By पं. अमिताभ शर्मा
दुःख और मानसिक बोझ से मुक्ति के लिए विशेष व्रत और पूजा

अशोक अष्टमी व्रत उन विशेष व्रतों में गिना जाता है जिन्हें शोक, मानसिक कष्ट और रोगों से मुक्ति के लिए अत्यंत प्रभावकारी माना गया है। जब जीवन में चिंता, दुःख और असंतुलन बढ़ने लगता है तब अशोक अष्टमी का व्रत व्यक्ति को आशा, स्वास्थ्य और आंतरिक शांति की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देता है। यह व्रत केवल एक दिन का अनुष्ठान नहीं बल्कि भावनात्मक बोझ को हल्का कर सकारात्मक सोच की ओर ले जाने वाली साधना के रूप में देखा जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार अशोक अष्टमी व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह तिथि हर वर्ष वसंत ऋतु में आती है जब प्रकृति भी नवऊर्जा से भरी रहती है और अशोक वृक्ष पर कोमल कलिकाएँ खिलने लगती हैं।
| विवरण | तिथि और वार |
|---|---|
| अशोक अष्टमी व्रत 2026 | गुरुवार, 26 मार्च 2026 |
कूर्म पुराण और कृत्यरत्नावली जैसे प्राचीन ग्रंथों में इस व्रत का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिससे पता चलता है कि प्राचीन काल से ही इसे शोक नाशक और स्वास्थ्य प्रदायक व्रत के रूप में मान्यता प्राप्त रही है।
अशोक अष्टमी व्रत के पौराणिक महत्व का संबंध भगवान हनुमान और माता सीता से जुड़ी अत्यंत भावपूर्ण घटना से माना जाता है।
मान्यता है कि इसी शुभ तिथि को भगवान हनुमान ने माता सीता की खोज के दौरान उन्हें लंका में स्थित अशोक वाटिका में देखा था। माता सीता अशोक वृक्ष के नीचे अत्यंत शोकग्रस्त अवस्था में विराजमान थीं। उसी स्थान पर हनुमान जी ने उन्हें भगवान श्रीराम की अंगूठी देकर यह विश्वास दिलाया कि प्रभु शीघ्र ही उन्हें मुक्त कराने के लिए आएँगे।
इस घटना के कारण यह दिन शोक के नाश और आशा के उदय का प्रतीक माना जाता है। जिस प्रकार अशोक वाटिका में विराजी सीता के जीवन में उस दिन नया विश्वास जागा, उसी प्रकार अशोक अष्टमी व्रत आज भी दुखी और चिंताग्रस्त मन को आश्वासन देने वाला माना जाता है।
शास्त्रीय ग्रंथों में इस व्रत को अशोक कालिका प्राशन व्रत नाम से भी वर्णित किया गया है। कालिका शब्द से आशय अशोक वृक्ष की कोमल कलिकाओं से है, जो इस व्रत की मुख्य विशेषता मानी जाती हैं।
इस व्रत में अशोक वृक्ष की कोमल कलिकाओं या कोमल पत्तों का सेवन किया जाता है। एक मत के अनुसार उस दिन अशोक की कलिकाओं का रस पीने से शारीरिक रोगों का नाश होता है और उत्तम स्वास्थ्य तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है। इसी कारण अशोक अष्टमी व्रत को स्वास्थ्य, शांति और दीर्घ जीवन देने वाला व्रत माना जाता है।
जो साधक अशोक अष्टमी व्रत 2026 को शास्त्रसम्मत ढंग से करना चाहे, उसके लिए व्रत विधि सरल है, पर भावपूर्ण होनी चाहिए।
इस विधि में बाहरी आचार के साथ साथ भीतर की भावना भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है।
अशोक अष्टमी व्रत में अशोक कलिकाओं का सेवन करते समय एक विशेष मंत्र का जप किया जाता है। यह मंत्र अशोक वृक्ष के प्रति श्रद्धा और शोक नाश की प्रार्थना का सुंदर रूप है।
मंत्र
त्वामशोक नमाम्येन मधुमाससमुद्भवम्।
शोकार्तः कलिकां प्राश्य मामशोकं सदा कुरु॥
इस मंत्र का भावार्थ यह है
हे वसंत ऋतु में उत्पन्न होने वाले अशोक वृक्ष, आपको प्रणाम है।
शोक से पीड़ित होकर आपकी पवित्र कलिका का सेवन करता हूँ,
मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि जीवन में सदैव शोक से मुक्त रह सकूँ।
मंत्र जप और कलिका सेवन का यह संयुक्त अभ्यास मन में यह विश्वास स्थापित करता है कि प्रकृति की शक्ति और भगवान की कृपा से शोक धीरे धीरे कम होकर शांति में परिवर्तित हो सकती है।
शास्त्रों में वर्णित है कि जो व्रती अशोक अष्टमी व्रत को विधि, श्रद्धा और संयम के साथ करता है, उसके लिए यह व्रत अनेक प्रकार के शुभ फल देने वाला होता है।
इस व्रत से
एक विशेष उल्लेख यह भी मिलता है कि यदि अशोक अष्टमी बुधवार के दिन पड़े या पुनर्वसु नक्षत्र के योग से युक्त हो, या दोनों संयोग साथ हों, तो व्रती जीवन भर शोक से मुक्त रहने का विशेष फल प्राप्त कर सकता है। अशोक अष्टमी 2026 गुरुवार को पड़ रही है, अतः यह सामान्य रूप से शोक निवारण और स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से शुभ मानी जा सकती है।
अशोक अष्टमी व्रत 2026 यह स्मरण कराता है कि दुख और शोक केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं बल्कि भीतर के असंतुलन से भी जुड़े होते हैं। जब व्यक्ति प्रकृति के एक वृक्ष के सामने विनम्र होकर जल अर्पित करता है, उसकी कलिकाओं का सेवन तपस्वी भावना से करता है और भगवान शिव से शांति की प्रार्थना करता है तब मन धीरे धीरे भरोसे और संतुलन की ओर बढ़ता है।
यह व्रत यह भी सिखाता है कि आध्यात्मिक साधना केवल बड़े अनुष्ठानों में नहीं बल्कि छोटी पवित्र आदतों और नियमित व्रतों में भी छिपी होती है। जो व्यक्ति अशोक अष्टमी 2026 पर इस व्रत को अपनाकर अपने भीतर के शोक, तनाव और नकारात्मक भावों को थोड़ा भी हल्का करने का संकल्प लेगा, उसके लिए यह दिन आगे की जीवन यात्रा में आशा और शांति का महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है।
अशोक अष्टमी व्रत 2026 कब रखा जाएगा अशोक अष्टमी व्रत 2026 चैत्र मास की शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को रखा जाएगा, जो इस वर्ष गुरुवार 26 मार्च 2026 को पड़ेगी।
अशोक अष्टमी व्रत का मुख्य उद्देश्य क्या माना जाता है इस व्रत का मुख्य उद्देश्य शोक, मानसिक कष्ट और शारीरिक रोगों से मुक्ति की प्रार्थना करना है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में शांति, संतुलन और दीर्घायु की भावना को मजबूत करने वाला माना जाता है।
अशोक अष्टमी व्रत में अशोक वृक्ष की कलिकाएँ क्यों खाई जाती हैं ग्रंथों में इस व्रत को अशोक कालिका प्राशन व्रत कहा गया है। मान्यता है कि अशोक वृक्ष की कोमल कलिकाओं या पत्तों का सेवन शारीरिक रोगों को दूर करने और शोक नाश की भावना को जागृत करने वाला होता है।
अशोक अष्टमी व्रत के समय किस देवता की विशेष पूजा की जाती है इस व्रत में अशोक वृक्ष की पूजा के साथ साथ भगवान शिव की विशेष आराधना की जाती है। अशोक वृक्ष से लाई गई आठ कलिकाओं से भगवान शिव की पूजा करने के बाद ही उनका सेवन किया जाता है।
अशोक अष्टमी व्रत 2026 को जीवन में अधिक सार्थक कैसे बनाया जा सकता है यदि इस व्रत के साथ व्यक्ति यह संकल्प ले कि आगे से शोक, क्रोध और नकारात्मक विचारों को धीरे धीरे कम करेगा, अपने स्वास्थ्य का अधिक ध्यान रखेगा और मन को शांत बनाने वाली आदतों को अपनाएगा, तो अशोक अष्टमी व्रत 2026 केवल एक दिन की रस्म न रहकर जीवन में स्थायी शांति और संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 32
इनसे पूछें: विवाह, करियर, व्यापार, स्वास्थ्य
इनके क्लाइंट: छ.ग., उ.प्र., म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें