तार होता है, वहाँ असंतुलन की संभावना भी जन्म लेती है। जहाँ शक्ति प्रकट होती है, वहाँ टकराव भी संभव हो जाता है। जहाँ जीवन चलता है, वहाँ परिवर्तन, विकार, विचलन भी आते हैं। इसलिए केवल लोकों का निर्माण पर्याप्त नहीं होता। उनके पीछे एक ऐसा संतुलन केंद्र भी होना चाहिए जो सबको भीतर से सहारा दे सके।
कुछ मान्यताओं के अनुसार, माँ कूष्मांडा ने इस गुप्त लोक को इसी कारण निर्मित किया। यह सृष्टि का एक अदृश्य संतुलन केंद्र था। जब किसी लोक में असंतुलन बढ़ता, जब ऊर्जा की दिशा विचलित होती, जब मर्यादा और लय टूटने लगती तब यह सूक्ष्म लोक उस संतुलन को भीतर से पुनः स्थिर करने में सहायता करता। यह सीधे हस्तक्षेप नहीं करता था बल्कि जैसे कोई अदृश्य धुरी पूरे चक्र को संभाले रहती है, उसी प्रकार यह लोक सृष्टि की धुरी बना रहता था।
देवता पूर्णतः अज्ञान में नहीं थे। कथा कहती है कि उन्हें इस लोक का आभास हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि सृष्टि में कहीं कोई ऐसी शक्ति सक्रिय है जो बहुत गहरे स्तर पर सब कुछ संतुलित बनाए हुए है। वे यह महसूस कर सके कि जब भी कोई अत्यधिक विकार उत्पन्न होता, कहीं न कहीं से एक अदृश्य समरस ऊर्जा सक्रिय हो जाती थी। पर वे यह नहीं जान सके कि वह ऊर्जा कहाँ से आ रही है।
यहाँ एक बहुत गहरी बात समझने योग्य है। हर आभास ज्ञान में नहीं बदलता। कुछ सत्य इतने सूक्ष्म होते हैं कि उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, पर तुरंत समझा नहीं जा सकता। देवता उस लोक को इसलिए पूरी तरह नहीं जान सके क्योंकि वह उनकी कार्य सीमा से परे था। वे अपने अपने धर्म में स्थित थे, पर यह गुप्त लोक उन सबके पीछे काम करने वाला मूल संतुलन तत्त्व था। उसे जानने के लिए केवल दिव्य पद पर्याप्त नहीं था। उसके लिए अत्यंत निर्मल, अत्यंत मौन, अत्यंत सूक्ष्म चेतना की आवश्यकता थी।
असुरों ने भी उस सूक्ष्म ऊर्जा को खोजने की चेष्टा की। वे यह अनुभव कर रहे थे कि सृष्टि में कोई ऐसा छिपा हुआ स्रोत है जो बार बार संतुलन को टूटने से बचा देता है। स्वाभाविक था कि वे उस स्रोत तक पहुँचना चाहते, क्योंकि जो उस शक्ति को पा ले, वह अनेक स्तरों पर प्रभाव डाल सकता था। पर वे हर बार असफल हुए।
इस असफलता का कारण केवल यह नहीं था कि वह लोक छिपा हुआ था। वास्तविक कारण यह था कि वह किसी स्थान विशेष में नहीं था। वह चेतना के स्तर पर विद्यमान था। असुर बाहरी मार्ग, शक्ति, नियंत्रण, अधिग्रहण के माध्यम से वहाँ पहुँचना चाहते थे। पर ऐसे मार्ग केवल भौतिक या निम्न सूक्ष्म लोकों तक ले जा सकते हैं। जहाँ प्रवेश का द्वार ही अंतर शुद्धि हो, वहाँ बाहरी बल काम नहीं करता। यही कारण है कि वह लोक उनकी पहुँच से बाहर रहा।
हाँ, पर उनका प्रयास अधिग्रहण का नहीं, समझ का था। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने एक बार अपनी चेतना को उस सूक्ष्म ऊर्जा के साथ जोड़ने का प्रयास किया। वे उसके प्रवाह को समझना चाहते थे, क्योंकि संरक्षण और संतुलन का कार्य उनसे भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने उस शक्ति को अनुभव किया, पर उसे पूरी तरह देख या सीमित रूप से परिभाषित नहीं कर सके।
यह अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि विष्णु उस लोक की उपस्थिति को समझ सके, पर उसकी सीमा तक नहीं पहुँचे। उन्होंने जाना कि यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ प्रवेश केवल वही कर सकता है जिसने अपनी चेतना को पूर्णतः निर्मल, निष्पृह, संतुलित कर लिया हो। यह भी संभव है कि उन्होंने जानबूझकर उससे अधिक आगे बढ़ने का प्रयास न किया हो, क्योंकि कुछ रहस्य समझ लेने योग्य होते हैं, पर उन्हें भंग करना उचित नहीं होता।
कथा का यह पक्ष अत्यंत गहरा है। कहा जाता है कि भगवान शिव इस रहस्य को जानते थे, पर उन्होंने कभी इसे प्रकट नहीं किया। इसका अर्थ यह नहीं कि वे छिपाना चाहते थे। इसका अर्थ यह है कि वे समझते थे कि हर ज्ञान हर समय साझा नहीं किया जा सकता। कुछ रहस्य सृष्टि के संतुलन के लिए आवश्यक होते हैं। यदि वे समय से पहले खुल जाएँ, तो अनेक शक्तियाँ उन्हें समझने के बजाय उपयोग या नियंत्रण के भाव से देखना शुरू कर सकती हैं।
शिव का मौन यह बताता है कि गहन ज्ञान और मौन का गहरा संबंध है। जो वास्तव में जानता है, वह हर सत्य को तुरंत प्रकट नहीं करता। वह यह भी देखता है कि कौन सा ज्ञान किस चेतना के लिए उपयुक्त है। माँ कूष्मांडा के इस गुप्त लोक का रहस्य भी ऐसा ही था। उसे संरक्षित रखना भी ब्रह्मांडीय संतुलन का हिस्सा था।
कथा कहती है कि उन्होंने इसे किसी से छिपाया नहीं। बल्कि यह लोक स्वभावतः छिपा हुआ था। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। जो सत्य किसी निम्न दृष्टि से दिखाई न दे, उसे छिपा हुआ कहा जा सकता है, पर वह आवश्यक नहीं कि जानबूझकर छिपाया गया हो। जैसे सूर्य का प्रकाश सबके लिए है, पर उसकी पूरी प्रकृति सबको समान रूप से समझ में नहीं आती, वैसे ही यह गुप्त लोक भी केवल उन्हीं के लिए खुल सकता था जो उसकी चेतना के स्तर तक पहुँच सकते थे।
इससे यह स्पष्ट होता है कि यह लोक बाहरी गोपनीयता से नहीं बल्कि आंतरिक पात्रता से जुड़ा था। जो जितना निर्मल, संतुलित और सूक्ष्म होगा, उतना ही उसके निकट पहुँच सकेगा। इसलिए यह रहस्य छिपाया हुआ कम और चेतना से संरक्षित अधिक था।
इस कथा का अंतिम और सबसे गहरा अर्थ यही है। यह लोक केवल कोई स्थान नहीं था। यह एक अवस्था भी था। ऐसी अवस्था जहाँ संतुलन, शांति, शुद्ध चेतना एक साथ विद्यमान हों। जहाँ कोई भी शक्ति अपने स्वार्थ, भय, या असंतुलन के साथ प्रवेश न कर सके। जहाँ केवल वही पहुँचे जो भीतर से सम हो, मौन हो, शुद्ध हो।
इस दृष्टि से माँ कूष्मांडा का गुप्त लोक बाहर भी है और भीतर भी। बाहर वह सृष्टि का अदृश्य संतुलन केंद्र है। भीतर वह मनुष्य की अपनी अंतरात्मा का वह प्रदेश है जहाँ गहरा मौन, व्यापक शांति, मूल संतुलन अनुभव किया जा सकता है। यही कारण है कि इस कथा का रहस्य केवल ब्रह्मांडीय नहीं, साधनामयी भी है।
हम अपने जीवन में जो कुछ देखते हैं, अक्सर उसी को वास्तविकता मान लेते हैं। पर जीवन हमेशा केवल दृश्य परतों से नहीं चलता। हमारे भीतर भी कई स्तर हैं। एक बाहरी व्यक्तित्व है, एक विचारों का स्तर है, एक भावनाओं का स्तर है, उनसे भी भीतर एक ऐसा केंद्र है जहाँ यदि हम पहुँच सकें, तो संतुलन अपने आप लौट आता है। माँ कूष्मांडा का यह गुप्त लोक उसी भीतरी संतुलन केंद्र का भी प्रतीक है।
जब बाहर अशांति हो, जब विचार बिखरे हों, जब भावनाएँ उलझी हों तब मनुष्य को अपने भीतर ऐसे ही किसी गुप्त लोक की आवश्यकता होती है जहाँ वह लौट सके। यह कथा हमें यही सिखाती है कि सबसे बड़ा रहस्य बाहर किसी दूर स्थान पर नहीं बल्कि भीतर की ऐसी अवस्था में छिपा है जहाँ हम स्वयं से गहरे रूप में जुड़ते हैं।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि माँ कूष्मांडा द्वारा निर्मित यह गुप्त लोक केवल किसी छिपे हुए दिव्य स्थान की कथा नहीं है। यह उस मूल संतुलन की कथा है जिसके बिना सृष्टि केवल विस्तार तो पा सकती है, पर स्थिर नहीं रह सकती। देवता उसका आभास कर सके, असुर उसे पा न सके, विष्णु उसे महसूस कर सके, शिव उसे जानकर मौन रहे, माँ कूष्मांडा उसकी मूल अधिष्ठात्री रहीं। यही इस कथा की गहराई है।
माँ कूष्मांडा हमें यह सिखाती हैं कि सच्चा रहस्य हमेशा बाहर नहीं होता। कई बार वह भीतर की सबसे शांत परत में छिपा होता है। जो उस परत तक पहुँच जाए, वह समझता है कि वास्तविक शक्ति शोर में नहीं, गहरे संतुलन में होती है।
क्या माँ कूष्मांडा ने सचमुच एक गुप्त लोक बनाया था
कथा के संकेत यही बताते हैं कि उन्होंने एक सूक्ष्म संतुलन केंद्र स्थापित किया था जिसे सामान्य रूप से न देवता समझ सके और न असुर पा सके।
यह गुप्त लोक किस काम आता था
कुछ मान्यताओं के अनुसार यह सृष्टि का एक अदृश्य संतुलन केंद्र था जो असंतुलन बढ़ने पर भीतर से सहायता करता था।
देवता उसे जान क्यों नहीं सके
उन्हें उसकी उपस्थिति का आभास हुआ, पर वह लोक चेतना के इतने सूक्ष्म स्तर पर था कि उसे पूरी तरह समझना सरल नहीं था।
असुर वहाँ तक पहुँचने में असफल क्यों रहे
क्योंकि वह किसी भौतिक स्थान में नहीं बल्कि चेतना के स्तर पर स्थित था, वहाँ बाहरी बल से प्रवेश संभव नहीं था।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह कि वास्तविक संतुलन का स्रोत अक्सर अदृश्य होता है, सबसे बड़ा रहस्य बाहर नहीं, भीतर की शुद्ध चेतना में छिपा होता है।
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