By पं. अमिताभ शर्मा
4 मार्च 2026 को मनाई जाने वाली भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी की तिथि, पूजा और चंद्र दर्शन का महत्व जानें

विघ्नहर्ता श्री गणेश के भालचंद्र स्वरूप की आराधना के लिए मनाया जाने वाला भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी व्रत मन और चित्त को स्थिर करने वाला अत्यंत प्रभावशाली पर्व माना जाता है। इस दिन गणेश जी के उस रूप की पूजा की जाती है जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित रहता है और जो साधक के भीतर शांति, संतुलन तथा स्पष्टता का प्रकाश जगाते हैं।
वर्ष 2026 में भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी बुधवार, 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। यह व्रत पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है, जिसे संकष्टि या संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। चतुर्थी तिथि 4 मार्च 2026 को प्रातः 06 बजकर 04 मिनट पर प्रारंभ होकर 5 मार्च 2026 को प्रातः 04 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगी, अतः व्रत और पूजन का मुख्य दिन 4 मार्च 2026 ही रहेगा।
संकष्टि चतुर्थी व्रत की पूर्णता चंद्र दर्शन और चंद्र पूजा से मानी जाती है। इसलिए तिथि के साथ साथ चंद्र उदय का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
| विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| व्रत का नाम | भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी 2026 |
| वार और तिथि | बुधवार, 4 मार्च 2026 |
| पक्ष और तिथि | कृष्ण पक्ष चतुर्थी |
| चतुर्थी तिथि प्रारम्भ | 4 मार्च 2026, प्रातः 06:04 |
| चतुर्थी तिथि समाप्त | 5 मार्च 2026, प्रातः 04:18 |
| संकष्टि व्रत पालन की तिथि | 4 मार्च 2026 |
| चंद्र उदय का समय | लगभग रात 09:24 |
चूँकि चतुर्थी तिथि 4 मार्च की संध्या और रात्रि में विद्यमान रहती है और उसी रात चंद्र उदय भी होता है, इसलिए संकष्टि चतुर्थी का व्रत 4 मार्च को रखकर रात में चंद्र दर्शन के साथ खोलना शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप माना जाएगा।
भालचंद्र शब्द दो भागों से बना है।
अर्थात वह गणेश स्वरूप जिसके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित हो, वही भालचंद्र कहलाते हैं। चंद्रमा मन, भावनाओं और मानसिक संतुलन का भी प्रतीक माना जाता है। इसलिए भालचंद्र गणेश साधक के मन में
का आशीर्वाद देने वाले माने जाते हैं।
भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी पर भक्त विशेष रूप से इस भाव से पूजा करते हैं कि जीवन में जो भी मानसिक तनाव, उलझन या बार बार आने वाली अड़चनें हैं, वे गणेश जी की कृपा से हल हों और भीतर स्थिरता तथा निर्णय क्षमता मजबूत हो।
संकष्टि चतुर्थी प्रत्येक मास की पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कहा जाता है। यह दिन
के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। वर्ष भर की संकष्टि तिथियों में कुछ तिथियाँ विशेष नामों से जानी जाती हैं, जिनमें भालचंद्र संकष्टि भी एक प्रमुख तिथि है।
भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी व्रत का मूल भाव संयम, श्रद्धा और चंद्र दर्शन के साथ व्रत पूर्ण करना है।
| चरण | क्या करें |
|---|---|
| चरण 1 | प्रातः काल स्नान कर स्वच्छ, हल्के और साधारण वस्त्र धारण करें |
| चरण 2 | व्रत का संकल्प लें, दिन भर उपवास या फलाहार का निश्चय करें |
| चरण 3 | गणेश जी की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें |
| चरण 4 | दिन भर यथाशक्ति मौन, जप, पाठ और मनन में समय बिताएँ |
| चरण 5 | संध्या के समय भालचंद्र गणेश की विशेष पूजा और आराधना करें |
| चरण 6 | चंद्र उदय के बाद चंद्र दर्शन कर चंद्र पूजा और मंत्र जप करें |
| चरण 7 | चंद्र और गणेश जी को नैवेद्य अर्पित करने के बाद व्रत खोलें |
शाम के समय संकष्टि चतुर्थी की पूजा में सामान्यतः यह सामग्री रखी जाती है।
भालचंद्र स्वरूप की कल्पना करते हुए ललाट पर चंद्रमा युक्त श्री गणेश का ध्यान किया जाता है और मन ही मन यह भाव रखा जाता है कि चंद्रमा की शीतलता की तरह ही मन भी शांत, संतुलित और निर्मल बना रहे।
यदि साधक चाहे तो सरल गणेश मंत्रों का जप कर सकता है, जैसे
जप की संख्या व्यक्ति की शक्ति और समय के अनुसार रखी जा सकती है।
संकष्टि चतुर्थी व्रत का सबसे महत्वपूर्ण चरण चंद्र दर्शन माना जाता है। इस दिन
चूंकि भालचंद्र स्वरूप स्वयं चंद्रमा से जुड़े हैं, इसलिए इस विशेष संकष्टि पर चंद्र पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है।
भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी का प्रमुख फल मन और भावनाओं की शांति से जुड़ा माना जाता है। जो साधक
का अनुभव करते हैं, उनके लिए यह व्रत मन को एक स्थिर आधार दे सकता है। गणेश जी की कृपा से व्यक्ति को
में सहारा मिल सकता है।
संकष्टि चतुर्थी पर संकट, विघ्न और बाधाओं के शमन की कामना की जाती है। भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी पर
इन सबको गणेश जी के चरणों में रखकर सहायता माँगी जाती है। श्रद्धा के साथ रखा गया व्रत
देने वाला माना जाता है।
चंद्रमा मन, भावनाएँ, स्नायविक संतुलन और स्मृति से जुड़ा माना जाता है। जिनको
जैसी स्थितियाँ बार बार महसूस हों, उनके लिए भालचंद्र गणेश की पूजा विशेष रूप से सहायक समझी जाती है। श्रद्धा और संयम के साथ किया गया व्रत चंद्र से जुड़े अशांत प्रभाव को कुछ हद तक शांत कर, साधक को भीतर से मजबूत बना सकता है।
भक्तों का विश्वास है कि भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी 2026 को नियमपूर्वक और भावपूर्वक मनाने से कई प्रकार के लाभ प्राप्त हो सकते हैं।
जब व्रत केवल इच्छापूर्ति के लिए नहीं बल्कि स्वयं को सुधारने और भीतर से संतुलित करने के भाव से रखा जाता है तब भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी जैसे व्रत साधक के जीवन पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ सकते हैं।
भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी 2026 कब है और चतुर्थी तिथि कब से कब तक रहेगी
भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी 2026 बुधवार, 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। चतुर्थी तिथि 4 मार्च 2026 को प्रातः 06:04 पर प्रारंभ होकर 5 मार्च 2026 को प्रातः 04:18 पर समाप्त होगी, इसलिए व्रत और पूजा का मुख्य दिन 4 मार्च रहेगा।
संकष्टि चतुर्थी पर व्रत कैसे रखा जाता है और व्रत कब तोड़ा जाता है
साधक सूर्योदय से लेकर चंद्र दर्शन तक उपवास या फलाहार का संकल्प लेते हैं। दिन भर गणेश मंत्र जप, ध्यान और पूजा में समय देते हैं। रात में लगभग 09:24 पर चंद्र उदय के बाद चंद्र पूजा की जाती है, फिर गणेश जी की आरती और नैवेद्य के बाद व्रत खोलते हैं।
भालचंद्र स्वरूप में गणेश जी की आराधना किस उद्देश्य से की जाती है
भालचंद्र गणेश के मस्तक पर चंद्रमा की कल्पना की जाती है। इस आराधना का उद्देश्य मन को शांत, संतुलित और स्वच्छ बनाना, भावनात्मक तनाव को कम करना और निर्णय क्षमता को मजबूत करना होता है, ताकि जीवन की बाधाओं का सामना अधिक स्थिरता से किया जा सके।
क्या भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी केवल ग्रह दोष निवारण के लिए ही महत्वपूर्ण है
यह व्रत चंद्र संबंधी अशुभ प्रभाव और मानसिक असंतुलन की कमी के लिए सहायक माना जाता है, पर इसका महत्व केवल ग्रह दोष निवारण तक सीमित नहीं है। यह व्रत साधक को संयम, अनुशासन, भक्ति और आत्मचिंतन का अभ्यास कराकर समग्र जीवन को संतुलित करने का अवसर देता है।
भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी 2026 से साधक अपने जीवन में क्या परिवर्तन ला सकता है
यदि यह व्रत केवल एक तिथि के रूप में नहीं बल्कि मन की शांति, आदतों के सुधार और नियमित साधना का आरंभ माना जाए, तो साधक धीरे धीरे अपने विचारों, प्रतिक्रियाओं और निर्णयों में संतुलन ला सकता है। इस प्रकार भालचंद्र संकष्टि चतुर्थी 2026 उसके लिए जीवन में अंदरूनी मजबूती और सकारात्मक दृष्टि का एक महत्वपूर्ण चरण बन सकती है।
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