By पं. नीलेश शर्मा
आषाढ़ अमावस्या का महत्व और धार्मिक अनुष्ठान

हिंदू पंचांग में अमावस्या को बहुत संवेदनशील और प्रभावकारी तिथि माना जाता है। इस दिन चंद्रमा अदृश्य रहता है, मन अपेक्षाकृत अधिक अंतर्मुख होता है और पूर्वजों की शांति, दान, साधना तथा दीप पूजा के लिए विशेष अवसर बनता है। इन्हीं अमावस्याओं में से आषाढ़ अमावस्या वर्ष की एक ऐसी महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है जो आगे आने वाले श्रावण मास और पूरे चातुर्मास के आध्यात्मिक वातावरण की भूमिका तैयार करती है।
अमावस्या या अमावसई, चंद्र मास की वह अवस्था है जब चंद्रमा क्षितिज पर दिखाई नहीं देता। हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ अमावस्या वर्ष का चौथा मासिक अमावस्या दिन माना जाता है। चंद्र मास प्रायः पूर्णिमा के अगले दिन से प्रारंभ माना जाता है, इसलिए अमावस्या तिथि उस मास के मध्य में पड़ती है और पूरे वर्ष कुल बारह अमावस्याएं आती हैं।
आषाढ़ अमावस्या 2026 से जुड़ी तिथि और काल इस प्रकार बताए गए हैं।
| आषाढ़ अमावस्या 2026 | विवरण |
|---|---|
| अमावस्या तिथि | मंगलवार, 14 जुलाई 2026 |
| तिथि आरंभ | 13 जुलाई 2026, सायं 06 बजकर 49 मिनट |
| तिथि समाप्त | 14 जुलाई 2026, दोपहर 03 बजकर 12 मिनट |
इस प्रकार जिन साधकों को व्रत, पितृ कर्म या विशेष पूजा करनी हो, वे इसी अवधि को आधार मानकर अपने संकल्प और विधि का समय तय करते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से गिनती करने पर जो तीसवीं तिथि आती है, उसे अमावस्या तिथि कहा जाता है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की यही अमावस्या, आषाढ़ अमावस्या के नाम से जानी जाती है।
एक चंद्र मास को दो समान भागों में बांटा जाता है। पहला भाग शुक्ल पक्ष कहलाता है, जब चंद्रमा दिन प्रतिदिन बढ़ता है। दूसरा भाग कृष्ण पक्ष कहलाता है, जब चंद्रमा घटता हुआ अमावस्या तक पहुंचता है। आषाढ़ अमावस्या इसी कृष्ण पक्ष के अंत की तिथि है और इसे पितृ तर्पण, तिल तर्पण, दान पुण्य तथा दीप पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
परंपरा में आषाढ़ अमावस्या को केवल चंद्र चक्र की समाप्ति नहीं माना गया बल्कि इस दिन किए गए कर्मों के विशेष फल भी बताए गए हैं। खासकर पितृ शांति, दोष निवारण, दान और दीप पूजा से जुड़े कई लाभ माने गए हैं।
इस दिन सरसों के तेल का जलता हुआ दीपक पीपल वृक्ष के नीचे रखकर उसकी पूजा करना शुभ माना जाता है। वृक्ष के चारों ओर परिक्रमा करते हुए पवित्र मंत्रों का जप करने से अकस्मात आने वाली बाधाओं, भय और अनपेक्षित संकटों से राहत पाने की भावना जुड़ी है।
यदि कोई साधक पीपल वृक्ष के चारों ओर सात परिक्रमा करता है तो मान्यता है कि उससे संतुष्ट होकर पितृदेव प्रसन्न होते हैं और उनकी आत्मा को शांति तथा सद्गति प्राप्त होती है। यह कर्म पितरों के लिए विशेष रूप से श्रेयस्कर माना गया है।
आषाढ़ अमावस्या के दिन पितृ तर्पण और पिंड प्रादन करना अत्यंत फलदायक माना जाता है। मान्यता है कि अमावस्या तिथि पर पितरों के नाम से जो भी तर्पण, जल, तिल या पिंड अर्पित किए जाते हैं, वे सीधे पितृ लोक तक पहुंचते हैं और दिवंगत आत्माओं को संतोष प्रदान करते हैं।
इसी प्रकार तिल तर्पण और अन्नदान को भी जीवन की विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए शुभ माना गया है। जो व्यक्ति श्रद्धा से पिंडदान और तर्पण करता है, उसके परिवार पर पितृ कृपा बनी रहती है और वंश में स्थिरता तथा संरक्षण की भावना मजबूत होती है।
जो जातक जन्म कुंडली में पितृ दोष, ग्रह दोष या शनि दोष से पीड़ित हों, उनके लिए भी आषाढ़ अमावस्या को विशेष रूप से उपयोगी माना गया है। इस दिन पितृ पूजन, तर्पण और दान कर्म के माध्यम से पितृदेवों को प्रसन्न करने से इन दोषों के दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं, ऐसी मान्यता प्रचलित है।
गरुड़ पुराण में अमावस्या के दिन दान, व्रत और संयम से जन्मपत्री के दोषों की तीव्रता घटने की बात कही गई है। इसलिए जो लोग पारिवारिक समस्याओं, मानसिक तनाव, बार बार आने वाली बाधाओं या कर्मज संबंधी अड़चनों से जूझ रहे हों, वे इस तिथि को विशेष रूप से ग्रहण कर सकते हैं।
आषाढ़ अमावस्या के दिन भगवान हनुमान की पूजा भी अत्यंत शुभ मानी जाती है। विशेष रूप से जिन जातकों की कुंडली में मंगल दोष हो, वे इस दिन हनुमान जी की आराधना, हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ कर के मंगल से जुड़े अशुभ प्रभावों को शांत करने की प्रार्थना कर सकते हैं।
मान्यता है कि हनुमान कृपा से व्यक्ति के भीतर साहस, संयम और निर्णय क्षमता बढ़ती है और क्रोध, आवेग तथा संघर्ष की स्थितियां संतुलित होने लगती हैं।
कर्नाटक क्षेत्र में आषाढ़ अमावस्या को भीमाना अमावस्या के नाम से जाना जाता है। इससे जुड़ी एक हृदयस्पर्शी कथा प्रचलित है, जो व्रत, विश्वास और देवी देवताओं की कृपा के महत्व को सरल रूप में समझाती है।
कथा के अनुसार एक ब्राह्मण दंपत्ति काशी यात्रा की इच्छा रखते थे। उनके घर में एक सुंदर और कोमल स्वभाव वाली कन्या थी, जिसे साथ ले जाना लंबी यात्रा के लिए संभव नहीं था। इसलिए उन्होंने सोचा कि यात्रा के समय तक बेटी को ब्राह्मण के भाई और उसकी पत्नी की देखरेख में छोड़ दिया जाए।
यात्रा दूरस्थ क्षेत्रों तक जाने वाली थी, इसलिए ब्राह्मण दंपत्ति जल्दी घर लौट नहीं सके। इस बीच, ब्राह्मण का लालची भाई और उसकी पत्नी धन के लोभ में उस कन्या का विवाह एक मृत राजकुमार से करा देते हैं। मृत शरीर के साथ प्रतीकात्मक विवाह कराकर वे धन प्राप्त कर लेते हैं।
विवाह के बाद राजा, सैनिक और अन्य लोग राजकुमार के शव को अंतिम संस्कार के लिए भागीरथी नदी के तट पर ले गए। अचानक तेज वर्षा होने लगी। सभी लोग बारिश से बचने के लिए लौट गए और वह नवविवाहिता कन्या अकेली, विषाद में डूबी हुई वहीं रह गई।
कन्या ने निराश न होकर, अपने माता पिता द्वारा सिखाया हुआ अमावस्या व्रत करने का निश्चय किया। उसने दो दीप जैसे स्तंभ बनाए, जिन्हें कलिकांबा के रूप में पूजा और पूरे मन से अमावस्या व्रत का पालन किया। उसी समय वहां से गुजर रहे एक दंपत्ति ने उसकी भक्ति और स्थिति को देखकर उससे सब कुछ पूछा। कन्या ने उन्हें अपनी पूरी कथा सुनाई।
पूजा पूर्ण होने के बाद कन्या ने दंपत्ति के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। अनजाने में उस दंपत्ति ने उसे आशीष दिया, "दीर्घ सुमंगली भव", अर्थात तेरे सुहाग की आयु लंबी हो। उसी क्षण मृत पड़े राजकुमार में प्राण लौट आए। कन्या समझ गई कि यह साधारण दंपत्ति नहीं, स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती थे, जो उसके व्रत और निष्ठा से प्रसन्न हो कर उसे आशीर्वाद देने आए थे।
यह कथा यह संदेश देती है कि आषाढ़ अमावस्या पर श्रद्धा, व्रत और दीप पूजा का पालन करने से असंभव लगने वाली स्थितियां भी बदल सकती हैं और ईश्वर के आशीर्वाद से जीवन में नया अध्याय शुरू हो सकता है।
आषाढ़ अमावस्या पर व्रत, स्नान, पूजा और दान की एक संपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। जो व्यक्ति इस दिन का व्रत करना चाहे, उसके लिए कुछ प्रमुख चरण बताए गए हैं।
व्रतधारी को अमावस्या के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त के निकट उठना, स्नान करना और घर की शुद्धि करना चाहिए। स्नान विशेष रूप से यदि किसी तीर्थ, नदी या पवित्र जल में हो सके तो अच्छा माना जाता है, अन्यथा सामान्य स्नान में भी मन की पवित्रता पर ध्यान देना आवश्यक है।
इसके बाद पूजा स्थान को साफ कर के वहां भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं। अनेक स्थानों पर इस दिन संभा परमेश्वरी और षोडशोपचार पूजा की विधि अपनाई जाती है, जैसा गणेश चतुर्थी पर विस्तृत पूजन में किया जाता है।
पूजा के दौरान दीप, धूप, पुष्प, अक्षत, कुमकुम, वस्त्र, नैवेद्य आदि अर्पित किए जाते हैं। आषाढ़ अमावस्या व्रत कथा का पाठ या श्रवण पूजा का मुख्य अंग माना जाता है, विशेषकर भीमाना अमावस्या की कथा का।
पूजा के पश्चात देव प्रतिमा के समक्ष रखे गए खाद्य पदार्थ को नैवेद्य मानकर बाद में प्रसाद के रूप में परिवार और भक्तों में बांटा जाता है। यह प्रसाद सात्त्विक, स्वच्छ और श्रद्धा से तैयार होना चाहिए।
आषाढ़ अमावस्या पर रखा गया व्रत सामान्यतः एक दिन और एक रात्रि तक माना जाता है। कई लोग पूरे दिन निराहार या केवल जल पर व्रत रखते हैं, तो कुछ फलाहार या फल दूध ग्रहण करते हैं। यह व्रत अगले दिन प्रातः, अमावस्या तिथि समाप्त होने के बाद, साधारण भोजन से पारण कर के समाप्त किया जाता है। पारण से पूर्व प्रार्थना और देव पूजन का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
आषाढ़ अमावस्या पर किए जाने वाले कर्म केवल घर तक सीमित नहीं रहते बल्कि तीर्थ, मंदिर और समाज जीवन से भी जुड़ते हैं।
अनेक भक्त इस दिन प्रातः काल पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और निकट के तीर्थ स्थान या मंदिरों में जाकर दिन भर चलने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। इससे एक ओर शरीर और मन में स्वच्छता आती है, दूसरी ओर सामूहिक पूजा और भक्ति का वातावरण भी बनता है।
आषाढ़ अमावस्या पर पितृ पूजा, तर्पण, पिंडदान और तिल तर्पण विशेष रूप से किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन पितृदेव पृथ्वी लोक के समीप होते हैं और उनकी शांति के लिए किए गए कर्म उन्हें संतोष और उन्नति प्रदान करते हैं।
कई स्थानों पर मान्यता है कि पितृ कभी कभी कौवे के रूप में आसपास आते हैं, इसलिए इस दिन कौओं को भोजन कराना भी पितृ तृप्ति का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन गरीब, जरूरतमंद और साधुओं को भोजन, वस्त्र और दैनिक उपयोग की वस्तुएं देना अत्यंत शुभ माना गया है। घर घर में गायों को खिलाना भी शास्त्र में वर्णित है, क्योंकि गौ सेवा को पितृ और देव दोनों की कृपा का साधन माना गया है।
जो व्यक्ति इस दिन अन्नदान, तिल दान या वस्त्र दान करता है, उसके लिए यह कर्म अगले समय में बाधा निवारण, आर्थिक स्थिरता और मानसिक संतुलन के रूप में फल दे सकता है।
आषाढ़ अमावस्या पर दीप पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। लोग अपने घरों को साफ करके, रंगोली या कोलम से सजाते हैं और अनेक प्रकार के दीए प्रज्वलित करते हैं। एक चौकी या चौरंग को पवित्र मानकर उस पर रंगोली, पुष्प और अनेक दीप सजाए जाते हैं।
दीप पूजा को अपने इष्ट देव और कुल देवता के नाम से भी किया जाता है। साथ ही इसे पंचमहाभूत अर्थात आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को समर्पित माना जाता है। कहीं इसे लक्ष्मी, पार्वती या सरस्वती को समर्पित कर दीप आराधना की जाती है।
शाम के समय जब घरों के भीतर और बाहर दीप जलते हैं तो माना जाता है कि यह प्रकाश नकारात्मक ऊर्जा, भय और अशुभता को दूर करके जीवन में नई रोशनी, उत्साह और आशा को आमंत्रित करता है। श्रद्धा से की गई दीप पूजा साधक को आतंरिक रूप से भी प्रकाश की ओर अग्रसर करती है, जहां अज्ञान, भ्रम और संशय धीरे धीरे कम हो सकते हैं।
महाराष्ट्र में आषाढ़ अमावस्या को गटारी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। श्रावण मास में प्रवेश से पहले लोग इस दिन उल्लास के साथ विशेष भोजन और उत्सव मनाते हैं। चूंकि श्रावण को अत्यंत पवित्र माना जाता है और इस अवधि में अनेक लोग मांसाहार और मदिरा त्याग देते हैं, इसलिए आषाढ़ अमावस्या को एक प्रकार से अंतिम दिन के रूप में भी देखा जाता है, जब लोग भारी भोजन और पुरानी आदतों को छोड़ने से पहले खुले मन से उसका सेवन कर लेते हैं।
मान्यता यह भी है कि वर्षा ऋतु में भारी भोजन और मदिरा से स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें अधिक हो सकती हैं, इसलिए श्रावण में संयम के लिए यह एक मानस तैयारी भी बन जाती है।
कर्नाटक में यही तिथि भीमाना अमावस्या, आंध्र प्रदेश में चुक्कला अमावस्या और गुजरात में हरियाली अमावस्या के रूप में मनाई जाती है, हालांकि वहां के स्थानीय रीति रिवाजों और पूजन विधि के अनुसार रूप थोड़ा भिन्न हो सकता है।
आषाढ़ अमावस्या के माध्यम से एक गहरा संदेश मिलता है कि अंधकार भी केवल भय का प्रतीक नहीं बल्कि भीतर झांकने का अवसर हो सकता है। जब बाहरी चंद्र प्रकाश नहीं दिखता तब एक व्यक्ति के पास यह अवसर होता है कि वह पितृों के प्रति, समाज के प्रति और स्वयं के प्रति अपने दायित्वों को याद करे।
इस तिथि पर किया गया तर्पण, दान, दीप पूजा और व्रत केवल किसी अदृश्य लोक को प्रसन्न करने के लिए नहीं बल्कि स्वयं को अधिक विनम्र, कृतज्ञ और संतुलित बनाने के लिए भी है। जो व्यक्ति आषाढ़ अमावस्या पर अपने पितरों के लिए कुछ क्षण निकालता है, जरूरतमंदों के लिए अन्न या वस्त्र देता है और ईश्वर के नाम का स्मरण करता है, उसके जीवन में धीरे धीरे स्थिरता, संतोष और दिशा का भाव मजबूत हो सकता है।
आषाढ़ अमावस्या वर्ष में कितनी बार आती है
आषाढ़ अमावस्या वर्ष में केवल एक बार आती है और यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को ही मानी जाती है। हर वर्ष चंद्र स्थिति के अनुसार इसकी तिथि में थोड़ा अंतर हो सकता है।
क्या आषाढ़ अमावस्या पर व्रत करना अनिवार्य है
व्रत अनिवार्य नहीं है, पर यदि स्वास्थ्य और परिस्थिति अनुमति दें तो व्रत, स्नान, तर्पण और दान के साथ दिन को पवित्र रूप से बिताना अत्यंत शुभ माना गया है। जो व्यक्ति पूर्ण उपवास न कर सके, वह भी सात्त्विक भोजन और संयम के साथ इस तिथि की भावना को ग्रहण कर सकता है।
पितृ तर्पण के लिए आषाढ़ अमावस्या ही आवश्यक है या अन्य अमावस्याएं भी उपयोगी हैं
सभी अमावस्याएं पितृ तर्पण के लिए शुभ मानी जाती हैं, पर आषाढ़ अमावस्या, भाद्रपद अमावस्या और पितृ पक्ष की अमावस्या को विशेष रूप से शक्तिशाली माना गया है। जो व्यक्ति नियमित रूप से हर अमावस्या पर तर्पण कर सके, उसके लिए पितृ कृपा और भी स्थिर मानी जाती है।
क्या गटारी अमावस्या केवल भोग और उत्सव से जुड़ी परंपरा है
गटारी अमावस्या में उत्सव और विशेष भोजन की परंपरा अवश्य है, पर इसके पीछे भी स्वास्थ्य, संयम और श्रावण में शुद्धता अपनाने की तैयारी का तत्व छिपा है। इसे केवल भोग का दिन न मानकर, एक सीमा रेखा की तरह देखना अधिक संतुलित दृष्टि होगी, जहां से आगे व्यक्ति अपने जीवन में अधिक संयम और सात्त्विकता को स्थान देता है।
आषाढ़ अमावस्या के दिन सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्या माने जाएं
सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में प्रातः स्नान, देव पूजन, पितृ तर्पण, अन्न या वस्त्र दान, दीप पूजा, पीपल वृक्ष की आराधना और किसी रूप में ईश्वर स्मरण शामिल हैं। यदि इनमें से कुछ भी श्रद्धा के साथ किया जाए, तो आषाढ़ अमावस्या का दिन जीवन में सकारात्मक और अर्थपूर्ण प्रभाव छोड़ सकता है।
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