माँ कूष्माण्डा पूजा विधि और महत्व 2026

By पं. नरेंद्र शर्मा

चैत्र नवरात्रि चौथा दिन: सृजन और ऊर्जा का पर्व

माँ कूष्माण्डा पूजा 2026: मुहूर्त, मंत्र और अनाहत चक्र

नवरात्रि का चौथा दिन देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप माँ कूष्माण्डा की उपासना के लिए समर्पित है। यह पावन दिन सृष्टि की रचना, जीवंतता और उस दिव्य ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है जो इस पूरे ब्रह्मांड का आधार है। तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा के माध्यम से साहस और सुरक्षा प्राप्त करने के उपरांत नवरात्रि का चौथा दिन देवी की सृजनात्मक शक्ति पर केंद्रित होता है। माँ कूष्माण्डा की कृपा से ही साधक के जीवन में अंधकार दूर होता है और प्रकाश का आगमन होता है।

चैत्र नवरात्रि 2026 चतुर्थ दिवस की महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त

चैत्र नवरात्रि 2026 में नवरात्रि का चौथा दिन रविवार 22 मार्च 2026 को पड़ रहा है। यह दिन पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि से संबंधित है और इस दिन वासुदेव चतुर्थी जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान भी किए जाते हैं। भक्त माँ कूष्माण्डा की पूजा स्वास्थ्य, समृद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए करते हैं।

विवरण जानकारी
दिनांक 22 मार्च 2026
दिन रविवार
नवरात्रि दिवस चौथा दिन
तिथि चतुर्थी
मुख्य पर्व कूष्माण्डा पूजा, वासुदेव चतुर्थी
पूजित देवी माँ कूष्माण्डा
शुभ रंग नारंगी

माँ कूष्माण्डा कौन हैं?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माँ कूष्माण्डा को ब्रह्मांड की आदि-स्वरूपा और सृजनकर्ता माना जाता है। कहा जाता है कि जब चारों ओर केवल अंधकार व्याप्त था और सृष्टि का अस्तित्व नहीं था तब देवी ने अपनी मंद मुस्कान से इस ब्रह्मांड की रचना की थी। उनके इसी दिव्य हास्य से वह ऊर्जा उत्पन्न हुई जिससे पिंड और ब्रह्मांड का निर्माण हुआ।

कूष्माण्डा शब्द तीन शब्दों के मेल से बना है जिसमें कु का अर्थ छोटा, ऊष्मा का अर्थ ऊर्जा और अण्ड का अर्थ ब्रह्मांडीय अंडा है। यह नाम उस देवी का प्रतीक है जिसने सूक्ष्म ऊर्जा से पूरे संसार को उत्पन्न किया है। इसी कारण माँ कूष्माण्डा को समस्त प्रकाश का स्रोत माना जाता है जो सूर्य के भीतर निवास करती हैं और जीवन का संचालन करती हैं।

माँ कूष्माण्डा का भव्य स्वरूप और प्रतीक

माँ कूष्माण्डा को सिंह पर सवार दिखाया गया है जो वीरता और दैवीय अधिकार का प्रतीक है। उनकी आठ भुजाएं हैं जिसके कारण उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनके हाथों में चक्र, गदा, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश और जप माला सुशोभित हैं। ये शस्त्र और वस्तुएं शक्ति, बुद्धि, सुरक्षा और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका मुखमंडल सूर्य के समान तेजस्वी है जो भक्तों के जीवन में नई चेतना भर देता है।

नवरात्रि के चौथे दिन का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

आध्यात्मिक दृष्टि से नवरात्रि का चौथा दिन अनाहत चक्र के जागरण से जुड़ा है। हृदय में स्थित यह चक्र करुणा, संतुलन और आध्यात्मिक चेतना के विस्तार का केंद्र है। माँ कूष्माण्डा की पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। उनकी कृपा से शरीर और मन की जीवंतता बढ़ती है और व्यक्ति के भीतर सृजनात्मक शक्ति का विकास होता है।

चतुर्थ दिवस का विशेष रंग और महत्व

नवरात्रि के चौथे दिन का शुभ रंग नारंगी है। नारंगी रंग उत्साह, ऊर्जा और आध्यात्मिक प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। इस दिन नारंगी वस्त्र धारण करना उस दैवीय तेज को अपनाने जैसा है जो माँ कूष्माण्डा इस संसार में लाती हैं। यह रंग मन में नई उमंग और कार्य करने की शक्ति प्रदान करता है।

माँ कूष्माण्डा की विधिवत पूजा अर्चना

नवरात्रि के चौथे दिन भक्त प्रथम दिन स्थापित कलश की पूजा करते हैं और माँ कूष्माण्डा का आह्वान करते हैं। पूजा की शुरुआत दीप प्रज्वलित कर देवी को पुष्प, धूप और अक्षत अर्पित करके की जाती है।

  • माँ कूष्माण्डा के दिव्य स्वरूप का ध्यान करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
  • भक्त दुर्गा मंत्रों का जाप करते हैं और दुर्गा सप्तशती के अध्यायों का पाठ करते हैं।
  • इस दिन साधक का ध्यान पूरी तरह से सृष्टि की उस आदि शक्ति पर केंद्रित होता है जिसने अंधकार को मिटाया।
  • कपूर से आरती करना और देवी की स्तुति करना इस दिन की पूजा का मुख्य हिस्सा है।

माँ कूष्माण्डा का प्रिय भोग

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्माण्डा को मालपुआ या पेठे से बनी मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। पेठा इस देवी को विशेष रूप से प्रिय है क्योंकि संस्कृत में कुम्हड़े को कूष्माण्ड कहा जाता है। मान्यता है कि यह भोग लगाने से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्त को आरोग्य, शक्ति और प्रचुरता का वरदान प्राप्त होता है।

माँ कूष्माण्डा के लिए शक्तिशाली मंत्र

माँ कूष्माण्डा की कृपा प्राप्त करने के लिए इस पवित्र मंत्र का जाप करना चाहिए:

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः

चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन श्रद्धापूर्वक इस मंत्र का उच्चारण करने से समस्त दुखों का अंत होता है और जीवन में समृद्धि आती है।

जीवन के लिए माँ कूष्माण्डा का पावन संदेश

नवरात्रि का चौथा दिन हमें याद दिलाता है कि यह पूरा ब्रह्मांड दैवीय ऊर्जा से निर्मित है। माँ कूष्माण्डा सृजन की शक्ति और हर जीव के भीतर विद्यमान प्रकाश का प्रतीक हैं। उनकी आराधना करके भक्त अपने जीवन में सकारात्मकता लाने और संसार में करुणा एवं प्रकाश फैलाने की शक्ति प्राप्त करते हैं। यह दिन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी एक मुस्कान नई सृष्टि का आधार बन सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

माँ कूष्माण्डा को अष्टभुजा देवी क्यों कहा जाता है?
देवी के आठ हाथ होने के कारण उन्हें यह नाम दिया गया है जो उनकी अनंत शक्ति को दर्शाता है।

क्या पेठे का भोग लगाना अनिवार्य है?
हाँ क्योंकि देवी का नाम ही पेठे या कुम्हड़े से जुड़ा है इसलिए इसे चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है।

अनाहत चक्र का इस दिन क्या महत्व है?
यह चक्र प्रेम और करुणा का केंद्र है और इसकी शुद्धि से व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरता है।

माँ कूष्माण्डा का निवास कहाँ माना जाता है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार वे सूर्य मंडल के भीतर निवास करती हैं और सूर्य को ऊर्जा प्रदान करती हैं।

चैत्र नवरात्रि 2026 में चौथा दिन कब मनाया जाएगा?
वर्ष 2026 में नवरात्रि का चौथा दिन 22 मार्च रविवार को मनाया जाएगा।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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