By पं. अमिताभ शर्मा
बुद्धिमत्ता और अटूट भक्ति की एक पौराणिक कथा

नवरात्रि के तीसरे दिन देवी दुर्गा के उस तेजस्वी स्वरूप की आराधना की जाती है जिन्हें हम माँ चंद्रघंटा के नाम से जानते हैं। यह स्वरूप वीरता, साहस और असुरों से रक्षा करने वाली एक योद्धा देवी का है। उनके मस्तक पर सुशोभित घंटे के आकार का अर्धचंद्र न केवल उनकी पहचान है बल्कि वह उनकी अजेय शक्ति का प्रतीक भी है। किंतु संसार के सामने एक सिंहवाहिनी योद्धा के रूप में प्रकट होने से पहले उनके जीवन में एक ऐसी अलौकिक घटना घटी जिसने उनकी बुद्धिमत्ता और अटूट आध्यात्मिक शक्ति को सिद्ध कर दिया था। यह कथा उस समय की है जब माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह संपन्न हुए कुछ ही समय बीता था।
शिव और पार्वती के विवाह के उपरांत देवलोक के कई दिव्य प्राणी और ऋषि मुनि इस संशय में थे कि क्या हिमालय की वह सुकोमल राजकुमारी वास्तव में महादेव के रहस्यमयी और अप्रत्याशित स्वभाव के साथ तालमेल बिठा पाएंगी। कुछ ऋषियों का मानना था कि पार्वती के भीतर अपार आध्यात्मिक शक्ति छिपी है जबकि कुछ अन्य लोग पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। स्वयं भगवान शिव ने भी देवी की समझ और उनके धैर्य की गहराई को परखने का निर्णय लिया ताकि संसार जान सके कि उनकी अर्धांगिनी कोई साधारण नारी नहीं बल्कि साक्षात् शक्ति हैं।
एक दिन जब देवी पार्वती कैलाश पर्वत के समीप अत्यंत शांत मुद्रा में बैठी थीं तब अचानक उनके सम्मुख एक विचित्र तपस्वी प्रकट हुआ। उसका स्वरूप अत्यंत असामान्य और विचलित करने वाला था। उस तपस्वी के वस्त्र फटे हुए थे, बाल बिखरे हुए थे और उसका व्यवहार अत्यंत अहंकारी प्रतीत हो रहा था। उसने बिना किसी शिष्टाचार के भगवान शिव की आलोचना करना आरंभ कर दिया। उस तपस्वी ने महादेव की जीवनशैली का उपहास उड़ाते हुए कहा कि शिव तो श्मशान में निवास करते हैं, अपने शरीर पर चिता की भस्म मलते हैं और उनके चारों ओर भूत प्रेत तथा विचित्र प्राणियों का वास रहता है। उसने पार्वती से प्रश्न किया कि उनके जैसी एक सुंदर राजकुमारी ने एक ऐसे व्यक्ति से विवाह क्यों किया जो सांसारिक मर्यादाओं से पूरी तरह परे है।
तपस्वी के इन कड़वे वचनों को सुनकर पार्वती की सखियां और परिचारिकाएं अत्यंत क्रोधित हो उठीं। किंतु देवी पार्वती के मुख पर एक स्थिर मुस्कान बनी रही और वे पूरी तरह शांत रहीं। उन्होंने उस तपस्वी को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान शिव को केवल वे ही लोग गलत समझते हैं जो केवल बाहरी वेशभूषा के आधार पर किसी का मूल्यांकन करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिव केवल एक तपस्वी नहीं हैं बल्कि वे वह परम चेतना हैं जो सृष्टि के निर्माण और विनाश के संतुलन को नियंत्रित करती है। पार्वती ने आगे समझाया कि महादेव का वह विचित्र स्वरूप वास्तव में सांसारिक मोह माया और भ्रम से मुक्ति का प्रतीक है। उनकी वाणी में वह दिव्य ज्ञान और अटूट निष्ठा झलक रही थी जिसने उस वातावरण को भी पवित्र कर दिया।
पार्वती का यह उत्तर सुनकर वह विचित्र तपस्वी अचानक मुस्कुराने लगा। अगले ही क्षण उस तपस्वी का रूप ओझल हो गया और साक्षात् भगवान शिव उनके सम्मुख खड़े थे। यह पूरी परीक्षा स्वयं महादेव द्वारा रची गई थी। वे यह देखना चाहते थे कि क्या पार्वती वास्तव में उनके वास्तविक स्वरूप को समझती हैं अथवा उनकी भक्ति केवल भावनाओं पर आधारित है। शिव देवी के उत्तर से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने स्वीकार किया कि पार्वती ही उनकी शक्ति का वास्तविक आधार हैं। इसी दिव्य बोध और शक्ति के मिलन से माँ चंद्रघंटा के योद्धा स्वरूप का उदय हुआ जो ब्रह्मांड की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता है। उनके मस्तक का चंद्रमा शिव के साथ उनके अटूट जुड़ाव और जाग्रत आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रमाण बन गया।
यह पौराणिक प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि माँ चंद्रघंटा केवल एक युद्ध करने वाली देवी नहीं हैं बल्कि वे गहन आध्यात्मिक ज्ञान का भी प्रतीक हैं। वे सिखाती हैं कि सच्ची भक्ति अंधविश्वास नहीं बल्कि वह प्रज्ञा है जो हर परिस्थिति में सत्य को देख पाने की क्षमता रखती है। नवरात्रि के तीसरे दिन साधक माँ चंद्रघंटा की पूजा मन की स्पष्टता, वीरता और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए करते हैं। उनकी कथा हमें यह भरोसा दिलाती है कि यदि हमारा विश्वास और ज्ञान दृढ़ है तो हम जीवन की किसी भी कठिन परीक्षा में सफल हो सकते हैं। माँ के घंटे की ध्वनि हमारे भीतर के भय और नकारात्मकता को जड़ से समाप्त कर देती है।
माँ चंद्रघंटा ने विचित्र तपस्वी को क्या उत्तर दिया?
उन्होंने कहा कि शिव का स्वरूप बाहरी दिखावे से परे है और वे वह सर्वोच्च चेतना हैं जो पूरे ब्रह्मांड को संतुलित रखते हैं।
महादेव ने देवी पार्वती की परीक्षा क्यों ली थी?
शिव यह देखना चाहते थे कि पार्वती उनकी बाहरी वेशभूषा से प्रभावित होती हैं या उनके भीतर के आध्यात्मिक सत्य को पहचानती हैं।
माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर चंद्रमा क्या दर्शाता है?
यह चंद्रमा उनके भीतर जाग्रत आध्यात्मिक शक्ति और भगवान शिव के साथ उनके दिव्य मिलन का प्रतीक है।
इस कथा से साधकों को क्या शिक्षा मिलती है?
यह कथा सिखाती है कि भक्ति के मार्ग पर ज्ञान और धैर्य का होना अत्यंत आवश्यक है।
माँ चंद्रघंटा की पूजा किस चक्र के लिए की जाती है?
माँ चंद्रघंटा का संबंध मणिपुर चक्र से माना जाता है जो व्यक्ति के आत्मविश्वास और साहस को नियंत्रित करता है।
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