By पं. अभिषेक शर्मा
देवशयनी एकादशी का महत्व और चतुर्मास आरंभ

बरसात के आगमन के साथ ही भारत में व्रत और त्योहारों का एक लंबा शुभ क्रम शुरू हो जाता है। आषाढ़ और श्रावण के महीनों से ही यह पवित्र यात्रा प्रबल हो जाती है, जिसमें श्रद्धा, संयम और भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। इन्हीं में से देवशयनी एकादशी 2026 को चातुर्मास का प्रथम पड़ाव माना जाता है, जो आने वाले चार महीनों के पूरे आध्यात्मिक वातावरण की दिशा तय करती है।
इस वर्ष देवशयनी एकादशी 2026 शनिवार, 25 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी। यह व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है और ज्यादातर हर वर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा के आसपास के समय में पड़ता है। देवशयनी एकादशी 2026 के तिथि समय को समझना व्रत, पूजा और चातुर्मास के नियमों के लिए बहुत उपयोगी होता है।
देवशयनी एकादशी की तिथि चंद्र पंचांग के अनुसार तय होती है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि ही देवशयनी एकादशी कहलाती है।
| देवशयनी एकादशी 2026 विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| व्रत तथा पर्व तिथि | शनिवार, 25 जुलाई 2026 |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 24 जुलाई 2026, प्रातः 09 बजकर 25 मिनट |
| एकादशी तिथि समाप्त | 25 जुलाई 2026, प्रातः 11 बजकर 40 मिनट |
एकादशी तिथि 25 जुलाई की पूर्वाह्न तक विद्यमान रहने के कारण देवशयनी एकादशी का मुख्य व्रत और पूजा उसी दिन मनाई जाएगी। व्रत का संकल्प एकादशी उदयकाल के आधार पर लिया जाता है, जबकि व्रत की तैयारी दशमी से शुरू मानी जाती है।
देवशयनी एकादशी आषाढ़ पूर्णिमा के लगभग दस दिन बाद आने वाली आषाढ़ शुक्ल एकादशी होती है। इस एकादशी को आषाढ़ी एकादशी और पद्मा एकादशी भी कहा जाता है।
मान्यता है कि इसी तिथि से चातुर्मास का आरंभ होता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेष शैय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। अगले चार महीने तक वे इसी विश्रामावस्था में रहते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल एकादशी, जिसे देवउठनी एकादशी या देवोत्थान ग्यारस कहा जाता है, पर जागृत होते हैं।
देवशयनी से देवउठनी तक के इन चार महीनों में विवाह, बड़े शुभ संस्कार और उत्सव प्रायः टाल दिए जाते हैं, जबकि भक्ति, जप, तप और सेवा को विशेष महत्व दिया जाता है।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, चातुर्मास देवशयनी एकादशी से ही प्रारंभ होता है। इन चार महीनों में सोलह संस्कारों और बड़े शुभ कार्यों पर विराम रखने की परंपरा है।
फिर भी शास्त्र बताते हैं कि इस अवधि में पूजा, साधना, जप, घर में प्रवेश के बाद सरल पूजन, वाहन या आभूषण क्रय जैसे कार्य किए जा सकते हैं, पर भोग विलास, प्रदर्शन और अत्यधिक उत्सव से बचना श्रेष्ठ माना गया है।
पद्म पुराण के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत जानबूझकर या अनजाने में किए गए पापों के नाश में अत्यंत प्रभावी माना गया है। उचित विधि से की गई पूजा और व्रत से मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है।
ब्रहमवैवर्त पुराण में इस एकादशी के व्रत को सौभाग्यादिनी एकादशी कहा गया है। मान्यता है कि जो साधक श्रद्धा और नियम से यह व्रत रखता है, उसकी अनेक कामनाएं धीरे धीरे पूर्ण होने लगती हैं और जीवन में शुभ परिस्थितियां बढ़ती हैं।
ऐसा भी कहा जाता है कि देवशयनी के बाद चार महीनों तक सूर्य, चंद्र और प्रकृति की चमक अपेक्षाकृत शांत हो जाती है। इसे देवशयन की अवस्था माना गया है। जब शुभ शक्तियां अपेक्षाकृत मृदु होती हैं तो किए गए बड़े शुभ कार्य भी पूर्ण फल न दे सकें, इसलिए चातुर्मास में संयम और भक्ति को सर्वोपरि रखा गया है।
देवशयनी एकादशी से जुड़ी प्रसिद्ध कथा सूर्यवंश के चक्रवर्ती राजा मंधाता की है।
कथा के अनुसार राजा मंधाता अत्यंत धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और पराक्रमी थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी, समृद्ध और संतुष्ट थी। लंबे समय तक राज्य में कोई कष्ट नहीं आया।
एक समय ऐसा आया जब तीन वर्षों तक वर्षा ही नहीं हुई। परिणामस्वरूप भयंकर अकाल पड़ा। खेत सूख गए, अनाज समाप्त होने लगा, यज्ञ, हवन और धार्मिक कार्य लगभग रुक गए। प्रजा भूख और कष्ट से व्याकुल हो गई।
राजा मंधाता गहराई से चिंतित हुए। शास्त्रों में पढ़ा था कि प्रजा का कष्ट अक्सर राजा के पापों का परिणाम माना जाता है। वे स्वयं धर्म का पालन करते थे, इसलिए उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह विपत्ति क्यों आई। समाधान की खोज में वे सेना सहित जंगल की ओर निकल पड़े।
यात्रा के दौरान वे अनेक आश्रमों में गए और अंततः अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे, जो ब्रह्माजी के पुत्र माने जाते हैं। राजा ने विनम्र होकर प्रणाम किया और कहा कि धर्म पालन के बावजूद उनके राज्य में अकाल का ऐसा भयंकर कष्ट क्यों आया है, इसका कारण वे समझ नहीं पा रहे।
अंगिरा ऋषि ने ध्यानपूर्वक सुनकर राजा से कहा कि वे आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पद्मा एकादशी का व्रत अत्यंत नियमपूर्वक करें और प्रजा, सेवकों और मंत्रियों को भी इस व्रत में सम्मिलित करें। उन्होंने बताया कि इस एकादशी के व्रत से सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं और समस्त दुखों का नाश होता है। व्रत के प्रभाव से राज्य में वर्षा होगी और प्रजा पुनः सुखी हो जाएगी।
राजा मंधाता नगर लौटे और ऋषि की आज्ञा के अनुसार स्वयं भी देवशयनी एकादशी का व्रत किया और प्रजा को भी इसके लिए प्रेरित किया। व्रत के प्रभाव से वर्षा हुई, अकाल समाप्त हुआ और राज्य पूर्ववत समृद्धि और आनंद से भर गया।
इस कथा के माध्यम से संदेश यह मिलता है कि जब व्यक्ति या समाज परिस्थितियों से घिर जाए तब सामूहिक व्रत, भक्ति और ईश्वर स्मरण से भीतरी और बाहरी दोनों स्तर पर परिवर्तन संभव हो सकता है।
देवशयनी एकादशी का व्रत केवल एक दिन का नहीं बल्कि दशमी से द्वादशी तक तीन दिनों का अनुशासन माना जाता है।
व्रत की वास्तविक तैयारी दशमी तिथि से ही शुरू मानी जाती है।
दशमी और एकादशी दोनों दिन सत्य बोलना, किसी को दुख या हानि न पहुंचाना और अधिकतम संयम रखना व्रत का महत्वपूर्ण भाग है।
एकादशी के दिन प्रातः जल्दी उठकर शौच, स्नान आदि दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होना चाहिए। यदि संभव हो तो तीर्थ या पवित्र नदी में स्नान करना श्रेष्ठ माना गया है, पर यदि यह संभव न हो तो घर पर ही शुद्ध भाव से स्नान किया जा सकता है।
स्नान के समय यदि मिट्टी, तिल और कुश का प्रयोग किया जाए तो यह और भी पवित्र माना गया है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर के पूजा की तैयारी की जाती है।
देवशयनी एकादशी की पूजा का केंद्र भगवान विष्णु की आराधना है, जो क्षीरसागर में शयन करने वाले अनंत शेष पर विराजमान देवता के रूप में माने जाते हैं।
पूजा के लिए पहले एक स्वच्छ आसन पर चावल बिछाकर उस पर कलश स्थापित किया जाता है। कलश को लाल कपड़े से बांधकर उसके ऊपर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र रखकर पूजन की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इसे ही कलश स्थापना कहा जाता है।
इसके बाद
जो साधक पूर्ण निर्जला या केवल फलाहार व्रत कर सकें, वे अपनी क्षमता के अनुसार व्रत कर सकते हैं। अन्य लोग भी सात्त्विक और हल्का भोजन रखकर व्रत की भावना से जुड़ सकते हैं, पर व्रत के नियमों का सम्मान आवश्यक है।
देवशयनी एकादशी का व्रत दशमी से शुरू होकर द्वादशी प्रातः तक चलता है। द्वादशी तिथि की सुबह या उपयुक्त समय पर व्रत पारण करना चाहिए।
पारण से पहले भगवान विष्णु को नैवेद्य अर्पित कर, यदि संभव हो तो किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराकर, उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करना शुभ माना गया है। व्रत की पूर्णता इसी संतुलित क्रम से मानी जाती है।
देवशयनी एकादशी के दिन ही चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो इन्हीं महीनों के दौरान भारत के अधिकांश भागों में मानसून सक्रिय होता है।
इस समय वातावरण में नमी बढ़ने से सूक्ष्म जीव, कीट और रोग पैदा करने वाले कारक भी तेजी से बढ़ते हैं, जो शरीर को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकते हैं। प्राचीन ऋषियों ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चातुर्मास के लिए जो धार्मिक नियम बनाए, वे वास्तव में स्वास्थ्य और अनुशासन से भी जुड़े हैं।
तामसिक भोजन से परहेज, अधिक बाहर घूमने या यात्राओं को कम करना, संयमित जीवन शैली, व्रत और हल्का भोजन, ध्यान और जप जैसे अभ्यास शरीर और मन दोनों को अस्थिर मौसम में सहज बनाकर चलते हैं। इस तरह देवशयनी एकादशी केवल धार्मिक नहीं बल्कि व्यावहारिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाती है।
देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी ग्यारस तक लगभग चार महीने तक सभी प्रकार के बड़े शुभ कार्य प्रायः स्थगित रखे जाते हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से यह समय ग्रहों की स्थिति, प्रकृति में परिवर्तन और मनोदशा में उतार चढ़ाव के कारण गंभीर आध्यात्मिक साधना के लिए अधिक अनुकूल माना गया है।
इस अवधि में
कई परंपराओं में चातुर्मास के दौरान रुद्राक्ष धारण का भी विशेष महत्व बताया गया है। यह माना जाता है कि
देवशयनी एकादशी 2026 से ऐसे रुद्राक्ष धारण करने की परंपरा भी कही गई है, ताकि जीवन के कष्टों में कमी आए, आत्मविश्वास बढ़े और मन अधिक सकारात्मक दिशा में स्थिर रह सके।
जो लोग चातुर्मास में नियमित जप, व्रत, सत्संग और संयम को अपनाते हैं, उनके लिए यह समय आध्यात्मिक प्रगति और भीतर की शुद्धि का विशेष अवसर बन सकता है।
देवशयनी एकादशी का मूल संदेश यह है कि वर्ष के बाकी समय में बाहरी दायित्वों और गतिशीलता में लगे रहने के बाद अब चार महीने भीतर की यात्रा का समय आ गया है।
जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में विश्राम करते हैं तो साधक के लिए यह संकेत होता है कि अब बाहर की चहल पहल से थोड़ा हटकर मन को स्थिर, शांत और संयमित बनाने की कोशिश की जाए। व्रत, जप, सेवा और सत्संग के माध्यम से जो व्यक्ति चातुर्मास को सार्थक बनाता है, उसके जीवन में धीरे धीरे शुभ निर्णय, स्थिरता और आध्यात्मिक स्पष्टता की वृद्धि दिखाई दे सकती है।
देवशयनी एकादशी 2026 कब है
देवशयनी एकादशी 2026 शनिवार, 25 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 24 जुलाई को प्रातः 09 बजकर 25 मिनट से शुरू होकर 25 जुलाई को प्रातः 11 बजकर 40 मिनट तक रहेगी।
देवशयनी एकादशी को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है
इस दिन से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है, जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन अवस्था में रहते हैं। इस एकादशी के व्रत से पाप क्षय, चित्त की शुद्धि, कामना पूर्ति और मोक्ष मार्ग में प्रगति की मान्यता है।
देवशयनी एकादशी का व्रत कैसे रखा जाता है
व्रत की तैयारी दशमी से शुरू कर के तामसिक भोजन, नमक और भारी आहार से बचा जाता है। एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा, कलश स्थापना, दीप धूप और नामजप किया जाता है। व्रत द्वादशी पर पारण से पूर्ण होता है।
चातुर्मास में कौन से कार्य नहीं करने चाहिए
चातुर्मास के दौरान विवाह, बड़े मांगलिक समारोह, गृह प्रवेश जैसे उत्सव सामान्यतः स्थगित रखे जाते हैं। जबकि भक्ति, जप, दान, साधना, वाहन या आभूषण क्रय जैसे कार्य सीमित रूप से किए जा सकते हैं।
देवशयनी एकादशी की कथा से क्या संदेश मिलता है
राजा मंधाता की कथा यह बताती है कि सामूहिक व्रत और भक्ति से भीषण अकाल जैसी विपत्तियां भी दूर हो सकती हैं। जब शासन और प्रजा दोनों मिलकर धर्म, व्रत और ईश्वर स्मरण का सहारा लेते हैं तब वर्षा, समृद्धि और शांति लौट सकती है।
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