By अपर्णा पाटनी
भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी पर गायों, बच्चों और कृषि का सम्मान करने का पर्व

कृषि से जुड़े परिवारों के लिए बहुला चतुर्थी या बोल चौथ केवल एक व्रत नहीं बल्कि गाय, बछड़े और भूमि के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भावुक अवसर माना जाता है। श्रावण के बाद भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की इस चतुर्थी पर खेत, गौ माता और बालकों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रार्थनाएँ की जाती हैं और पूरे गांव का वातावरण भक्ति और सादगी से भर जाता है।
बहुला चतुर्थी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह व्रत श्रावण के बाद आने वाली इस विशेष चतुर्थी पर होगा।
| विवरण | तिथि और दिन | समय / जानकारी |
|---|---|---|
| बहुला चतुर्थी 2026 / बोल चौथ | सोमवार, 31 अगस्त 2026 | पूरे दिन व्रत और गौ पूजा |
| चतुर्थी तिथि प्रारंभ | 31 अगस्त 2026 | प्रातः लगभग 08 बजकर 51 मिनट के आसपास |
| चतुर्थी तिथि समाप्त | 1 सितम्बर 2026 | प्रातः लगभग 07 बजकर 41 से 08 बजकर 53 मिनट के बीच मान्य विवरणों के अनुसार |
| गोधूलि पूजा समय | 31 अगस्त 2026 | लगभग 06 बजकर 43 मिनट से 07 बजकर 08 मिनट के बीच |
| चंद्रोदय समय | 31 अगस्त 2026 | रात्रि लगभग 08 बजकर 50 मिनट के आसपास, व्रत खोलने में उपयोगी |
इस प्रकार बहुला चतुर्थी का मुख्य व्रत 31 अगस्त सोमवार को रहेगा। दिन भर व्रत, गौ सेवा और शाम के गोधूलि बेला में विशेष गौ पूजन के बाद चंद्रोदय के समय या उसके बाद व्रत खोलने की परंपरा बताई गई है।
बहुला चतुर्थी को कई स्थानों पर बोल चौथ या बहुला चौथ के नाम से जाना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से गुजरात, राजस्थान के कुछ ग्रामीण क्षेत्र और उत्तर भारत के कृषक समाज में अधिक आस्था से मनाया जाता है।
इस दिन गाय और बछड़े को सौभाग्य, शांति और समृद्धि का आधार मानकर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि बहुला चतुर्थी के दिन सच्चे मन से गौ सेवा और व्रत करने से घर परिवार में सुख शांति और खेती में अच्छा फल प्राप्त होता है। कई परंपराओं में इसे विशेष रूप से बच्चों और पुत्र की रक्षा के व्रत के रूप में भी माना जाता है।
बहुला чतुर्थी पर एक बड़ा संकेत यह भी है कि गाय का दूध सबसे पहले और प्रमुख रूप से उसके बछड़े का अधिकार है, इसलिए इस दिन लोग स्वयं दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन त्याग कर यह संदेश जीते हैं।
बहुला चतुर्थी के व्रत में एक विशिष्ट नियम यह है कि इस दिन दूध, दही, घी, मक्खन और पनीर जैसे गाय आधारित दुग्ध पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता। इसके पीछे दो स्पष्ट भाव हैं। पहला, यह मान्यता कि गाय के दूध पर सबसे पहली और प्राकृतिक पात्रता बछड़े की है, इसलिए इस दिन मनुष्य स्वयं पीछे हटकर यह अधिकार केवल बछड़े के लिए छोड़ देता है। दूसरा, यह स्मरण कि खेती, गोबर और गौमूत्र से लेकर दूध तक, जो कुछ भी मनुष्य गाय से प्राप्त करता है, वह उसके जीवन पर एक अनुग्रह है, अधिकार नहीं।
इसी कारण बहुला चतुर्थी पर व्रती सामान्यतः मोटे अनाज, बाजरा, ज्वार और बिना दूध वाले व्यंजन ग्रहण करते हैं। कई परंपराओं में गेहूं और चावल से भी परहेज रखा जाता है, जबकि कहीं कहीं चावल से बने व्यंजन केवल पशुओं को अर्पित किए जाते हैं।
बहुला चतुर्थी को कृषक समुदाय, विशेषकर गाय पालने वाले परिवारों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। विश्वास है कि जो व्यक्ति इस दिन पूर्ण व्रत रखकर, गाय की सेवा और पूजा करता है और गोधूलि समय गाय की आराधना कर चंद्रमा को अर्घ्य देता है, उसे पुत्र सुख, संतान की रक्षा और खेती में अच्छे उत्पादन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कई मान्यताओं के अनुसार यह व्रत माता द्वारा अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए भी किया जाता है। गौ माता की तरह अपने बच्चों को संरक्षण देने वाली माताएँ इस दिन भावनात्मक रूप से बहुला की कथा से जुड़कर संकल्प लेती हैं कि वे भी अपने वात्सल्य और वचन से परिवार के लिए सुरक्षा कवच बनेंगी।
बहुला चतुर्थी की मुख्य कथा एक गाय बहुला और उसके बछड़े के प्रेम पर आधारित है। यह कहानी सरल होते हुए भी व्रत के मूल भाव को बड़ी गहराई से समझाती है।
कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक गौ थी, जिसका नाम बहुला था। वह रोज चरने के लिए जंगल जाती और समय पर लौटकर अपने बछड़े को दूध पिलाती। एक दिन जब बहुला अपने बछड़े के लिए दूध से भरा थन लेकर लौट रही थी, तभी मार्ग में एक सिंह से उसका सामना हो गया। सिंह ने भूख में बहुला को रोक लिया और उसे मारकर खाने की इच्छा जताई।
बहुला ने शांत स्वर में सिंह से विनती की कि उसे पहले अपने घर जाकर बछड़े को दूध पिलाने दें, उसके बाद वह स्वयं वापस आकर सिंह के सामने प्रस्तुत हो जाएगी। सिंह को यह विश्वास दिलाना आसान नहीं था, पर बहुला की आँखों में सत्य और मातृत्व की शक्ति थी। सिंह ने शर्त रखी कि यदि वह लौटकर न आए तो वह बछड़े को भी नहीं छोड़ेगा। बहुला ने संकल्प लिया और अपने वचन के साथ आगे बढ़ गई।
घर लौटकर बहुला ने अपने बछड़े को प्रेम से दूध पिलाया, उसे सहलाया और मन ही मन विदा ले ली। बछड़ा आनंद से माँ का दूध पी रहा था, जबकि माँ ने सोच लिया था कि अपने प्राण देकर भी वह बछड़े की भूख पूरी करके ही जाएगी। दूध पिलाकर बहुला बिना देर किए पुनः जंगल की ओर चल पड़ी और सिंह के सामने पहुंच गई।
सिंह ने यह देखकर आश्चर्य किया कि बहुला अपने प्राणों की चिंता छोड़कर वापस आ गई है। वह उसकी ममतामयी भावना और वचन पालन से अत्यंत प्रभावित हुआ। कुछ कथाओं में बताया गया है कि यहाँ सिंह का वास्तविक रूप स्वयं भगवान कृष्ण का था, जो बहुला की सत्यनिष्ठा और मातृत्व की परीक्षा लेकर उसे आशीर्वाद देना चाहते थे।
बहुला की अचल निष्ठा और वचनबद्धता से प्रसन्न होकर सिंह ने उसे और उसके बछड़े को जीवनदान दिया और कहा कि इस वृत्ति वाली बहुला को मनुष्य सदैव आदर देंगे। भगवान कृष्ण ने आशीर्वाद दिया कि भाद्रपद की कृष्ण चतुर्थी को बहुला चतुर्थी के रूप में मनाया जाएगा और गौ माता की पूजा कर लोग संतान और संपत्ति की रक्षा की प्रार्थना करेंगे।
यह कथा यह संकेत देती है कि शारीरिक बल, क्रोध और हिंसा को भी ममता, वचन और करुणा के सामने झुकना पड़ता है। बहुला चतुर्थी इसी मातृत्व, दया और वचन की शक्ति की स्मृति के रूप में मनाई जाती है।
बहुला चतुर्थी पर व्रत और पूजा की विधि सरल होते हुए भी अत्यंत भावपूर्ण होती है। अधिकांश रस्में गौ माता, बछड़े और गोशाला से जुड़ी रहती हैं।
व्रत करने वाले लोग प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं। मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु का स्मरण कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद गौशाला या पशुशाला की ओर जाने से पहले घर में हल्की पूजा और दीप प्रज्वलन किया जाता है। यह प्रारंभ इस बात का संकेत है कि दिन की शुरुआत शुद्ध शरीर और शांत मन से हो, ताकि व्रत और सेवा दोनों का प्रभाव गहरा हो सके।
बहुला चतुर्थी की मुख्य विशेषता गौ सेवा है। किसान और ग्रामीण लोग अपने पशुशाला, गोशाला और खूँटे की अच्छी तरह सफाई करते हैं। गाय, बछड़े, बैल या भैंस को नहलाया जाता है, शरीर पर ब्रश या हाथ से सफाई कर उन्हें स्नेह से सहलाया जाता है। कई जगहों पर गोबर से चौका लीपकर, फूलों और रंगोली से गाय के खूँटे के आस पास जगह सजाई जाती है। सफाई का यह कार्य केवल बाहरी स्वच्छता नहीं बल्कि मन में बसे कृतज्ञता के भाव को भी प्रकट करता है।
बहुला चतुर्थी पर भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु की उपासना को भी गहरी जगह दी जाती है। घरों में श्रीकृष्ण और विष्णु के चित्र या मूर्ति को सजाया जाता है। कुमकुम, चंदन, अक्षत, फूल और धूप से पूजा की जाती है। भक्त मंदिरों में जाकर भी दर्शन करते हैं और गौ माता की चरणों में नमस्कार करते हैं। श्रीकृष्ण का गोपाल रूप, ग्वाला बालक और गायों के बीच की उनकी लीलाएँ इस दिन विशेष रूप से स्मरण की जाती हैं।
बहुला चतुर्थी के दिन मंत्र जप और आरती वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना देते हैं। प्रमुख रूप से यह मंत्र जपा जाता है।
Om Namo Bhagwate Vasudevaye
इस मंत्र का भाव यह है कि श्रीकृष्ण, जो वासुदेव हैं, सर्वव्यापक हैं, उनके चरणों में नमस्कार कर जीवन में संरक्षण, विवेक और शांति की कामना की जाए। परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर इस मंत्र का जप और बहुला चौथ की आरती पढ़ने से मन में श्रद्धा और संतुलन आता है।
गोधूलि बेला वह समय है जब सूर्य अस्त होने के ठीक पहले गायें चरागाह से लौटती हैं और उनके खुरों से उठती धूल वातावरण में एक विशेष आभा उत्पन्न करती है। बहुला चतुर्थी पर यही समय गौ पूजा के लिए अत्यंत पावन माना जाता है।
गोधूलि में गाय और बछड़ों को फूल मालाओं, रंगीन कपड़ों या हल्की सजावट से अलंकृत किया जाता है। उनके माथे पर कुमकुम और चंदन का तिलक लगाया जाता है। धूप, दीप, अक्षत और फूल के साथ गाय के चारों ओर प्रदक्षिणा की जाती है। परिवार के सदस्य हाथ जोड़कर गो माता से घर की शांति, समृद्धि और अच्छी फसल की प्रार्थना करते हैं। गो पूजा का यह रूप बहुला की कथा और वर्तमान जीवन दोनों को जोड़ता है, क्योंकि गाय को अन्न, दूध, खेती और अर्थ चारों के केंद्र में माना गया है।
भारतीय व्रत परंपरा में उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि इच्छाओं के नियंत्रण और मन की शुद्धि का अभ्यास माना जाता है। बहुला चतुर्थी पर व्रत की कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं। व्रती प्रातः संकल्प लेकर पूरा दिन अन्न या सामान्य भोजन से दूर रहते हैं। कई लोग केवल फल, जल या मोटे अनाज से बने हल्के प्रसाद का सेवन करते हैं। दूध और दूध उत्पादों, गाय के घी आदि से सामान्यतः परहेज रखा जाता है।
रात में गोधूलि पूजा के बाद और चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला जाता है। यह क्रम यह संकेत देता है कि दिन भर की तपस्या के बाद चंद्रमा की शीतलता और गौ माता की कृपा जीवन में संतुलन और शांति भरती है।
बहुला चतुर्थी की एक रोचक परंपरा यह भी बताई जाती है कि इस दिन भोजन अक्सर खुले आकाश के नीचे तैयार और ग्रहण किया जाता है। बाजरा, ज्वार और अन्य मोटे अनाज से बने व्यंजन बनाए जाते हैं। कई परंपराओं में गेहूं और चावल का उपयोग कम या वर्जित माना जाता है या केवल पशुओं के लिए चावल आधारित व्यंजन बनाकर उन्हें खिलाया जाता है। पशुओं के लिए विशेष रूप से चावल, दलिया या अन्य अनाज पकाकर उनके सामने प्रेम से परोसा जाता है।
खुले आकाश के नीचे भोजन करना, खेत खलिहान और प्रकृति के बीच बैठना, मनुष्य को यह याद दिलाता है कि जीवन का मूल संबंध भूमि, पशु और प्रकृति से ही जुड़ा है।
बहुला चतुर्थी 2026 उस समय मनाई जाएगी जब खेती, पशुपालन और पर्यावरण संरक्षण पर विचार और भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इस व्रत से एक सीधा संदेश मिलता है कि केवल लाभ के लिए पशु और भूमि का उपयोग करने के बजाय उन्हें सम्मान, करुणा और संतुलन के साथ देखना आवश्यक है।
बहुला की कथा यह सिखाती है कि प्रेम, वचन और त्याग की शक्ति से हिंसा और क्रूरता को भी बदला जा सकता है। यदि किसान, पशुपालक और सामान्य गृहस्थ बहुला चतुर्थी के दिन अपने व्यवहार में थोड़ा भी अधिक सौम्यता, संयम और कृतज्ञता जोड़ लें, तो यही इस पर्व की सच्ची साधना कहलाएगी।
बहुला चतुर्थी 2026 कब मनाई जाएगी और गोधूलि पूजा का समय क्या रहेगा?
बहुला चतुर्थी 2026 सोमवार 31 अगस्त 2026 को भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के दिन मनाई जाएगी। चतुर्थी तिथि सुबह लगभग 8 बजे के बाद से अगले दिन सुबह तक रहेगी। गोधूलि पूजा के लिए शाम लगभग 6 बजकर 43 मिनट से 7 बजकर 8 मिनट तक का समय विशेष रूप से उपयुक्त माना जा सकता है।
बहुला चतुर्थी पर दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन क्यों नहीं किया जाता?
इस व्रत में यह संकल्प रहता है कि गाय के दूध पर पहला अधिकार बछड़े का है। इसलिए व्रती दूध, दही, घी और अन्य दुग्ध उत्पादों का त्याग कर यह भावना जीते हैं कि मनुष्य लाभ के पीछे नहीं बल्कि करुणा और कृतज्ञता के साथ गाय से जुड़ा रहे।
बहुला चतुर्थी की प्रमुख व्रत कथा में क्या संदेश है?
कथा के अनुसार गाय बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाने की प्रतिज्ञा निभाने के लिए सिंह के सामने वापस लौट आती है। सिंह उसकी ममता और वचन पालन से प्रभावित होकर उसे और उसके बछड़े को जीवनदान देता है। इससे यह संदेश मिलता है कि प्रेम, सत्य और वचन की शक्ति से क्रूरता भी पिघल सकती है।
बहुला चतुर्थी पर कौन सी मुख्य पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं?
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान, गौशाला और पशुबाड़े की सफाई, गाय और बछड़े को स्नान और साज सज्जा, श्रीकृष्ण और विष्णु की पूजा, “Om Namo Bhagwate Vasudevaye” मंत्र जप, गोधूलि बेला में गौ पूजा और चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा मुख्य रूप से निभाई जाती है।
बहुला चतुर्थी को बोल चौथ या गौ पूजा व्रत क्यों कहा जाता है?
बहुला चतुर्थी में पूरा ध्यान गाय, बछड़े और पशुशाला की सेवा पर रहता है। गायों को सजाकर, उनके खूँटे की सफाई कर और उन्हें विशेष भोजन खिलाकर लोग अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इसी कारण कुछ क्षेत्रों में इसे बोल चौथ, गौ पूजा व्रत या बहुला चौथ के नाम से पुकारा जाता है।
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