By पं. अमिताभ शर्मा
सृष्टि में संतुलन और भीतर की समझ का दिव्य अनुभव

भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में जाना जाता है। उनके हाथों में संतुलन, व्यवस्था, संरक्षण और जीवन प्रवाह की धारा मानी जाती है। जब सृष्टि अपने प्रारंभिक विस्तार से आगे बढ़कर एक स्थिर लय में प्रवेश करने लगी तब यह स्वाभाविक था कि हर लोक, हर जीव और हर ऊर्जा का संतुलन विष्णु के संरक्षण से जुड़ा हुआ दिखाई दे। पर इसी क्रम में एक ऐसा क्षण आया जिसने स्वयं विष्णु को भीतर तक सोचने पर विवश कर दिया। यह वह क्षण था जब उन्हें पहली बार अनुभव हुआ कि सृष्टि का संपूर्ण संचालन केवल उनके हाथों में नहीं है बल्कि उसके पीछे एक और भी, सूक्ष्म भी, गहरी भी व्यापक शक्ति सक्रिय है।
यह कथा किसी हार या चुनौती की कथा नहीं है। यह एक आत्मबोध की कथा है। यह उस बिंदु की कहानी है जहाँ पालनकर्ता को यह समझ में आता है कि संरक्षण भी एक बड़े ब्रह्मांडीय क्रम का हिस्सा है। विष्णु की महिमा कम नहीं होती बल्कि इस अनुभव से उनका स्वरूप और भी अधिक गहरा हो जाता है। क्योंकि जो शक्ति स्वयं से बड़ी व्यवस्था को पहचान लेती है, वही वास्तव में पूर्ण संतुलन को धारण कर सकती है।
सृष्टि के संचालन का दायित्व जब विष्णु के हाथों में स्थापित हुआ तब सब कुछ एक निश्चित लय में चलता हुआ दिखाई देता था। लोकों की गति थी, तत्वों की मर्यादा थी, जीवधाराओं का प्रवाह था, ऊर्जा का संतुलन भी बना हुआ था। देखने वालों को यही प्रतीत होता था कि सब कुछ सुव्यवस्थित है और यह व्यवस्था विष्णु के संरक्षण से सुरक्षित है। यह आंशिक रूप से सत्य भी था, क्योंकि पालन का धर्म उन्हीं के भीतर प्रकट था।
लेकिन ब्रह्मांड में बहुत से परिवर्तन ऐसे होते हैं जो बाहर से तुरंत दिखाई नहीं देते। वे पहले सूक्ष्म स्तर पर जन्म लेते हैं। यही यहाँ भी हुआ। सृष्टि के कुछ भागों में ऊर्जा का प्रवाह बहुत सूक्ष्म रूप से बदलने लगा। कुछ लोकों में संतुलन बिना किसी प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के अपने आप स्थापित होने लगा। कुछ स्थानों पर ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति व्यवधानों को शांत कर रही हो, वह भी बिना किसी घोषित दैवी क्रिया के। यही वह प्रथम संकेत था जिसने विष्णु के भीतर प्रश्न जगाया।
प्रारंभ में उन्होंने इसे सामान्य ब्रह्मांडीय प्रक्रिया के रूप में ही देखा। सृष्टि में सूक्ष्म समायोजन होना कोई नई बात नहीं थी। संरक्षण के कार्य में यह स्वाभाविक था कि कई परिवर्तन समय के साथ अपने आप स्थिर हो जाएँ। इसलिए पहले पहल उन्होंने इस घटना को किसी विशेष रहस्य की तरह नहीं लिया। लेकिन जब यह प्रवाह बार बार, अनेक स्तरों पर, एक समान ढंग से प्रकट होने लगा तब उनके भीतर सजगता और बढ़ी।
विष्णु की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे केवल सतह नहीं देखते। वे लय देखते हैं, जब लय बदलती है, तो उसका कारण खोजते हैं। उन्होंने अपनी चेतना को और गहराई से उस दिशा में केंद्रित किया जहाँ से यह सूक्ष्म संतुलन उठ रहा था। वहाँ उन्हें एक ऐसी उपस्थिति का अनुभव हुआ जो उनके अपने प्रत्यक्ष कार्यक्षेत्र से परे थी। यह अनुभव आश्चर्य का था, पर उसमें विरोध नहीं था।
यहीं इस कथा का रहस्य खुलता है। विष्णु ने पहली बार उस सूक्ष्म ऊर्जा को महसूस किया जो माँ कूष्मांडा से संबंधित थी। यह कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं था। कहीं कोई घोषणा नहीं हुई थी। कोई दिव्य आदेश नहीं आया था। फिर भी एक ऐसा प्रवाह था जो सृष्टि के भीतर भीतर, हर स्तर पर, संतुलन को सहारा दे रहा था। यह प्रवाह किसी एक लोक तक सीमित नहीं था। यह किसी एक घटना का उत्तर भी नहीं था। यह जैसे सृष्टि की जड़ों में काम कर रही एक मूल जीवनधारा थी।
विष्णु के लिए यह अनुभव नया था। वे पालनकर्ता थे, पर यहाँ एक ऐसी शक्ति थी जो संरक्षण के पीछे की आधारभूत समरसता को संभाले हुए थी। यह शक्ति आदेश देकर काम नहीं कर रही थी। यह अपनी उपस्थिति से ही संतुलन रच रही थी। तब उन्हें समझ आया कि सृष्टि में संरक्षण केवल ऊपर से नहीं होता। बहुत कुछ भीतर से भी होता है, वही भीतर का संतुलन कई बार बिना किसी प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के परिणाम उत्पन्न करता है।
इस प्रसंग को यदि चुनौती के रूप में देखा जाए, तो उसका अर्थ बहुत छोटा हो जाएगा। यह प्रतियोगिता नहीं थी कि कौन अधिक शक्तिशाली है। यह एक गहरी पहचान का क्षण था। विष्णु ने अनुभव किया कि सृष्टि का संचालन केवल प्रत्यक्ष भूमिका से नहीं होता। उसके पीछे ऐसे सूक्ष्म तत्त्व भी कार्य करते हैं जो दिखाई नहीं देते, पर जिनके बिना दृश्य व्यवस्था टिक नहीं सकती।
उनके सामने दो मार्ग थे। वे या तो इस शक्ति को समझने के बजाय उसे अपने अधिकार क्षेत्र में लाने की चेष्टा करते, या वे यह स्वीकार करते कि उनका पालन धर्म भी एक अधिक व्यापक आदिशक्ति के भीतर काम कर रहा है। उन्होंने दूसरा मार्ग चुना। यही उनकी महानता का प्रमाण है। उन्होंने इस ऊर्जा को रोकने, जाँचने, बाँधने, या नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की। उन्होंने उसे स्वीकार किया।
यही इस कथा का सबसे सुंदर मोड़ है। जब उन्होंने उस ऊर्जा को रोकने के बजाय उसकी उपस्थिति को स्वीकार किया तब उनकी अपनी भूमिका और स्पष्ट हो गई। उन्हें समझ आया कि वे केवल संरक्षक नहीं हैं बल्कि एक ऐसे विशाल ब्रह्मांडीय क्रम का हिस्सा हैं जिसमें सृजन, संरक्षण, परिवर्तन और सूक्ष्म संतुलन सब एक साथ काम करते हैं। उनका कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, पर वह अकेला नहीं है। उनके पीछे भी एक मूल संतुलन चेतना सक्रिय है।
यह समझ विनम्रता से जुड़ी है, पर उससे भी अधिक यह पूर्णता से जुड़ी है। जो शक्ति अपने से बड़े तंत्र को पहचान लेती है, वही अपने धर्म को सही रूप में निभा सकती है। विष्णु ने जाना कि सृष्टि को संभालना केवल नियंत्रण का काम नहीं है। यह सहयोग, समझ, समरस स्वीकृति का भी काम है।
कथा कहती है कि भगवान शिव इस प्रवाह को पहले से जानते थे, इसलिए वे मौन रहे। शिव का मौन कई बार उस ज्ञान का संकेत होता है जो शब्दों से परे होता है। वे समझते थे कि सृष्टि के दृश्य पक्ष के पीछे एक अदृश्य संतुलन भी होता है, माँ कूष्मांडा की ऊर्जा उसी स्तर पर सक्रिय है। इसीलिए उन्होंने इस प्रसंग में कोई अलग प्रतिक्रिया नहीं दी।
ब्रह्मा ने भी इस ऊर्जा का अनुभव किया, पर उन्होंने उसे सृजन की प्रक्रिया के भीतर ही स्वाभाविक रूप से देखा। उनके लिए यह उस मूल चेतना का विस्तार था जिसके कारण सृष्टि का जन्म संभव हुआ। पर विष्णु के लिए यह अनुभव विशेष रूप से गहरा था, क्योंकि उनका धर्म सीधे संतुलन और संरक्षण से जुड़ा हुआ था। इसीलिए जब उन्हें यह समझ आया कि संतुलन का एक सूक्ष्म स्तर उनके संरक्षण से भी परे काम कर रहा है, तो यह उनके लिए एक गहरा आंतरिक परिवर्तन बन गया।
इस कथा का सबसे व्यावहारिक और गहरा संदेश यहीं छिपा है। मनुष्य अक्सर यह मान लेता है कि यदि वह किसी भूमिका में है, किसी परिवार, संस्था, कार्य, या संबंध को संभाल रहा है, तो सब कुछ उसके नियंत्रण में होना चाहिए। पर जीवन, सृष्टि की तरह, केवल एक स्तर पर नहीं चलता। उसमें बहुत से अदृश्य प्रवाह होते हैं, बहुत सी सूक्ष्म शक्तियाँ होती हैं, बहुत से ऐसे आयाम होते हैं जिन्हें हम सीधे न देख पाते हैं, न नियंत्रित कर पाते हैं।
विष्णु का यह अनुभव सिखाता है कि पूर्ण नियंत्रण कई बार एक भ्रम होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कार्य छोड़ दिया जाए, या जिम्मेदारी से हट जाया जाए। इसका अर्थ यह है कि जिम्मेदारी निभाते हुए भी यह समझा जाए कि जीवन में कुछ ऐसे तत्व हैं जो हमारे प्रयासों से परे भी काम कर रहे हैं। सच्चा संतुलन तब आता है जब हम नियंत्रण की जिद छोड़कर समझ और सामंजस्य को अपनाते हैं।
माँ कूष्मांडा की यह ऊर्जा हमें यह दिखाती है कि सृष्टि में दृश्य व्यवस्था के पीछे भी एक अदृश्य व्यवस्था काम करती है। बाहर जो संतुलन दिखाई देता है, उसके पीछे भीतर का एक बहुत सूक्ष्म ऊर्जा क्रम होता है। वही क्रम अनेक बार बिना शोर, बिना आदेश, बिना पहचान के, सबको उसकी मर्यादा में रखता है। यही कारण है कि उनका स्वरूप केवल सृजन से नहीं बल्कि सृष्टि के भीतर छिपे आत्मिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
विष्णु ने जब इस ऊर्जा को पहचाना तब वे किसी सीमा में नहीं बँधे। वे और व्यापक हुए। उन्हें समझ आया कि सृष्टि का पालन केवल ऊपर से देखने का कार्य नहीं बल्कि उस गहरे क्रम के साथ चलने का कार्य है जो सबके भीतर काम कर रहा है।
हमारे जीवन में भी कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब हम महसूस करते हैं कि बहुत कुछ हमारे प्रयासों से हो रहा है, पर कुछ चीजें ऐसी भी हैं जो हमारे प्रयासों से परे होकर भी संतुलन बना रही हैं। कभी कोई संबंध बिना बहुत कहे अपने आप संभल जाता है। कभी किसी उलझन का उत्तर भीतर से उभर आता है। कभी जीवन में ऐसी सहायता मिलती है जो हमने न माँगी होती है, न योजनाबद्ध की होती है। यह सब इस बात की ओर संकेत करता है कि जीवन में दृश्य नियंत्रण के साथ साथ अदृश्य सहयोगी शक्तियाँ भी काम करती हैं।
माँ कूष्मांडा की कथा हमें यह सिखाती है कि हर चीज को नियंत्रित करने की कोशिश करने के बजाय हमें उसके पीछे काम कर रहे गहरे संतुलन को भी पहचानना चाहिए। जब यह पहचान आती है तब मनुष्य अधिक शांत, अधिक विनम्र, अधिक सजग हो जाता है।
अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि वह क्षण जब विष्णु को एहसास हुआ कि सृष्टि पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं है, किसी कमजोरी का क्षण नहीं था। वह विस्तार का क्षण था। वह वह बिंदु था जहाँ पालनकर्ता ने स्वयं को एक और भी बड़े ब्रह्मांडीय सत्य के भीतर देखा। उन्होंने जाना कि सृष्टि एक साझा प्रक्रिया है। उसमें उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, पर वह अकेली नहीं है। माँ कूष्मांडा की सूक्ष्म ऊर्जा उस साझा व्यवस्था की मूल संतुलन शक्ति है।
यही इस कथा का अंतिम संदेश है। सच्ची शक्ति वह नहीं जो सब पर नियंत्रण चाहती है। सच्ची शक्ति वह है जो अपने स्थान को समझती है, बड़े सत्य को स्वीकारती है, उसी स्वीकृति में अपना धर्म पूर्ण करती है।
विष्णु को कब लगा कि सृष्टि पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं है
जब उन्होंने अनुभव किया कि कुछ सूक्ष्म संतुलन बिना उनके प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के अपने आप स्थापित हो रहे हैं।
वह कौन सी शक्ति थी जिसे उन्होंने महसूस किया
यह माँ कूष्मांडा की सूक्ष्म ऊर्जा थी, जो सृष्टि के भीतर भीतर संतुलन को बनाए रख रही थी।
क्या यह अनुभव विष्णु के लिए चुनौती था
नहीं, यह एक गहरी समझ और आत्मबोध का क्षण था, जिसमें उन्होंने एक व्यापक ब्रह्मांडीय व्यवस्था को पहचाना।
उन्होंने उस ऊर्जा के साथ क्या किया
उन्होंने उसे रोकने या नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की बल्कि उसे स्वीकार किया और अपनी भूमिका को अधिक स्पष्ट रूप से समझा।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह कि पूर्ण नियंत्रण एक भ्रम हो सकता है, सच्चा संतुलन समझ, स्वीकृति और सामंजस्य से आता है।
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