दशमी श्राद्ध 2026: तिथि, महत्व और श्राद्ध विधि

By पं. सुव्रत शर्मा

पितृपक्ष के अंतिम चरण दशमी श्राद्ध का महत्व और विधियां

दशमी श्राद्ध 2026 तिथि, महत्व और विधि

पितृपक्ष के अंतिम चरण में प्रवेश करते हुए दशमी श्राद्ध एक ऐसे दिन के रूप में सामने आता है, जिसमें स्मरण, पूर्णता और पितरों के प्रति उत्तरदायित्व एक साथ अनुभव किए जाते हैं। वर्ष 2026 में दशमी श्राद्ध सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा। इस दिन श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त लगभग 11:36 ए एम से 12:24 पी एम, रौहिण मुहूर्त लगभग 12:24 पी एम से 1:12 पी एम और अपराह्न काल लगभग 1:12 पी एम से 3:36 पी एम तक विशेष रूप से शुभ माना गया है। यही वह समय है जब तर्पण, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन जैसे अनुष्ठान अधिक फलदायक माने जाते हैं।

दशमी श्राद्ध क्या है

दशमी श्राद्ध पितृपक्ष के सोलह पार्वण श्राद्धों में से एक महत्वपूर्ण तिथि आधारित श्राद्ध है। यह उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका देहावसान किसी भी मास और किसी भी वर्ष की दशमी तिथि पर हुआ हो, चाहे वह शुक्ल पक्ष की दशमी रही हो या कृष्ण पक्ष की। इस दिन पितरों के लिए विधिपूर्वक तर्पण, पिण्ड अर्पण और श्रद्धासहित भोजन दान किया जाता है।

कुछ परम्पराओं में इसे दसमी श्राद्ध भी कहा जाता है। संस्कृत का दशम शब्द केवल संख्या का संकेत नहीं देता बल्कि एक ऐसे चरण की ओर भी संकेत करता है जहाँ कोई क्रम अपने परिपक्व बिन्दु की ओर बढ़ रहा होता है। इसी कारण दशमी श्राद्ध को पितृपक्ष के भीतर एक विशेष मोड़ की तिथि माना जाता है।

दशमी तिथि का आध्यात्मिक संकेत क्या है

दशमी संख्या दस भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन में पूर्णता का बोध कराती है। यही संख्या दशावतार, दश दिशाओं और जीवन की सम्पूर्णता की सूचक मानी जाती है। पितृकर्म के सन्दर्भ में यह तिथि उस भाव को पुष्ट करती है कि जो अर्पण श्रद्धा से किया जाए, वह अपने लक्ष्य तक सम्यक रूप से पहुँचे।

पितृपक्ष के अंतिम दिनों की ओर बढ़ते हुए दशमी श्राद्ध का महत्व और अधिक गहरा हो जाता है। इस समय तक परिवार पहले से कई श्राद्ध तिथियों का क्रम देख चुका होता है, इसलिए दशमी एक ऐसे बिन्दु की तरह अनुभव होती है जहाँ स्मरण का भाव अधिक गंभीर और अधिक आत्मिक हो जाता है।

दशमी श्राद्ध 2026 की तिथि और मुहूर्त

वर्ष 2026 में पितृपक्ष 26 सितम्बर 2026 से आरम्भ होकर 10 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। इसी क्रम में दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर 2026, सोमवार को पड़ेगा। यह दिन मातृ नवमी के बाद और एकादशी श्राद्ध से पहले आता है, इसलिए पितृपक्ष के अंतिम और अधिक प्रभावशाली दिनों में इसकी गणना होती है।

नीचे समय को सरल रूप में देखा जा सकता है:

अनुष्ठान कालसमय
कुतुप मुहूर्तलगभग 11:36 ए एम से 12:24 पी एम
रौहिण मुहूर्तलगभग 12:24 पी एम से 1:12 पी एम
अपराह्न काललगभग 1:12 पी एम से 3:36 पी एम

सोमवार का सम्बन्ध चन्द्र और भगवान शिव दोनों से माना जाता है। वैदिक परम्परा में चन्द्रलोक को पितरों के सूक्ष्म निवास से भी जोड़ा गया है। इसलिए सोमवार को आने वाला दशमी श्राद्ध पितृ शांति और पितृ तृप्ति के लिए विशेष प्रभावशाली माना गया है।

किन लोगों को दशमी श्राद्ध करना चाहिए

दशमी श्राद्ध का प्रथम अधिकार उन परिवारों का है जिनके पितृकुल या मातृकुल के किसी प्रत्यक्ष पूर्वज का निधन दशमी तिथि पर हुआ हो। यही इसका मूल नियम है। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात है और वह दशमी है, तो पितृपक्ष की दशमी को श्राद्ध करना शास्त्रसम्मत माना जाता है।

इसके अतिरिक्त धर्मशास्त्रीय परम्परा कुछ अन्य श्रेणियों का भी उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए ऐसे पितर जो विष्णु या राम भक्ति से जुड़े रहे हों, ऐसे परिवार जिनके प्रियजन का निधन विजयादशमी के आसपास हुआ हो, ऐसे पुराने कुल सदस्य जिनकी मृत्यु तिथि अब निश्चित रूप से याद न हो, या वे कुल जिनका सम्बन्ध क्षत्रिय परम्परा से रहा हो, उनके लिए भी दशमी श्राद्ध एक गहरे भाव वाला दिन माना गया है।

दशमी का स्वभाव पूर्णता से जुड़ा होने के कारण यह उन परिवारों के लिए भी उपयोगी माना गया है जो कई भूले हुए या अनिश्चित पितरों के लिए एक व्यापक भावना के साथ श्राद्ध करना चाहते हैं।

दशमी श्राद्ध की विधि कैसे की जाती है

दशमी श्राद्ध की विधि पार्वण श्राद्ध की मान्य परम्परा का पालन करती है। इसमें शुद्धता, संकल्प और क्रमबद्ध अनुष्ठान का विशेष महत्व है।

प्रातः स्नान और आरम्भिक पूजा

श्राद्ध का दिन सूर्योदय से पहले की शुद्धि से आरम्भ होता है। यदि तीर्थ स्थल पर अनुष्ठान हो रहा हो, तो प्रातःकाल का स्नान विशेष फलदायक माना जाता है। प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर स्नान को शरीर और मन दोनों की पवित्रता से जोड़ा जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ सफेद वस्त्र या बिना सिले वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके पश्चात कुल देवता या गृह देवता की संक्षिप्त पूजा करके श्राद्ध की तैयारी की जाती है।

संकल्प

श्राद्ध का वास्तविक आरम्भ संकल्प से होता है। संकल्प में कर्ता अपना नाम, पिता का नाम, गोत्र, वर्तमान काल विवरण और जिन पितरों के लिए श्राद्ध किया जा रहा है, उनका स्मरण करता है। संकल्प ही सामान्य धार्मिक कर्म को विशिष्ट पितरों तक पहुँचाने वाला आध्यात्मिक माध्यम बनाता है।

तर्पण

तर्पण दशमी श्राद्ध का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इसमें जल, काला तिल, जौ और कुश का प्रयोग किया जाता है। दाहिने हाथ की अंजलि से धीरे धीरे जल अर्पित करते हुए पितरों के नाम लिए जाते हैं। सामान्यतः इसमें तीन पीढ़ियों के पितरों का क्रम आता है, पर दशमी श्राद्ध में दशमी तिथि पर दिवंगत पितृ को विशेष रूप से अग्रस्थान दिया जाता है।

पिण्डदान

तर्पण के पश्चात पिण्ड तैयार किए जाते हैं। ये सामान्यतः पके हुए चावल, तिल, घी, शहद और कभी कभी जौ के आटे के मिश्रण से बनाए जाते हैं। प्रत्येक पिण्ड को सावधानी से बनाकर सम्बद्ध पितृ के नाम से अर्पित किया जाता है। पिण्डदान का गहरा अर्थ यह माना गया है कि यह पितृ आत्मा के लिए पोषण का प्रतीकात्मक शरीर प्रदान करता है, जिसके माध्यम से वह अर्पण की सूक्ष्म शक्ति को ग्रहण कर सके।

प्रयागराज जैसे पवित्र स्थल पर, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम माना जाता है, पिण्डदान का भाव और भी अधिक गहन हो जाता है।

ब्राह्मण भोजन

दशमी श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन को अनिवार्य अंगों में गिना गया है। सात्त्विक भोजन में प्याज, लहसुन और मांसाहार का स्थान नहीं होता। भोजन पूरी श्रद्धा, नम्रता और सेवा भाव से कराया जाता है। परम्परा यह मानती है कि ब्राह्मण इस अनुष्ठान में पितरों के जीवित प्रतिनिधि के रूप में सम्मानित होते हैं।

भोजन के बाद दक्षिणा और यथाशक्ति वस्त्र अर्पित करना भी श्रेयस्कर माना जाता है।

काक बलि, गो ग्रास और अंतिम अर्पण

श्राद्ध के अंत में कौए के लिए अन्न, गाय के लिए आहार और भूमि पर चींटियों के लिए थोड़ा अन्न अर्पित किया जाता है। इसे केवल परम्परा का विस्तार नहीं बल्कि पितृ अर्पण की व्यापकता का प्रतीक माना गया है।

शास्त्रों में दशमी श्राद्ध का महत्व

गरुड़ पुराण में तिथि आधारित श्राद्ध का विस्तार से वर्णन मिलता है और दशमी को पार्वण श्राद्ध की मान्य तिथियों में गिना गया है। इसमें यह भाव स्पष्ट मिलता है कि जिस तिथि पर पितृ का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर पितृपक्ष में किया गया श्राद्ध सबसे स्पष्ट और सबसे पूर्ण रूप में उन तक पहुँचता है।

विष्णु पुराण की परम्परा दशमी तिथि को विष्णु के दशावतार से जोड़ती है। इस कारण दशमी श्राद्ध विशेष रूप से उन परिवारों के लिए अधिक अर्थपूर्ण माना गया है जिनकी आस्था वैष्णव परम्परा से जुड़ी रही हो। ऐसी मान्यता है कि इस दिन किया गया श्राद्ध विष्णु कृपा से और अधिक कल्याणकारी बनता है।

मत्स्य पुराण में यह भाव मिलता है कि यदि दशमी श्राद्ध किसी पवित्र तीर्थ में किया जाए, तो उसका फल केवल एक पितृ तक सीमित नहीं रहता बल्कि उन अन्य पूर्वजों तक भी पहुँच सकता है जो पूर्व वर्षों में पर्याप्त रूप से स्मरण न किए गए हों। यही कारण है कि दशमी तिथि को पूर्णता का दिन कहा जाता है।

दशमी श्राद्ध के दिन क्या करें

दशमी श्राद्ध का दिन संयम और श्रद्धा के साथ बिताना चाहिए। कुछ कार्य विशेष रूप से उपयोगी माने गए हैं:

क्या करेंक्यों करें
**विष्णु सहस्रनाम** या वैष्णव स्तोत्र का पाठ करेंदशमी तिथि का विष्णु सम्बन्ध इस साधना को बल देता है
काले तिल का भरपूर प्रयोग करेंश्राद्ध में इसे अत्यंत आवश्यक माना गया है
तुलसी पत्र अर्पित करेंतुलसी विष्णु प्रिय मानी जाती है
दस दीपक जलाएंदशमी की संख्या पूर्णता और प्रकाश का संकेत देती है
दस लोगों को अन्न दान देंदशमी में दान का पुण्य और अधिक प्रभावशाली माना गया है
विष्णु मंदिर के दर्शन करेंतिथि के वैष्णव भाव को सम्मान मिलता है

दशमी श्राद्ध के दिन क्या न करें

जैसे कुछ आचरण करने योग्य हैं, वैसे ही कुछ बातों से बचना भी आवश्यक माना गया है।

क्या न करेंक्यों न करें
मांस, मछली, अंडा, प्याज, लहसुन या तामसिक भोजन न लेंश्राद्ध में सात्त्विकता आवश्यक मानी गई है
नए कार्य, अनुबन्ध या बड़े आर्थिक निर्णय न लेंपितृपक्ष स्मरण और संयम का काल है
ब्राह्मण भोजन को न छोड़ेंयह श्राद्ध की पूर्णता का मुख्य भाग है
रात्रि में श्राद्ध न करेंअनुष्ठान अपराह्न काल तक ही उचित माना गया है
लोहे के पात्र का प्रयोग न करेंताम्र, पीतल या रजत अधिक उपयुक्त माने जाते हैं
अनुष्ठान के बीच आलस्य न करेंपूरे समय सजगता और श्रद्धा आवश्यक है

दशमी श्राद्ध जीवन को क्या सिखाता है

दशमी श्राद्ध यह स्मरण कराता है कि परिवार केवल जीवित व्यक्तियों का समूह नहीं है। उसमें वे सभी भी सम्मिलित हैं जिन्होंने कभी इस वंश को संस्कार, संरक्षण और पहचान दी। जब परिवार किसी दशमी दिवंगत पितृ का नाम लेकर तर्पण करता है, तो वह केवल अनुष्ठान नहीं कर रहा होता, वह अपने ही इतिहास के प्रति विनम्रता व्यक्त कर रहा होता है।

यह तिथि विशेष रूप से यह भी सिखाती है कि स्मरण अधूरा न रहे, कर्तव्य टलता न रहे और आशीर्वाद को ग्रहण करने की पात्रता बनी रहे। इसलिए दशमी श्राद्ध केवल पितरों के लिए नहीं, जीवित वंशजों के अंतर्मन के लिए भी एक शुद्धिकारी अवसर है।

FAQs

दशमी श्राद्ध 2026 कब है
दशमी श्राद्ध वर्ष 2026 में सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा।

दशमी श्राद्ध किन पितरों के लिए किया जाता है
यह उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका निधन किसी भी मास की दशमी तिथि पर हुआ हो।

क्या दशमी श्राद्ध अनिश्चित मृत्यु तिथि वाले पितरों के लिए भी किया जा सकता है
हाँ, दशमी की पूर्णता से जुड़ी प्रकृति के कारण कुछ परिवार व्यापक भावना के साथ ऐसे पितरों के लिए भी श्राद्ध करते हैं, यद्यपि सर्वपितृ अमावस्या का प्रावधान भी उपलब्ध रहता है।

दशमी श्राद्ध में कौन कौन से मुख्य अनुष्ठान होते हैं
प्रातः स्नान, संकल्प, तर्पण, पिण्डदान, ब्राह्मण भोजन और काक बलि जैसे अर्पण इसके मुख्य अंग हैं।

दशमी श्राद्ध में सोमवार का क्या महत्व है
सोमवार चन्द्र और शिव से सम्बद्ध माना जाता है, इसलिए इस दिन किया गया दशमी श्राद्ध पितृ शांति के लिए विशेष प्रभावशाली माना जाता है।

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पं. सुव्रत शर्मा

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