By पं. नीलेश शर्मा
युद्ध के समय माँ स्कंदमाता की मौन शक्ति और असुरों पर उसका प्रभाव

युद्ध को सामान्यतः बाहर घटित होने वाली घटना माना जाता है। दो सेनाएं आमने सामने आती हैं, अस्त्र उठते हैं, रणनीतियां बनती हैं और विजय या पराजय का निर्णय धीरे धीरे स्पष्ट होता जाता है। परंतु हर युद्ध केवल बाहर नहीं लड़ा जाता। कुछ युद्ध ऐसे होते हैं जो भीतर जन्म लेते हैं, भीतर बढ़ते हैं और अंततः बाहर की दिशा को भी बदल देते हैं। देवताओं और असुरों के बीच चल रहे उस महायुद्ध में भी एक ऐसा ही अदृश्य संघर्ष आकार ले चुका था। यह संघर्ष किसी शस्त्र, गर्जना या प्रत्यक्ष आक्रमण से प्रारंभ नहीं हुआ था। इसका कारण थी माँ स्कंदमाता की वह शांत, स्थिर और गहरी मौन उपस्थिति जिसने असुरों के भीतर छिपी अस्थिरता को जगाना शुरू कर दिया।
माँ स्कंदमाता कमल पर विराजमान थीं। उनका चेहरा शांत था, उनकी दृष्टि स्थिर थी और उनके चारों ओर एक ऐसी सूक्ष्म ऊर्जा फैल रही थी जिसे केवल देखा नहीं, महसूस भी किया जा सकता था। वे कुछ कह नहीं रही थीं, फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे बहुत कुछ घटित हो रहा हो। उनका मौन रिक्त नहीं था। उसमें एक ऐसी दैवी शक्ति थी जो युद्धभूमि में उपस्थित प्रत्येक चेतना को स्पर्श कर रही थी। देवताओं के लिए वही मौन आश्रय बन गया, जबकि असुरों के लिए वही मौन भीतर का द्वार खोलने लगा, जिसके पीछे उनके अपने भय, भ्रम और असंतुलन छिपे हुए थे।
माँ स्कंदमाता का मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं था। वह एक ऐसी स्थिर चेतना थी जो स्वयं विचलित नहीं होती, पर सामने वाले की विक्षिप्तता को उजागर कर देती है। सामान्यतः लोग शक्ति को केवल आवाज, आदेश, आक्रमण और दबाव में पहचानते हैं। पर दैवी शक्ति कई बार शोर में नहीं बल्कि संतुलित मौन में प्रकट होती है। जब कोई चेतना पूरी तरह स्थिर हो जाती है तब उसके सामने खड़ी अस्थिर चेतना स्वयं अपनी अशांति को देखने लगती है।
माँ स्कंदमाता की उपस्थिति में यही घटित हुआ। उनका कमलासन भी इस सत्य को गहरा करता है। कमल कीचड़ में रहकर भी उससे अछूता रहता है। उसी प्रकार उनका स्वरूप यह बता रहा था कि वे युद्ध के बीच में हैं, पर युद्ध उनके भीतर प्रवेश नहीं कर पाया है। यही शांति एक दर्पण की तरह कार्य कर रही थी। देवताओं ने उसमें अपना संतुलन देखा, असुरों ने उसमें अपना विखंडन।
देवताओं के भीतर भी भय और तनाव था। वे जानते थे कि संघर्ष साधारण नहीं है। असुरों की शक्ति बढ़ चुकी थी और परिणाम को लेकर एक प्रकार की आंतरिक बेचैनी उपस्थित थी। पर जैसे जैसे माँ स्कंदमाता की उपस्थिति गहरी होती गई, देवताओं ने अपने भीतर एक अलग प्रकार की शांति उतरती हुई अनुभव की। उनका मन स्थिर होने लगा। उनके विचारों में संयम लौटने लगा। जिस घबराहट ने उनकी दृष्टि को धुंधला किया था, वह धीरे धीरे कम होने लगी।
यह परिवर्तन बाहरी नहीं था, पर अत्यंत प्रभावशाली था। उन्होंने अनुभव किया कि जब भीतर स्पष्टता होती है तब शत्रु उतना भयावह नहीं लगता। जब मन संतुलित हो तब निर्णय अधिक सही होते हैं। माँ स्कंदमाता ने उन्हें बिना कुछ कहे यही शक्ति दी। उन्होंने उन्हें केवल साहस नहीं दिया, उन्होंने उन्हें आंतरिक आधार दिया।
असुरों का आधार बाहरी बल, संख्या और आक्रामकता पर टिका हुआ था। वे युद्ध को दबाव, भय और त्वरित प्रहार के माध्यम से जीतने के आदी थे। इसीलिए जब उन्होंने माँ स्कंदमाता की शांत उपस्थिति को देखा, तो प्रारंभ में उसे महत्व नहीं दिया। उन्हें लगा कि यह केवल एक कोमल रूप है जिसका युद्ध पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होगा। पर यही उनका पहला भ्रम था।
धीरे धीरे उनके भीतर कुछ बदलने लगा। उन्होंने पाया कि वे पहले जैसे केंद्रित नहीं रह पा रहे। उनकी ऊर्जा बिखरने लगी। जो आत्मविश्वास कुछ समय पहले तक दृढ़ था, उसमें सूक्ष्म दरारें आने लगीं। वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह परिवर्तन क्यों हो रहा है। बाहर सब कुछ लगभग वैसा ही था, फिर भी भीतर कोई आधार ढहने लगा था। यही वह क्षण था जब माँ स्कंदमाता की मौन शक्ति ने अपना काम शुरू कर दिया था।
हाँ और यही इस कथा का सबसे गहरा बिंदु है। असुरों के भीतर एक आंतरिक युद्ध शुरू हो चुका था। यह युद्ध बाहरी शत्रु के साथ नहीं, स्वयं अपने मन के साथ था। जो पहले एक दिशा में सोच रहे थे, अब प्रश्न करने लगे। जो पहले बिना हिचक आगे बढ़ रहे थे, अब रुककर सोचने लगे। जो पहले एक दूसरे पर विश्वास करते थे, अब एक दूसरे की मंशा को परखने लगे।
यहीं से उनका आंतरिक विखंडन आरंभ हुआ। किसी को रणनीति पर संदेह होने लगा, किसी को नेतृत्व पर, किसी को अपने साथियों पर और किसी को स्वयं की क्षमता पर। यह वह स्थिति थी जहाँ बाहरी युद्ध अभी पूर्ण रूप से फूटा भी नहीं था, पर भीतर का युद्ध उन्हें पहले ही कमजोर कर चुका था। यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जब मन विभाजित हो जाए तब बाहरी सेना चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसकी शक्ति स्थायी नहीं रह सकती।
माँ स्कंदमाता की मौन उपस्थिति ने असुरों के भीतर छिपे हुए असंतुलन को सतह पर लाना शुरू कर दिया। सामान्यतः जब अहंकार और आक्रामकता बहुत प्रबल होती है तब भीतर की दुर्बलता छिपी रहती है। पर जैसे ही कोई उच्चतर शांत शक्ति सामने आती है, वह छिपी हुई दुर्बलता उजागर होने लगती है। असुरों के साथ भी यही हुआ।
वे पहले एकजुट दिखाई दे रहे थे, पर उस एकता के भीतर वास्तविक समरसता नहीं थी। जैसे ही संदेह ने जन्म लिया, उनके बीच मतभेद बढ़ने लगे। कुछ तत्काल आक्रमण चाहते थे, कुछ प्रतीक्षा की बात करने लगे। कुछ अपने नेतृत्व पर प्रश्न उठाने लगे। कुछ यह मानने लगे कि सामने उपस्थित शक्ति साधारण नहीं है। यह सब धीरे धीरे उनके भीतर एक अदृश्य दरार बनाता गया। यही दरार आगे चलकर उनकी हार का आधार बनी।
देवताओं ने अनुभव किया कि असुरों की गति बदल रही है। वे उतने संगठित नहीं रहे। उनके निर्णयों में पहले जैसी तीक्ष्णता नहीं रही। उनका उत्साह अब आवेगपूर्ण तो था, पर स्थिर नहीं था। देवताओं ने समझ लिया कि यह केवल बाहरी रणनीति का परिणाम नहीं है। यह किसी गहरी दैवी शक्ति का प्रभाव है, जो विरोधी को भीतर से कमजोर कर रही है।
माँ स्कंदमाता का मौन उनके लिए अब और भी अधिक अर्थपूर्ण हो गया। उन्होंने देखा कि बिना शस्त्र उठाए भी वह शक्ति काम कर रही है। इससे देवताओं के भीतर नया विश्वास जागा। उन्हें यह बोध हुआ कि हर विजय केवल प्रहार से नहीं मिलती। कुछ विजय ऐसी होती हैं जो शत्रु के भीतर के असंतुलन को उजागर कर देने से मिलती हैं।
यही दैवी उपस्थिति का रहस्य है। सच्ची शक्ति हमेशा प्रत्यक्ष आदेशों, बड़े संकेतों या बाहरी प्रदर्शन के माध्यम से ही काम नहीं करती। कई बार वह केवल उपस्थिति के रूप में कार्य करती है। माँ स्कंदमाता ने किसी असुर को श्राप नहीं दिया, कोई चेतावनी नहीं दी, कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया। फिर भी उनका मौन उनकी सबसे बड़ी क्रियाशील शक्ति बन गया।
उन्होंने किसी को रोका नहीं, पर असुर स्वयं रुकने लगे। उन्होंने किसी को कमजोर नहीं किया, पर असुर भीतर से टूटने लगे। उन्होंने किसी को भ्रमित नहीं किया, पर असुर अपने ही विचारों में उलझने लगे। यही उस उच्चतर मातृशक्ति का रूप है जो बाहर संघर्ष नहीं करती, पर भीतर के सत्य को प्रकट कर देती है।
मानव जीवन में भी सबसे कठिन युद्ध वही होते हैं जो भीतर चलते हैं। बाहर व्यक्ति सफल, स्थिर और शक्तिशाली दिखाई दे सकता है, पर भीतर यदि भय, संदेह, भ्रम और असंतुलन सक्रिय हों, तो बाहरी विजय लंबे समय तक टिक नहीं सकती। यह कथा बताती है कि सबसे बड़ा शत्रु हमेशा बाहर नहीं होता। कई बार वह भीतर के विचारों, असुरक्षाओं और अस्थिरता के रूप में उपस्थित होता है।
माँ स्कंदमाता का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि यदि भीतर शांति हो, तो बाहर का संघर्ष सरल हो जाता है। पर यदि भीतर ही युद्ध चल रहा हो, तो बाहर की सबसे बड़ी जीत भी अधूरी रह जाती है। इसीलिए आध्यात्मिक परंपरा में बार बार मन के संतुलन, मौन और आंतरिक स्पष्टता को इतना महत्व दिया गया है।
कथा का सबसे स्पष्ट निष्कर्ष यही है कि असुरों की हार सबसे पहले उनके भीतर हुई। बाहरी युद्ध तो बाद की घटना थी। उनकी वास्तविक पराजय उस क्षण शुरू हो गई थी जब वे अपने ही संदेहों, मतभेदों और आंतरिक विखंडन से घिरने लगे। माँ स्कंदमाता की मौन उपस्थिति ने उनके भीतर छिपे हुए उसी असंतुलन को उजागर कर दिया।
यही कारण है कि यह प्रसंग केवल एक पौराणिक कथा नहीं रह जाता। यह मनुष्य के लिए भी एक गहरी शिक्षा बन जाता है। जब भीतर शांति नहीं होती तब व्यक्ति स्वयं अपने विरुद्ध खड़ा हो जाता है। और जब भीतर संतुलन स्थापित हो जाता है तब बाहर का संघर्ष भी रूपांतरित होने लगता है।
माँ स्कंदमाता हमें यह सिखाती हैं कि सच्ची शक्ति वही है जो भीतर के संघर्ष को शांत कर सके। वे यह भी सिखाती हैं कि मौन निष्क्रियता नहीं है। मौन कई बार सबसे गहरी रूपांतरणकारी शक्ति होता है। वह व्यक्ति को स्वयं से मिलाता है, भीतर छिपे असंतुलन को सामने लाता है और निर्णय की दिशा बदल देता है।
उनका यह स्वरूप बताता है कि शांति कोई कमजोर अवस्था नहीं बल्कि सबसे ऊँची सजगता है। जहाँ शांति है, वहाँ स्पष्टता है। जहाँ स्पष्टता है, वहाँ सही निर्णय संभव है। और जहाँ सही निर्णय है, वहाँ विजय केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी होती है।
क्या माँ स्कंदमाता ने सचमुच असुरों के भीतर युद्ध शुरू कर दिया था
हाँ। उनकी मौन उपस्थिति ने असुरों के भीतर छिपे भय, संदेह और असंतुलन को उजागर कर दिया, जिससे उनका आंतरिक संघर्ष आरंभ हुआ।
देवताओं पर इस मौन का क्या प्रभाव पड़ा
देवताओं के भीतर स्थिरता, स्पष्टता और संतुलन बढ़ा। उन्हें माँ स्कंदमाता की उपस्थिति से सहारा और आंतरिक विश्वास मिला।
असुरों के भीतर सबसे पहले क्या बदला
सबसे पहले उनका आत्मविश्वास डगमगाया। उसके बाद संदेह, मतभेद और रणनीतिक अस्थिरता बढ़ने लगी।
क्या बिना शस्त्र के भी युद्ध की दिशा बदली जा सकती है
हाँ। यदि मन प्रभावित हो जाए और विरोधी भीतर से असंतुलित हो जाए, तो बिना प्रत्यक्ष आक्रमण के भी युद्ध की दिशा बदल सकती है।
इस कथा का मुख्य संदेश क्या है
सबसे बड़ा युद्ध भीतर चलता है। जो भीतर से संतुलित है वही बाहर भी स्थायी विजय प्राप्त कर सकता है।
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