By पं. नरेंद्र शर्मा
नवरात्रि की शुरुआत और देवी के पुनर्जन्म का रहस्य

नवरात्रि के प्रथम दिन जब भक्त माँ शैलपुत्री की आराधना करते हैं तो वे उन्हें हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में स्मरण करते हैं। किंतु इस शांत और सौम्य स्वरूप के पीछे बलिदान, अटूट भक्ति और पुनर्जन्म की एक अत्यंत शक्तिशाली गाथा छिपी हुई है। माँ शैलपुत्री की पहचान देवी सती के उस पिछले जीवन से जुड़ी है जिसके भाग्य ने ब्रह्मांड के इतिहास की दिशा बदल दी थी। यह विस्मृत कथा स्पष्ट करती है कि नवरात्रि की यात्रा उन्हीं से क्यों आरंभ होती है और वे आध्यात्मिक जागरण का आधार क्यों मानी जाती हैं।
शैलपुत्री के रूप में विख्यात होने से बहुत पहले देवी ने राजा दक्ष की पुत्री सती के रूप में जन्म लिया था। दक्ष भगवान ब्रह्मा द्वारा रचित प्रजापतियों में से एक थे और उन्हें अपनी सत्ता तथा कुल की मर्यादा पर अत्यधिक अभिमान था। सती के हृदय में बचपन से ही भगवान शिव के प्रति असाधारण भक्ति समाहित थी। जब सती विवाह योग्य हुईं तो उन्होंने निश्चय किया कि वे केवल देवाधिदेव महादेव का ही वरण करेंगी।
यद्यपि शिव कैलाश पर्वत पर एक वैरागी के रूप में रहते थे और सांसारिक वैभव से पूर्णतः विरक्त थे परंतु सती का मन केवल उन्हीं के स्मरण में लीन रहता था। सती ने अपनी कठोर साधना से शिव को प्रसन्न किया और अंततः उनका विवाह संपन्न हुआ। हालाँकि राजा दक्ष इस विवाह के पूर्णतः विरुद्ध थे क्योंकि उनकी दृष्टि में शिव एक भस्मधारी अघोरी थे जो राजसी मानकों पर कभी खरे नहीं उतरते थे। यही द्वेष और वैचारिक मतभेद कालांतर में ब्रह्मांड की एक अत्यंत दुखद घटना का कारण बना।
समय बीतने के साथ राजा दक्ष के भीतर शिव के प्रति घृणा बढ़ती गई। उन्होंने एक बार एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने ब्रह्मांड के समस्त देवताओं, ऋषियों, यक्षों और दिव्य प्राणियों को आमंत्रित किया। किंतु उन्होंने अपनी ही पुत्री सती और जमाता भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। जब सती को देवर्षि नारद के माध्यम से इस विशाल यज्ञ के बारे में ज्ञात हुआ तो उनका पुत्री मन पिता के घर जाने को व्याकुल हो उठा।
भगवान शिव ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि बिना निमंत्रण जाना उचित नहीं है और वहां उन्हें अपमान का सामना करना पड़ सकता है। परंतु सती ने आग्रह किया कि पिता के घर जाने के लिए किसी औपचारिक निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। जब सती यज्ञ सभा में पहुँचीं तो वहां का दृश्य अत्यंत कष्टदायक था। कोई भी अतिथि या परिजन उनसे प्रेमपूर्वक नहीं मिला और राजा दक्ष ने पूरी सभा के समक्ष भगवान शिव का घोर अपमान किया। दक्ष ने शिव को अमंगलकारी और कुलहीन कहकर पुकारा। अपने आराध्य और पति के प्रति इन कड़वे शब्दों को सुनकर सती का हृदय शोक और प्रचंड क्रोध से फट पड़ा।
सती ने उस भरी सभा में गरजते हुए कहा कि जिस शरीर ने ऐसे पिता के अंश से जन्म लिया है जो महादेव का अपमान करता है वह शरीर अब त्यागने योग्य है। उन्होंने घोषणा की कि वे योग अग्नि द्वारा अपनी देह को भस्म कर देंगी ताकि भविष्य में कोई उन्हें दक्ष की पुत्री न कह सके। उसी क्षण सती ने आँखें बंद कीं और अपनी आंतरिक योग शक्ति से शरीर में अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी। देखते ही देखते सती का भौतिक शरीर यज्ञ की वेदी के समीप भस्म हो गया।
जब यह समाचार कैलाश पहुँचा तो भगवान शिव का रुद्र रूप जागृत हो उठा। उन्होंने क्रोध में अपनी एक जटा उखाड़कर भूमि पर पटक दी जिससे महाभयंकर वीरभद्र का जन्म हुआ। वीरभद्र ने अपनी सेना के साथ दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और अपमान में मौन रहने वालों को कठोर दंड दिया। शिव सती के अधजले शरीर को लेकर विक्षिप्त अवस्था में पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। उनके इस तांडव से सृष्टि पर प्रलय का संकट मंडराने लगा। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई हिस्सों में विभाजित कर दिया। पृथ्वी पर जहाँ जहाँ सती के अंग गिरे वहां 51 शक्तिपीठों का निर्माण हुआ जो आज भी सनातन धर्म में परम पूजनीय हैं।
सती के जाने के बाद पूरा ब्रह्मांड सूना हो गया था और शिव गहन समाधि में चले गए थे। परंतु प्रकृति के नियम के अनुसार देवी की चेतना को पुनः एक नए और अधिक स्थिर स्वरूप में वापस आना था। पर्वतराज हिमालय और रानी मैना ने माँ भगवती को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करने के लिए युगों तक तपस्या की थी। परिणामस्वरूप देवी ने उनके घर में एक नवजात कन्या के रूप में जन्म लिया।
चूँकि वे शैल अर्थात पर्वत की पुत्री थीं इसलिए उन्हें शैलपुत्री कहा गया। इस जन्म में देवी के भीतर सती वाली व्याकुलता के स्थान पर हिमालय जैसी स्थिरता और दृढ़ता थी। बचपन से ही शैलपुत्री के मुख पर एक अलौकिक तेज था और उनके खेल भी आध्यात्मिक साधना से प्रेरित होते थे। पर्वत के शुद्ध वातावरण में पलकर वे असीम शक्ति और धैर्य की प्रतिमूर्ति बन गईं। उन्होंने पुनः नारद जी के उपदेश से भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वन में जाकर तपस्या आरंभ की।
सती और शैलपुत्री की यह कथा केवल एक कहानी नहीं बल्कि आध्यात्मिक विकास का एक गहरा मानचित्र है। नवरात्रि माँ शैलपुत्री से इसलिए शुरू होती है क्योंकि वे संकल्प की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। सती का रूप 'भावना' का प्रतीक था जो अपमान सह न सका जबकि शैलपुत्री का रूप 'तप' का प्रतीक है जो अडिग है। जिस प्रकार देवी ने अपनी पुरानी पहचान का त्याग कर एक नई और उच्चतर पहचान प्राप्त की उसी प्रकार भक्त भी नवरात्रि के प्रथम दिन अपनी पुरानी बुराइयों को छोड़कर एक नई आध्यात्मिक यात्रा का संकल्प लेते हैं।
योग विज्ञान के अनुसार माँ शैलपुत्री का वास मूलाधार चक्र में माना जाता है। यह चक्र मनुष्य के शरीर का आधार स्तंभ है। जिस प्रकार पर्वत स्थिर होता है उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिए मन का स्थिर होना अनिवार्य है। बिना आधार को मजबूत किए कोई भी साधक उच्च चेतना की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकता है। इसलिए नवरात्रि का प्रथम चरण जड़ों को मजबूत करने का संदेश देता है।
माँ शैलपुत्री का चित्रण अत्यंत भव्य और प्रेरणादायक है। वे एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल का पुष्प धारण करती हैं। त्रिशूल मनुष्य के तीन तापों यथा दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों के विनाश का संकेत देता है। कमल का पुष्प इस संसार रूपी कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त और पवित्र रहने की कला सिखाता है।
उनका वाहन वृषभ अर्थात नंदी है। बैल को बहुत अधिक शक्तिशाली और सहनशील जीव माना जाता है। यह दर्शाता है कि जो व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलता है उसके भीतर असीम सहनशक्ति और भार वहन करने की क्षमता स्वतः आ जाती है। उनका श्वेत वस्त्र उनकी शुद्धता और वैराग्य का परिचायक है जो सती के त्याग और शैलपुत्री के नए संकल्प के बीच एक सेतु का कार्य करता है।
माँ शैलपुत्री की यह संपूर्ण यात्रा हमें सिखाती है कि जीवन में कठिन परिस्थितियाँ और अपमान हमें तोड़ने के लिए नहीं बल्कि हमें फिर से गढ़ने के लिए आते हैं। सती का अंत दुःखद लग सकता है लेकिन उसी अंत ने शैलपुत्री जैसी स्थिर शक्ति को जन्म दिया। यदि आपके जीवन में भी कुछ नष्ट हो रहा है तो विश्वास रखिए कि वह एक नई और बेहतर शुरुआत का संकेत है।
भक्ति, साहस और अटूट विश्वास के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन के अंधकारमय अध्याय को आध्यात्मिक उजाले में बदल सकता है। इसीलिए जब नवरात्रि माँ शैलपुत्री की पूजा से शुरू होती है तो यह प्रत्येक साधक को यह याद दिलाती है कि हर बड़े लक्ष्य के लिए प्रथम सोपान विनम्रता, जड़ों से जुड़ाव और पुनः उठ खड़े होने का साहस ही है।
क्या माँ शैलपुत्री ही वास्तव में सती हैं?
हाँ माँ शैलपुत्री देवी सती का ही पुनर्जन्म हैं जिन्होंने हिमालय के घर में दूसरा अवतार लिया था।
माँ शैलपुत्री की पूजा में किस रंग का प्रयोग करना चाहिए?
प्रथम दिन के लिए पीला रंग अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि यह ज्ञान और नई चेतना का प्रतीक है।
मूलाधार चक्र और माँ शैलपुत्री का क्या संबंध है?
मूलाधार चक्र शरीर का आधार है और माँ शैलपुत्री स्थिरता की देवी हैं इसलिए इस चक्र के जागरण हेतु उनकी पूजा अनिवार्य है।
त्रिशूल और कमल का क्या अर्थ है?
त्रिशूल बुराइयों के संहार का और कमल का फूल संसार में रहकर भी पवित्र बने रहने का प्रतीक है।
माँ शैलपुत्री का प्रिय भोग क्या है?
माँ शैलपुत्री को गाय के शुद्ध घी से बनी वस्तुओं या दूध से बने नैवेद्य का भोग लगाना अत्यंत प्रिय है।
क्या आप नवरात्रि के अगले अध्याय में माँ ब्रह्मचारिणी की उस कठिन तपस्या की कहानी सुनना चाहेंगे जिसने कामदेव को भी विस्मित कर दिया था?
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