By पं. सुव्रत शर्मा
सृष्टि से पहले का रहस्य और त्रिमूर्ति की संतुलन परीक्षा

सृष्टि के प्रारंभ से पहले की अवस्था को केवल अंधकार या शून्य कह देना पर्याप्त नहीं है। वह एक ऐसी स्थिति थी जहाँ सब कुछ संभावना के रूप में विद्यमान था, पर अभी कुछ भी स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं हुआ था। न दिशा निश्चित थी, न समय की कोई पहचानी हुई धारा, न ही सृजन, पालन और संहार के कार्यों का विभाजन तय था। इसी सूक्ष्म, गहन और अप्रकट अवस्था में माँ कूष्मांडा की चेतना सक्रिय हुई। उन्हें सामान्य रूप से सृष्टि की आदि जननी कहा जाता है, पर कुछ परंपरागत संकेत यह भी बताते हैं कि सृष्टि को उत्पन्न करने से पहले उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने यह परखा कि जिन शक्तियों को आगे चलकर सृष्टि के संचालन का दायित्व मिलेगा, क्या वे केवल समर्थ हैं, या वास्तव में संतुलित भी हैं।
यही इस कथा का गहरा रहस्य है। सामान्य रूप से हम ब्रह्मा, विष्णु, महेश को सृष्टि के तीन प्रमुख आयामों के रूप में देखते हैं। ब्रह्मा सृजन के, विष्णु पालन के, शिव परिवर्तन या संहार के अधिष्ठाता माने जाते हैं। पर यदि सृष्टि के संचालन की यह भूमिका किसी भी शक्ति को सौंपनी हो, तो केवल उसकी क्षमता पर्याप्त नहीं होती। उसे धैर्य, संयम, मौन, समझ, संतुलन की भी परीक्षा से गुजरना होता है। माँ कूष्मांडा ने यही सुनिश्चित किया।
यह कथा किसी प्रतियोगिता या प्रत्यक्ष युद्ध की कथा नहीं है। यहाँ परीक्षा का अर्थ किसी विजेता या पराजित को तय करना नहीं था। यह एक सूक्ष्म परीक्षण था। इसका उद्देश्य यह जानना था कि कौन किस प्रकार की शक्ति को किस स्तर की सजगता के साथ धारण कर सकता है। सृष्टि को चलाना कोई साधारण कार्य नहीं है। यदि सृजन हो पर मर्यादा न हो, तो अराजकता बढ़ सकती है। यदि पालन हो पर विवेक न हो, तो जड़ता पैदा हो सकती है। यदि परिवर्तन हो पर समयबोध न हो, तो संतुलन टूट सकता है।
इसलिए माँ कूष्मांडा ने यह नहीं देखा कि कौन सबसे शक्तिशाली है। उन्होंने यह देखा कि कौन अपनी शक्ति के धर्म को सही प्रकार से समझता है। यही कारण है कि यह परीक्षा बाहरी नहीं बल्कि स्वभाव की परीक्षा थी।
कथा के अनुसार सबसे पहले ब्रह्मा को सृजन का अवसर दिया गया, पर बिना किसी स्पष्ट मार्गदर्शन के। यह स्थिति अत्यंत गहरी थी, क्योंकि सृजन के लिए केवल कल्पना नहीं बल्कि लय, धैर्य, अनुपात भी आवश्यक होते हैं। यदि कोई शक्ति केवल रचना करना जानती हो, पर उसे संतुलन में रखना न जानती हो, तो उसकी रचना सुंदर होते हुए भी टिकाऊ नहीं रह सकती।
ब्रह्मा ने सृजन आरंभ किया। प्रारंभ में उनकी रचना में गति तो थी, पर स्थिरता कम थी। वे बनाते रहे, रूप गढ़ते रहे, विस्तार करते रहे, पर उस विस्तार में अभी पूर्ण संतुलन नहीं था। इसी बिंदु पर माँ कूष्मांडा का संकेत स्पष्ट होता है। केवल उत्पत्ति की क्षमता पर्याप्त नहीं है। सृष्टि को क्रम देने के लिए सृजनकर्ता को अपनी रचना के भीतर भी धैर्य और समरसता लानी होती है।
यह परीक्षा ब्रह्मा की असफलता की नहीं बल्कि उनके गुण की सीमा दिखाने की थी। माँ कूष्मांडा ने देखा कि उनमें सृजन की शक्ति है, पर इस शक्ति को सही स्थान मिलने के लिए अन्य सहायक तत्त्वों की भी आवश्यकता होगी। तभी सृजन टिकाऊ बन सकेगा।
विष्णु को जो परिस्थिति दी गई, वह भी अत्यंत सूक्ष्म थी। उन्हें संतुलन बनाए रखने का दायित्व दिया गया, पर बिना किसी स्पष्ट नियम पुस्तिका के। यह स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि पालन का कार्य हमेशा बने बनाए नियमों में नहीं चलता। कई बार संरक्षण का अर्थ यह नहीं होता कि जो है उसे केवल वैसा ही रहने दिया जाए। संरक्षण का अर्थ यह भी होता है कि बदलती हुई परिस्थितियों के भीतर सम्यक संतुलन बनाए रखा जाए।
शुरुआत में यह दायित्व कठिन था, क्योंकि हर दिशा में ऊर्जा थी, पर स्पष्ट संरचना नहीं। विष्णु ने धीरे धीरे अपनी चेतना को उस व्यापक ऊर्जा के साथ जोड़ना शुरू किया जो चारों ओर फैल रही थी। उन्होंने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने के बजाय पहले समझना चुना। यहीं से उनकी परीक्षा का उत्तर प्रकट हुआ। उन्हें संरक्षण का अर्थ केवल पकड़े रखना नहीं बल्कि ऊर्जा की लय के साथ जुड़ना समझ में आने लगा।
माँ कूष्मांडा ने यही देखा कि विष्णु का स्वभाव अनुकूलनशील संतुलन का है। वे नियमों के अभाव में भी सामंजस्य खोज सकते हैं। यही गुण आगे चलकर उन्हें पालन का स्वामी बनाता है।
इस कथा का सबसे अद्भुत और गहरा भाग शिव से जुड़ा है। उन्हें कोई प्रत्यक्ष कार्य नहीं दिया गया। न उनसे सृजन करने को कहा गया, न संरक्षण करने को। उन्हें केवल शून्य में स्थिर रहने की स्थिति में रखा गया, जहाँ कोई क्रिया आवश्यक नहीं थी। देखने में यह सबसे सरल लग सकता है, पर वास्तविकता में यही सबसे कठिन परीक्षा थी।
कुछ न करना उतना आसान नहीं जितना प्रतीत होता है। जहाँ ऊर्जा हो, संभावना हो, प्रकट होने की प्रक्रिया चल रही हो, वहाँ मौन रहना और अपनी अंतर स्थिरता को बनाए रखना अत्यंत उच्च साधना है। बहुत सी शक्तियाँ वहाँ सक्रिय होना चाहेंगी, अपनी उपस्थिति दिखाना चाहेंगी, अपना प्रभाव जोड़ना चाहेंगी। पर शिव ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने उस मौन को सहजता से स्वीकार किया।
यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध हुई। शिव ने दिखाया कि सृष्टि के लिए केवल सक्रियता ही नहीं बल्कि धारण करने वाला मौन भी आवश्यक है। माँ कूष्मांडा ने समझ लिया कि जहाँ सृजन और पालन सक्रिय होंगे, वहाँ शिव का यह मौन तत्त्व व्यवस्था को गहराई देगा। यही कारण है कि उनकी परीक्षा सबसे अलग और सबसे सूक्ष्म थी।
जब माँ कूष्मांडा ने इन तीनों स्थितियों को देखा तब उन्हें स्पष्ट हो गया कि सृष्टि का कार्य किसी एक ही शक्ति को नहीं सौंपा जा सकता। ब्रह्मा में आरंभ करने की शक्ति थी। विष्णु में उसे संभालने की क्षमता थी। शिव में उस संपूर्ण क्रम को मौन आधार देने और आवश्यकता पड़ने पर परिवर्तन के माध्यम से पुनर्संतुलित करने की क्षमता थी।
यहाँ से त्रिदेव के कार्यों का विभाजन केवल पद विभाजन नहीं बल्कि स्वभाव विभाजन बन जाता है। ब्रह्मा सृजन करेंगे, विष्णु संरक्षण देंगे, शिव समय आने पर रूपांतरण लाएँगे। यह किसी आदेश का परिणाम नहीं था। यह माँ कूष्मांडा द्वारा देखे गए स्वभाव सत्य का परिणाम था।
इस कथा की एक और गहरी परत यही है कि यह परीक्षा केवल एक प्रारंभिक घटना भर नहीं थी। इसे एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में भी समझा जाता है। सृष्टि के हर चरण में, हर युग में, हर परिवर्तन में, सृजन, पालन, परिवर्तन की शक्तियाँ फिर फिर परखी जाती हैं। क्या सृजन अपनी मर्यादा में है। क्या पालन जड़ता में नहीं बदल रहा। क्या परिवर्तन समय से पहले या समय के बाद नहीं आ रहा। यह संतुलन निरंतर परखा जाता है।
इसीलिए त्रिदेव के कार्य अलग होते हुए भी एक दूसरे से कटे हुए नहीं हैं। वे जुड़े हुए हैं, क्योंकि माँ कूष्मांडा द्वारा स्थापित मूल संतुलन केवल आरंभिक व्यवस्था नहीं बल्कि एक जीवंत दैवी व्यवस्था है।
बहुत बार सृष्टि की चर्चा में माँ कूष्मांडा का उल्लेख केवल सृजन के आरंभ तक सीमित कर दिया जाता है। पर यह कथा बताती है कि उनकी भूमिका उससे कहीं अधिक गहरी है। उन्होंने केवल सृष्टि की शुरुआत नहीं की बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि सृष्टि को चलाने वाली शक्तियाँ संतुलित, सजग, धर्मनिष्ठ हों। यह एक जननी की भूमिका है। वह केवल जन्म नहीं देती, वह यह भी देखती है कि जन्म के बाद व्यवस्था सही हाथों में जाए।
यही कारण है कि माँ कूष्मांडा का यह स्वरूप केवल सृजनमयी देवी का नहीं बल्कि व्यवस्था की सूक्ष्म नियामक का भी स्वरूप है। उनके बिना त्रिदेव की भूमिकाएँ स्पष्ट तो हो सकती थीं, पर संतुलित न भी हो पातीं।
यह प्रसंग केवल देवी कथा नहीं, जीवन का भी गहरा पाठ है। हम भी अपने जीवन में अनेक बार जिम्मेदारियाँ लेते हैं, भूमिकाएँ निभाते हैं, बड़े कार्यों में प्रवेश करते हैं। पर क्या हर बार हम स्वयं को पहले परखते हैं। क्या हमारे भीतर केवल क्षमता है, या उसके साथ धैर्य, समझ, मौन, संतुलन भी है। यही इस कथा का जीवन से जुड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
कई बार व्यक्ति कुछ बनाने में सक्षम होता है, पर उसे संभाल नहीं पाता। कोई संभाल सकता है, पर सही समय पर बदल नहीं पाता। कोई मौन रह सकता है, पर आवश्यक समय पर सक्रिय नहीं हो पाता। इसीलिए जिम्मेदारी से पहले स्वभाव की परीक्षा आवश्यक है। माँ कूष्मांडा यही सिखाती हैं कि सच्ची शक्ति वही है जो स्वयं को समझकर कार्य करे।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि सृष्टि का संचालन केवल शक्ति के आधार पर नहीं सौंपा गया था। यह एक संतुलित व्यवस्था का परिणाम था, उस व्यवस्था की स्थापना में माँ कूष्मांडा की भूमिका अत्यंत केंद्रीय थी। उन्होंने देखा, परखा, समझा, फिर त्रिदेव को उनके स्वभावानुसार स्थान दिया। यही कारण है कि सृष्टि केवल उत्पन्न नहीं हुई, वह व्यवस्थित भी हुई।
यही इस कथा का सबसे बड़ा रहस्य है। माँ कूष्मांडा केवल प्रकाश की जननी नहीं बल्कि उस ब्रह्मांडीय व्यवस्था की बुद्धि भी हैं जिसने सृजन को टिकाऊ बनाया। उनका यह स्वरूप हमें सिखाता है कि किसी भी महान कार्य से पहले संतुलन की परीक्षा आवश्यक है, क्योंकि बिना संतुलन के शक्ति अधूरी है।
क्या माँ कूष्मांडा ने सचमुच त्रिदेव की परीक्षा ली थी
कथा का संकेत यही है कि उन्होंने त्रिदेव के स्वभाव और संतुलन को परखा ताकि सृष्टि का कार्य सही प्रकार से विभाजित हो सके।
ब्रह्मा की परीक्षा का मुख्य अर्थ क्या था
यह देखना कि सृजन की शक्ति के साथ धैर्य, क्रम और संतुलन भी है या नहीं।
विष्णु की परीक्षा में क्या परखा गया
यह कि बिना स्पष्ट नियमों के भी क्या वे ऊर्जा की लय के साथ जुड़कर संतुलन बनाए रख सकते हैं।
शिव की परीक्षा सबसे कठिन क्यों थी
क्योंकि उन्हें कुछ न करते हुए स्थिर रहना था, यही सबसे सूक्ष्म शक्ति का परीक्षण था।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह कि किसी भी बड़ी जिम्मेदारी से पहले केवल शक्ति नहीं बल्कि संतुलन, धैर्य और सही समझ भी आवश्यक होती है।
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