By अपर्णा पाटनी
नवरात्रि के पांचवें दिन की विशेष पौराणिक कथा

नवरात्रि के पावन पर्व पर पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा का विधान है। ममता और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति यह देवी भगवान कार्तिकेय अर्थात् स्कंद की माता हैं। शास्त्रों में उन्हें एक सौम्य और करुणामय रूप में चित्रित किया गया है जो अपनी गोद में नन्हे बालक को लिए हुए कमल के पुष्प पर विराजमान हैं। परंतु उनके शांत स्वरूप के पीछे एक अत्यंत शक्तिशाली रक्षक की छवि भी छिपी है। पौराणिक कथाओं में एक ऐसी घटना का वर्णन मिलता है जहाँ माँ ने अपने पुत्र को एक गुप्त असुर प्रहार से बचाकर संपूर्ण ब्रह्मांड के भविष्य की रक्षा की थी।
जब महादेव और माता पार्वती के पुत्र स्कंद का जन्म हुआ तो पूरे देवलोक में हर्ष की लहर दौड़ गई। एक प्राचीन भविष्यवाणी के अनुसार केवल कार्तिकेय ही महाबली असुर तारकासुर का वध कर सकते थे। तारकासुर ने अपनी तपस्या के बल पर यह वरदान प्राप्त किया था कि उसे केवल शिव पुत्र ही मार पाएगा। जैसे ही उसे बालक के जन्म का समाचार मिला वह अत्यंत भयभीत हो गया। उसे ज्ञात था कि यदि यह बालक जीवित रहा और युवावस्था तक पहुँचा तो उसका अंत निश्चित है। अपने अंत को टालने के लिए उसने एक षड्यंत्र रचा और अपने सबसे क्रूर असुरों को सक्रिय कर दिया।
तारकासुर ने अपने सबसे विश्वासपात्र और मायावी अनुचर विद्युतमाली को एक गुप्त अभियान पर भेजा। उसने आदेश दिया कि बालक के शक्तिशाली होने से पूर्व ही उसका वध कर दिया जाए। एक रात्रि जब कैलाश पर्वत के चारों ओर गहरी शांति व्याप्त थी और नन्हा स्कंद अपनी माता की गोद में सुरक्षित विश्राम कर रहा था तब विद्युतमाली ने पर्वत की सीमाओं में प्रवेश किया। उसने अपनी आसुरी शक्तियों का उपयोग करके स्वयं को अदृश्य कर लिया ताकि नंदी या अन्य शिव गण उसे देख न सकें। वह बड़ी चतुराई से उस स्थान के समीप पहुँच गया जहाँ माता अपने पुत्र के साथ विराजमान थीं।
असुर को लगा कि वह सफल हो जाएगा परंतु वह भूल गया था कि एक माँ की दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं रहता। जैसे ही विद्युतमाली ने अपनी विषैली तलवार निकाली माँ स्कंदमाता की आँखें खुल गईं। उनका सौम्य चेहरा क्षण भर में क्रोध की अग्नि से दैदीप्यमान हो उठा। उन्होंने अनुभव किया कि उनके पुत्र के जीवन पर संकट है। माता ने तुरंत अपना वात्सल्य रूप त्याग कर रणचंडी का संकल्प लिया। उनके वाहन सिंह ने ऐसी भीषण गर्जना की कि पूरा कैलाश पर्वत कांप उठा। पर्वत की कंदराओं से टकराती वह ध्वनि असुर के हृदय में भय पैदा करने के लिए पर्याप्त थी।
विद्युतमाली ने अपनी हार निकट देखकर मायावी भ्रम उत्पन्न करने शुरू कर दिए। उसने आसमान में कई नकली चंद्रमा और अंधकार का जाल फैला दिया ताकि माता भ्रमित हो जाएं। लेकिन देवी स्कंदमाता तो ज्ञान और चेतना का प्रतीक हैं। उन्होंने अपनी एक दृष्टि से उस अंधकार को चीर दिया। जब असुर ने उन पर अपनी मायावी गदा से प्रहार करना चाहा तो माता ने उसे बीच हवा में ही पकड़ लिया। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति का एक पुंज छोड़ा जिसने विद्युतमाली के सभी अस्त्रों को भस्म कर दिया। माता ने उस असुर को पराजित कर यह सिद्ध कर दिया कि उनकी ममता ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।
इस युद्ध के पश्चात भगवान कार्तिकेय पूरी तरह सुरक्षित रहे। माता की इस वीरता ने यह सुनिश्चित किया कि भविष्य का वह महान योद्धा समय आने पर तारकासुर का अंत कर सके। यदि उस रात माँ ने रक्षा न की होती तो धर्म की स्थापना संभव नहीं होती। यही कारण है कि भक्त उन्हें विद्वत्ता और शक्ति की देवी मानते हैं। वह न केवल मोक्ष का मार्ग दिखाती हैं बल्कि अपने भक्तों की हर संकट से रक्षा भी करती हैं। उनका यह रूप सिखाता है कि सृजन और संरक्षण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
माँ स्कंदमाता की पूजा क्यों की जाती है?
उनकी पूजा करने से भक्तों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
स्कंदमाता का स्वरूप कैसा है?
माता की चार भुजाएं हैं जिनमें वह दो हाथों में कमल धारण करती हैं। एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में रहता है और एक हाथ से वह कार्तिकेय को थामे रहती हैं।
क्या स्कंदमाता केवल शांति की देवी हैं?
नहीं वह शांति और युद्ध दोनों की प्रतीक हैं। वह ममतामयी तब हैं जब बालक सुरक्षित हो और काल का रूप तब लेती हैं जब उनके बच्चे पर संकट आता है।
विद्युतमाली कौन था?
वह तारकासुर का एक सेनापति था जिसे जादुई और मायावी शक्तियों में महारत हासिल थी और उसने कैलाश पर गुप्त हमला किया था।
कार्तिकेय को स्कंद क्यों कहा जाता है?
शास्त्रों के अनुसार उनके तेज से उत्पन्न होने के कारण और उनकी अद्वितीय युद्ध कला के कारण उन्हें स्कंद नाम दिया गया है।
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