By पं. अभिषेक शर्मा
जानें नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी पूजा का आध्यात्मिक महत्व, सही पूजा विधि और भक्ति का संदेश

नवरात्रि के नौ दिन केवल उत्सव नहीं हैं बल्कि ये साधना के नौ सोपान माने जाते हैं। पहले दिन कलश स्थापना के साथ जो दिव्य ऊर्जा जागृत होती है वह दूसरे दिन तपस्या और समर्पण का रूप लेती है। नवरात्रि के दूसरे दिन माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। यह दिन शक्ति का नहीं बल्कि संयम का प्रतीक है। यह दिन बताता है कि जीवन में सच्ची उपलब्धि धैर्य, तप और अटूट निष्ठा से ही प्राप्त होती है। देवी का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि बिना संघर्ष और कठिन परिश्रम के सफलता प्राप्त करना संभव नहीं है।
चैत्र नवरात्रि 2026 में नवरात्रि का दूसरा दिन शुक्रवार 20 मार्च 2026 को पड़ रहा है। इस दिन की तिथि द्वितीया है। इस दिन से जुड़े कुछ अन्य महत्वपूर्ण व्रत और पर्व भी हैं जो इसे और भी विशेष बनाते हैं। इस दिन चंद्र दर्शन का भी विशेष महत्व होता है क्योंकि द्वितीया की तिथि चंद्रमा के उदय से जुड़ी होती है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| तिथि | 20 मार्च 2026 |
| दिन | शुक्रवार |
| नवरात्रि दिवस | द्वितीय दिन |
| तिथि | द्वितीया |
| विशेष पर्व | चंद्र दर्शन, सिंधारा दूज |
| पूजित देवी | माँ ब्रह्मचारिणी |
| दिन का रंग | हरा |
माँ ब्रह्मचारिणी देवी पार्वती का वह स्वरूप हैं जिसमें उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। ब्रह्मचारिणी शब्द दो भागों से बना है जिसमें ब्रह्म अर्थात परम ज्ञान है और चारिणी अर्थात आचरण करने वाली है। इस प्रकार माँ ब्रह्मचारिणी वह देवी हैं जो तप, समर्पण और आध्यात्मिक ज्ञान के मार्ग पर चलती हैं। उनका पूरा जीवन एक तपस्वी की भांति बीता है जो हमें संयम की शिक्षा देता है।
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनेक वर्षों तक कठिन तपस्या की। पहले वे फल और कंद मूल खाकर जीवन व्यतीत करती रहीं और फिर धीरे-धीरे उन्होंने आहार छोड़ा और अंततः जल तक त्याग दिया। उनकी यह अडिग साधना सारे ब्रह्मांड को प्रभावित करने लगी और अंत में भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं है बल्कि यह मनुष्य को यह सिखाती है कि दृढ़ निश्चय और सच्ची लगन से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत शांत और दीप्तिमान है। वे नंगे पाँव चलती हैं जो उनकी सादगी और वैराग्य का प्रतीक है। उनके दाहिने हाथ में जपमाला है जो निरंतर आध्यात्मिक साधना का संकेत देती है। बाएं हाथ में कमंडल है जो तपस्या और संयमित जीवन का प्रतीक माना जाता है। देवी के मस्तक पर एक अद्भुत तेज दिखाई देता है जो उनकी कठिन साधना का परिणाम है। उनका सौम्य मुखमंडल यह स्मरण दिलाता है कि सच्ची शक्ति बाहरी आडंबर में नहीं बल्कि आंतरिक दृढ़ता में निहित है। जो भक्त उनके इस स्वरूप का ध्यान करते हैं उनके भीतर भी इसी प्रकार की शांति का संचार होने लगता है।
योग और तंत्र की दृष्टि से नवरात्रि का दूसरा दिन स्वाधिष्ठान चक्र से जुड़ा है। यह चक्र भावनाओं, सृजनशीलता और आंतरिक संतुलन को नियंत्रित करता है। माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना इस चक्र को जागृत और संतुलित करने में सहायक मानी जाती है। इससे भावनात्मक स्थिरता, धैर्य और इंद्रिय संयम की प्राप्ति होती है। जब साधक इस चक्र पर ध्यान केंद्रित करता है तो उसकी चेतना ऊपर की ओर बढ़ने लगती है।
आध्यात्मिक रूप से यह दिन यह संदेश देता है कि जीवन में जो भी सार्थक उपलब्धि होती है उसके पीछे समर्पण और प्रयास होता है। माँ ब्रह्मचारिणी अटूट ध्यान की शक्ति और कठिनाइयों के बावजूद आध्यात्मिक पथ पर चलते रहने के साहस का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति अपने मानसिक विकारों पर विजय प्राप्त करने में सक्षम होता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन का रंग हरा है। हरा रंग विकास, सामंजस्य, समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन भक्त प्रायः हरे वस्त्र धारण करते हैं और माँ को हरे पुष्प या पत्ते अर्पित करते हैं। यह रंग नवरात्रि काल में साधक के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा के विकास को दर्शाता है। प्रकृति के समीप होने के कारण यह रंग शांति और आरोग्य भी प्रदान करता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन की पूजा में सरलता और भाव की प्रधानता होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त इस विधि का पालन कर सकते हैं:
इन अनुष्ठानों के माध्यम से भक्त माँ ब्रह्मचारिणी से अनुशासन, शक्ति और आध्यात्मिक विवेक का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
माँ ब्रह्मचारिणी को नवरात्रि के दूसरे दिन चीनी और फल का भोग लगाने की परंपरा है। कई स्थानों पर माँ को मिश्री और मेवे भी अर्पित किए जाते हैं। चीनी मन की मिठास और शुद्धता का प्रतीक है। मान्यता है कि माँ को चीनी का भोग लगाने से जीवन में शांति, दीर्घायु और सामंजस्य की प्राप्ति होती है। यह सात्विक भोग साधक के मन को भी एकाग्र करने में मदद करता है। भोग सदैव शुद्ध भाव और साफ हाथों से लगाना चाहिए।
माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित पवित्र मंत्र है:
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः
इस मंत्र का नवरात्रि के दूसरे दिन श्रद्धापूर्वक जाप करने से मानसिक अनुशासन सुदृढ़ होता है और आध्यात्मिक साधना में स्पष्टता आती है। जपमाला पर 108 बार इस मंत्र का उच्चारण विशेष फलदायी माना जाता है जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है।
माँ ब्रह्मचारिणी की कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं है बल्कि यह आधुनिक जीवन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। आज के समय में जब लोग जल्दी हार मान लेते हैं तो देवी का यह स्वरूप हमें निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा देता है। उनकी तपस्या हमें बताती है कि कठिन से कठिन लक्ष्य को भी केवल धैर्य और विश्वास के बल पर प्राप्त किया जा सकता है। जो विद्यार्थी या व्यवसायी अपने कार्य में एकाग्रता चाहते हैं उन्हें माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना अवश्य करनी चाहिए।
नवरात्रि का दूसरा दिन प्रत्येक भक्त को यह स्मरण कराता है कि सच्ची सफलता और आध्यात्मिक अनुभूति के लिए धैर्य, समर्पण और अटल निश्चय आवश्यक हैं। माँ ब्रह्मचारिणी यह सिखाती हैं कि जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से अनुशासन और भक्ति के मार्ग पर चलता है तो दैवीय कृपा अंततः उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाती है। उनकी साधना की कथा केवल देवी पार्वती की नहीं है बल्कि वह हर उस साधक की कथा है जो थककर भी रुका नहीं और अंत में ईश्वरीय कृपा का पात्र बना।
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा नवरात्रि के किस दिन होती है?
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन होती है। चैत्र नवरात्रि 2026 में यह दिन 20 मार्च 2026 को पड़ रहा है।
नवरात्रि के दूसरे दिन कौन सा रंग पहनना चाहिए?
नवरात्रि के दूसरे दिन हरा रंग शुभ माना जाता है। यह रंग विकास, समृद्धि और नई ऊर्जा का प्रतीक है।
माँ ब्रह्मचारिणी को कौन सा भोग लगाया जाता है?
माँ ब्रह्मचारिणी को चीनी और फल का भोग अर्पित किया जाता है। चीनी का भोग जीवन में शांति और दीर्घायु देने वाला माना जाता है।
माँ ब्रह्मचारिणी का मंत्र कौन सा है?
माँ ब्रह्मचारिणी का मंत्र है ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः। इसे नवरात्रि के दूसरे दिन 108 बार जपने का विधान है।
माँ ब्रह्मचारिणी किस चक्र से जुड़ी हैं?
माँ ब्रह्मचारिणी स्वाधिष्ठान चक्र से जुड़ी हैं। इनकी उपासना भावनात्मक संतुलन, धैर्य और इंद्रिय संयम प्रदान करती है।
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