अजा एकादशी 2026: तिथि, मुहूर्त, व्रत विधि, पारण और कथा

By पं. नीलेश शर्मा

भाद्रपद मास की अजा एकादशी का धार्मिक महत्व, व्रत विधि और पौराणिक कथा जानें

अजा एकादशी 2026: तिथि, मुहूर्त और व्रत विधि

भाद्रपद मास में आने वाली अजा एकादशी वर्ष भर की प्रमुख एकादशियों में मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन शास्त्रीय विधि से व्रत रखकर और श्रीहरि की भक्ति में मन लगाकर पुराने पापों का क्षय होता है और शुभ संकल्पों की पूर्ति का मार्ग खुलता है।

अजा एकादशी 2026 की तिथि, एकादशी तिथि और पारण समय

सितम्बर 2026 में अजा एकादशी का व्रत विशेष रूप से शुभ माना जाएगा। पंचांग के अनुसार तिथि, आरंभ और समाप्ति का समय तथा पारण का क्रम इस प्रकार बताया गया है।

विवरण तिथि और दिन समय / जानकारी
अजा एकादशी व्रत तिथि 2026 सोमवार, 7 सितम्बर 2026 उदीयमान सूर्य के दिन व्रत मान्य
एकादशी तिथि प्रारंभ रविवार, 6 सितम्बर 2026 सायं लगभग 07 बजकर 35 मिनट के आसपास
एकादशी तिथि समाप्त सोमवार, 7 सितम्बर 2026 सायं लगभग 05 बजे के आसपास
पारण दिवस मंगलवार, 8 सितम्बर 2026 द्वादशी तिथि में व्रत खोलना शुभ
पारण का समय 8 सितम्बर 2026 प्रातः 06 बजकर 44 मिनट से 09 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त 8 सितम्बर 2026 दोपहर लगभग 02 बजकर 32 मिनट के आसपास

एकादशी तिथि 6 सितम्बर की शाम से ही लग जाएगी, परंतु उदीयमान सूर्य के नियम के अनुसार व्रत रखकर पूजन करने का मुख्य दिन सोमवार 7 सितम्बर 2026 माना जाएगा। पारण का समय 8 सितम्बर की प्रातः द्वादशी के भीतर रखा गया है, इसलिए व्रतधारी को उसी समय सीमा में ही व्रत खोलना शुभ माना जाएगा।

अजा एकादशी क्या है और क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?

अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी है। पुराणों में इसका विशेष महात्म्य बताया गया है।
कथा के अनुसार स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत के महत्व को समझाते हुए कहा कि जो भक्त श्रद्धा से अजा एकादशी व्रत रखता है, उसके दुःख और पाप क्षीण होते हैं और मनोकामनाओं की पूर्णता का मार्ग प्रशस्त होता है।

अजा शब्द के कई अर्थ माने जाते हैं। इसे अव्यक्त, जन्म रहित और प्राचीन शक्ति से जोड़ा जाता है। इसी भाव से अजा एकादशी को भी ऐसा दिन माना गया है जो जीवन को भीतर से नया आरंभ देने की क्षमता रखता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी बताया जाता है जो अपने पुराने कर्मों के बोझ से मुक्त होकर नई सकारात्मक दिशा चाहते हैं।

अजा एकादशी व्रत कैसे करें?

अजा एकादशी व्रत का पालन करते समय साधारण नियमों के साथ कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

एक दिन पूर्व की तैयारी

एकादशी से एक दिन पहले, यानि दशमी तिथि पर, भोजन को हल्का और सात्त्विक रखने की सलाह दी जाती है।

  • तामसिक और अत्यधिक मसालेदार भोजन से बचना उत्तम है।
  • कई परंपराओं में दशमी की रात्रि को जल्दी सोने का संकेत दिया जाता है ताकि एकादशी के दिन मन और शरीर दोनों स्थित रह सकें।

दशमी की शाम से ही अनाज ग्रहण न करने का संकल्प भी कई लोग लेते हैं, जिससे एकादशी का व्रत और अधिक शुद्ध माना जाता है।

अजा एकादशी के दिन प्रातःकालीन संकल्प

सोमवार 7 सितम्बर 2026 की सुबह व्रतधारी को सामान्य से थोड़ा पहले उठकर स्नान करना चाहिए।

  • स्वच्छ वस्त्र धारण कर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके व्रत संकल्प लिया जाता है।
  • संकल्प में यह निश्चय किया जाता है कि पूरे दिन भगवान विष्णु की पूजा, जप और सात्त्विक आचरण में ही समय बिताया जाएगा।

जो पूर्ण उपवास की क्षमता रखते हैं, वे निर्जल या केवल जल से व्रत रखते हैं। सामान्य रूप से फलाहार और सरल शाकाहारी आहार इस व्रत में स्वीकार्य माना गया है।

अजा एकादशी पर पूजा विधि कैसी होनी चाहिए?

अजा एकादशी पर भगवान विष्णु की उपासना ही केंद्र में रहती है। पूजा विधि को सरल रखते हुए भी मन के भाव को अधिक गहरा करना महत्वपूर्ण है।

भगवान विष्णु की पूजा और तुलसी पूजन

स्नान के बाद घर के पूजा स्थान पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर दीप प्रज्वलित किया जाता है।

  • पंचोपचार या षोडशोपचार से भगवान की पूजा की जा सकती है।
  • फूल, चंदन, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

अजा एकादशी पर तुलसी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। तुलसी के पौधे के सामने दीपक जलाकर, जल अर्पित कर और तुलसी के कुछ पत्ते भगवान विष्णु को समर्पित किए जाते हैं। तुलसी दल के बिना विष्णु पूजन को अधूरा माना जाता है, इसलिए इस दिन तुलसी की उपस्थिति अत्यंत शुभ मानी जाती है।

मंत्र जप और विष्णु सहस्रनाम का श्रवण

अजा एकादशी के दिन मन में भगवान विष्णु के नाम का जप करते रहना व्रत की आत्मा माना जा सकता है।

  • जो लोग पढ़ सकते हैं, वे दिन में समय निकालकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं।
  • यदि पाठ स्वयं करना संभव न हो, तो सहस्रनाम या अन्य स्तोत्रों को सुनना भी उतना ही फलदायी माना गया है।

पूजा के समय या दिन भर में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे मंत्र का शांत मन से जप मन को स्थिर बनाने में बहुत सहायक होता है।

एकादशी दिन में आहार और व्रत संबंधी नियम

अजा एकादशी व्रत में सामान्यतः यह माना जाता है कि

  • व्रतधारी केवल फल, दूध, पानी या हल्की फलाहारी सामग्री ही ग्रहण करे।
  • तामसिक या भारी भोजन से दूर रहे।

रोगी, वृद्ध या गर्भवती महिलाएँ यदि पूर्ण व्रत करने में असमर्थ हों, तो उनके लिए शास्त्रों ने छूट दी है। उन्हें स्वास्थ्य के अनुसार हल्का भोजन लेने की सलाह दी जाती है ताकि शरीर पर अनावश्यक दबाव न पड़े। उनके लिए मुख्य साधना प्रभु का स्मरण, पूजा और जप ही मानी जाती है।

सायंकालीन आरती और कथा श्रवण

शाम के समय पुनः भगवान विष्णु की आरती की जाती है।

  • हल्का दीपक जलाकर, कपूर आरती या दीए की लौ के साथ हरि नाम का कीर्तन किया जाता है।
  • इस समय अजा एकादशी की कथा सुनना या सुनाना अत्यंत शुभ माना गया है।

आरती के बाद फलाहार या लघु प्रसाद लेकर रात्रि तक व्रत की शांत अवस्था बनाए रखना अच्छा माना जाता है।

अजा एकादशी की पौराणिक कथा क्या है?

अजा एकादशी से जुड़ी प्रमुख कथा सत्य और धर्मप्रिय राजा हरिश्चंद्र के जीवन से संबंधित है। यह कथा यह दिखाती है कि कैसे एकादशी का प्रभाव और सच्ची भक्ति मिलकर जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन ला सकते हैं।

कथा के अनुसार राजा हरिश्चंद्र अपने युग के अत्यंत सत्यनिष्ठ और प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाले राजा थे। वे दान, वचन पालन और धर्म के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार महर्षि विश्वामित्र की प्रेरणा से उन्होंने अपना समस्त राज्य, धन और वैभव दान में दे दिया। बाद में जब ऋषि ने उनसे स्वर्ण मुद्राओं की मांग की, तो तत्काल भुगतान संभव न होने के कारण हरिश्चंद्र को स्वयं और अपने परिवार को दासत्व में देना पड़ा।

ऋषि के ऋण को चुकाने के लिए हरिश्चंद्र ने श्मशान में काम करना स्वीकार किया जहाँ उनका कर्तव्य था कि बिना शुल्क लिए किसी भी मृत देह का दाह संस्कार न होने दें। समय बीतता रहा और एक दिन ऐसा आया जब उनकी अपनी पत्नी अपने मृत पुत्र के शरीर को लेकर उसी श्मशान पर पहुँची। दुख की उस घड़ी में भी वह श्मशान की निर्धारित शुल्क राशि देने में असमर्थ थी।

हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा के कारण पत्नी को बिना शुल्क देह जलाने की अनुमति नहीं दे सके। तब उनकी पत्नी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर शुल्क के रूप में अर्पित किया। उस दिन संयोग से एकादशी थी। राजा, रानी और पुत्र तीनों ही भूखे रहे और पूरे दिन हरि नाम जपते रहे। कठोर परीक्षा के उस क्षण में भी उन्होंने सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ा।

उनकी यह दृढ़ता और अनजाने ही किए गए अजा एकादशी व्रत ने भगवान विष्णु को प्रसन्न कर दिया। कथा में आता है कि भगवान ने प्रकट होकर हरिश्चंद्र को उनका खोया हुआ राज्य वापस दे दिया। उनका मृत पुत्र भी पुनः जीवित हो गया और पूरे परिवार को दुख से मुक्ति मिली। कहा जाता है कि अजा एकादशी की कथा सुनने और व्रत रखने से मनुष्य को पापों से मुक्ति और जीवन में शुभ परिवर्तन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

अजा एकादशी व्रत से मिलने वाले लाभ

अजा एकादशी व्रत के अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ बताए गए हैं।

  • यह व्रत मन को स्थिर और शांत करने में सहायक होता है, क्योंकि दिन भर हरि स्मरण और संयम पर ध्यान रहता है।
  • पुराने अपराधबोध और नकारात्मक संस्कारों से मुक्ति की दिशा में बढ़ने का एक साधन बनता है।
  • संयमित आहार और व्रत के माध्यम से शरीर को भी हल्कापन मिलता है और पाचन को विश्राम मिलता है।
  • भगवान विष्णु की कृपा के साथ सार्थक संकल्पों की पूर्ति और बाधाओं के शमन की आशा मजबूत होती है।

आध्यात्मिक दृष्टि से अजा एकादशी को विशेष अवसर माना जा सकता है जहाँ भक्ति और अनुशासन मिलकर जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं।

अजा एकादशी 2026 से मिलने वाला मार्ग

अजा एकादशी 2026 उन लोगों के लिए विशेष अवसर है, जो जीवन में सत्य, धर्म और आत्मिक प्रगति की राह पर आगे बढ़ना चाहते हैं। राजा हरिश्चंद्र की कथा यह बताती है कि

  • कठिन परिस्थितियों में भी सत्य से समझौता न करना कितना महत्वपूर्ण है।
  • एक साधारण प्रतीत होने वाला व्रत भी यदि भीतर से सच्ची भावना के साथ किया जाए, तो ईश्वरीय संरक्षण का द्वार खोल सकता है।

यदि अजा एकादशी 2026 पर व्रतधारी केवल एक दिन के उपवास से आगे जाकर अपने व्यवहार में थोड़ा अधिक सत्य, करुणा और अनुशासन जोड़ने का संकल्प ले, तो यही इस व्रत की वास्तविक साधना कही जाएगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अजा एकादशी 2026 कब है और व्रत का मुख्य दिन कौन सा रहेगा?
अजा एकादशी 2026 सोमवार 7 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 6 सितम्बर की शाम से शुरू होकर 7 सितम्बर की शाम तक रहेगी, पर उदीयमान सूर्य के नियम के अनुसार व्रत का मुख्य पालन सोमवार को ही किया जाएगा।

अजा एकादशी 2026 के पारण का सही समय क्या है?
अजा एकादशी का पारण 8 सितम्बर 2026 को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। पारण के लिए प्रातः 06 बजकर 44 मिनट से 09 बजे तक का समय उपयुक्त माना गया है, तथा द्वादशी तिथि लगभग 02 बजकर 32 मिनट के आसपास समाप्त हो जाएगी।

अजा एकादशी पर व्रत रखने से क्या लाभ माने जाते हैं?
धार्मिक मान्यता के अनुसार अजा एकादशी व्रत से पापों में कमी, पुरानी नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति और शुभ इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस व्रत को मनोकामना सिद्ध करने वाला बताया है, विशेष रूप से जब इसे श्रद्धा और अनुशासन के साथ रखा जाए।

अजा एकादशी पर कौन कौन से प्रमुख नियम और पूजा विधि अपनानी चाहिए?
इस दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है, भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी पूजन और हरि नाम जप किया जाता है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ या श्रवण, घी में हल्दी मिलाकर आरती करना और दिन भर सात्त्विक आचरण बनाए रखना इस व्रत के महत्वपूर्ण अंग हैं।

किन लोगों को अजा एकादशी पर कठोर व्रत से बचना चाहिए?
रोगी, अत्यधिक वृद्ध और गर्भवती महिलाओं के लिए कठोर उपवास करना उचित नहीं माना गया है। वे अपनी क्षमता के अनुसार हल्का भोजन लेकर भी प्रभु का स्मरण, पूजा और कथा श्रवण के माध्यम से अजा एकादशी की भावना को अपना सकती हैं।

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पं. नीलेश शर्मा

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