द्वितीया श्राद्ध 2026: तिथि, महत्व और पूरी पूजा विधि

By पं. संजीव शर्मा

द्वितीया श्राद्ध का महत्व, तिथि और पिंडदान विधि

द्वितीया श्राद्ध 2026: पूजा और महत्व

द्वितीया श्राद्ध 2026 पितृपक्ष का दूसरा दिन है जो परिवार के रक्षक पुरुष पितरों के स्मरण के लिए विशेष रूप से समर्पित माना जाता है। इस दिन उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है जिनका देहांत किसी भी माह की द्वितीया तिथि को हुआ हो। वर्ष 2026 में द्वितीया श्राद्ध सोमवार, 28 सितंबर 2026 को पड़ेगा, इसलिए चंद्रदेव के दिवस के कारण इस दिन की आध्यात्मिक प्रभाव शक्ति और भी अधिक मानी जाएगी।

अश्विन कृष्ण द्वितीया तिथि पितृपक्ष के दूसरे दिन के रूप में मानी जाती है। वर्ष 2026 में यह तिथि सोमवार को रहेगी, जो स्वयं चंद्र ग्रह का दिन है और वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को पितृलोक का कारक ग्रह माना गया है। उत्तर भारत के लिए अनुमानित शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं। कुतुप मुहूर्त लगभग 11:44 AM से 12:31 PM तक, रोहिणा मुहूर्त 12:31 PM से 1:17 PM तक, तथा अपराह्न काल 1:17 PM से 3:36 PM तक पितृकर्म के लिए मान्य अवधि मानी जाएगी। सुबह के समय स्नान, शुद्धि और तैयारी के कर्म किए जाते हैं, जबकि तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसे मुख्य कार्य इन दोपहर के मुहूर्तों में किए जाना श्रेष्ठ माना गया है।

द्वितीया श्राद्ध क्या है

द्वितीया किसी भी पक्ष की दूसरी तिथि को कहा जाता है। पितृपक्ष की द्वितीया श्राद्ध उन सभी पितरों के नाम से की जाती है जिनका देहांत शुक्ल द्वितीया या कृष्ण द्वितीया, किसी भी माह में हुआ हो। लोकपरंपरा में इसे अक्सर दूज श्राद्ध कहा जाता है। यही तिथि कार्तिक महीने में भाई दूज के रूप में भी प्रसिद्ध है, जहां बहन और भाई के पवित्र संबंध का उत्सव मनाया जाता है।

द्वितीया तिथि का संबंध वैदिक दृष्टि से संबंधों और सुरक्षा से जोड़ा जाता है। मत्स्य पुराण आदि ग्रंथों में संकेत मिलता है कि द्वितीया श्राद्ध विशेष रूप से उन पितरों के लिए फलदायी है जो परिवार के संरक्षक, बड़े भाई, ताऊ, चाचा या युवा अवस्था में देहांत को प्राप्त हुए पूर्वज रहे हों। जिन्हें जीवन में अपने परिवार को और आगे बढ़ते देखने की इच्छा अधूरी रह गई हो, उनके लिए भी द्वितीया का श्राद्ध एक महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है।

द्वितीया श्राद्ध 2026: तिथि और मुहूर्त

द्वितीया श्राद्ध 2026 के मुख्य समय को एक स्थान पर देखने से योजना बनाना सरल हो जाता है।

विवरण तिथि और समय
पितृपक्ष का दूसरा दिन सोमवार, 28 सितंबर 2026
संबंधित चंद्र तिथि अश्विन कृष्ण द्वितीया
श्राद्ध के लिए उपयुक्त दिवस 28 सितंबर 2026
कुतुप मुहूर्त लगभग 11:44 AM से 12:31 PM
रोहिणा मुहूर्त लगभग 12:31 PM से 1:17 PM
अपराह्न काल लगभग 1:17 PM से 3:36 PM

द्वितीया तिथि प्रतिपदा के समाप्त होने के बाद 28 सितंबर की प्रातः में प्रभावी होती है और दोपहर तक चलती है, इसलिए इसी दिन के अपराह्न में श्राद्ध करना शास्त्रीय रूप से उपयुक्त माना जाता है। पितृकर्म के लिए सोमवार का दिन वैसे ही विशेष माना जाता है, क्योंकि चंद्रमा की कोमल और संवेदनशील ऊर्जा पितृलोक से जुड़े कर्मों को सहज बनाती है।

द्वितीया श्राद्ध किनके लिए विशेष रूप से किया जाता है

धर्मग्रंथों के अनुसार द्वितीया श्राद्ध कुछ विशेष पितरों और परिस्थितियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • वे पूर्वज जिनका देहांत द्वितीया तिथि को हुआ हो, चाहे वह शुक्ल पक्ष की द्वितीया हो या कृष्ण पक्ष की।
  • बड़े भाई, ताऊ, चाचा और वे पुरुष रिश्तेदार जो किसी समय परिवार के रक्षक और मार्गदर्शक रहे हों।
  • वे पितृ जिनका देहांत युवावस्था या मध्यम आयु में हो गया हो।
  • ऐसे सौतेले रिश्तेदार, जैसे सौतेले माता पिता, सौतेले भाई बहन, या गोद लिए हुए सदस्य जिनके साथ गहरा संबंध रहा हो।
  • ऐसे परिवार जहां अनेक पुरुष पितरों, जैसे दादा, बड़े चाचा, बड़े भाइयों का देहांत हो चुका हो और सभी का सामूहिक स्मरण करना हो।

यदि किसी परिवार में पहली बार पितृपक्ष के श्राद्ध शुरू किए जा रहे हों और किसी विशेष पितृ की तिथि स्पष्ट न हो, तो विद्वान पंडित के मार्गदर्शन से द्वितीया श्राद्ध का उपयोग भी विस्तृत स्मरण दिवस के रूप में किया जाता है। इससे भ्रातृ और कुल के रक्षक पुरुष पितरों का सामूहिक सम्मान संभव हो पाता है।

द्वितीया श्राद्ध की सुबह की तैयारी

द्वितीया श्राद्ध के दिन की शुरुआत से ही वातावरण को सात्विक और शांत रखना आवश्यक माना गया है।

  • श्राद्धकर्ता प्रातः सूर्योदय से पहले या उसके आसपास जागकर स्नान करता है।
  • स्नान के जल में जहां संभव हो थोड़ा गंगाजल मिलाया जाता है।
  • श्वेत या हल्के रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं।
  • घर या जिस स्थान पर अनुष्ठान होना हो, वहां की सफाई कर गंगाजल या गोमूत्र मिश्रित जल से छिड़काव किया जाता है।

इसके बाद घर में या पूजा स्थल पर एक छोटा सा वेदी स्थान बनाया जाता है जहां पितृ स्मरण के लिए स्थानचिन्ह, फोटो या केवल कुशा आसन रखा जा सकता है। रसोई में चावल, दाल, उरद दाल, तिल, घी, शहद और मौसमी सब्जियों जैसे सात्विक पदार्थों की तैयारी आरंभ की जाती है।

द्वितीया श्राद्ध में संकल्प कैसे किया जाता है

श्राद्ध का केंद्र संकल्प होता है, जिसमें पूरे अनुष्ठान की दिशा निर्धारित होती है। द्वितीया श्राद्ध के संकल्प में विशेष रूप से भ्रातृ और कुल के रक्षक पुरुष पितरों के नाम सम्मिलित किए जाते हैं।

संकल्प के समय

  • अपना नाम, गोत्र, निवास स्थान और तिथि का उल्लेख किया जाता है।
  • जिन पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण किया जाना है, उनके नाम, संबंध और यदि ज्ञात हो तो मृत्यु तिथि बोली जाती है।
  • यह निश्चय उच्चारित किया जाता है कि इस द्वितीया श्राद्ध के माध्यम से बड़े भाई, चाचा, ताऊ और युवा अवस्था में दिवंगत हुए पितरों की आत्मिक तृप्ति और कुल की उन्नति की कामना की जा रही है।

इस प्रकार संकल्प में ही एक विस्तृत वंश वृत्तांत संक्षेप में समाहित हो जाता है।

द्वितीया श्राद्ध में तर्पण की विधि

तर्पण के बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है। यदि यह कार्य किसी पवित्र नदी, संगम या तालाब पर संभव हो तो और भी अच्छा रहता है, अन्यथा घर पर ही पात्र में जल रखकर तर्पण किया जा सकता है।

  • जल में काले तिल और कुशा मिलाए जाते हैं।
  • दाहिने हाथ से जल अर्पित करते हुए पितामह, प्रपितामह और अन्य पितरों के नाम लिए जाते हैं।
  • द्वितीया श्राद्ध के तर्पण क्रम में विशेष रूप से बड़े भाई, ताऊ और चाचा जैसे पितरों का भी अलग से स्मरण किया जाता है।

प्रत्येक तर्पण के साथ तृप्ति की प्रार्थना की जाती है कि यह जल, तिल और स्मरण पितृलोक में अमृत के समान उन्हें शांति और संतोष प्रदान करें।

द्वितीया श्राद्ध में पिंडदान की विशेषता

द्वितीया श्राद्ध का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इस दिन प्रायः एक से अधिक पिंड तैयार किए जाते हैं। प्रत्येक पिंड किसी एक विशिष्ट पितृ के लिए समर्पित किया जा सकता है।

  • पिंड बनाने के लिए पके हुए चावल, जौ का आटा, काला तिल, घी और शहद का उपयोग किया जाता है।
  • जितने पितरों के नाम से पिंडदान करना हो, उतने पिंड क्रम से बनाए जाते हैं।
  • प्रत्येक पिंड को हाथ में लेकर उस पितृ का नाम, गोत्र और संबंध उच्चारित किया जाता है, फिर कुशा बिछे स्थान पर अर्पित किया जाता है।

यदि किसी पितृ की तिथि या नाम स्पष्ट न हो तब संयुक्त रूप से एक पिंड पूरे अज्ञात पितरों के लिए भी अर्पित किया जा सकता है, पर जहां जानकारी हो वहां अलग अलग पिंड देना अधिक उचित माना जाता है। द्वितीया के दिन ऐसे पिंडदान से भ्रातृ और कुल रक्षक पुरुष पितरों को विशेष तृप्ति मिलती है।

द्वितीया श्राद्ध में ब्राह्मण भोज और दान

श्राद्ध के बाद ब्राह्मण भोज का विधान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। द्वितीया श्राद्ध के दिन भोजन में सामान्यतः

  • चावल, दाल और मौसमी सब्जियां
  • उरद दाल से बना कोई व्यंजन
  • खीर या मीठा पकवान
  • रोटी या पूरी

जैसे सात्विक पदार्थ रखे जाते हैं। उरद दाल को कई परंपराओं में विशेष रूप से द्वितीया तिथि के पितरों के लिए प्रिय माना गया है। ब्राह्मणों को आदरपूर्वक आसन देकर भोजन कराया जाता है और अंत में उनके आशीर्वाद ग्रहण किए जाते हैं।

भोजन के उपरांत दान दिया जाता है। इसमें अन्न, तिल, गुड़ और घर की स्थिति के अनुसार वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुएं शामिल हो सकती हैं। यदि जिस पितृ की स्मृति में श्राद्ध किया जा रहा है, वह किसी विशेष व्यवसाय या विद्या से जुड़े रहे हों, तो उसी से संबंधित कोई छोटा प्रतीकात्मक दान भी किया जा सकता है, जैसे विद्वान के नाम पर पुस्तक देना या किसान के नाम पर बीज का दान करना।

द्वितीया श्राद्ध के दिन आचरण के नियम

इस दिन का आचरण भी पितृकर्म का हिस्सा माना जाता है, इसलिए कुछ बातों का ध्यान रखना उपयोगी रहता है।

क्या करना शुभ माना गया है

  • दिन भर संयमित वाणी और शांत व्यवहार रखना।
  • जहां संभव हो, पीपल के वृक्ष को जल अर्पित करना, क्योंकि परंपरा में पीपल को पितृ ऊर्जा से जोड़ा गया है।
  • श्राद्ध के बाद घर में किसी वृद्ध सदस्य के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना, इसे पितृ आशीर्वाद का ही विस्तार माना जाता है।
  • दो दीपक जलाना, एक सीधी वंश परंपरा के पितरों के लिए और दूसरा भ्रातृ तथा सहपरिवार के पितरों के लिए।

किन बातों से बचना चाहिए

  • श्राद्ध की मुख्य विधि को बहुत जल्दी और हड़बड़ी में न करना, क्योंकि द्वितीया के दिन अनेक पिंड और विस्तृत संकल्प की आवश्यकता रहती है।
  • अत्यधिक शोरगुल, विवाद या कटु वाणी से दूर रहना, इससे घर का सूक्ष्म वातावरण अस्थिर होता है।
  • कौवे को भोजन कराए बिना स्वयं भोजन न करना, क्योंकि पितृ तृप्ति का प्रतीक रूप कौवा ही माना जाता है।
  • श्राद्ध के दिन परिवार के भीतर किसी नए विवाद या कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत न करना।

इन नियमों का भाव यही है कि कम से कम एक दिन के लिए पूरा घर पितृ स्मरण और कृतज्ञता के भाव में डूबा रहे।

द्वितीया श्राद्ध से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ

जब परिवार मन से द्वितीया श्राद्ध करता है तो केवल किसी एक तिथि का अनुष्ठान नहीं होता बल्कि एक गहरी पारिवारिक ऊर्जा जागृत होती है।

उन पूर्वजों की आत्मा, जो कभी बड़े भाई, चाचा या परिवार के संरक्षक रहे हों और जिनका देहांत समय से पहले हो गया हो, वे वंशजों के प्रेम और स्मरण से तृप्त होते हैं। इससे अक्सर परिवार के भीतर छिपी हुई खींचतान, अनजाने भय या आर्थिक अड़चनें भी धीरे धीरे हल्की महसूस होने लगती हैं।

द्वितीया श्राद्ध पीढ़ियों को यह संदेश भी देता है कि केवल माता पिता ही नहीं बल्कि पूरे कुल की रक्षा करने वाले हर पितृ के प्रति हमारी जिम्मेदारी और कृतज्ञता है। यही भाव आगे चलकर परिवार को भीतर से सुदृढ़ बनाता है।

द्वितीया श्राद्ध 2026 से जुड़े सामान्य प्रश्न

द्वितीया श्राद्ध 2026 किस दिन और किस वार को होगा?
द्वितीया श्राद्ध 2026 सोमवार, 28 सितंबर को होगा और यह पितृपक्ष का दूसरा दिन रहेगा।

द्वितीया श्राद्ध किन पितरों के लिए विशेष रूप से किया जाता है?
द्वितीया तिथि को दिवंगत हुए पितरों, बड़े भाइयों, ताऊ, चाचा, युवा अवस्था में दिवंगत पुरुष पितरों और सहपरिवार के रक्षक पुरुषों के लिए यह दिन विशेष माना जाता है।

क्या द्वितीया श्राद्ध में एक से अधिक पिंड दिए जा सकते हैं?
हां, जिस जिस पितृ के लिए अलग से स्मरण करना हो, उनके लिए अलग पिंड बनाना शुभ माना गया है। केवल तब संयुक्त पिंड दिया जाता है जब नाम या तिथि बिल्कुल ज्ञात न हो।

द्वितीया श्राद्ध का मुख्य मुहूर्त क्या माना जाए?
कुतुप और रोहिणा मुहूर्त के भीतर, तथा व्यापक रूप से अपराह्न काल में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज करना शास्त्रीय दृष्टि से सर्वोत्तम रहता है।

यदि तीर्थ यात्रा संभव न हो तो क्या घर पर द्वितीया श्राद्ध किया जा सकता है?
हां, घर पर या पास के किसी स्वच्छ जलाशय पर स्नान, संकल्प, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन की व्यवस्था करके भी पूरी श्रद्धा के साथ द्वितीया श्राद्ध किया जा सकता है, भाव ही इस अनुष्ठान की वास्तविक शक्ति है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


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