By पं. संजीव शर्मा
15 से 23 जुलाई 2026 तक गुप्त नवरात्रि की सही तिथि, घटस्थापना मुहूर्त और नौ देवियों का क्रम

अशाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 बुधवार, 15 जुलाई 2026 से आरंभ होकर गुरुवार, 23 जुलाई 2026 को समाप्त होगी। प्रथम दिन प्रातः 5:33 बजे से 10:09 बजे तक शुभ मुहूर्त में घटस्थापना या कलश स्थापना की जाएगी। इस नौ दिवसीय साधना पर्व में नवदुर्गा की नौ रूपों की पूजा होती है। साधक शक्ति, भक्ति, संरक्षण और आध्यात्मिक कृपा की कामना करते हैं। यह साधना बाहर से शांत दिखाई देती है, पर भीतर गहरी चेतना को जाग्रत करने वाली होती है।
अशाढ़ गुप्त नवरात्रि का स्वरूप साधारण उत्सव से भिन्न है। यह वह समय है जब साधना अधिक अंतर्मुखी होती है और देवी का स्मरण अधिक गूढ़ बन जाता है। जो व्यक्ति श्रद्धा और संयम से इन दिनों को जीता है, उसके भीतर साहस, धैर्य और मानसिक शुद्धि का संचार हो सकता है। गुप्त नवरात्रि का प्रभाव बाहरी प्रदर्शन से नहीं बल्कि आंतरिक समर्पण से फलित होता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पर्व | अशाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 |
| आरंभ | 15 जुलाई 2026, बुधवार |
| समापन | 23 जुलाई 2026, गुरुवार |
| घटस्थापना मुहूर्त | 5:33 AM से 10:09 AM |
| प्रमुख साधना | नवदुर्गा पूजा |
| मुख्य भाव | शक्ति, भक्ति, संरक्षण, साधना |
अशाढ़ गुप्त नवरात्रि का मूल स्वर अंतःशक्ति है।
गुप्त नवरात्रि का अर्थ केवल गुप्त रूप से मनाया जाने वाला पर्व नहीं है। इसका गहरा संकेत यह है कि साधना को बाहरी प्रदर्शन से हटाकर भीतर की अनुभूति से जोड़ा जाए। जब मन शांत होता है तब देवी की उपासना अधिक सूक्ष्म रूप से फल देती है। इस पर्व में साधक अपने भीतर की दुर्बलताओं, भय, भ्रम और आलस्य को पहचानता है।
नवरात्रि के नौ दिन केवल पूजा के लिए नहीं बल्कि एक क्रमबद्ध आध्यात्मिक यात्रा के लिए हैं। प्रत्येक दिन देवी का एक रूप मनुष्य के भीतर किसी गुण को जाग्रत करता है। कहीं स्थिरता चाहिए, कहीं धैर्य, कहीं साहस, कहीं करुणा और कहीं अंतिम सिद्धि। यही कारण है कि नवदुर्गा की उपासना जीवन के अनेक स्तरों को स्पर्श करती है।
नवरात्रि केवल पूजा नहीं, साधक के भीतर चलने वाला परिवर्तन है।
प्रथम दिन घटस्थापना या कलश स्थापना का विशेष महत्त्व है। यह केवल एक विधि नहीं बल्कि देवी के आवाहन की प्रतीकात्मक शुरुआत है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करने का उद्देश्य घर और मन दोनों में पवित्र ऊर्जा को स्थिर करना होता है। जल, नारियल, आम्रपल्लव और अन्य पूजन सामग्री के साथ कलश की स्थापना समृद्धि और शुद्धता का प्रतीक मानी जाती है।
प्रातः 5:33 बजे से 10:09 बजे तक का समय विशेष रूप से शुभ बताया गया है। इस अवधि में की गई स्थापना से साधना की नींव दृढ़ मानी जाती है। जो व्यक्ति पूरे मन से इस आरंभ को करता है, उसके लिए आने वाले नौ दिन अधिक सार्थक हो सकते हैं।
| विषय | संकेत |
|---|---|
| विधि | घटस्थापना |
| मुहूर्त | 5:33 AM से 10:09 AM |
| प्रतीक | पवित्र आरंभ |
| उद्देश्य | देवी आवाहन |
| फल | साधना की दृढ़ नींव |
घटस्थापना आरंभ नहीं, संकल्प का प्रवेश द्वार है।
अशाढ़ गुप्त नवरात्रि में नौ दिनों तक देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। प्रत्येक रूप का अपना स्वरूप, अपना संदेश और अपना आध्यात्मिक कार्य है। कोई रूप शक्ति देता है, कोई धैर्य, कोई विजय, कोई करुणा और कोई सिद्धि। साधक जब इन सभी रूपों को क्रम से स्मरण करता है तब जीवन में संतुलन बनता है।
यह क्रम केवल परंपरा नहीं है। यह मनुष्य की चेतना को ऊंचा उठाने की विधि है। जैसे जैसे दिन आगे बढ़ते हैं, साधक का मन भी अधिक परिष्कृत होता जाता है। अंत में सिद्धिदात्री तक पहुंचते पहुंचते साधना अपने पूर्ण फल की ओर बढ़ती है।
नवदुर्गा का क्रम उत्थान की एक पूर्ण साधना है।
पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। वे हिमालय की पुत्री हैं और शक्ति, शुद्धता तथा भक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी दुर्गा के प्रथम रूप के रूप में वे आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत का संकेत देती हैं। उनके उपासक स्थिरता, साहस और आंतरिक बल की कामना करते हैं।
शैलपुत्री का रूप सिखाता है कि साधना की पहली शर्त पवित्र आधार है। यदि मन और उद्देश्य शुद्ध हों, तो आगे का मार्ग सुगम हो सकता है। वे साधक के भीतर धरती जैसी स्थिरता पैदा करती हैं।
| दिन | देवी | प्रमुख गुण |
|---|---|---|
| 1 | माँ शैलपुत्री | शक्ति, शुद्धता, भक्ति |
माँ शैलपुत्री की आराधना स्थिरता का आरंभ है।
दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। वे तप, समर्पण और भक्ति का प्रतीक हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर अनुशासन और दृढ़ संकल्प उनका मूल संदेश है। साधक उनके आशीर्वाद से धैर्य, बुद्धि और कठिनाइयों पर विजय की शक्ति मांगते हैं।
ब्रह्मचारिणी का स्वरूप यह बताता है कि साधना में आकर्षण नहीं, तप आवश्यक है। किसी भी गहरी उपलब्धि के लिए निरंतरता चाहिए। जो व्यक्ति अपने लक्ष्य पर टिक सकता है, वह भीतर से बदलने लगता है। यह रूप मन को विषयों से हटाकर साधना की ओर मोड़ता है।
| दिन | देवी | प्रमुख गुण |
|---|---|---|
| 2 | माँ ब्रह्मचारिणी | तप, अनुशासन, समर्पण |
माँ ब्रह्मचारिणी धैर्य और संयम की श��्ति देती हैं।
तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। वे साहस, शांति और रक्षा की प्रतीक हैं। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र का चिह्न उनकी विशिष्ट पहचान है। उनकी उपासना से भय, नकारात्मकता और बाधाओं पर विजय पाने की प्रेरणा मिलती है।
चंद्रघंटा का स्वरूप विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी माना जाता है जो भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर दबाव महसूस करते हैं। वे केवल भय हरती नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी देती हैं। शांति और शक्ति का यह संतुलन इस रूप की विशेष उपलब्धि है।
माँ चंद्रघंटा साहस और शांति का संतुलन हैं।
चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा की जाती है। वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा, समृद्धि और जीवनी शक्ति से जुड़ी हैं। माना जाता है कि उनकी उपासना से सकारात्मकता, अच्छा स्वास्थ्य और प्रसन्नता प्राप्त होती है। वे सृष्टि की रचनात्मक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
कूष्मांडा का स्वरूप बताता है कि सृजन केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी होता है। जब मन में सकारात्मक ऊर्जा जागती है तब जीवन के अनेक क्षेत्र प्रकाशित हो सकते हैं। यह रूप साधक को उत्साह और जीवनशक्ति देता है।
| दिन | देवी | प्रमुख गुण |
|---|---|---|
| 4 | माँ कूष्मांडा | ऊर्जा, समृद्धि, स्वास्थ्य |
माँ कूष्मांडा जीवनशक्ति का प्रकाश हैं।
पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है। वे भगवान कार्तिकेय की माता हैं। मातृत्व, करुणा और बुद्धि उनके प्रमुख गुण हैं। साधक उनसे पारिवारिक सुख, सुरक्षा, शांति और आध्यात्मिक प्रगति की कामना करते हैं।
स्कंदमाता का स्वरूप यह स्मरण कराता है कि करुणा कमजोरी नहीं, शक्ति का उच्च रूप है। उनका आशीर्वाद घर के वातावरण को शांत और सुरक्षित बना सकता है। यह रूप मन में वात्सल्य और संतुलन दोनों लाता है।
माँ स्कंदमाता ममत्व और ज्ञान का संगम हैं।
छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। वे दुर्गा का योद्धा रूप मानी जाती हैं। साहस, शक्ति और नकारात्मक शक्तियों पर विजय उनका प्रमुख संदेश है। भक्त उनसे रक्षा, आत्मविश्वास और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।
कात्यायनी का स्वरूप जीवन के संघर्षों के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। वे यह सिखाती हैं कि अन्याय, भय और बाधाओं के सामने मौन रहना उचित नहीं। जब भीतर की शक्ति जागती है तब व्यक्ति अपनी राह खुद स्पष्ट करता है।
| दिन | देवी | प्रमुख गुण |
|---|---|---|
| 6 | माँ कात्यायनी | साहस, विजय, शक्ति |
माँ कात्यायनी विजय की प्रेरणा हैं।
सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा होती है। वे दुर्गा के सबसे उग्र रूपों में से एक हैं। उनका स्वरूप भय के नाश और बुराई के संहार से जुड़ा है। भक्त मानते हैं कि वे नकारात्मकता, बाधाओं और कठिनाइयों से रक्षा करती हैं।
कालरात्रि का रूप बाहर से भयंकर लग सकता है, पर भीतर से वह करुणा और रक्षा का स्वरूप है। यह स्मरण कराता है कि सभी अंधकार हमेशा स्थायी नहीं होते। जब देवी का स्मरण किया जाता है तब भीतर का भय भी धीरे धीरे कम होने लगता है।
माँ कालरात्रि रक्षा और रूपांतरण की देवी हैं।
आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा की जाती है। वे शुद्धता, शांति और करुणा का प्रतिनिधित्व करती हैं। भक्त उनसे सामंजस्य, प्रसन्नता और आध्यात्मिक प्रगति की प्रार्थना करते हैं। उनका स्वरूप शांत, सौम्य और परिवर्तनकारी है।
महागौरी का संदेश है कि शुद्धता केवल बाहरी नहीं होती। मन की निर्मलता भी उतनी ही आवश्यक है। जब विचार शांत होते हैं तब जीवन में संतुलन आता है। यह रूप साधक को धैर्य और गहराई दोनों देता है।
| दिन | देवी | प्रमुख गुण |
|---|---|---|
| 8 | माँ महागौरी | शांति, शुद्धता, करुणा |
माँ महागौरी निर्मलता का सजीव रूप हैं।
नवमी और अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। वे आध्यात्मिक ज्ञान, दिव्य आशीर्वाद और सिद्धि देने वाली देवी मानी जाती हैं। साधक उनसे सफलता, ज्ञान और आध्यात्मिक यात्रा की पूर्णता की प्रार्थना करते हैं।
सिद्धिदात्री का स्वरूप नवरात्रि की साधना का अंतिम फल है। जब साधक क्रमशः सभी रूपों का स्मरण करता है तब अंत में उसे पूर्णता का अनुभव हो सकता है। यह रूप बताता है कि साधना का उद्देश्य केवल आरंभ नहीं बल्कि पूर्णता तक पहुंचना है।
माँ सिद्धिदात्री सिद्धि और पूर्णता की अधिष्ठात्री हैं।
गुप्त नवरात्रि का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि यह बाहरी हलचल से अधिक आंतरिक साधना पर बल देती है। जब व्यक्ति नियमित रूप से मंत्र जप, देवी स्मरण, उपवास, दीपक और ध्यान को अपनाता है तब मन की परतें खुलने लगती हैं। साधना का प्रभाव धीरे धीरे बढ़ता है, पर उसका आधार बहुत गहरा होता है।
यह पर्व उन लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखता है जो जीवन में स्थिरता, सुरक्षा, मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रगति चाहते हैं। गुप्त नवरात्रि की शुद्धता मन को संयमित करती है और साधक को अधिक परिपक्व बनाती है। यही इसकी सबसे बड़ी देन है।
गुप्त नवरात्रि भीतर की साधना का पर्व है।
अशाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 कब शुरू होगी
अशाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 बुधवार, 15 जुलाई 2026 से शुरू होगी।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है
प्रथम दिन घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 5:33 बजे से 10:09 बजे तक है।
गुप्त नवरात्रि में किसकी पूजा की जाती है
इस दौरान नवदुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
पहले दिन किस देवी की पूजा होती है
पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा होती है।
नवमी के दिन किस देवी की पूजा होती है
नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।
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