By पं. अमिताभ शर्मा
युद्ध के समय माँ स्कंदमाता की मौन शक्ति और उसकी प्रभावशीलता

युद्ध का अपना एक स्वभाव होता है। वह शोर से आरंभ होता है, आक्रोश से फैलता है और धीरे धीरे विनाश की ओर बढ़ने लगता है। देवताओं और असुरों के बीच जब वह निर्णायक समय आया तब चारों ओर वही वातावरण उपस्थित था। अस्त्रों की चमक बढ़ रही थी, युद्ध के शंख गूंज रहे थे, सेनाओं की गति तेज हो रही थी और हर दिशा में एक घना तनाव उतर आया था। सभी को लग रहा था कि अब संघर्ष अपने चरम रूप में फूट पड़ेगा। पर ठीक उसी क्षण एक ऐसा दृश्य सामने था जो इस पूरी गति से बिल्कुल अलग था और वही दृश्य आगे चलकर युद्ध की दिशा बदलने वाला बना। वह दृश्य था माँ स्कंदमाता का, जो कमल पर स्थिर, शांत और गहरी करुणा से भरे स्वरूप में विराजमान थीं।
उनकी यह शांति साधारण शांति नहीं थी। यह न तो परिस्थिति से अनभिज्ञ रहने की शांति थी, न ही संघर्ष से दूर खड़े रहने की। यह उस शक्ति की शांति थी जो सब कुछ देखती है, सब कुछ समझती है, पर भीतर से विचलित नहीं होती। माँ स्कंदमाता युद्धभूमि के निकट थीं, पर युद्ध का आवेश उनके भीतर प्रवेश नहीं कर पा रहा था। यही कारण था कि उनका मौन केवल मौन नहीं रह गया, वह एक ऐसी दैवी उपस्थिति बन गया जिसने पूरे वातावरण को भीतर से प्रभावित करना शुरू कर दिया।
जब कोई शक्ति उग्र रूप में सामने आती है, तो उसका प्रभाव तुरंत दिखाई देता है। लोग उसे पहचान लेते हैं, उससे डरते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं। पर जब कोई शक्ति स्थिरता के रूप में प्रकट होती है, तो उसका प्रभाव अधिक सूक्ष्म होता है और कई बार अधिक गहरा भी। माँ स्कंदमाता का यही मौन उस समय सबसे बड़ी शक्ति बन चुका था।
वे कमल पर विराजमान थीं। कमल का अपना गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। वह कीचड़ में जन्म लेकर भी कीचड़ से अछूता रहता है। जल से घिरा होकर भी जल उसे भिगोकर भारी नहीं कर पाता। इसी प्रकार माँ स्कंदमाता का कमल पर बैठना यह संकेत दे रहा था कि वे उस संघर्ष के बीच होते हुए भी उससे बंधी नहीं हैं। वे परिस्थिति के केंद्र में हैं, पर परिस्थिति उनके भीतर प्रवेश नहीं कर पा रही। यही वह स्थिति है जहाँ शांति केवल एक भाव नहीं रहती, वह एक चेतन शक्ति बन जाती है।
जैसे जैसे उनकी उपस्थिति गहरी होती गई, युद्ध की गति में एक सूक्ष्म परिवर्तन आने लगा। जो सैनिक कुछ क्षण पहले आक्रमण के लिए तीव्रता से तैयार थे, उनके कदमों में अनायास ही ठहराव आने लगा। यह ठहराव किसी आदेश से नहीं आया था। किसी ने उन्हें रोका नहीं था। फिर भी एक अनजानी स्थिरता उनके भीतर उतरने लगी।
यह युद्ध का अत्यंत गहरा पक्ष है, जिसे सामान्य दृष्टि से समझना कठिन होता है। बाहरी शोर के बीच जब भीतर मौन उतरता है तब व्यक्ति अचानक अपने ही आवेश को देखने लगता है। सैनिकों के साथ भी यही हो रहा था। वे अपने अंदर उठती बेचैनी, भय, उत्साह और आवेग को महसूस करने लगे। इससे उनकी गति बदलने लगी। यह कोई हार नहीं थी बल्कि युद्ध की दिशा में पहला सूक्ष्म परिवर्तन था।
देवताओं ने सबसे पहले अपने भीतर यह प्रभाव महसूस किया। कुछ ही देर पहले तक उनके भीतर जो घबराहट थी, जो परिणाम को लेकर अस्थिरता थी, वह धीरे धीरे कम होने लगी। उनकी दृष्टि साफ होने लगी। उनके विचार संयमित हुए। उन्हें पहली बार अनुभव हुआ कि युद्ध केवल बाहरी आक्रमण का नाम नहीं है। यदि भीतर का मन ही बिखरा हुआ हो, तो बाहरी शक्ति भी अधिक देर तक साथ नहीं देती।
माँ स्कंदमाता के मौन ने देवताओं को यह अनुभूति कराई कि संतुलन के बिना विजय अधूरी है। उनका आत्मविश्वास वापस लौटने लगा, लेकिन यह केवल जोश का आत्मविश्वास नहीं था। यह गहरी समझ से जन्मा हुआ विश्वास था। वे अब केवल युद्ध करने के लिए तैयार नहीं थे बल्कि सही समय और सही दिशा में युद्ध करने के लिए तैयार हो रहे थे।
असुरों के लिए यह स्थिति और भी अधिक विचित्र थी। वे आक्रमण करना चाहते थे, आगे बढ़ना चाहते थे, अपनी शक्ति दिखाना चाहते थे, लेकिन उनके भीतर कुछ टूटने लगा। उनकी ऊर्जा बिखरने लगी। उनके मन में यह प्रश्न उठने लगे कि क्या अभी आक्रमण करना उचित है, क्या सामने जो शांति है वह वास्तव में शांति है या किसी और ही शक्ति का संकेत।
यही संदेह उनके लिए सबसे बड़ा संकट बन गया। युद्ध में बाहरी शत्रु से पहले यदि भीतर संदेह जन्म ले ले, तो शक्ति धीरे धीरे कम होने लगती है। असुरों के साथ यही हुआ। वे बाहर से अभी भी बलशाली दिख रहे थे, पर भीतर उनका आत्मविश्वास पूर्ण नहीं रह गया था। वे आक्रमण की इच्छा और आंतरिक अस्थिरता के बीच फँसने लगे।
हाँ और यही इस कथा का सबसे अद्भुत पक्ष है। माँ स्कंदमाता ने न कोई शस्त्र उठाया, न कोई घोषणा की, न कोई ललकार दी। उन्होंने केवल मौन में स्थिर रहकर यह सिद्ध किया कि उपस्थिति भी एक शक्ति हो सकती है। उनका मौन ही उनका संदेश था। वह संतुलन का संदेश था, धैर्य का संदेश था और उस शक्ति का संदेश था जो बिना संघर्ष किए भी संघर्ष की दिशा बदल सकती है।
युद्ध का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि हर परिवर्तन शस्त्रों से नहीं आता। कुछ परिवर्तन चेतना से आते हैं। कुछ परिवर्तन केवल इस कारण आते हैं कि एक महान शक्ति किसी स्थिति के बीच पूरी तरह संतुलित रह सकी। माँ स्कंदमाता ने उसी संतुलन को जीवित रखा। इसी कारण बिना किसी प्रत्यक्ष आक्रमण के भी दोनों पक्षों की अवस्था बदलने लगी।
इस प्रसंग में भगवान कार्तिकेय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे देवसेना के सेनापति थे। वे युद्ध की तीव्रता को समझते थे और आवश्यकता पड़ने पर उग्र निर्णय लेने में समर्थ थे। पर जब उन्होंने अपनी माता के उस शांत स्वरूप को अनुभव किया, तो उनके भीतर भी एक गहरा संतुलन जन्म लेने लगा। युद्ध की अग्नि उनके भीतर थी, लेकिन अब वह अंधी नहीं रही। उसमें विवेक जुड़ने लगा।
उन्होंने यह समझा कि हर समय आक्रमण करना ही वीरता नहीं होता। कई बार सही समय की प्रतीक्षा करना अधिक बड़ी शक्ति होती है। यह समझ केवल रणनीतिक नहीं थी, यह आंतरिक स्पष्टता से जन्मी हुई थी। माँ स्कंदमाता के मौन ने उनके भीतर वही स्पष्टता जाग्रत की। उनके निर्णय अधिक संतुलित, अधिक समयानुकूल और अधिक परिणामकारी बनने लगे। इसीलिए कहा जा सकता है कि युद्धभूमि में उनका मौन केवल उपस्थित नहीं था, वह कार्तिकेय के निर्णयों के माध्यम से कार्य भी कर रहा था।
यह कथा जीवन का अत्यंत गहरा सूत्र भी है। हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हर समस्या का समाधान तुरंत प्रतिक्रिया, वाद विवाद, कठोरता या संघर्ष में है। पर जीवन बार बार यह सिखाता है कि कई स्थितियों में सबसे बड़ा परिवर्तन तब आता है जब हम भीतर से शांत हो जाएँ। शांति निष्क्रियता नहीं है। शांति वह अवस्था है जहाँ से सही निर्णय जन्म लेते हैं।
जब मन शोर से भरा हो तब निर्णय भी आवेगपूर्ण होते हैं। जब मन स्थिर हो तब वह सही समय, सही दिशा और सही सीमा को पहचान सकता है। माँ स्कंदमाता का यह स्वरूप यही सिखाता है कि यदि भीतर की अवस्था संतुलित हो जाए, तो बाहर की सबसे कठिन परिस्थिति भी अपनी दिशा बदल सकती है।
बहुत लोग मौन को कमजोरी समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि जो तुरंत बोल नहीं रहा, प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, आक्रमण नहीं कर रहा, वह शायद निर्बल है। पर दैवी दृष्टि से देखा जाए तो मौन कई बार सबसे ऊँची शक्ति का रूप होता है। क्योंकि मौन में व्यक्ति अपनी ऊर्जा को बचाता है, उसे बिखरने नहीं देता और उसी ऊर्जा से सही क्षण पर सही परिवर्तन लाता है।
माँ स्कंदमाता ने यही दिखाया। उनका मौन शून्यता नहीं था। उसमें दिशा थी, प्रभाव था, करुणा थी और गहरा संतुलन था। वह मौन अपने आप में एक ऐसा अस्त्र बन गया जिसने बिना टकराव के ही वातावरण को रूपांतरित कर दिया। यही कारण है कि उनकी यह लीला केवल युद्ध की कथा नहीं बल्कि मौन की शक्ति का दिव्य उदाहरण है।
अंततः यह स्पष्ट हो गया कि माँ स्कंदमाता का मौन कोई साधारण मौन नहीं था। यह एक ऐसी दैवी शक्ति थी जिसने पूरे युद्ध को भीतर से प्रभावित किया। देवताओं को संतुलन मिला, कार्तिकेय को स्पष्टता मिली और असुरों के भीतर संदेह उत्पन्न हुआ। बिना किसी प्रत्यक्ष शस्त्र प्रयोग के ही युद्ध की धारा बदलने लगी। यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी।
यह कथा हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम भी अपने जीवन में उस मौन की शक्ति को पहचान पा रहे हैं। क्या हम हर समस्या का समाधान केवल संघर्ष में खोजते हैं, या कभी कभी शांति को भी साधन मानते हैं। माँ स्कंदमाता यह सिखाती हैं कि जब भीतर स्थिरता उतर आती है तब हमारी उपस्थिति ही बदल जाती है। और जब उपस्थिति बदलती है तब परिस्थितियाँ भी अपने आप रूपांतरित होने लगती हैं।
माँ स्कंदमाता का मौन युद्ध में इतना प्रभावशाली क्यों था
क्योंकि उनका मौन साधारण नहीं था। वह संतुलित चेतना की ऐसी शक्ति थी जिसने दोनों पक्षों के मन पर प्रभाव डाला।
देवताओं पर उनके मौन का क्या प्रभाव पड़ा
देवताओं के भीतर की घबराहट कम हुई, विचार स्पष्ट हुए और उनके आत्मविश्वास में स्थिरता आई।
असुरों को क्या अनुभव हुआ
असुरों के भीतर संदेह उत्पन्न हुआ, उनकी आक्रामकता कमजोर हुई और उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगा।
क्या भगवान कार्तिकेय के निर्णय भी इससे प्रभावित हुए
हाँ, उनके भीतर अधिक स्पष्टता और धैर्य उत्पन्न हुआ जिससे वे अधिक संतुलित निर्णय ले सके।
इस कथा का मुख्य संदेश क्या है
सच्ची शक्ति केवल शोर और आक्रमण में नहीं होती। कई बार मौन, शांति और आंतरिक संतुलन ही सबसे बड़ा परिवर्तन लाते हैं।
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