By अपर्णा पाटनी
चतुर्थी श्राद्ध का महत्व, तिथि और पिंडदान विधि

चतुर्थी श्राद्ध पितृपक्ष का वह दिन है जो उन पितरों के लिए समर्पित माना जाता है जिनका देहांत चतुर्थी तिथि को हुआ हो। इस दिन श्रद्धापूर्वक श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण करने से मान्यता है कि पितृगण प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बरसाते हैं। पितृपक्ष के अन्य दिनों की तरह चतुर्थी श्राद्ध भी पूरे घर के लिए एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव बन सकता है यदि इसे विधि और भाव दोनों के साथ किया जाए।
वर्ष 2026 में चतुर्थी श्राद्ध बुधवार, 30 सितम्बर 2026 को पड़ेगा। यह पितृपक्ष का चौथा दिन रहेगा और इस दिन भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि मान्य होगी। चतुर्थी तिथि का आरंभ 29 सितम्बर 2026 को सायं 05:09 बजे से होगा और यह तिथि 30 सितम्बर 2026 को दोपहर 02:55 बजे तक रहेगी। श्राद्ध के लिए मुख्यतः दिन का दोपहर वाला भाग श्रेष्ठ माना जाता है। उसी के अनुसार कुतुप मुहूर्त लगभग 11:02 AM से 11:50 AM, रौहिण मुहूर्त 11:50 AM से 12:38 PM और अपराह्न काल 12:38 PM से 03:02 PM तक रहेगा। इन मुहूर्तों के भीतर श्राद्धकर्म सम्पन्न करना शास्त्रानुसार अत्यंत शुभ माना गया है।
चतुर्थी श्राद्ध से जुड़ी सभी मुख्य जानकारियां एक तालिका में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| चतुर्थी श्राद्ध दिवस | बुधवार, 30 सितम्बर 2026 |
| संबंधित चंद्र तिथि | भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी |
| तिथि प्रारम्भ | 29 सितम्बर 2026, सायं 05:09 |
| तिथि समाप्त | 30 सितम्बर 2026, दोपहर 02:55 |
| कुतुप मुहूर्त | लगभग 11:02 AM से 11:50 AM |
| रौहिण मुहूर्त | लगभग 11:50 AM से 12:38 PM |
| अपराह्न काल | लगभग 12:38 PM से 03:02 PM |
अपराह्न काल के समाप्त होने से पहले चतुर्थी श्राद्ध के सभी प्रमुख अनुष्ठान, जैसे संकल्प, पिण्डदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन पूरा कर लेना उचित माना जाता है। सूर्यास्त के बाद श्राद्धकर्म न करने की परंपरा इसलिए है क्योंकि पितृकर्म का सूक्ष्म फल सूर्य की मध्याह्न और अपराह्न स्थिति से जुड़ा माना गया है।
चतुर्थी श्राद्ध पितृपक्ष के चौथे दिन की चतुर्थी तिथि पर किया जाने वाला वह विशेष श्राद्ध है जो उन पितरों के निमित्त होता है जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि को हुई हो। यह तिथि चाहे शुक्ल पक्ष की रही हो या कृष्ण पक्ष की, पितृपक्ष की चतुर्थी पर उनका श्राद्ध करना ही सर्वोत्तम माना गया है।
इसे चौथ श्राद्ध नाम से भी जाना जाता है। लोक परंपरा में चौथ शब्द चतुर्थी तिथि का सहज रूप है। धर्मशास्त्रों की दृष्टि से प्रत्येक तिथि की अपनी एक विशेष शक्ति और स्वभाव होता है। जिस तिथि को किसी पितर ने देह त्याग किया हो, उसी तिथि पर किया गया श्राद्ध उसके लिए सबसे अधिक फलदायक रहता है, इसलिए चतुर्थी तिथि के पितरों के लिए चतुर्थी श्राद्ध अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
यदि किसी पितर की मृत्यु तिथि स्पष्ट रूप से ज्ञात हो तो उसी तिथि के श्राद्ध को प्रमुखता देना चाहिए। यदि किसी कारणवश वास्तविक तिथि का ज्ञान न हो तब सर्वपितृ अमावस्या के दिन समस्त पितरों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है, पर जहां तिथि ज्ञात हो वहां चतुर्थी जैसे तिथि विशेष श्राद्ध का अपना अलग ही महत्व है।
चतुर्थी श्राद्ध मुख्यतः दो प्रकार के पितरों के लिए विशेष रूप से अनुशंसित माना जाता है।
इनके अतिरिक्त, कुछ परिवारों में जहां किसी पितर की मृत्यु तिथि तो ज्ञात है, पर किसी वर्ष किसी कारणवश श्राद्ध छूट गया हो, वहां उस वर्ष के छूटे हुए श्राद्ध की भरपाई के लिए भी तिथि विशेष पर विशेष संकल्प लेकर श्राद्ध किया जाता है। ऐसी स्थिति में चतुर्थी श्राद्ध का फल केवल एक वर्ष के लिए नहीं बल्कि पूरे वंश के लिए शांति और स्थिरता का माध्यम बन जाता है।
धर्मग्रंथों के अनुसार चतुर्थी तिथि पर श्राद्ध करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। मनुस्मृति, यमस्मृति, गृह्यसूत्र और निर्णयसिन्धु जैसे ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि तिथि के अनुसार किया गया श्राद्ध कुल में सुख, शांति, समृद्धि और सन्तान वृद्धि के लिए विशेष रूप से शुभ होता है।
चतुर्थी श्राद्ध के संदर्भ में यह भी कहा गया है कि इससे गृह कल्याण, आरोग्य और दीर्घायु के योग सुदृढ़ होते हैं। जो परिवार नियमित रूप से तिथि विशेष श्राद्ध करते हैं, उनके घर में वंशवृद्धि का आशीर्वाद स्थिर बना रहता है और पितृदोष के प्रभाव स्वतः धीरे धीरे कम हो जाते हैं। चतुर्थी श्राद्ध के माध्यम से पितरों के प्रति कृतज्ञता और स्मरण का भाव प्रकट करने से वंशजों के जीवन में मानसिक संतुलन और आंतरिक मजबूती भी बढ़ती है।
पितृपक्ष के श्राद्धों को सामान्यतः पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। पार्वण श्राद्ध में तिथि विशेष के अनुसार पितरों के लिए तर्पण और पिण्डदान किया जाता है और दिन के मध्य भाग को विशेष महत्व दिया जाता है।
पार्वण श्राद्ध के दौरान
अन्य समय, जैसे प्रातः बहुत जल्दी या सूर्यास्त के बाद, पितृकर्म के लिए अनुकूल नहीं माने जाते। इसलिए चतुर्थी श्राद्ध के दिन पूरे कार्यक्रम को इस प्रकार रखना चाहिए कि प्रमुख विधियां दोपहर के इन मुहूर्तों के भीतर ही पूर्ण हो जाएं।
चतुर्थी श्राद्ध की विधि सामान्य श्राद्ध के क्रम पर आधारित होती है पर संकल्प में चतुर्थी तिथि के पितरों का विशेष उल्लेख किया जाता है।
दिन की शुरुआत प्रातःकाल में स्नान से की जाती है। जहां सुविधा हो वहां तीर्थ या नदी में स्नान किया जा सकता है, अन्यथा घर पर ही स्वच्छ जल में स्नान करते समय थोड़ी मात्रा में गंगाजल मिलाना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ, सादे और हल्के रंग के वस्त्र धारण किए जाते हैं।
घर या जिस स्थान पर श्राद्ध होना हो, वहां की सफाई कर ली जाती है। रसोई में उस दिन केवल सात्विक भोजन बनाने का संकल्प किया जाता है। इससे पूरा घर एक शांत और पवित्र वातावरण में आ जाता है।
श्राद्ध के आरंभ में संकल्प लिया जाता है। इसमें श्राद्धकर्ता अपना नाम, गोत्र, निवास स्थान और तिथि का उल्लेख करते हुए यह निश्चय करता है कि आज चतुर्थी तिथि पर फलां पितरों के लिए श्राद्ध किया जा रहा है।
संकल्प के बाद पितृ आसन पर कुशा या आसन बिछाकर पितृगण का आवाहन किया जाता है कि वे आज के पिण्ड, तर्पण और अन्नदान को सूक्ष्म रूप से स्वीकार करें।
श्राद्ध के मध्य भाग में तर्पण किया जाता है। तर्पण के जल में काले तिल, जौ और कुशा का प्रयोग सामान्यतः किया जाता है।
तर्पण के समय मन में यह भावना रखनी चाहिए कि यह जल केवल भौतिक अर्पण नहीं बल्कि कृतज्ञता और स्मरण की तरंग बनकर पितृलोक तक पहुंच रहा है।
पिण्डदान श्राद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी है। चावल, तिल, घी और शहद से गोलाकार पिण्ड बनाए जाते हैं।
चतुर्थी श्राद्ध के पिण्डदान का परिणाम केवल उस दिन तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे वर्ष परिवार के सूक्ष्म वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
श्राद्ध के पूर्ण होने पर ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। ब्राह्मण को आदरपूर्वक आसन देकर भोजन कराया जाता है। भोजन में चावल, दाल, सब्जी, रोटी या पूरी और किसी मीठे व्यंजन जैसे खीर या हलवा का समावेश सामान्यतः किया जाता है।
भोजन के बाद ब्राह्मण को दक्षिणा और यथाशक्ति वस्त्र या उपयोगी सामग्री दान दी जाती है। श्राद्ध के अंतिम चरण में फिर से तर्पण कर देव, ऋषि और पितृ इन तीनों के लिए जल अर्पित किया जाता है। इसी के साथ चतुर्थी श्राद्ध की मुख्य विधि पूर्ण मानी जाती है।
धर्मग्रंथों में यह संकेत मिलता है कि तिथि विशेष पर किया गया श्राद्ध विशेष प्रकार के पितृदोषों को शांत करने में सहायक होता है। चतुर्थी श्राद्ध को विशेष रूप से सन्तान प्राप्ति, गृह कल्याण, आरोग्य और दीर्घायु के लिए शुभ माना गया है।
जो परिवार पितृपक्ष के दिनों में अपनी अपनी तिथि के अनुसार श्राद्ध करते हैं, वहां कई बार अनजानी बाधाएं, जैसे बार बार बीमारी या घर में अस्थिरता, धीरे धीरे कम होने लगती हैं। यह किसी चमत्कार की तरह अचानक नहीं बल्कि एक स्थिर और गहरी शांति के रूप में दिखाई देता है। चतुर्थी श्राद्ध इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है, विशेषकर जब इसे हर वर्ष नियमित रूप से निभाया जाए।
चतुर्थी श्राद्ध 2026 किस दिन और किस समय किया जाएगा?
वर्ष 2026 में चतुर्थी श्राद्ध बुधवार, 30 सितम्बर 2026 को भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि पर किया जाएगा। श्राद्ध के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल विशेष रूप से शुभ माने गए हैं।
चतुर्थी श्राद्ध किन पितरों के लिए अनिवार्य माना जाता है?
यह श्राद्ध उन पितरों के लिए विशेष रूप से किया जाता है जिनका देहावसान चतुर्थी तिथि को हुआ हो, चाहे वह शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष, तथा उन पितरों के लिए भी जिनके लिए चौथ श्राद्ध परिवार की परंपरा का हिस्सा रहा हो।
यदि पितर की सही मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो क्या चतुर्थी श्राद्ध किया जा सकता है?
यदि तिथि का ज्ञान बिल्कुल न हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन समस्त पितरों के लिए श्राद्ध करना उचित है। जहां अनुमान हो या परंपरागत जानकारी से चतुर्थी तिथि का संकेत मिले, वहां चतुर्थी श्राद्ध भी अलग से किया जा सकता है।
चतुर्थी श्राद्ध के दिन कौन सा समय टालना चाहिए?
सूर्यास्त के बाद और रात्रि के समय श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। पितृकर्म के लिए दोपहर का कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल ही मान्य और फलदायी माने जाते हैं।
क्या चतुर्थी श्राद्ध घर पर किया जा सकता है या तीर्थ पर ही आवश्यक है?
चतुर्थी श्राद्ध घर पर भी विधिपूर्वक पूरा किया जा सकता है। जहां तीर्थ यात्रा संभव हो वहां तीर्थ पर किया गया श्राद्ध अधिक फलदायी माना जाता है, पर घर पर श्रद्धा और शुद्धि के साथ किया गया श्राद्ध भी पितरों तक अवश्य पहुंचता है।
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