By पं. अमिताभ शर्मा
गंगौर 2026 का महत्व, वैवाहिक सौभाग्य और गृह जीवन में संतुलन का संदेश

गंगौर 2026 उन पर्वों में से एक है जिसे विशेष रूप से स्त्री जीवन की सौभाग्य भावना, वैवाहिक सुख और समर्पित प्रेम के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। रांग बिरंगे वस्त्र, पारंपरिक गीत और सुहाग का साज श्रृंगार गंगौर को केवल एक व्रत न बनाकर जीवन की सुंदरता और जिम्मेदारी दोनों का उत्सव बना देते हैं। यह पर्व देवी गौरी के उस रूप की याद दिलाता है जो गृहस्थ जीवन में प्रेम, धैर्य और संतुलन को संभाल कर रखती हैं। गंगौर हमेशा चैत्र मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में गंगौर सोमवार 23 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि दिन के समय विद्यमान रहेगी और इसी के दौरान गंगौर व्रत, गंगौर पूजा और शोभायात्राओं का मुख्य आयोजन किया जाएगा। देवी गौरी की विशेष कृपा के लिए प्रातःकाल के शुभ समय में पूजा की परंपरा मानी जाती है।
गंगौर 2026 पर गंगौर पूजा का सबसे शुभ समय सूर्योदय के बाद की प्रातः बेला मानी गई है, जब तृतीया तिथि विद्यमान हो और वातावरण शुद्ध तथा मन ग्रहणशील हो। इस समय देवी गौरी की मूर्ति या प्रतिमा के समक्ष बैठकर शांत भाव से प्रार्थना की जाती है।
| विवरण | समय |
|---|---|
| गंगौर पर्व की तिथि | सोमवार, 23 मार्च 2026 |
| तिथि | चैत्र शुक्ल तृतीया, दिन में तृतीया का प्रभाव |
| प्रातः गंगौर पूजा मुहूर्त | सुबह 06:18 बजे से 08:42 बजे तक |
सुबह 06 बजकर 18 मिनट से 08 बजकर 42 मिनट तक का समय देवी गौरी की आराधना, पुष्प, सिंदूर, श्रृंगार सामग्री और मिठाई अर्पित करने के लिए अत्यंत अनुकूल माना जा सकता है। जो महिलाएँ इस समयावधि में पूजा नहीं कर पातीं, वे दिन में अन्य उपयुक्त समय में भी सूर्यास्त से पहले गंगौर पूजा कर सकती हैं, बस इतना ध्यान रखना होता है कि स्थानिक पंचांग अनुसार राहुकाल जैसे अशुभ समय से बचा जाए।
गंगौर पूजा परंपरागत रूप से दिन के समय ही करने का विधान है। इस पर्व में देवी गौरी को घर की गौरी, सुहाग की रक्षक और गृहस्थ जीवन की संरक्षिका के रूप में देखा जाता है, इसलिए उनकी पूजा प्रकाश और जागरूकता की अवस्था में की जाती है। यही कारण है कि गंगौर के लिए संध्या या रात्रि का समय सामान्यतः नहीं रखा जाता। अधिकांश स्थानों पर विवाहित महिलाएँ और अविवाहित कन्याएँ समूह में एकत्र होकर पूजा करती हैं। वे साथ बैठकर लोकगीत गाती हैं, गंगौर से जुड़े पारंपरिक गीतों में अपने मन की भावनाएँ व्यक्त करती हैं और सामूहिक रूप से देवी से आशीर्वाद मांगती हैं। इससे केवल पूजा ही नहीं होती बल्कि स्त्रियों के बीच सहयोग और समर्पण की भावना भी मजबूत होती है।
गंगौर मुख्य रूप से राजस्थान का लोक पर्व माना जाता है, लेकिन इसके प्रभाव की छाया मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों तक भी दिखाई देती है। यह पर्व देवी गौरी को समर्पित है, जो भगवान शिव की अर्धांगिनी और गृहस्थ जीवन में सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। यह पर्व विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं। अविवाहित कन्याएँ भी गंगौर पर देवी गौरी की पूजा करती हैं और योग्य, सद्गुणी और प्रेमपूर्ण जीवनसाथी की कामना करती हैं। गंगौर शब्द दो भागों से मिलकर बना है। गण या गण से आशय भगवान शंकर से और गौर या गौरी से आशय माता पार्वती से है। इस प्रकार गंगौर शिव और पार्वती के दिव्य मिलन, पारिवारिक समरसता और स्त्री शक्ति की प्रतिष्ठा का उत्सव बन जाता है।
वर्ष 2026 में गंगौर सोमवार 23 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। गंगौर का पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को आता है, जो चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि होती है। यह वही समय होता है जब प्रकृति बसंत की पूर्णता की ओर बढ़ रही होती है और वातावरण में नएपन, हरियाली और सौम्यता की वृद्धि दिखाई देती है। गंगौर के संदर्भ में माना जाता है कि जब तक तृतीया तिथि दिन के समय प्रभाव में रहे तब तक देवी गौरी की पूजा और गंगौर व्रत के कार्य किए जा सकते हैं। यही कारण है कि गंगौर के तिथि निर्धारण में यह विशेष रूप से देखा जाता है कि तृतीया तिथि दिन में विद्यमान हो।
कई क्षेत्रों में गंगौर का उत्सव केवल एक दिन की पूजा तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह होली के तुरंत बाद शुरू हो जाता है। होली के दूसरे दिन से ही कई घरों में छोटी छोटी गौरी प्रतिमाएँ, मिट्टी की मूर्तियाँ या लकड़ी एवं धातु से बनी सजावटी प्रतिमाएँ स्थापित कर दी जाती हैं। फिर लगभग सोलह से अठारह दिन तक प्रतिदिन उनके सामने दीप, जल, पुष्प और सिन्दूर अर्पित किया जाता है। इस अवधि में महिलाएँ सुबह शाम गंगौर के पारंपरिक गीत गाती हैं और अपनी गृहस्थी, परिवार और वैवाहिक जीवन की मंगल कामना करती हैं। इस प्रकार गंगौर 2026 केवल एक दिन का पर्व नहीं बल्कि होली के बाद से शुरू होकर चैत्र शुक्ल तृतीया तक चलने वाला एक निरंतर सौभाग्य पर्व बन सकता है, जहाँ हर दिन थोड़ा समय देवी गौरी के ध्यान और प्रार्थना को दिया जाता है।
गंगौर 2026 पर पूजा और व्रत की विधि बहुत भव्य भी हो सकती है और साधारण रखी जाए तो भी पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकार्य है। मुख्य बात भाव और नियमितता है। गंगौर के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद महिलाएँ स्वच्छ या नए वस्त्र पहनती हैं। विशेष रूप से लाल, हरे या पीले रंग के वस्त्र और पारंपरिक गहने पहनने की परंपरा कई क्षेत्रों में देखी जाती है। इसके बाद देवी गौरी की प्रतिमा, चित्र या गंगौर के विशेष स्वरूप को घर की स्वच्छ जगह पर या आँगन में सजे हुए आसन पर विराजमान किया जाता है। देवी को सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ, मेहंदी और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती हैं। फूल, अक्षत, हल्दी, कुंकुम और मिठाई चढ़ाई जाती है। विवाहित महिलाएँ पूरे मन से पति की दीर्घायु, सुस्थिर वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। अविवाहित कन्याएँ मन ही मन यह प्रार्थना करती हैं कि देवी गौरी की कृपा से उन्हें जीवन में ऐसा साथी मिले जो सम्मान, स्नेह और जिम्मेदारी की भावना से भरा हो। कई स्थानों पर गंगौर व्रत के अंतर्गत महिलाएँ दिन में एक समय फलाहार या हल्का भोजन लेकर शेष समय भक्ति, कीर्तन और पारंपरिक गीतों में व्यतीत करती हैं।
गंगौर 2026 की एक बड़ी विशेषता यह रहती है कि इस दिन केवल पूजा नहीं होती बल्कि लोकगीत, नृत्य और सामूहिक संगति के माध्यम से स्त्री संसार अपनी भावनाएँ सहज रूप से प्रकट करता है। राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में गंगौर के अवसर पर विशेष गीत गाए जाते हैं जिनमें गौरी का ससुराल जाना, मायके आना, पति की प्रतीक्षा और गृहस्थ जीवन के छोटे बड़े प्रसंगों को सरल शब्दों में गाया जाता है। यह गीत स्त्रियों के बीच एक स्वाभाविक साझा मंच तैयार करते हैं, जहाँ वे एक दूसरे की भावनाओं को समझ और महसूस कर सकती हैं। कई इलाकों में गंगौर के दिन या उससे जुड़े अंतिम दिनों में स्त्रियाँ समूह में निकलकर ताल या मटकियाँ लेकर घर घर गीत गाती हुई जाती हैं। कहीं वे गंगौर की मिट्टी की प्रतिमाओं को सिर पर रखकर शोभायात्रा निकालती हैं, तो कहीं किसी विशेष स्थान पर सामूहिक रूप से देवी की विदाई की रस्म निभाती हैं। इस तरह गंगौर 2026 केवल व्यक्तिगत पूजा नहीं बल्कि सामूहिक संस्कृति और स्त्री सम्मान का उत्सव बन जाता है।
राजस्थान के अनेक नगरों में गंगौर के दिन भव्य शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं। देवी गौरी की खूबसूरती से सजाई गई प्रतिमाएँ रथ, पालकी या विशेष वाहन पर विराजमान कर शहर के प्रमुख मार्गों से निकाली जाती हैं। लोग दोनों ओर खड़े होकर देवी के दर्शन करते हैं, कुछ स्थानों पर महिलाएँ पारंपरिक नृत्य और लोकनृत्य भी प्रस्तुत करती हैं। पर्यटकों के लिए यह दृश्य राजस्थान की लोक संस्कृति का जीवंत परिचय बन जाता है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए यह अपनी परंपरा के प्रति गर्व और भावनात्मक जुड़ाव को बढ़ाने वाला अवसर होता है। गंगौर 2026 की ऐसी शोभायात्राएँ केवल धार्मिक भावना नहीं बल्कि सामाजिक सामंजस्य और उत्सवप्रियता को भी अभिव्यक्त करती हैं।
गंगौर के केंद्र में देवी गौरी का वह रूप है जो शक्ति, धैर्य, सौम्यता और समर्पण से भरा हुआ है। गंगौर 2026 इस बात की याद दिलाएगी कि वैवाहिक जीवन केवल उत्सव और श्रृंगार का नाम नहीं बल्कि दोनों पक्षों के समर्पण, समझ और सहनशीलता पर टिकता है। विवाहित महिलाएँ जब गंगौर पर व्रत रखती हैं और अपने पति तथा परिवार के लिए मंगल कामना करती हैं, तो वे अपने भीतर भी धैर्य और जिम्मेदारी के गुणों को दृढ़ करती हैं। अविवाहित कन्याएँ जब गौरी की पूजा करती हैं, तो वे केवल अच्छे जीवनसाथी की प्रार्थना नहीं करतीं बल्कि यह भी सीखती हैं कि जीवनसाथी के लिए स्वयं के भीतर भी करुणा, संतुलन और निष्ठा के गुण विकसित करना आवश्यक है।
गंगौर 2026 केवल त्योहार की तरह मनाकर छोड़ देने का प्रसंग नहीं बल्कि यह अपने जीवन के संबंधों को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर भी बन सकता है। जो लोग इस दिन देवी गौरी की पूजा के साथ साथ अपने वैवाहिक जीवन, परिवार और रिश्तों की दिशा पर ईमानदारी से विचार करेंगे, उनके लिए यह पर्व एक शांत, परिपक्व और संतुलित शुरुआत बन सकता है। यदि गंगौर 2026 पर यह संकल्प रखा जाए कि आने वाले वर्ष में परिवार के भीतर संवाद, सम्मान और सहयोग बढ़ाया जाएगा और रिश्तों में अनावश्यक कटुता से बचने का प्रयास किया जाएगा, तो देवी गौरी की कृपा से यह पर्व घरों में स्थिरता, प्रेम और समृद्धि का आधार बन सकता है।
गंगौर 2026 कब मनाई जाएगी और यह किस तिथि से जुड़ी है गंगौर 2026 सोमवार 23 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। यह चैत्र मास की शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि से जुड़ी है, जो दिन के समय विद्यमान रहेगी और इसी दौरान गंगौर व्रत और पूजा की जाएगी।
गंगौर 2026 के लिए प्रातःकाल का शुभ पूजा मुहूर्त क्या रहेगा गंगौर 2026 पर देवी गौरी की पूजा के लिए सुबह 06 बजकर 18 मिनट से 08 बजकर 42 मिनट तक का समय विशेष रूप से शुभ माना जाएगा। इसी अवधि में गंगौर पूजा, पुष्प, सिंदूर, श्रृंगार सामग्री और नैवेद्य अर्पित करना उत्तम रहेगा, हालांकि आवश्यकता होने पर दिन में सूर्यास्त से पहले अन्य समय में भी पूजा की जा सकती है।
गंगौर पूजा दिन के समय ही क्यों की जाती है, शाम या रात में क्यों नहीं गंगौर को प्रकाश, जागरूकता और गृहस्थ जीवन की सक्रिय ऊर्जा से जोड़ा गया है, इसलिए इसकी पूजा दिन के समय करने की परंपरा है। इस पर्व में महिलाएँ समूह में गीत, व्रत और पूजा के माध्यम से देवी गौरी की आराधना करती हैं, जिससे सामूहिक संगति और सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण दिन के उजाले में अधिक सहज माना जाता है।
गंगौर 2026 में विवाहित और अविवाहित महिलाओं के लिए व्रत और पूजा का क्या अर्थ है विवाहित महिलाएँ गंगौर 2026 पर व्रत रखकर अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख की प्रार्थना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ देवी गौरी से योग्य, स्नेही और जिम्मेदार जीवनसाथी की कामना करती हैं। दोनों ही परिस्थितियों में गंगौर स्त्री शक्ति, धैर्य और समर्पित प्रेम के सम्मान का पर्व बन जाता है।
गंगौर 2026 को अधिक सार्थक कैसे बनाया जा सकता है यदि गंगौर 2026 पर महिलाएँ केवल पारंपरिक रीति से पूजा करने के साथ साथ अपने रिश्तों में संवाद, सम्मान और सहयोग बढ़ाने का संकल्प लें, सामूहिक गीत और उत्सव में भाग लेकर अपने भीतर की रचनात्मकता और आनंद को स्थान दें और देवी गौरी की कृपा को जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन के रूप में देखने की कोशिश करें, तो यह पर्व लंबे समय तक सकारात्मक प्रभाव छोड़ सकता है।
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