By पं. नरेंद्र शर्मा
सृष्टि में संतुलन और सूर्य के भीतर गुप्त शक्ति का रहस्य

माँ कूष्मांडा के स्वरूप से जुड़ी सबसे विलक्षण बातों में एक यह कही जाती है कि वे स्वयं सूर्य के भीतर निवास करती हैं। पहली दृष्टि में यह कथन प्रतीकात्मक लग सकता है, मानो केवल उनके प्रकाशमय तेज की ओर संकेत किया गया हो। पर जब इस कथन को गहराई से समझने का प्रयास किया जाता है तब यह स्पष्ट होने लगता है कि इसके भीतर एक अत्यंत गंभीर ब्रह्मांडीय रहस्य छिपा हुआ है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जब अनगिनत लोक, सूक्ष्म आयाम और दिव्य प्रदेश पहले से संभव थे तब माँ कूष्मांडा ने सूर्य को ही अपना निवास क्यों चुना। यह निर्णय केवल स्थान का चयन नहीं था। यह सृष्टि के मूल संतुलन से जुड़ा हुआ एक दैवी निर्णय था।
सृष्टि के प्रारंभिक समय में प्रकाश का विस्तार हो रहा था, पर वह अभी पूर्ण संतुलन में नहीं आया था। ऊर्जा जाग चुकी थी, दिशा बनने लगी थी, गति उत्पन्न हो चुकी थी, पर स्थिरता अब भी अधूरी थी। सूर्य उस समय केवल एक तेजस्वी ऊर्जा केंद्र था। उसमें प्रचंड प्रकाश था, अगाध ताप था, अपार सामर्थ्य थी, पर यह सब अभी पूर्ण लय में नहीं था। यदि उस शक्ति को संतुलित न किया जाता, तो वही प्रकाश जो जीवन का आधार बनना था, आगे चलकर सृष्टि के लिए संकट भी बन सकता था। यहीं से माँ कूष्मांडा की कथा एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरे स्तर पर प्रवेश करती है।
इस प्रश्न का उत्तर सृष्टि की संरचना में छिपा है। जो भी केंद्र में होता है, वही सबसे अधिक प्रभावशाली भी होता है। सूर्य केवल एक प्रकाश स्रोत नहीं था। वह वह केंद्रीय ऊर्जा बिंदु था जहाँ से जीवन की संभावना हर दिशा में फैल सकती थी। यदि केंद्र असंतुलित हो, तो परिधि भी अस्थिर होगी। यदि केंद्र स्थिर हो जाए, तो दूर तक फैला हुआ तंत्र भी लय में आ सकता है। माँ कूष्मांडा ने यही पहचाना।
उन्होंने सूर्य को केवल अग्नि का गोला नहीं देखा। उन्होंने उसे सृष्टि की धड़कन के रूप में देखा। वहाँ बैठकर वे केवल एक स्थान पर नहीं टिकतीं बल्कि उस बिंदु पर स्थित होती हैं जहाँ से संपूर्ण ऊर्जा प्रवाह संचालित हो सकता है। इसीलिए उनका सूर्य को निवास बनाना किसी बाहरी तेज के आकर्षण का परिणाम नहीं था। यह एक अत्यंत सूक्ष्म ऊर्जा निर्णय था।
जब सृष्टि का विस्तार प्रारंभ हुआ तब सूर्य का तेज अत्यंत प्रबल था, पर उसके भीतर समरसता का अभाव था। वह ऊर्जा के रूप में विराट था, पर लयबद्ध नहीं था। उसका ताप जीवन उत्पन्न करने योग्य भी था और विनाशकारी भी हो सकता था। यही वह अवस्था थी जिसे देवताओं ने महसूस किया। उन्होंने देखा कि यदि यह शक्ति अपने आप चलती रही, तो सृष्टि को अपेक्षित संतुलन मिलना कठिन हो जाएगा।
देवता इस असंतुलन को समझ तो रहे थे, पर उसके केंद्र तक पहुँचने का साहस किसी में नहीं था। सूर्य के निकट जाना ही असह्य था, उसके भीतर प्रवेश करना तो और भी असंभव प्रतीत होता था। वहाँ केवल ताप नहीं था, वहाँ असंयमित ऊर्जा थी। वही स्थिति थी जहाँ माँ कूष्मांडा ने हस्तक्षेप किया, पर उनका यह हस्तक्षेप बाहरी नहीं था। उन्होंने कोई युद्ध नहीं किया, कोई आदेश नहीं दिया, कोई प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने सूर्य को भीतर से संतुलित करने का निश्चय किया।
माँ कूष्मांडा का स्वरूप सृजन से जुड़ा अवश्य है, पर उनकी शक्ति केवल उत्पत्ति तक सीमित नहीं है। वे उस ऊर्जा को भी जानती हैं जो सृष्टि को टिकाऊ बनाती है। इसलिए जब सब लोग सूर्य के तेज को देख रहे थे, वे उसके भीतर की असम लय को देख रही थीं। उन्होंने समझ लिया कि यदि इस ऊर्जा को दिशा नहीं मिली, तो उसका प्रसार सृष्टि के लिए बाधा बन सकता है।
यही कारण था कि उनका निर्णय विलंबित नहीं हुआ। वे जानती थीं कि कुछ शक्तियाँ बाहर से नियंत्रित नहीं की जा सकतीं। उन्हें भीतर से धारण करना पड़ता है। सूर्य के साथ भी यही आवश्यक था। उसे रोकना नहीं था, उसे दबाना नहीं था, उसे कम करना नहीं था। उसे संतुलित करना था। यही वह सूक्ष्म अंतर है जो माँ कूष्मांडा को केवल महाशक्ति नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन की अधिष्ठात्री सिद्ध करता है।
कथाओं में कहा गया है कि माँ कूष्मांडा स्वयं सूर्य के भीतर प्रविष्ट हुईं। यह कोई साधारण प्रवेश नहीं था। सूर्य का ताप और प्रखर ऊर्जा इतनी तीव्र थी कि वहाँ तक पहुँचना ही असंभव माना जाता था। पर माँ कूष्मांडा के लिए यह बाधा नहीं थी, क्योंकि वही उस प्रकाश की मूल चेतना थीं। जो शक्ति सूर्य को बाहर से देख रही थी, वही शक्ति उसके भीतर का सत्य भी जानती थी।
उनका सूर्य में प्रवेश वास्तव में एक प्रकार का ऊर्जा अवतरण था। उन्होंने स्वयं को उस केंद्र में स्थापित किया जहाँ से प्रकाश और ताप दोनों संचालित होते थे। उनके वहाँ स्थित होते ही सूर्य की प्रकृति बदलने लगी। जो ऊर्जा पहले केवल फैल रही थी, वह अब लयबद्ध होने लगी। जो ताप पहले केवल तीव्र था, उसमें अब मर्यादा जुड़ने लगी। जो प्रकाश पहले केवल प्रबल था, वह अब जीवनदायी बनता गया।
माँ कूष्मांडा के स्थापित होते ही सूर्य की ऊर्जा में सूक्ष्म परिवर्तन शुरू हुआ। यह परिवर्तन अचानक नहीं था बल्कि क्रमशः विकसित हुआ। उसकी चमक बनी रही, पर उसमें अनावश्यक विक्षोभ कम होने लगा। उसका ताप बना रहा, पर उसमें पोषण का तत्व प्रकट होने लगा। उसकी गति बनी रही, पर उसमें नियमितता आ गई। यही वह लय थी जिसने आगे चलकर सृष्टि को स्थिर आधार दिया।
इस परिवर्तन का अर्थ केवल खगोलीय नहीं था। इसका प्रभाव समस्त ब्रह्मांडीय व्यवस्था पर पड़ा। ऊर्जा अब हर दिशा में अधिक समन्वित रूप से फैलने लगी। जीवन को सहारा देने वाली ऊष्मा और प्रकाश का सही अनुपात संभव हुआ। यही कारण है कि सूर्य को बाद में केवल तेज का स्रोत नहीं बल्कि जीवन के मूल संरक्षक के रूप में भी सम्मान मिला।
यही इस कथा का सबसे गहरा और रोचक रहस्य है। कहा जाता है कि सूर्य के भीतर केवल आग, प्रकाश और ऊष्मा नहीं है। वहाँ एक ऐसा सूक्ष्म चेतना क्षेत्र भी है जहाँ माँ कूष्मांडा की उपस्थिति निरंतर सक्रिय रहती है। यह कोई सामान्य लोक नहीं बल्कि ऐसा सूक्ष्म प्रदेश है जहाँ से वे ऊर्जा के व्यापक संतुलन को संचालित करती हैं।
यह क्षेत्र किसी भौतिक दिशा से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह चेतना का क्षेत्र है। वहाँ वही पहुँच सकता है जो बाहरी अग्नि के पार भीतर की ऊर्जा को महसूस कर सके। इसीलिए देवताओं को सूर्य का महत्त्व तो समझ में आया, पर उसके भीतर छिपी इस चेतना की पूर्ण अनुभूति नहीं हो सकी। वे सूर्य को देव रूप में पूजते रहे, पर माँ कूष्मांडा के उस गूढ़ निवास का रहस्य सीमित ही बना रहा।
देवताओं ने सूर्य के तेज को स्वीकार किया, उसकी दैवी महिमा को भी पहचाना, पर उसके भीतर सक्रिय उस सूक्ष्म शक्ति को पूरी तरह नहीं समझ पाए। उन्हें उसका आभास अवश्य हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि सूर्य केवल अग्नि नहीं है। उसमें कोई ऐसी उपस्थिति है जो ऊर्जा को विवेकपूर्ण दिशा देती है। पर आभास और अनुभव में अंतर होता है। वे उसकी सतह तक पहुँचे, उसके हृदय तक नहीं।
असुरों ने भी अनेक बार उस शक्ति को पाने की चेष्टा की। उनके लिए सूर्य एक ऐसी सामर्थ्य का प्रतीक था जिसे पा लिया जाए तो अपार प्रभाव संभव हो सकता है। पर वे असफल रहे, क्योंकि सूर्य के भीतर प्रवेश करना केवल किसी स्थान तक पहुँचना नहीं था। वह एक चेतन क्षेत्र था। वहाँ बाहरी बल से नहीं, केवल आंतरिक पात्रता से पहुँचा जा सकता था। यही कारण है कि वह रहस्य उनकी पहुँच से बाहर रहा।
भगवान शिव इस रहस्य को जानते थे। वे सूर्य को केवल ज्योति पिंड के रूप में नहीं देखते थे। वे समझते थे कि उसके भीतर एक ऐसी अधिष्ठात्री शक्ति स्थित है जो सृष्टि के संतुलन से जुड़ी है। इसीलिए उनकी दृष्टि सूर्य पर सामान्य नहीं थी। वे उस तेज के भीतर की मौन चेतना को पहचानते थे।
भगवान विष्णु ने भी सूर्य की ऊर्जा को सृष्टि के संतुलन का आधार माना। उन्होंने जाना कि पालन केवल बाहर से नहीं होता। उसके लिए एक स्थिर केंद्रीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। सूर्य में माँ कूष्मांडा की उपस्थिति ने यही संभव किया। विष्णु ने इसे स्वीकार किया और समझा कि संरक्षण का कार्य उस समय तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक केंद्र में स्थित ऊर्जा संतुलित न हो।
इस कथा को केवल देवी महिमा या ब्रह्मांडीय चमत्कार की कथा समझना पर्याप्त नहीं होगा। इसका एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है। सूर्य को यहाँ बाहरी ब्रह्मांड का केंद्र ही नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर के आत्मिक केंद्र के रूप में भी समझा जा सकता है। जैसे सूर्य से समस्त दिशा में प्रकाश फैलता है, वैसे ही मनुष्य के भीतर भी एक केंद्र होता है जहाँ से विचार, भाव, संकल्प और ऊर्जा संचालित होते हैं।
यदि वह केंद्र असंतुलित हो जाए, तो जीवन की सारी दिशाएँ प्रभावित हो जाती हैं। यदि वही केंद्र स्थिर हो जाए, तो बाहर की परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, भीतर की लय बनी रहती है। माँ कूष्मांडा का सूर्य में निवास हमें यही सिखाता है कि सच्ची शक्ति को हमेशा केंद्र में स्थापित होना चाहिए। जो शक्ति केंद्र को सँभाल ले, वही संपूर्ण व्यवस्था को स्थिर बना सकती है।
हर व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा सूर्य होता है जो उसका केंद्र है। कभी वह मन है, कभी प्राण शक्ति, कभी आत्मविश्वास, कभी उद्देश्य, कभी अंतःकरण का मौन प्रकाश। यदि यह केंद्र असंतुलित हो, तो बाहर की उपलब्धियाँ भी स्थिर संतोष नहीं देतीं। यदि यह केंद्र संतुलित हो जाए, तो जीवन का विस्तार सहज हो जाता है। माँ कूष्मांडा की कथा हमें यही याद दिलाती है कि बाहरी संसार को बदलने से पहले भीतर के केंद्र को पहचानना आवश्यक है।
यह भी समझना चाहिए कि केंद्र को संतुलित करना बलपूर्वक संभव नहीं होता। उसके लिए भीतर उतरना पड़ता है, जैसे माँ कूष्मांडा सूर्य के भीतर उतरीं। यही इस कथा का साधनामयी संकेत है। जब तक व्यक्ति अपने भीतर के सूर्य में प्रवेश नहीं करेगा तब तक उसकी ऊर्जा केवल बिखरेगी। जब वह भीतर के केंद्र में स्थित हो जाएगा तब उसकी ऊर्जा में भी लय, प्रकाश, स्थिरता आएगी।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि माँ कूष्मांडा ने सूर्य को निवास इसलिए चुना क्योंकि वह सृष्टि का केंद्रीय ऊर्जा बिंदु था। वहाँ स्थित होकर वे केवल एक स्थान पर नहीं रहीं बल्कि उस धुरी पर स्थित हुईं जहाँ से पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा को दिशा मिल सकती थी। सूर्य उनके लिए प्रकाश का घर नहीं था। वह संतुलन की कार्यशाला था, वह जीवन की धुरी था, वह सृष्टि का हृदय था।
माँ कूष्मांडा हमें यह सिखाती हैं कि सच्ची शक्ति वही है जो अपने को वहाँ स्थापित करे जहाँ से वह सबसे अधिक कल्याणकारी प्रभाव उत्पन्न कर सके। यही इस कथा का गहरा सार है। जब केंद्र संतुलित हो जाता है तब परिधि भी अपनी जगह पर आ जाती है।
माँ कूष्मांडा ने सूर्य को अपना निवास क्यों चुना
क्योंकि सूर्य सृष्टि का केंद्रीय ऊर्जा केंद्र था, उसे संतुलित किए बिना व्यापक सृष्टि का स्थिर विकास संभव नहीं था।
क्या सूर्य प्रारंभ में असंतुलित था
कथा के अनुसार उसका प्रकाश और ताप अत्यंत प्रबल था, पर उनमें स्थिर लय और संतुलन का अभाव था।
माँ कूष्मांडा ने सूर्य के भीतर जाकर क्या किया
उन्होंने वहाँ अपनी चेतना स्थापित कर उसकी ऊर्जा को लय, मर्यादा और जीवनदायी संतुलन प्रदान किया।
क्या सूर्य के भीतर कोई सूक्ष्म लोक भी माना गया है
हाँ, कुछ परंपराओं में संकेत मिलता है कि वहाँ माँ कूष्मांडा की सक्रिय चेतना से जुड़ा एक सूक्ष्म चेतना क्षेत्र विद्यमान है।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह कि जीवन और सृष्टि दोनों में केंद्र को संतुलित करना सबसे आवश्यक है, क्योंकि वही सारी दिशाओं को प्रभावित करता है।
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