By पं. संजीव शर्मा
एक श्राप का अंत और देवी की दिव्य करुणा

नवरात्रि के पावन पर्व का आठवां दिन माँ महागौरी की आराधना के लिए समर्पित है। देवी का यह स्वरूप अत्यंत देदीप्यमान और शांत है जो भक्तों को शुद्धि और शांति प्रदान करता है। उनकी आभा चंद्रमा की चांदनी के समान उज्ज्वल है और वे श्वेत वृषभ पर सवारी करती हैं जो आध्यात्मिक संतुलन का प्रतीक माना जाता है। यद्यपि माता का यह स्वरूप बहुत कोमल है परंतु प्राचीन कथाएं उनके भीतर छिपी एक अद्भुत शक्ति का वर्णन करती हैं। ऐसी ही एक अल्पज्ञात कथा उस क्षण के बारे में है जब माँ महागौरी ने केवल अपनी एक दृष्टि से संपूर्ण राज्य का भाग्य बदल दिया था।
प्राचीन काल की बात है जब हिमालय की घाटियों में एक समृद्ध राज्य हुआ करता था। वहां के निवासी बहुत शांतिप्रिय और देवताओं के प्रति समर्पित थे। संपूर्ण क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा रहता था जहाँ नदियां और वन अपनी सुंदरता बिखेरते थे। एक दिन उस राज्य में एक तपस्वी का आगमन हुआ। वह कोई साधारण साधु नहीं था बल्कि एक ऐसा शक्तिशाली प्राणी था जो अपनी सिद्धियों के कारण अहंकारी हो गया था। एक सभा के दौरान राजा ने अनजाने में उसका अपमान कर दिया। तपस्वी को वह अपमान सहन नहीं हुआ और उसका क्रोध एक भयानक श्राप में बदल गया। उसने आवेश में आकर घोषणा कर दी कि संपूर्ण राज्य पत्थर की तरह निर्जीव हो जाएगा ताकि वहां कभी कोई आनंद या हलचल न रहे। श्राप का प्रभाव फैलते ही पक्षियों ने उड़ना बंद कर दिया और नदियां स्थिर हो गईं। देखते ही देखते वह हंसता खेलता राज्य पत्थर की एक मौन दुनिया बन गया।
उस राज्य में एक छोटी बालिका रहती थी जिसकी माँ भगवती के प्रति अटूट श्रद्धा थी। श्राप के पूरी तरह पत्थर बनने से पहले उसने अपनी रक्षा के लिए माँ महागौरी से सच्चे मन से प्रार्थना की। उसकी पुकार पहाड़ों से होती हुई उस सूक्ष्म लोक तक पहुँची जहाँ देवी का वास है। उस मासूम भक्ति से द्रवित होकर माता अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुईं।
जब माँ महागौरी ने उस अभिशप्त भूमि पर अपने चरण रखे तो पूरी घाटी एक कोमल श्वेत आभा से भर गई। माता की उपस्थिति ने वहां एक शांत मौन फैला दिया परंतु उस मौन में असीम शक्ति छिपी थी। देवी ने वहां कोई युद्ध नहीं किया और न ही कोई अस्त्र उठाया। वे केवल उस पत्थर के राज्य में चलने लगीं। जहाँ भी उनके चरणों का स्पर्श हुआ वहां चमत्कार होने लगा। पत्थर की मूर्तियां धीरे धीरे जीवन में लौटने लगीं। पक्षियों को अपने पंख वापस मिल गए और नदियां पुनः कलकल कर बहने लगीं। लोग ऐसे जागने लगे जैसे वे किसी बहुत लंबी और गहरी नींद से उठे हों।
वह अहंकारी तपस्वी जिसने श्राप दिया था वह इस चमत्कार को देख दंग रह गया। उसका शक्तिशाली मंत्र बिना किसी संघर्ष के टूट रहा था। जब उसने घाटी के मध्य में माँ महागौरी को खड़ा देखा तो उसे सत्य का आभास हुआ। माता की शुद्धता और करुणा उस क्रोध से कहीं अधिक बलवान थी जिसने श्राप को जन्म दिया था। अपनी भूल स्वीकार करते हुए उसने माता के चरणों में झुककर क्षमा मांगी। माँ महागौरी ने उसे क्षमा कर दिया और वह राज्य पूरी तरह सामान्य हो गया।
यह कथा एक अत्यंत शक्तिशाली संदेश देती है। माँ महागौरी पवित्रीकरण और पुनर्स्थापना की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। जहाँ क्रोध या अहंकार जीवन की खुशियों को जड़ बना देता है वहां माता की कृपा पुनः सामंजस्य और गति लेकर आती है। यही कारण है कि भक्त नवरात्रि के आठवें दिन माता की पूजा करते हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि सबसे बड़े चमत्कार विनाश से नहीं बल्कि करुणा और दिव्य प्रकाश से संभव होते हैं।
माँ महागौरी का वाहन क्या है?
माता वृषभ अर्थात् बैल पर सवारी करती हैं जो स्थिरता और पवित्रता का प्रतीक है।
असुरों के विनाश के बजाय माता ने इस कथा में क्या किया?
इस कथा में माता ने अपनी करुणा और दिव्य उपस्थिति से एक भयानक श्राप को समाप्त कर निर्जीव को सजीव कर दिया।
महाअष्टमी के दिन माता की पूजा का क्या फल मिलता है?
अष्टमी की पूजा से व्यक्ति के पुराने पापों का बोझ कम होता है और जीवन में शांति तथा शुद्धि का संचार होता है।
माता का रंग श्वेत क्यों है?
उनका श्वेत रंग पूर्ण शुद्धता और आत्मिक ज्ञान का प्रतीक है जो अज्ञान के अंधेरे को दूर करता है।
तपस्वी के साथ अंत में क्या हुआ?
तपस्वी ने माता के दिव्य स्वरूप को देख अपना अहंकार त्याग दिया और क्षमा मांगकर अपनी गलती सुधारी।
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