अष्टमी श्राद्ध 2026: तिथि, महत्व और विधि

By पं. नीलेश शर्मा

मुहूर्त, महत्व और अष्टमी श्राद्ध की संपूर्ण विधि की पूरी जानकारी

अष्टमी श्राद्ध 2026: तिथि, महत्व और विधि

पितृ पक्ष का प्रत्येक दिन अपने भीतर एक विशिष्ट आध्यात्मिक अर्थ समेटे रहता है, पर अष्टमी श्राद्ध का स्थान विशेष माना जाता है। वर्ष 2026 में अष्टमी श्राद्ध शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा। इस दिन का कुतुप मुहूर्त लगभग 11:36 ए एम से 12:24 पी एम, रौहिण मुहूर्त लगभग 12:24 पी एम से 1:12 पी एम, तथा अपराह्न काल लगभग 1:12 पी एम से 3:36 पी एम तक माना गया है। श्राद्ध कर्म के लिए यही समय सबसे उपयुक्त समझा जाता है, क्योंकि पितरों को अर्पण इसी अवधि में अधिक फलदायक माना गया है।

अष्टमी श्राद्ध क्या है

अष्टमी श्राद्ध पितृ पक्ष के दौरान किया जाने वाला तिथि आधारित पार्वण श्राद्ध है। यह उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका देहावसान किसी भी महीने की अष्टमी तिथि को हुआ हो, चाहे वह शुक्ल पक्ष की अष्टमी रही हो या कृष्ण पक्ष की। पितृ पक्ष में आने वाली अष्टमी पर उन्हें तर्पण, पिण्डदान और श्रद्धापूर्वक स्मरण अर्पित किया जाता है।

हिन्दू परम्परा में तिथि के अनुसार श्राद्ध करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यही कारण है कि जिस तिथि पर पितृ का निधन हुआ हो, उसी तिथि के श्राद्ध को शास्त्रसम्मत और अधिक प्रभावकारी माना जाता है। अष्टमी श्राद्ध भी इसी नियम का एक गम्भीर और पुण्यदायक रूप है।

अष्टमी तिथि का आध्यात्मिक संकेत क्या है

अष्टमी संख्या आठ का सम्बन्ध भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में गहरे अर्थों से जुड़ा हुआ है। यह तिथि महागौरी, अष्टमूर्ति शिव और अष्टदिक की स्मृति जगाती है। इसलिए अष्टमी को केवल पंचांग की एक तिथि मानकर नहीं देखा जाता बल्कि इसे परिवर्तन, शुद्धि और आंतरिक मार्गदर्शन की तिथि भी समझा जाता है।

पितृ कर्म के सन्दर्भ में यह मान्यता विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। अष्टमी को जीवित जगत और पितृ लोक के बीच की सूक्ष्म निकटता का समय माना गया है। इसी कारण इस दिन किया गया श्राद्ध पितरों तक स्पष्ट रूप से पहुँचता है और उनकी तृप्ति का माध्यम बनता है।

अष्टमी श्राद्ध का शास्त्रीय महत्व क्यों माना जाता है

गरुड़ पुराण में अष्टमी को श्राद्ध के लिए शुभ तिथियों में गिना गया है। यह पक्ष के मध्य भाग में आने वाली तिथि है, इसलिए इसे आध्यात्मिक ग्रहणशीलता का समय माना गया है। ऐसा समझा जाता है कि इस दिन अर्पित किया गया तर्पण और पिण्डदान पितरों तक विशेष रूप से प्रभावशाली रूप में पहुँचता है।

शिव पुराण में भी अष्टमी तिथि को भगवान शिव की विशेष तिथि कहा गया है। इस आधार पर यह विश्वास प्रचलित है कि अष्टमी पर किया गया श्राद्ध केवल पारिवारिक कर्तव्य नहीं रहता बल्कि उसमें मुक्ति की कामना का भी एक गहरा आयाम जुड़ जाता है।

विष्णु धर्मशास्त्र की परम्परा में यह भी उल्लेख मिलता है कि यदि किसी अष्टमी तिथि पर दिवंगत पितृ का श्राद्ध न किया जाए, तो परिवार में पितृदोष के कुछ सूक्ष्म प्रभाव दिखाई दे सकते हैं। इसलिए विधिपूर्वक अष्टमी श्राद्ध करना केवल परम्परा का पालन नहीं बल्कि कुल की शांति का भी साधन माना गया है।

अष्टमी श्राद्ध 2026 की तिथि और समय

वर्ष 2026 में पितृ पक्ष 26 सितम्बर से आरम्भ होकर 10 अक्टूबर तक रहेगा। इसी क्रम में अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर 2026, शनिवार को पड़ेगा। यह दिन सप्तमी श्राद्ध के बाद और नवमी श्राद्ध से पहले आता है, इसलिए पितृ पक्ष के क्रम में इसका स्थान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

नीचे समय को सरल रूप में देखा जा सकता है:

अनुष्ठान कालसमय
कुतुप मुहूर्तलगभग 11:36 ए एम से 12:24 पी एम
रौहिण मुहूर्तलगभग 12:24 पी एम से 1:12 पी एम
अपराह्न काललगभग 1:12 पी एम से 3:36 पी एम

शनिवार का सम्बन्ध शनि से माना जाता है, जो कर्म, समय और वंशगत उत्तरदायित्व के अधिपति माने जाते हैं। ऐसे में शनिवार को पड़ने वाला अष्टमी श्राद्ध कर्मफल, पितृ स्मरण और आत्मिक शांति की दृष्टि से और भी गंभीर महत्व ग्रहण कर लेता है।

किन पितरों के लिए अष्टमी श्राद्ध किया जाता है

सबसे पहला नियम यह है कि यदि किसी प्रत्यक्ष कुल पितृ या मातृकुल के किसी निकट पूर्वज का निधन अष्टमी तिथि पर हुआ हो, तो अष्टमी श्राद्ध उनके लिए किया जाना चाहिए। यही इसका मूल आधार है।

इसके अतिरिक्त धर्मशास्त्रीय परम्परा कुछ विशेष स्थितियों को भी इस दिन से जोड़ती है। उदाहरण के लिए ऐसे पितर जिनकी मृत्यु दीर्घ रोग या कष्ट के बाद हुई हो, ऐसे पितर जो शिव या शक्ति उपासना से जुड़े रहे हों, ऐसे पितर जिनके अन्त्येष्टि संस्कार पूर्ण विधि से न हो सके हों, या ऐसे प्रियजन जो रक्त सम्बन्धी न होते हुए भी जीवन में परिवार समान रहे हों, उनके लिए भी इस दिन श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया जा सकता है।

यदि किसी परिवार को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या का प्रावधान श्रेष्ठ माना जाता है। फिर भी जहाँ तिथि निश्चित हो, वहाँ उसी तिथि का श्राद्ध अधिक यथार्थ और अधिक फलदायी माना जाता है।

अष्टमी श्राद्ध की विधि कैसे की जाती है

अष्टमी श्राद्ध की विधि पार्वण श्राद्ध की परम्परा का पालन करती है, किन्तु इस तिथि के कारण इसमें कुछ विशेष भाव भी जुड़ जाते हैं। अनुष्ठान प्रातः काल की शुद्धि से आरम्भ होता है। प्रातः स्नान कर स्वच्छ, विशेष रूप से सफेद वस्त्र धारण करना उत्तम माना जाता है। यदि घर पर अनुष्ठान हो रहा हो तो स्नान के जल में गंगाजल मिलाना भी शुभ समझा जाता है।

इसके बाद कुछ परिवार आवाहन की संक्षिप्त प्रक्रिया करते हैं। इसमें दक्षिण दिशा की ओर तिल के तेल का दीपक जलाकर पितरों को उपस्थित होने का निमंत्रण दिया जाता है। दक्षिण दिशा को यम और पितरों की दिशा माना गया है, इसलिए इस दिशा का विशेष महत्व रहता है।

फिर संकल्प लिया जाता है। संकल्प में कर्ता अपना नाम, गोत्र और जिन पितरों के लिए श्राद्ध किया जा रहा है उनका स्मरण करता है। इसके तुरंत बाद तर्पण किया जाता है। तर्पण में जल, काला तिल और कुश का प्रयोग होता है। दाहिने हाथ से अर्पित यह जल पितरों तक सम्मानपूर्वक पहुँचाया जाता है।

पिण्डदान का चरण

तर्पण के बाद पिण्ड तैयार किए जाते हैं। ये पिण्ड सामान्यतः उबले हुए चावल, तिल, शहद और घी से बनाए जाते हैं। प्रत्येक पिण्ड को पितरों के नाम स्मरण करते हुए अर्पित किया जाता है। अष्टमी श्राद्ध के सन्दर्भ में कुछ परम्पराओं में इन पिण्डों में विभूति की एक छोटी मात्रा भी मिलाई जाती है, जो इस तिथि के शैव स्वरूप की ओर संकेत करती है।

नदी तट या पवित्र संगम स्थल पर पिण्डदान का अनुभव और भी अधिक गहन माना गया है, क्योंकि वहाँ जल, मंत्र और स्मरण तीनों मिलकर पितृ तृप्ति का गंभीर वातावरण बनाते हैं।

ब्राह्मण भोजन और जीवों को अर्पण

पिण्डदान के पश्चात ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। यह केवल भोजन कराना नहीं बल्कि पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम है। भोजन से पहले अन्न का कुछ भाग गाय, कौए, कुत्ते और चींटियों के लिए भी निकाला जाता है। इन अर्पणों को पितृ कर्म का एक आवश्यक अंग माना गया है।

भोजन के बाद श्रद्धा और सम्मान से दक्षिणा दी जाती है। शास्त्रीय दृष्टि में ब्राह्मण की संतुष्टि को पितरों की संतुष्टि का प्रतीक माना गया है।

अष्टमी श्राद्ध के दिन क्या करें

इस दिन का व्यवहार संयमपूर्ण, शांत और श्रद्धापूर्ण होना चाहिए। कुछ कार्य विशेष रूप से उपयोगी माने गए हैं:

क्या करेंक्यों करें
प्रातः शिव मंदिर में जल और बिल्वपत्र अर्पित करेंअष्टमी का सम्बन्ध शिव कृपा से माना गया है
काले तिल का प्रयोग करेंश्राद्ध कर्म में यह अत्यंत पवित्र माना गया है
दक्षिण दिशा में तिल तेल का दीपक जलाएंपितरों के स्मरण का प्रतीक
**महामृत्युंजय मंत्र** का 108 बार जप करेंपितृ शांति और कल्याण की कामना के लिए
रोग से दिवंगत पितरों की स्मृति में दान देंकरुणा और स्मरण का श्रेष्ठ रूप

अष्टमी श्राद्ध के दिन किन बातों से बचना चाहिए

जिस दिन श्राद्ध किया जा रहा हो, उस दिन बाहरी आडम्बर से दूर रहना चाहिए। यदि घर में जन्म या मृत्यु के कारण अशौच की स्थिति हो, तो श्राद्ध नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार इस दिन मांसाहार, मद्य, प्याज और लहसुन से दूर रहना आवश्यक माना गया है।

अनुष्ठान को जल्दबाजी में या केवल औपचारिकता समझकर नहीं करना चाहिए। श्राद्ध का मूल श्रद्धा ही है। सूर्यास्त के बाद श्राद्ध से बचना चाहिए, क्योंकि इसका उचित समय अपराह्न तक ही माना गया है। फटे, मैले या अशुद्ध वस्त्र धारण कर अनुष्ठान करना भी वर्जित समझा गया है।

इस दिन ऊँची आवाज, उत्सव, संगीत या मनोरंजन से भी दूरी रखनी चाहिए, ताकि मन पितृ स्मरण में स्थिर बना रहे।

पितृ स्मरण का यह दिन क्या सिखाता है

अष्टमी श्राद्ध केवल एक तिथि नहीं बल्कि यह अपने स्रोतों को याद करने का दिन है। यह जीवन की उस धारा को पहचानने का अवसर देता है जिसके बिना वर्तमान अस्तित्व संभव नहीं होता। जब परिवार अपने पितरों का नाम लेकर तर्पण करता है तब वह केवल अतीत को नहीं पुकारता बल्कि अपने वंश की चेतना को सम्मान देता है।

इस श्राद्ध का एक कोमल पक्ष यह भी है कि यह मनुष्य को कृतज्ञता, कर्तव्य और आत्मिक विनम्रता सिखाता है। जो पीढ़ियाँ जा चुकी हैं, उन्हीं की छाया में वर्तमान पीढ़ी खड़ी है। अष्टमी श्राद्ध उस सम्बन्ध को श्रद्धा से स्वीकार करने का पावन अवसर है।

FAQs

अष्टमी श्राद्ध 2026 कब है
अष्टमी श्राद्ध वर्ष 2026 में शनिवार, 3 अक्टूबर को किया जाएगा।

अष्टमी श्राद्ध किन पितरों के लिए किया जाता है
यह उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका निधन किसी भी महीने की अष्टमी तिथि को हुआ हो।

अष्टमी श्राद्ध का सबसे उपयुक्त समय कौन सा है
कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और अपराह्न काल श्राद्ध के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं।

क्या अष्टमी श्राद्ध में पिण्डदान आवश्यक है
हाँ, तर्पण, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन अष्टमी श्राद्ध के मुख्य अंग माने जाते हैं।

यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो क्या करें
ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करना अधिक उपयुक्त माना जाता है।

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