By पं. संजीव शर्मा
युद्ध के समय में माँ स्कंदमाता की शांत शक्ति और संतुलन का रहस्य

जब किसी बड़े युद्ध की आहट सुनाई देती है तब केवल रणभूमि ही नहीं बदलती, चेतना भी बदलने लगती है। देवताओं के बीच गति बढ़ जाती है, विचार तेज हो जाते हैं, शस्त्र सजने लगते हैं और हर दिशा में एक अदृश्य तनाव फैल जाता है। ऐसे समय में सामान्य अपेक्षा यही होती है कि जो भी महान शक्ति हो, वह भी उग्रता, तैयारी और प्रत्यक्ष सक्रियता के रूप में दिखाई दे। लेकिन माँ स्कंदमाता के स्वरूप में ठीक इसके विपरीत एक अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। युद्ध निकट है, असुरों की शक्ति बढ़ रही है, देवता चिंतित हैं, फिर भी माँ स्कंदमाता कमल पर पूर्ण शांति से विराजमान हैं। यही दृश्य इस कथा को असाधारण बनाता है।
यह शांति साधारण नहीं थी। यह वह शांति नहीं थी जो परिस्थितियों से अनजान हो। यह वह शांति भी नहीं थी जो दूर खड़ी होकर सब कुछ देखती रहे। यह उस शक्ति की शांति थी जो परिस्थिति के केंद्र में रहते हुए भी उससे विचलित नहीं होती। माँ स्कंदमाता युद्ध से दूर नहीं थीं। वे उसी समय, उसी तनाव, उसी आंतरिक दबाव के बीच उपस्थित थीं। फिर भी उनका स्वरूप संतुलित था। यही कारण है कि उनका कमल पर बैठना एक प्रतीक मात्र नहीं बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संकेत बन जाता है।
जब देवताओं ने माँ स्कंदमाता को इस रूप में देखा, तो उनके भीतर अनेक प्रश्न उठे। उन्हें लगा कि जब युद्ध अवश्यंभावी हो चुका है, जब असुरों की शक्ति बढ़ती जा रही है तब ऐसी स्थिरता का क्या अर्थ है। क्या यह किसी गहरे विश्वास का संकेत है। क्या यह ऐसी स्थिति है जहाँ परिणाम पहले ही देखा जा चुका है। या क्या यह वह मौन शक्ति है जो युद्ध से पहले ही उसकी दिशा बदल देती है।
देवताओं के मन में उस समय भय था। उनके सामने केवल बाहरी संघर्ष नहीं था बल्कि परिणाम की चिंता भी थी। वे जानते थे कि युद्ध केवल शस्त्रों से नहीं जीता जाता, फिर भी भय मन को धुंधला कर देता है। ऐसे समय में माँ स्कंदमाता की शांति ने उनके भीतर एक अलग ही प्रभाव डाला। पहले उन्हें यह मौन समझ में नहीं आया, पर धीरे धीरे उन्हें अनुभव होने लगा कि यह शांति निष्क्रियता नहीं बल्कि आत्मनियंत्रण का उच्चतम रूप है।
माँ स्कंदमाता का कमल पर विराजमान होना इस कथा की आत्मा है। कमल केवल एक सुंदर आसन नहीं है। वह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में पवित्रता, असंगता, उच्च चेतना का प्रतीक है। कमल कीचड़ में जन्म लेता है, पर कीचड़ से दूषित नहीं होता। उसके चारों ओर जल होता है, पर जल उसे भिगोकर भारी नहीं बना पाता। वह अपनी आंतरिक शुचिता और संतुलन को हर परिस्थिति में बनाए रखता है।
इसीलिए माँ स्कंदमाता का कमल पर बैठना यह बताता है कि वे उस समय घट रही हर परिस्थिति से परिचित थीं, पर उससे बंधी हुई नहीं थीं। वे युद्ध के बीच थीं, पर युद्ध उनके भीतर नहीं था। वे संघर्ष के समय उपस्थित थीं, पर संघर्ष ने उनके मन को नहीं पकड़ा था। यह रूप सिखाता है कि बाहरी उथलपुथल के बीच भी चेतना को निर्मल और स्थिर रखा जा सकता है।
उनकी उपस्थिति स्वयं एक उत्तर थी। उन्होंने शस्त्र उठाकर कुछ नहीं कहा। उन्होंने घोषणा करके किसी को आश्वस्त नहीं किया। उन्होंने किसी को समझाने का प्रयास भी नहीं किया। फिर भी उनका मौन ही संदेश बन गया। यह संदेश था कि हर संघर्ष को घबराहट से नहीं बल्कि संतुलन से जीता जाता है। जब मन भय से भर जाता है तब सामर्थ्य होते हुए भी निर्णय कमजोर पड़ जाते हैं। जब मन स्थिर हो तब सीमित साधन भी पर्याप्त सिद्ध हो सकते हैं।
माँ स्कंदमाता ने उसी क्षण यह दिखा दिया कि युद्ध पहले बाहर नहीं, भीतर तय होता है। यदि देवताओं का मन भयभीत रहता, तो उनकी शक्ति बिखर जाती। यदि उनका आत्मविश्वास टूटता, तो शस्त्र भी कम पड़ जाते। इसलिए उनकी शांति युद्ध से पहले की सबसे बड़ी तैयारी थी। वे प्रत्यक्ष रूप से कुछ करती हुई नहीं दिख रही थीं, पर वास्तव में वही चेतना का आधार स्थापित कर रही थीं।
कथा में यह संकेत मिलता है कि भगवान शिव भी इस स्थिति को देख रहे थे, पर वे भी मौन थे। उनका मौन इस प्रसंग को और गहरा बनाता है। शिव जानते थे कि यह वह क्षण है जहाँ बाहरी गतिविधि से अधिक महत्वपूर्ण है शक्ति के स्वरूप को समझना। माँ स्कंदमाता का रूप केवल मातृत्व का नहीं बल्कि ऐसी दैवी स्थिरता का भी है जो संकट के समय दिशा बनती है।
शिव का मौन इस बात का संकेत है कि वे उस संदेश को पहचान रहे थे जो माँ स्कंदमाता दे रही थीं। वे देख रहे थे कि यह समय केवल युद्ध की तैयारी का नहीं बल्कि युद्ध से पहले मन की शुद्धि और चेतना की एकाग्रता का भी है। जहाँ भीतर संतुलन हो, वहीं बाहर विजय की संभावना मजबूत होती है।
इस कथा का रोचक पक्ष यह भी है कि असुरों ने भी इस शांति को देखा, पर उसका अर्थ नहीं समझ सके। उन्होंने इसे बाहरी दृष्टि से देखा। उन्हें यह लगा कि इतनी शांति शायद कमजोरी का संकेत हो। उन्हें यह समझ में नहीं आया कि जो शक्ति अपने भीतर से स्थिर हो जाती है, उसे बाहरी उग्रता से डिगाना कठिन हो जाता है।
यही असुरिक दृष्टि और दैवी दृष्टि का अंतर है। असुरों ने शांति को निष्क्रियता समझा। देवताओं ने पहले उसे प्रश्न की तरह देखा और फिर धीरे धीरे उसे बल के रूप में समझा। माँ स्कंदमाता का यही रूप बताता है कि दैवी शक्ति हमेशा ऊँची आवाज में प्रकट नहीं होती। कई बार वह इतनी शांत होती है कि जो उसे केवल बाहर से देखते हैं, वे उसके असली स्वरूप को पहचान ही नहीं पाते।
माँ स्कंदमाता ने उस क्षण कोई प्रत्यक्ष युद्ध नहीं किया, फिर भी उनकी उपस्थिति ने वातावरण बदल दिया। देवताओं के मन में जो चिंता थी, वह धीरे धीरे कम होने लगी। उनकी सोच साफ होने लगी। उनका आत्मविश्वास लौटने लगा। जहाँ पहले तनाव था, वहाँ अब संयम जन्म लेने लगा। यही वह सूक्ष्म परिवर्तन था जिसने आगामी युद्ध की दिशा बदल दी।
यहाँ एक बहुत बड़ा सिद्धांत छिपा है। हर विजय तलवार से शुरू नहीं होती। कुछ विजय उस क्षण से शुरू होती हैं जब भय हटता है और स्पष्टता लौटती है। माँ स्कंदमाता ने यह सिद्ध किया कि सबसे बड़ी शक्ति वह नहीं जो केवल प्रहार करे बल्कि वह है जो प्रहार से पहले ही मन, दिशा और निर्णय को स्थिर कर दे।
माँ स्कंदमाता केवल युद्ध से पहले शांत बैठी देवी नहीं हैं। वे माँ हैं, उनका यह मातृस्वरूप भी इस कथा को गहराई देता है। एक माँ केवल बाहरी सुरक्षा नहीं देती, वह आंतरिक आश्वासन भी देती है। जब कोई बच्चा भयभीत होता है, तो हमेशा शब्द जरूरी नहीं होते। कई बार केवल माँ की उपस्थिति ही पर्याप्त होती है। स्कंदमाता का यही भाव देवताओं के साथ भी था।
उनकी शांति देवताओं के लिए आश्रय बन रही थी। उनका मौन आश्वासन था कि स्थिति चाहे जितनी कठिन हो, संतुलन अभी भी संभव है। यही मातृत्व और शक्ति का अद्वितीय मिलन है। वे कोमल भी हैं, अडिग भी। वे शांत भी हैं, अप्रत्यक्ष रूप से अत्यंत प्रभावशाली भी।
यह कथा केवल पुरातन युद्ध की नहीं है। यह हमारे अपने जीवन की भी कथा है। जब जीवन में संघर्ष आता है, जब निर्णय कठिन हो जाते हैं, जब परिस्थितियाँ दबाव पैदा करती हैं तब मन सबसे पहले डगमगाता है। उसी समय हम भी या तो घबराहट में निर्णय लेते हैं, या रुककर भीतर की स्थिरता खोजते हैं। माँ स्कंदमाता का यह रूप सिखाता है कि किसी भी बाहरी संघर्ष से पहले भीतर की स्थिति को संभालना आवश्यक है।
यदि मन ही विचलित हो, तो सही मार्ग दिखाई नहीं देता। यदि भीतर भय बहुत अधिक हो, तो उपलब्ध शक्ति भी कम लगने लगती है। लेकिन यदि मन स्थिर हो जाए, तो कठिन परिस्थिति भी समझ में आने लगती है। इसीलिए उनका कमल पर बैठना केवल एक दिव्य दृश्य नहीं बल्कि जीवन का गहरा सूत्र है। शांति भागना नहीं है। शांति वह स्थिति है जहाँ से सही कर्म जन्म लेते हैं।
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। बहुत लोग शांति को निष्क्रियता समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि जो तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, वह शायद कमजोर है। पर माँ स्कंदमाता का यह प्रसंग ठीक उलटा सत्य बताता है। युद्ध से पहले शांत रहना निष्क्रियता नहीं बल्कि ऊर्जा का संरक्षण है। यह अपनी चेतना को बिखरने से बचाना है। यह निर्णय को भावनात्मक धुंध से बाहर रखना है।
जो शक्ति बिना सोचे तुरंत प्रतिक्रिया देती है, वह कई बार स्वयं को कमजोर कर लेती है। जो शक्ति सही समय तक स्थिर रह सकती है, वही सही क्षण में पूर्ण प्रभाव से कार्य कर सकती है। स्कंदमाता इसी सूक्ष्म शक्ति की अधिष्ठात्री हैं।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि माँ स्कंदमाता का कमल पर शांत विराजमान रहना कोई साधारण दृश्य नहीं था। वह युद्ध से पहले की सबसे गहरी तैयारी थी। वह यह घोषणा थी कि भीतर की विजय के बिना बाहर की विजय अधूरी है। वह यह संकेत था कि संतुलित मन ही धर्म की रक्षा कर सकता है। वह यह शिक्षा थी कि शांति और शक्ति जब एक साथ जुड़ते हैं तब परिस्थिति बदलने लगती है।
माँ स्कंदमाता हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में संघर्ष अनिवार्य हो सकते हैं, पर घबराहट अनिवार्य नहीं है। यदि भीतर का कमल सुरक्षित रहे, यदि चेतना निर्मल और स्थिर रहे, तो सबसे कठिन समय भी दिशा खोता नहीं। यही उनके शांत स्वरूप का वास्तविक अर्थ है।
माँ स्कंदमाता युद्ध से पहले कमल पर शांत क्यों विराजमान रहीं
क्योंकि वे यह दिखा रही थीं कि किसी भी संघर्ष से पहले मन का संतुलन और चेतना की स्थिरता सबसे आवश्यक है।
कमल का इस कथा में क्या अर्थ है
कमल असंगता, पवित्रता और ऐसी स्थिर चेतना का प्रतीक है जो कठिन परिस्थिति में भी दूषित नहीं होती।
क्या देवताओं ने उनकी शांति को तुरंत समझ लिया था
नहीं। पहले उनके मन में प्रश्न उठा, पर धीरे धीरे उन्होंने समझा कि वही शांति उनके भय को समाप्त कर रही है।
असुरों ने इस शांति को कैसे देखा
उन्होंने इसे कमजोरी समझा, क्योंकि वे उस मौन स्थिरता के भीतर छिपी दैवी शक्ति को पहचान नहीं सके।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह कि सच्ची शक्ति केवल युद्ध में नहीं बल्कि युद्ध से पहले मन, निर्णय और चेतना को संतुलित करने में होती है।
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