By पं. सुव्रत शर्मा
ममता और शक्ति का दिव्य संगम

नवरात्रि के पावन उत्सव का पांचवां चरण देवी के उस स्वरूप को समर्पित है जिसे हम माँ स्कंदमाता के नाम से पूजते हैं। यह स्वरूप वात्सल्य, दया और ममता की साक्षात प्रतिमूर्ति है। वह भगवान स्कंद की माता हैं जिन्हें कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है और जो देवताओं के सेनापति बने। परंतु स्कंदमाता की यह कथा केवल मातृत्व की कोमलता तक सीमित नहीं है। यह उस साहस और दिव्य शक्ति की एक प्रेरक कहानी है जिसने उस महान योद्धा को तैयार किया जिसने भविष्य में अजेय असुर तारकासुर का संहार कर समस्त ब्रह्मांड की रक्षा की थी।
प्राचीन काल में तारकासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने अपनी कठोर तपस्या के बल पर ब्रह्मा जी से एक विशिष्ट वरदान प्राप्त कर लिया था। इस वरदान ने उसे लगभग अजेय बना दिया क्योंकि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही निश्चित थी। उस समय महादेव घोर समाधि में लीन थे और उन्हें सांसारिक जीवन अथवा विवाह में कोई रुचि नहीं थी। इसी कारण तारकासुर का यह विश्वास दृढ़ हो गया था कि वह सदा के लिए तीनों लोकों पर शासन करेगा। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को प्रताड़ित करना आरंभ कर दिया जिससे चारों ओर त्राहि त्राहि मच गई। देवताओं को यह स्पष्ट हो गया कि केवल शिव पुत्र का जन्म ही इस संकट का एकमात्र समाधान है।
सती के पुनर्जन्म और शिव पार्वती के मिलन के पश्चात एक अत्यंत ओजस्वी बालक का जन्म हुआ जिसे स्कंद या कार्तिकेय कहा गया। यह बालक इतनी तीव्र आध्यात्मिक ऊर्जा से संपन्न था कि स्वयं देवता भी उसके तेज को देखकर चकित रह गए थे। इसी कालखंड में देवी पार्वती ने एक अत्यंत ममतामयी और संरक्षक स्वरूप धारण किया जिसे माँ स्कंदमाता कहा जाता है। वह दिव्य बालक को अपनी गोद में लेकर उसे सुरक्षा प्रदान करती थीं और उसका मार्गदर्शन करती थीं। माँ का यह रूप यह दर्शाता है कि एक कोमल हृदय ही अत्यंत कठोर संकल्पों का आधार होता है।
जैसे जैसे स्कंद बड़े होने लगे माँ स्कंदमाता ने उनकी शक्ति और बुद्धि को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बालक को उन खतरों से बचाया जो तारकासुर द्वारा भेजे जा रहे थे और उनमें वह साहस भरा जो एक असुर के विरुद्ध युद्ध के लिए अनिवार्य था। उनकी उपस्थिति मातृ प्रेम और दिव्य सामर्थ्य का एक अद्भुत संतुलन थी। यद्यपि वह एक करुणामयी माता थीं परंतु वह उस ब्रह्मांडीय शक्ति की स्वामिनी भी थीं जो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती थीं। उनकी ममता ने कार्तिकेय को केवल बलवान ही नहीं बल्कि विवेकशील भी बनाया।
जब स्कंद एक पूर्ण योद्धा के रूप में तैयार हो गए तो उन्होंने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर के विरुद्ध भीषण युद्ध का शंखनाद किया। अपने दिव्य अस्त्रों और माँ के दिए हुए संस्कारों के बल पर उन्होंने उस भयानक असुर को पराजित कर उसका वध कर दिया। स्वर्ग में पुनः शांति स्थापित हुई और सभी लोक भयमुक्त हो गए। देवताओं ने इस विजय का उत्सव मनाया और माँ स्कंदमाता की भूरि भूरि प्रशंसा की क्योंकि उन्होंने ही उस बालक का पोषण किया था जिसने अंततः संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा की।
माँ स्कंदमाता की यह कथा मातृत्व की शक्ति और दिव्य संरक्षण का प्रतिनिधित्व करती है। यह इस विचार का प्रतीक है कि पोषण करने वाला प्रेम ही महान शक्ति और साहस का सृजन कर सकता है। भक्तों का यह विश्वास है कि माँ स्कंदमाता की पूजा करने से जीवन में शांति, बुद्धि और सुरक्षा प्राप्त होती है। वह सिंह पर सवार होकर अपनी गोद में बाल स्कंद को थामे हुए दिखाई देती हैं जो प्रेम और शक्ति के मध्य एक सुंदर संतुलन को दर्शाता है।
नवरात्रि का पांचवां दिन करुणा, पवित्रता और आध्यात्मिक विकास का काल माना जाता है। माँ स्कंदमाता की आराधना करने से साधक का मन विशुद्ध चक्र में स्थित होता है जिससे उसकी वाणी में ओज और कार्यों में निपुणता आती है। उनके आशीर्वाद से घर में सुख समृद्धि, सामंजस्य और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है। यही कारण है कि भक्त इस दिन अत्यंत श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ माँ की शरण में जाते हैं।
माँ स्कंदमाता को यह नाम कैसे प्राप्त हुआ?
भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का एक नाम स्कंद है। चूँकि देवी उनकी माता हैं इसलिए उन्हें स्कंदमाता कहा जाता है।
तारकासुर का वध करने के लिए शिव पुत्र का होना क्यों आवश्यक था?
तारकासुर को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल शिव के वीर्य से उत्पन्न पुत्र ही कर सकता है।
देवी की गोद में बैठा बालक क्या संदेश देता है?
यह बालक वात्सल्य और ज्ञान का प्रतीक है जो यह बताता है कि ज्ञान की रक्षा करना और उसका पोषण करना माता का धर्म है।
माँ स्कंदमाता का वाहन सिंह क्या दर्शाता है?
सिंह अदम्य साहस और वीरता का प्रतीक है जो यह सिद्ध करता है कि देवी ममतामयी होने के साथ साथ अत्यंत शक्तिशाली भी हैं।
इस दिन की पूजा से भक्तों को क्या लाभ होता है?
माँ स्कंदमाता की कृपा से भक्तों को मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है और उनके सांसारिक कष्टों का निवारण होकर ज्ञान की वृद्धि होती है।
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