By पं. अभिषेक शर्मा
अनंत चतुर्दशी व्रत, अनंत सूत्र पूजा और गणेश विसर्जन का महत्व

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला अत्यंत पावन व्रत और पर्व है। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और कई क्षेत्रों में इसे अनंत चौदस नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विशेष रूप से चौदह गांठ वाले पवित्र सूत्र के माध्यम से अनंत रूप भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। घरों में, मंदिरों में और समाजिक स्तर पर बड़े श्रद्धा भाव से अनंत व्रत किया जाता है। इसी तिथि को कई स्थानों पर गणेशोत्सव के समापन के रूप में गणेश विसर्जन भी संपन्न होता है।
अनंत चतुर्दशी हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को आती है। हाल के वर्षों में यह पर्व 6 सितंबर 2025, 17 सितंबर 2024, 28 सितंबर 2023 और 9 सितंबर 2022 को मनाया गया। आने वाले वर्षों में 14 सितंबर 2027 और 2 सितंबर 2028 को भी यह पर्व भक्ति और आस्था के साथ मनाया जाएगा। भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी ही इसकी नियत तिथि है, इसलिए पंचांग के अनुसार उस दिन व्रत, पूजा और अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा निभाई जाती है।
अनंत चतुर्दशी का स्वरूप अच्छी तरह समझने के लिए उसके निकटतम मनाए गए वर्ष का उदाहरण उपयोगी रहता है। वर्ष 2025 में अनंत चतुर्दशी शनिवार, 6 सितंबर को मनाई गई। उस वर्ष के अनुसार
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| पर्व तिथि | 6 सितंबर 2025 शनिवार |
| पूजा के लिए मुख्य अवधि | 6 सितंबर 2025, प्रातः 6:02 से 7 सितंबर 1:41 तक |
| चतुर्दशी तिथि आरंभ | 6 सितंबर 2025, 3:12 AM |
| चतुर्दशी तिथि समाप्त | 7 सितंबर 2025, 1:41 AM |
अनंत चतुर्दशी के नाम में ही इसकी भावना छिपी है। अनंत का अर्थ है जो कभी समाप्त न हो, जो अनंत काल तक विद्यमान रहे। यह नाम स्वयं भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की ओर संकेत करता है। इस दिन भगवान श्री हरि की पूजा चौदह गांठ वाले धागे या सूत्र के माध्यम से की जाती है, जो चौदह लोकों और चतुर्दशी तिथि की दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
इस व्रत का एक विशेष पक्ष यह भी है कि यही दिन कई स्थानों पर गणेशोत्सव के अंतिम दिन के रूप में भी माना जाता है। गणपति स्थापना के बाद दस दिन तक चले उत्सव का समापन गणेश विसर्जन के साथ होता है और उसी दिन अनंत व्रत भी रखा जाता है। इस प्रकार यह पर्व भगवान गणेश की विदाई और भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना, दोनों को जोड़ता हुआ सेतु बन जाता है।
अनंत चतुर्दशी को कुछ लोग अनंत चौदस नाम से भी जानते हैं। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इस व्रत के द्वारा साधक अपने जीवन के कष्ट, दांपत्य समस्याएं, आर्थिक रुकावटें और मन के दोषों से मुक्ति की प्रार्थना करता है। नियमित रूप से चौदह वर्ष तक यह व्रत करने को अत्यंत फलदायी माना गया है।
अनंत चतुर्दशी पर व्रत, अनुष्ठान और पूजा एक विशिष्ट क्रम में किए जाते हैं। भक्त इस दिन प्रातःकाल से स्वयं को शुद्ध और संयमित रखते हैं।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। घर के पूजा स्थान या किसी शुद्ध स्थान की भलीभांति सफाई करें। भूमि पर या चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं। कुछ परंपराओं में कुश से निर्मित अष्टदल कमल बनाकर उस पर कलश स्थापित किया जाता है। यह अष्टदल कमल विष्णु की कृपा के आठ दिशाओं में प्रसार का प्रतीक माना जाता है।
कलश के समीप या ऊपर भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। चाहें तो शालिग्राम शिला या नारायण रूप की मूर्ति भी विराजित कर सकते हैं। वेदी के चारों ओर दीपक, धूप, पुष्प और नैवेद्य की थाली सजा दी जाती है।
अनंत चतुर्दशी का मुख्य अंग अनंत सूत्र है। यह धागा सामान्य नहीं होता। परंपरा के अनुसार
ये चौदह गांठें लोकों, मन के गुणों और जीवन के कई महत्वपूर्ण पक्षों का संकेत देती हैं। कुछ लोग इन्हें चार वेद, अठारह पुराण और चौदह लोकों की स्मृति से भी जोड़कर देखते हैं। तैयार अनंत सूत्र पहले भगवान विष्णु के समक्ष अर्पित किया जाता है। पूजा में इसे पूरे समय वेदी पर ही रखा जाता है और अंत में घर के सदस्यों द्वारा इसे धारण किया जाता है।
अनंत सूत्र की तैयारी के बाद षोडशोपचार विधि से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
पूजा के अंत में अनंत व्रत की संकल्प कथा सुनना और सुनाना भी अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। कई घरों में पूरे परिवार के साथ बैठकर अनंत व्रत कथा पढ़ी जाती है।
पूजा के पश्चात विशेष अनंत मंत्र का जप किया जाता है। यह मंत्र अनंत स्वरूप विष्णु से सुरक्षा और स्थिरता की प्रार्थना है।
अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं संभद्र वासुदेव।
अनंतरूपे विनियोजयस्व, ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते॥
इस मंत्र के द्वारा भक्त जीवन रूपी महासागर से सुरक्षित पार लगाने की याचना करता है। जप के बाद भगवान के सामने रखे हुए अनंत सूत्र को उठाया जाता है और विधिपूर्वक धारण किया जाता है।
परंपरा के अनुसार पुरुष दाहिने हाथ की कलाई में और महिलाएं बाएं हाथ की कलाई में अनंत सूत्र बांधती हैं। धागा बांधते समय मन में यह भावना रखी जाती है कि जीवन की सभी उलझनों में भगवान का अनंत संरक्षण प्राप्त रहे। यह सूत्र केवल ताबीज न होकर संकल्प और श्रद्धा का सजीव प्रतीक बन जाता है।
पूजन के पश्चात प्रसाद का वितरण किया जाता है। कई परिवार ब्राह्मणों या साधुजन को भोजन करवाकर व्रत को और अधिक पूर्णता देते हैं। घर के छोटे बच्चे भी प्रसाद ग्रहण कर आनंद अनुभव करते हैं, जिससे यह पर्व पूरे परिवार के लिए एक आध्यात्मिक उत्सव बन जाता है।
अनंत चतुर्दशी से जुड़ी पौराणिक कथा महाभारत के समय की मानी जाती है। संक्षेप संकेत के रूप में इतना समझना पर्याप्त है कि एक प्रसंग में महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप इतना अद्भुत था कि जल और स्थल की भिन्नता स्पष्ट दिखाई ही नहीं देती थी। जहां जल था वहां भूमि का आभास होता और जहां भूमि थी वहां जल जैसा प्रतिबिंब दिखाई देता।
इसी प्रसंग से संबंधित विस्तृत अनंत व्रत कथा में यह भाव उभरकर आता है कि जब भी मनुष्य अहंकार, भ्रम या कठिन परिस्थितियों में उलझ जाता है तो भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की शरण उसे स्थिरता और समाधान प्रदान करती है। इस व्रत के माध्यम से युधिष्ठिर सहित पाण्डवों ने भी अपने जीवन में पुनः संतुलन और शांति प्राप्त की।
अनंत चतुर्दशी केवल वैष्णव परंपरा तक सीमित नहीं है। जैन धर्म में भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है।
श्वेतांबर जैन भादो महीने के अंतिम दस दिनों को पर्युषण पर्व के रूप में मनाते हैं। यह गहन आत्मचिंतन, तप, स्वाध्याय और संयम का समय माना जाता है। दूसरी ओर दिगंबर जैन दस लक्षण पर्व मनाते हैं, जो दस दिनों तक चलने वाला महान आध्यात्मिक उत्सव है। इन दसों दिनों के समापन का दिन भी कई परंपराओं में अनंत चतुर्दशी के आसपास माना जाता है।
अनंत चतुर्दशी के अगले दिन जैन परंपरा में क्षमवाणी मनाई जाती है। इस दिन जैन साधु, साध्वी, गृहस्थ और श्रावक एक दूसरे से और समस्त जीवों से जाने अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं। यह दिन क्षमा, करुणा और आत्मशुद्धि का प्रतीक बन जाता है।
जैन मान्यता में यह वही तिथि है जब वर्तमान कालचक्र के बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य ने निर्वाण प्राप्त किया था। इस कारण अनंत चतुर्दशी जैन समाज के लिए भी आध्यात्मिक स्मरण और श्रद्धा का दिन बन जाता है।
अनंत चतुर्दशी के बारे में संक्षिप्त जानकारी को एक स्थान पर देखना सरलता देता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| मुख्य देवता | भगवान विष्णु, अनंत रूप |
| अन्य स्वरूप | अनंत चौदस, अनंत व्रत |
| तिथि | भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी |
| प्रमुख कारण | विष्णु पूजा, अनंत सूत्र व्रत, गणेश विसर्जन, जैन महोत्सव |
| उत्सव विधि | घर में पूजा, विष्णु मंदिर दर्शन, व्रत और दान |
| अवधि | एक दिन |
| आवृत्ति | वार्षिक |
भविष्य की तिथियों के संदर्भ से भी स्पष्ट होता है कि यह पर्व हर वर्ष इसी चतुर्थी तिथि पर आता रहेगा और भक्तों को अनंत स्वरूप की याद दिलाता रहेगा।
हर व्यक्ति बड़े आयोजन न कर सके, फिर भी अनंत चतुर्दशी घर पर सरल तरीके से भी मनाई जा सकती है।
जो लोग गणेश उत्सव मनाते हैं वे इस दिन विधिपूर्वक गणेश विसर्जन भी करते हैं। पहले गणपति को विदा कर, फिर विष्णु जी के अनंत स्वरूप की पूजा करना कई स्थानों पर प्रचलित है।
अनंत चतुर्दशी व्रत व्यक्ति के जीवन में स्थिरता, दीर्घकालिक सुरक्षा और मानसिक शांति लाने वाला माना जाता है।
अनंत सूत्र बांधते समय लिया गया संकल्प जीवन के कठिन समय में भी व्यक्ति को यह स्मरण दिलाता रहता है कि कोई दिव्य शक्ति उसके साथ है। दांपत्य जीवन में सामंजस्य, आर्थिक स्थिरता, परिवार में सामूहिक श्रद्धा और बच्चों में धार्मिक संस्कार जैसे लाभ भी इस व्रत से जुड़े माने जाते हैं।
जो लोग निरंतर अनेक वर्षों तक यह व्रत श्रद्धा से करते हैं, उनके भीतर धैर्य और सहनशीलता की शक्ति विकसित होती जाती है। अनंत चतुर्दशी भक्त के लिए केवल एक पर्व नहीं बल्कि दीर्घकालिक संकल्प बन जाती है।
अनंत चतुर्दशी किस तिथि को मनाई जाती है?
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को। हाल के वर्षों में यह 6 सितंबर 2025, 17 सितंबर 2024, 28 सितंबर 2023 और 9 सितंबर 2022 को रही।
अनंत चतुर्दशी के दिन क्या अनिवार्य रूप से अनंत सूत्र बांधना चाहिए?
परंपरा में अनंत सूत्र धारण को व्रत का मुख्य भाग माना गया है। श्रद्धा से तैयार किया हुआ चौदह गांठ वाला धागा पुरुष दाहिने और महिलाएं बाएं हाथ में बांधती हैं।
क्या अनंत चतुर्दशी पर व्रत रखना आवश्यक है?
यदि स्वास्थ्य अनुमति दे तो कम से कम फलाहार या हल्का सात्विक व्रत रखना शुभ माना जाता है। जो असमर्थ हों वे केवल पूजा, दान और मंत्र जप से भी इस दिन का लाभ ले सकते हैं।
क्या यह दिन केवल विष्णु भक्तों के लिए ही महत्वपूर्ण है?
नहीं, जैन धर्म में भी यह तिथि अत्यंत पवित्र मानी गई है, क्योंकि इसी समय भगवान वासुपूज्य का निर्वाण स्मरण किया जाता है और पर्युषण या दस लक्षण पर्व का समापन होता है।
अनंत चतुर्दशी पर कौन से मुख्य कार्य करने चाहिए?
विष्णु पूजन, अनंत सूत्र धारण, व्रत पालन, दान, ब्राह्मण या जरूरतमंदों को भोजन और गणेश विसर्जन जहां परंपरा हो वहां उसका पालन करना प्रमुख माने जाते हैं।
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