By पं. अमिताभ शर्मा
पितृपक्ष में द्वादशी तिथि पर किया जाने वाला विशेष श्राद्ध

पितृपक्ष के भीतर आने वाला द्वादशी श्राद्ध, जिसे अनेक स्थानों पर बरस श्राद्ध भी कहा जाता है, उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका देहावसान द्वादशी तिथि में हुआ हो। वर्ष 2026 में द्वादशी श्राद्ध बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा। इस दिन का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि इसी तिथि पर मघा नक्षत्र भी अपराह्न काल में उपस्थित रहेगा। श्राद्ध के लिए मान्य प्रमुख समयों में कुतुप मुहूर्त लगभग 11:36 ए एम से 12:24 पी एम, रौहिण मुहूर्त लगभग 12:24 पी एम से 1:12 पी एम और उसके बाद अपराह्न काल विशेष रूप से स्वीकार्य माना गया है। इसी अवधि में तर्पण, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन जैसे कर्म करना श्रेयस्कर माना जाता है।
हिन्दू पितृ परम्परा में प्रत्येक श्राद्ध तिथि उस चन्द्र दिवस से जुड़ी मानी जाती है जिस दिन परिवार के किसी सदस्य का निधन हुआ हो। ऐसा विश्वास है कि दिवंगत आत्मा उस तिथि की सूक्ष्म ऊर्जा से जुड़ी रहती है। इसलिए उसी तिथि पर किया गया श्राद्ध जीवित और दिवंगत के बीच एक विशेष सामंजस्य स्थापित करता है, जिससे तर्पण, पिण्डदान और प्रार्थना का फल सही आत्मा तक अधिक प्रभावशाली रूप में पहुँचता है।
द्वादशी तिथि का सम्बन्ध पारम्परिक रूप से भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है। एकादशी व्रत विष्णु को समर्पित माना जाता है और उसके बाद आने वाली द्वादशी तिथि व्रत के पारण, दान और पूजन की पूर्णता का दिन मानी जाती है। इसी कारण जिस व्यक्ति का निधन द्वादशी तिथि में हुआ हो, उसके लिए द्वादशी श्राद्ध को केवल पारिवारिक कर्तव्य नहीं बल्कि मोक्ष भाव से जुड़ा श्राद्ध भी माना जाता है।
उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों में द्वादशी श्राद्ध को बोलचाल में बरस श्राद्ध कहा जाता है। यहाँ बरस शब्द का प्रयोग बारह के अर्थ में किया जाता है। यह नाम स्थानीय परम्परा का हिस्सा है, पर इसका धार्मिक आशय वही है, द्वादशी तिथि में दिवंगत पितरों के लिए किया जाने वाला श्राद्ध।
वर्ष 2026 में पितृपक्ष शनिवार, 26 सितम्बर से प्रारम्भ होकर शनिवार, 10 अक्टूबर तक चलेगा। इसी क्रम में द्वादशी श्राद्ध 7 अक्टूबर 2026, बुधवार को पड़ेगा। विशेष बात यह है कि इसी दिन मघा नक्षत्र भी अपराह्न काल में रहेगा, इसलिए यह तिथि एक साथ दो प्रकार के पितृ अनुष्ठानों के लिए महत्त्वपूर्ण बन जाती है।
नीचे समय को सरल रूप में देखा जा सकता है:
| विवरण | समय |
|---|---|
| द्वादशी श्राद्ध की तिथि | 7 अक्टूबर 2026, बुधवार |
| कुतुप मुहूर्त | लगभग 11:36 ए एम से 12:24 पी एम |
| रौहिण मुहूर्त | लगभग 12:24 पी एम से 1:12 पी एम |
| मुख्य श्राद्ध काल | अपराह्न काल |
द्वादशी श्राद्ध में अनुष्ठान को अपराह्न काल के भीतर पूर्ण करना उचित माना गया है। यदि परिवार को उसी दिन मघा श्राद्ध भी करना हो, तो योग्य पण्डित उपलब्ध समय के भीतर दोनों श्राद्धों का क्रम निर्धारित कर सकता है।
द्वादशी श्राद्ध उन परिवारों को करना चाहिए जिनके किसी पूर्वज का निधन द्वादशी तिथि में हुआ हो, चाहे वह शुक्ल पक्ष द्वादशी हो या कृष्ण पक्ष द्वादशी। यदि परिवार में मृत्यु तिथि का सही लेखा रखा गया हो, तो पंचांग के आधार पर यह आसानी से जाना जा सकता है कि दिवंगत की तिथि द्वादशी थी या नहीं।
इसके अतिरिक्त कुछ विशेष श्रेणियां भी हैं जिनके लिए द्वादशी श्राद्ध उपयुक्त माना गया है:
| किसके लिए | कारण |
|---|---|
| द्वादशी तिथि में दिवंगत पितर | यह उनका नियत तिथि श्राद्ध है |
| संन्यासी | संन्यास लेने के बाद वे सामान्य गृहस्थ नियमों से ऊपर माने जाते हैं |
| व्रत निष्ठ व्यक्ति | जो नियमित धार्मिक व्रत में स्थित रहे हों |
| कुछ परम्पराओं में एकादशी में दिवंगत व्यक्ति | यदि एकादशी श्राद्ध न हो सके तो द्वादशी वैकल्पिक रूप में मान्य हो सकती है |
द्वादशी श्राद्ध की एक विशेषता यह भी है कि यह संन्यासियों के लिए भी मान्य श्राद्ध दिवस माना जाता है। जो व्यक्ति जीवन में विधिवत संन्यास दीक्षा ले चुका हो, वह सामान्य गृहस्थ श्रेणियों से भिन्न माना जाता है। ऐसे व्यक्तियों के लिए द्वादशी श्राद्ध इस भाव से किया जाता है कि उन्होंने पारिवारिक जीवन की सीमाओं का अतिक्रमण कर आध्यात्मिक मार्ग अपनाया था।
इसी प्रकार कुछ परम्पराओं में वे लोग भी द्वादशी श्राद्ध के अधिकारी माने जाते हैं जो जीवन भर एकादशी द्वादशी व्रत के प्रति निष्ठावान रहे हों, अथवा जिन्होंने किसी धार्मिक व्रत का पालन करते हुए देह त्याग किया हो।
परम्परा में इसका प्रथम अधिकार सामान्यतः ज्येष्ठ पुत्र को दिया गया है। किन्तु उसकी अनुपस्थिति में अन्य पात्र भी यह कर्तव्य निभा सकते हैं। जैसे पोता, पुत्री का पुत्र, भाई, भाई का पुत्र, अथवा कोई अन्य निकट सम्बन्धी। आधुनिक धर्मशास्त्रीय व्याख्याओं और अनेक परिवारों की वर्तमान परम्परा में पुत्री को भी योग्य कर्ता माना जाने लगा है, विशेषकर तब जब परिवार में पुरुष उत्तराधिकारी न हो।
यदि किसी पितृ की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
द्वादशी श्राद्ध की विधि पितृपक्ष के मानक श्राद्ध क्रम का पालन करती है, किन्तु इसका संकल्प विशेष रूप से द्वादशी में दिवंगत पितृ या संन्यासी के लिए किया जाता है।
प्रातःकाल सूर्योदय से पहले या प्रारम्भिक घंटों में स्नान किया जाता है। स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण किए जाते हैं। शरीर और मन दोनों की शुद्धि का ध्यान रखा जाता है। पूर्व दिवस से सात्त्विक आहार, संयम और शांत व्यवहार को महत्व दिया जाता है।
यदि श्राद्ध नदी तट या संगम पर किया जा रहा हो तो वहाँ स्वच्छ स्थान चुना जाता है। घर पर होने पर भूमि या आसन को शुद्ध कर कुश बिछाई जाती है। एक ताम्र या कांस्य पात्र में जल रखा जाता है। श्राद्ध सामग्री में सामान्यतः काला तिल, जौ, कुश, पुष्प, धूप और पिण्ड सम्मिलित होते हैं।
संकल्प में कर्ता अपना नाम, पिता का नाम, गोत्र और जिन पितरों के लिए श्राद्ध किया जा रहा है उनका उल्लेख करता है। यदि श्राद्ध किसी संन्यासी के लिए हो, तो संकल्प में संन्यास की स्थिति का भी उल्लेख किया जाता है। यही संकल्प सामान्य धार्मिक कर्म को विशिष्ट पितृ तक निर्देशित करता है।
पिण्डदान में सामान्यतः पके हुए चावल या जौ से पिण्ड बनाए जाते हैं। इनमें काला तिल, शहद और घी मिलाया जाता है। प्रायः तीन पिण्ड न्यूनतम माने जाते हैं, जो दिवंगत, उसके पिता और पितामह के प्रतीक रूप में अर्पित किए जाते हैं। संगम या नदी तट पर इन पिण्डों को मंत्रोच्चार के साथ अर्पित कर पवित्र जल में समर्पित किया जाता है।
तर्पण में जल के साथ काला तिल, जौ और कुश मिलाकर दाहिने हाथ से जलधारा अर्पित की जाती है। प्रत्येक अर्पण के साथ पितृ का नाम और गोत्र लिया जाता है। पिण्डदान के बाद तर्पण का क्रम पितृकुल और मातृकुल की पीढ़ियों तक विस्तारित किया जा सकता है, विशेष रूप से उन पितरों के लिए जिनकी तिथि स्पष्ट रूप से ज्ञात न हो।
द्वादशी श्राद्ध की पूर्णता में ब्राह्मण भोजन अनिवार्य माना गया है। कम से कम एक योग्य ब्राह्मण को सात्त्विक भोजन कराया जाता है। भोजन में श्रद्धा, सम्मान और सेवा भाव प्रमुख हैं। परम्परा यह मानती है कि ब्राह्मण इस कर्म में पितरों के सजीव प्रतिनिधि के रूप में आदर पाते हैं। भोजन के बाद दक्षिणा अर्पित की जाती है।
परिवार के भोजन से पहले अन्न का कुछ भाग गाय, कौए, कुत्ते, चींटियों और अन्य जीवों के लिए निकाला जाता है। विशेष रूप से कौए को अन्न देना शुभ माना जाता है, क्योंकि उसे पितृलोक का दूत समझा जाता है।
यदि द्वादशी श्राद्ध किसी संन्यासी के लिए किया जा रहा हो, तो संकल्प में यह स्पष्ट होना चाहिए कि दिवंगत ने संन्यास दीक्षा ली थी। कुछ परम्पराओं में ऐसे श्राद्ध में भोजन सामग्री का चयन भी दिवंगत के जीवनव्रत के अनुसार किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि उन्होंने कुछ विशेष वस्तुओं का त्याग किया था, तो उन वस्तुओं को अर्पण में शामिल न करना उचित माना जाता है। ऐसे श्राद्ध में मंत्रों के कुछ रूप सामान्य गृहस्थ श्राद्ध से भिन्न हो सकते हैं, इसलिए योग्य पण्डित का मार्गदर्शन श्रेष्ठ माना जाता है।
द्वादशी तिथि का भगवान विष्णु से सम्बन्ध द्वादशी श्राद्ध को पितृपक्ष के अन्य श्राद्धों से थोड़ा अलग स्वर देता है। गरुड़ पुराण में यह भाव मिलता है कि जो आत्माएं विष्णु सम्बन्धी तिथियों में दिवंगत होती हैं, उनके लिए श्राद्ध मोक्ष मार्ग को अधिक पुष्ट कर सकता है।
विष्णु पुराण की परम्परा द्वादशी को ऐसी तिथि मानती है जिसमें विष्णु शक्ति का अनुभव विशेष रूप से सुलभ होता है। जो पूर्वज वैष्णव भाव रखते थे या द्वादशी तिथि में दिवंगत हुए, उनके लिए इस दिन किया गया श्राद्ध कृतज्ञता और आत्मिक पोषण दोनों का कार्य करता है।
धर्मसिन्धु जैसी परम्पराओं में संन्यासियों के लिए द्वादशी का चयन भी इसी कारण से सार्थक माना गया है। एक प्रकार से यह तिथि तप से प्रसाद की ओर संक्रमण का संकेत देती है और यही संन्यासी जीवन के आध्यात्मिक निष्कर्ष से भी मेल खाती है।
| क्या करें | क्यों करें |
|---|---|
| कुतुप या रौहिण मुहूर्त में श्राद्ध करें | यह अपराह्न के भीतर सबसे शुभ समय माने जाते हैं |
| तर्पण में काले तिल का प्रयोग करें | पितृ अर्पण के लिए यह अत्यंत आवश्यक माना गया है |
| संकल्प में द्वादशी या संन्यास सम्बन्ध स्पष्ट बोलें | अर्पण सही भाव से निर्देशित होता है |
| सात्त्विक भोजन तैयार करें | श्राद्ध की शुद्धता बनी रहती है |
| ब्राह्मण, कौए, गाय और अन्य जीवों को भोजन दें | यह श्राद्ध की पूर्णता का आवश्यक भाग है |
| सम्भव हो तो नदी या पवित्र जलाशय पर तर्पण करें | प्रवाहमान जल अनुष्ठान को अधिक प्रभावशाली बनाता है |
| सायंकाल तिल तेल का दीपक जलाएं | दिवंगत आत्मा के प्रति प्रकाश अर्पण का भाव जुड़ता है |
| क्या न करें | क्यों न करें |
|---|---|
| प्याज, लहसुन, मांस, मछली या अंडा न लें | सात्त्विकता श्राद्ध का मूल नियम है |
| सूर्यास्त के बाद श्राद्ध न करें | श्राद्ध का मुख्य काल अपराह्न तक माना गया है |
| लोहे के बर्तनों का उपयोग न करें | ताम्र या कांस्य अधिक शुद्ध माने जाते हैं |
| अत्यधिक विलाप या असंतुलित व्यवहार न करें | श्राद्ध का वातावरण शांत और संयत होना चाहिए |
| ब्राह्मण भोजन को न छोड़ें | इसके बिना श्राद्ध अपूर्ण माना जाता है |
वर्ष 2026 में 7 अक्टूबर का दिन विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि इसी दिन द्वादशी श्राद्ध और मघा नक्षत्र का संयोग बन रहा है। मघा नक्षत्र का सम्बन्ध भी पितृदेवों से माना गया है। इसलिए यह दिन उन परिवारों के लिए और भी अधिक प्रभावशाली हो जाता है जिन्हें एक ही दिन द्वादशी श्राद्ध और मघा श्राद्ध जैसे अनुष्ठान करने हों।
यह संयोग केवल पंचांग की जानकारी नहीं है बल्कि यह सूक्ष्म रूप से उस दिन की आध्यात्मिक गंभीरता को भी बढ़ाता है। इसलिए इस तिथि पर श्राद्ध करते समय संकल्प, मुहूर्त और अनुष्ठान क्रम का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
द्वादशी श्राद्ध यह सिखाता है कि स्मरण केवल तिथि का पालन नहीं है बल्कि आत्मिक उत्तरदायित्व भी है। जो लोग इस तिथि में दिवंगत हुए, या जिन्होंने जीवन को व्रत, त्याग और साधना में बिताया, उनके लिए किया गया श्राद्ध परिवार को भी एक गहरे आध्यात्मिक विनम्रता से जोड़ता है।
यह दिन यह भी याद दिलाता है कि पितृकर्म केवल अतीत के लिए नहीं होता। यह वर्तमान को संतुलित करता है, परिवार को जड़ों से जोड़ता है और भविष्य के लिए आशीर्वाद का एक शांत आधार बनाता है।
द्वादशी श्राद्ध 2026 कब है
द्वादशी श्राद्ध वर्ष 2026 में बुधवार, 7 अक्टूबर को किया जाएगा।
बरस श्राद्ध किसे कहा जाता है
बरस श्राद्ध द्वादशी श्राद्ध का ही लोकप्रचलित नाम है।
द्वादशी श्राद्ध किनके लिए किया जाता है
यह द्वादशी तिथि में दिवंगत पितरों, संन्यासियों और कुछ परम्पराओं में व्रत निष्ठ व्यक्तियों के लिए किया जाता है।
क्या 2026 में द्वादशी श्राद्ध और मघा श्राद्ध एक ही दिन हैं
हाँ, वर्ष 2026 में दोनों 7 अक्टूबर को एक ही दिन पड़ रहे हैं।
यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो क्या करें
ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करना उचित माना जाता है।
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