By पं. अभिषेक शर्मा
कैसे माता के मार्गदर्शन ने बदला ब्रह्मांड का भाग्य

नवरात्रि के पावन पर्व पर पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा का विधान है। ममता और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति यह देवी भगवान कार्तिकेय अर्थात् स्कंद की माता हैं। शास्त्रों में उन्हें एक सौम्य और करुणामय रूप में चित्रित किया गया है जो अपने वाहन सिंह पर विराजमान हैं और नन्हे स्कंद को अपनी गोद में लिए हुए हैं। यद्यपि माता का यह स्वरूप शांत और ममतामयी दिखता है परंतु पौराणिक कथाएं बताती हैं कि माँ स्कंदमाता ने उस महान योद्धा को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसने आगे चलकर ब्रह्मांड के सबसे भयंकर असुर का अंत किया। यह कहानी उस परिवर्तन की है जिसने एक बालक को देव सेना का नेतृत्व करने योग्य बनाया।
वह समय देवताओं के लिए अत्यंत कठिन था जब असुरराज तारकासुर ने अपनी शक्तियों से स्वर्ग और पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था। तारकासुर ने कठिन तपस्या के बल पर यह वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल महादेव शिव के पुत्र द्वारा ही संभव होगा। देवताओं को ज्ञात था कि भगवान कार्तिकेय का जन्म हो चुका है परंतु उनके मन में फिर भी आशंकाएं थीं। बालक अभी छोटा था और दूसरी ओर तारकासुर के पास मायावी असुरों की एक विशाल सेना थी। देवताओं को चिंता सता रही थी कि क्या यह नन्हा बालक उस शक्तिशाली शत्रु का सामना करने के योग्य बन पाएगा।
इन्हीं कठिन परिस्थितियों में माँ स्कंदमाता ने अपने पुत्र का पालन पोषण अत्यंत सावधानी और प्रेम से किया। माता ने केवल उनकी रक्षा ही नहीं की बल्कि उन्हें साहस और अनुशासन की शिक्षा भी दी। शास्त्रों के अनुसार कार्तिकेय के पास जन्म से ही अपार ऊर्जा थी परंतु उस ऊर्जा को सही दिशा देने का कार्य उनकी माता ने किया। माता के मार्गदर्शन के कारण ही बालक स्कंद के भीतर अद्भुत नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास का विकास हुआ। माता ने उन्हें सिखाया कि शक्ति का प्रयोग केवल अहंकार के लिए नहीं बल्कि धर्म की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए।
जैसे जैसे कार्तिकेय की आयु बढ़ी उनकी वीरता और दिव्य शक्तियों के चर्चे होने लगे। अंततः सभी देवताओं ने मिलकर यह निर्णय लिया कि अब तारकासुर के विरुद्ध युद्ध का समय आ गया है। जब उन्होंने बालक के तेज और अदम्य साहस को देखा तो उन्हें विश्वास हो गया कि यही वह योद्धा है जो उनका उद्धार करेगा। एक भव्य सभा में भगवान कार्तिकेय को देवताओं की सेना का सेनापति नियुक्त किया गया। उस क्षण सभी देवताओं ने माँ स्कंदमाता की स्तुति की क्योंकि वे जानते थे कि माता के प्रेम और संस्कारों ने ही इस महान रक्षक को तैयार किया है।
सेनापति नियुक्त होने के तुरंत बाद स्कंद ने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यह युद्ध अत्यंत भीषण था और असुरों ने अपनी पूरी मायावी शक्ति लगा दी थी। परंतु कार्तिकेय के साहस और रणनीति के सामने तारकासुर की एक न चली। अंत में स्कंद ने अपने अस्त्रों से उस पापी असुर का वध कर दिया। तारकासुर की मृत्यु के साथ ही स्वर्ग में शांति लौट आई। देवताओं ने पुनः माँ स्कंदमाता का आभार व्यक्त किया क्योंकि ब्रह्मांड को बचाने वाला योद्धा वास्तव में एक माता की ममता और ज्ञान की ही उपज था।
यह कथा स्पष्ट करती है कि माँ स्कंदमाता शक्ति और करुणा का वह संगम हैं जो भविष्य के महान कार्यों के लिए नींव तैयार करती हैं। वह उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो बुद्धि और साहस को आकार देती है। यही कारण है कि नवरात्रि के पांचवें दिन भक्त उनकी आराधना करते हैं ताकि उन्हें ज्ञान और मानसिक शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त हो सके। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति की शुरुआत सदैव सही मार्गदर्शन और प्रेम से होती है।
स्कंदमाता की पूजा किस फल के लिए की जाती है?
उनकी पूजा करने से भक्तों को संतान सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा बुद्धि का विकास होता है।
स्कंदमाता का स्वरूप कैसा है?
माता की चार भुजाएं हैं जिनमें वे कमल के फूल धारण करती हैं और अपनी गोद में बालक स्कंद को थामे रहती हैं।
कार्तिकेय को स्कंद क्यों कहा जाता है?
शास्त्रों के अनुसार उनके तेज और युद्ध कला में निपुणता के कारण उन्हें स्कंद नाम से संबोधित किया जाता है।
तारकासुर को कौन मार सकता था?
ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार तारकासुर का वध केवल भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के हाथों ही संभव था।
माता का वाहन क्या है?
माता स्कंदमाता सिंह पर सवार होती हैं जो साहस और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है।
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