By पं. अभिषेक शर्मा
जानें 5 मार्च 2026 को भ्रातृ द्वितीया का महत्व, द्वितीया तिथि और पारंपरिक पूजा

भाई बहन के पवित्र प्रेम को समर्पित भ्रातृ द्वितीया 2026 केवल एक पारिवारिक उत्सव नहीं बल्कि सुरक्षा, विश्वास और आशीर्वाद का सूक्ष्म आध्यात्मिक संकेत भी देती है। वर्ष भर में कई पर्व ऐसे होते हैं जो रिश्तों को जोड़ते हैं, पर भ्रातृ द्वितीया उन खास तिथियों में से है जहाँ बहन का स्नेह और भाई की जिम्मेदारी दोनों एक साथ याद दिलाई जाती हैं।
ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार भ्रातृ द्वितीया 2026 बुधवार, 5 मार्च 2026 को पड़ेगी। हिंदू पंचांग के अनुसार यह दिन चेत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि के रूप में माना जाएगा। द्वितीया तिथि 4 मार्च 2026 को शाम 04 बजकर 48 मिनट पर प्रारंभ होकर 5 मार्च 2026 को शाम 05 बजकर 03 मिनट पर समाप्त होगी। इसी द्वितीया में होली भाई दूज या भ्रातृ द्वितीया मनाई जाएगी, जो होली के क्रम के तुरंत बाद आने वाला महत्वपूर्ण पर्व है।
भ्रातृ द्वितीया का पूरा आधार द्वितीया तिथि पर टिका होता है। यह तिथि होली के बाद आने वाली द्वितीया के रूप में मानी जाती है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व | भ्रातृ द्वितीया 2026 |
| अन्य प्रचलित नाम | भाई दूज, होली भाई दूज |
| दिन और तिथि | बुधवार, 5 मार्च 2026 |
| पंचांग अनुसार तिथि | चैत्र कृष्ण द्वितीया |
| द्वितीया तिथि प्रारम्भ | 4 मार्च 2026, शाम 04:48 |
| द्वितीया तिथि समाप्त | 5 मार्च 2026, शाम 05:03 |
| पर्व की तिथि का आधार | द्वितीया तिथि का 5 मार्च को विद्यमान होना |
क्योंकि द्वितीया तिथि 5 मार्च के दिन के अधिकतर भाग तक विद्यमान रहती है, इसलिए भाई दूज की पूजा, तिलक और आरती का विधान इसी दिन करना शुभ माना जाएगा।
इस पर्व का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है।
इस प्रकार भ्रातृ द्वितीया वह दिन है जब द्वितीया तिथि के योग में बहन अपने भाई के जीवन, सुरक्षा और मंगल के लिए विशेष पूजा और तिलक करती है। यह दिन प्रायः होली के बाद आने वाली द्वितीया पर मनाया जाता है, इसलिए इसे होली भाई दूज भी कहा जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में यह पर्व 5 मार्च 2026 को चेत्र कृष्ण द्वितीया के रूप में मनाया जाएगा, जो पंचांग में द्वितीय चैत्र 2079 के रूप में भी उल्लिखित है।
भाई दूज प्रायः दो संदर्भों में जाना जाता है।
यहाँ जिस भ्रातृ द्वितीया की चर्चा है, वह होली के बाद वाली द्वितीया है। होली का उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा से जुड़ा रहता है और उसके बाद पंचांग में जो द्वितीया तिथि आती है, उसी दिन भाई बहन के इस पावन मिलन को भ्रातृ द्वितीया के रूप में मनाया जाता है।
भ्रातृ द्वितीया के महत्व को समझने के लिए सबसे पहले यमराज और उनकी बहन यमुना की कथा याद की जाती है। माना जाता है कि
एक बार यमराज, जो मृत्यु और न्याय के देवता माने जाते हैं, अपनी बहन यमुना के घर गए। यमुना ने प्रसन्न मन से उनका स्वागत किया, स्नान कराया, उनके लिए स्वादिष्ट भोजन बनाया, उनके माथे पर तिलक लगाया और आरती उतारी।
बहन के इस स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने आशीर्वाद दिया कि
जो भी भाई इस दिन अपनी बहन के घर आए, बहन से तिलक और आरती प्राप्त करे, प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करे, वह भाई आयु, समृद्धि और निडरता का वरण करेगा और उसे मृत्यु का भय सरल हो जाएगा।
इसी कारण भ्रातृ द्वितीया को कई स्थानों पर यम द्वितीया भी कहा जाता है और इस दिन की पूजा को दीर्घायु, सुरक्षा और संकट निवारण से जोड़ा जाता है।
हिंदू परंपरा में तिलक केवल एक चिह्न नहीं बल्कि आशीर्वाद, रक्षा और शुभ संकल्प का प्रतीक है। भ्रातृ द्वितीया के दिन बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाते समय यह भाव रखती है कि
आरती का अर्थ भी केवल दीप घुमाना नहीं बल्कि भाई के चारों ओर प्रकाश का सुरक्षात्मक घेरा बनाना है, ताकि उसके जीवन से अंधकार और नकारात्मकता धीरे धीरे दूर होती जाए।
भ्रातृ द्वितीया मनाने की विधि सरल है, पर भाव अत्यंत गहरा होता है। सही भावना से थोड़ी सी तैयारी भी इस दिन को जीवन भर के लिए स्मरणीय बना सकती है।
| क्रम | क्या करें |
|---|---|
| पहला चरण | भाई का बहन के घर जाना या बहन का भाई के पास उपस्थित होना |
| दूसरा चरण | बहन का थाली तैयार करना, जिसमें पूजन सामग्री सजी हो |
| तीसरा चरण | दीप प्रज्वलित कर भाई की आरती उतारना |
| चौथा चरण | कुमकुम और अक्षत से भाई के मस्तक पर तिलक लगाना |
| पाँचवाँ चरण | भाई को मिठाई, फल, नारियल आदि अर्पित करना |
| छठा चरण | भाई का बहन को उपहार, वस्त्र या अन्य सौगात देना |
भ्रातृ द्वितीया 2026 के दिन बहन जब पूजा की थाली सजाए, तो उसमें सामान्यतः यह सामग्री रखी जाती है।
पहले थाली में दीपक जलाकर आरती उतारी जाती है, फिर भाई के माथे पर तिलक लगाया जाता है और उसके बाद मिठाई, फल तथा नारियल अर्पित किए जाते हैं।
परंपरा के अनुसार भ्रातृ द्वितीया पर
यह आदान प्रदान केवल वस्तु का नहीं बल्कि परस्पर सम्मान, जिम्मेदारी और वचनबद्धता का संकेत माना जाता है।
इस सुंदर पर्व से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं जो भाई बहन के रिश्ते को अलग अलग दृष्टि से उजागर करती हैं।
एक लोकप्रिय कथा के अनुसार
यमराज वर्ष में एक दिन अपनी बहन यमुना के घर अवश्य जाते हैं। जिस दिन वे पहुँचे, वह भी द्वितीया तिथि ही थी। यमुना ने स्नान, भोजन और तिलक के साथ उनका स्वागत किया।
आनंदित होकर यमराज ने कहा कि
जो भी भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर प्रेम से तिलक और भोजन ग्रहण करेगा, वह स्वास्थ्य, आयु और समृद्धि प्राप्त करेगा। इसी भाव से यह दिन यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाने लगा।
दूसरी कथा के अनुसार
जब भगवान कृष्ण ने नरकासुर नामक अत्याचारी असुर का वध किया तब वे अपनी बहन सुभद्रा से मिलने पहुँचे। उस दिन भी द्वितीया तिथि थी।
सुभद्रा ने श्रद्धा से कृष्ण का स्वागत किया, उनके माथे पर तिलक लगाया और आरती उतारी। यह संकेत था कि
बहन का तिलक भाई के लिए सुरक्षा और शुभभावना का प्रतीक है। धीरे धीरे इस कथा के माध्यम से भी भ्रातृ द्वितीया पर तिलक और आरती की परंपरा और मजबूत हो गई।
भ्रातृ द्वितीया से जुड़ी एक कथा जैन परंपरा में भी मिलती है।
कहा जाता है कि जब भगवान महावीर ने निर्ग्रह की स्थिति प्राप्त की, तो उनके भाई राजा नंदिवर्धन अत्यंत व्याकुल और दुःखी हुए। उस समय उनकी बहन सुदर्शन ने उन्हें सांत्वना दी, उनके दुख को शांत किया और उन्हें मानसिक सहारा दिया।
इस घटना के कारण भ्रातृ द्वितीया के दिन स्त्रियों और बहनों की करुणा, धैर्य और सहारा देने की क्षमता का विशेष सम्मान किया जाता है। इसलिए यह पर्व जैन परंपरा में भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
भ्रातृ द्वितीया 2026 केवल तिथि और पूजन का क्रम नहीं बल्कि संबंधों के संतुलन और कृतज्ञता की एक सुंदर सीख भी दे सकता है।
जो परिवार श्रद्धा और सरलता के साथ भ्रातृ द्वितीया 2026 मनाएँगे, उनके लिए यह तिथि आने वाले समय में कई बार स्नेह, सुरक्षा और विश्वास की याद दिलाती रहेगी।
भ्रातृ द्वितीया 2026 कब है और द्वितीया तिथि का समय क्या है
भ्रातृ द्वितीया 2026 बुधवार, 5 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। द्वितीया तिथि 4 मार्च 2026 को शाम 04:48 पर प्रारंभ होकर 5 मार्च 2026 को शाम 05:03 पर समाप्त होगी और इसी द्वितीया में भ्रातृ द्वितीया का त्योहार मनाया जाएगा।
भ्रातृ द्वितीया को भाई दूज और यम द्वितीया क्यों कहा जाता है
इस दिन बहन अपने भाई के लिए तिलक और आरती करती है, इसलिए इसे भाई दूज या भ्रातृ द्वितीया कहा जाता है। यमराज और यमुना की कथा के कारण यह दिन यम द्वितीया नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि उस दिन यमराज ने बहन के सत्कार पर भाई बहन को आशीर्वाद प्रदान किया था।
भ्रातृ द्वितीया 2026 कैसे मनाई जाए और पूजा में क्या किया जाता है
इस दिन भाई को बहन के घर जाना शुभ माना जाता है। बहन नारियल, बताशे, फल, पान, रोली, कुमकुम, चावल और दीपक से सजी थाली तैयार करती है, दीपक जलाकर भाई की आरती उतारती है, कुमकुम और अक्षत से तिलक लगाती है और मिठाई तथा फल अर्पित करती है। इसके बदले भाई बहन को उपहार देकर अपने स्नेह और कृतज्ञता को प्रकट करता है।
भ्रातृ द्वितीया से जुड़ी कौन सी प्रमुख कथाएँ प्रसिद्ध हैं
भ्रातृ द्वितीया से संबंधित प्रमुख कथाओं में यमराज और यमुना की कथा, कृष्ण और सुभद्रा की कथा और भगवान महावीर के भाई नंदिवर्धन तथा बहन सुदर्शन की कथा विशेष रूप से याद की जाती हैं। इन सभी में बहन का स्नेह और भाई के लिए सुरक्षात्मक भावना मुख्य केंद्र में रहती है।
भ्रातृ द्वितीया 2026 से व्यक्ति अपने जीवन में क्या सीख ले सकता है
यह दिन सिखाता है कि रिश्तों में कृतज्ञता, संवाद और परस्पर सुरक्षा की भावना को समय देकर मजबूत बनाना बहुत आवश्यक है। यदि भाई बहन और परिवार इस दिन कुछ समय शांत बैठकर एक दूसरे की सराहना करें और शुभकामनाएँ व्यक्त करें, तो भ्रातृ द्वितीया जीवनभर के लिए संबंधों में एक स्थिर और उज्ज्वल ऊर्जा भर सकती है।
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