By पं. अमिताभ शर्मा
गणपति विसर्जन का महत्व और सही पूजा विधि

गणपति विसर्जन 2026 का दिन भक्तों के लिए भावुक विदाई और नये संकल्प का विशेष अवसर लेकर आएगा। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में आरंभ होने वाला गणेश चतुर्थी उत्सव दस दिनों तक पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इस अवधि के बाद जब बप्पा को विदा करने का समय आता है तो उसी दिन गणपति विसर्जन किया जाता है, जिसे कई स्थानों पर अनंत चतुर्दशी से भी जोड़ा जाता है।
वर्ष 2026 में गणेश उत्सव की तिथियां इस प्रकार रहेंगी। गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। अनंत चतुर्दशी शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 के दिन पड़ेगी। विशेष बात यह है कि गणपति विसर्जन दिवस का मुख्य जुलूस बुधवार, 23 सितंबर 2026 को निकाला जाएगा, जबकि कई स्थानों पर अंतिम सामूहिक विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन भी किया जाता है। इस प्रकार भक्त दस दिनों के मंगलमय उत्सव के बाद नियत तिथि पर बप्पा को ससम्मान विदा करते हैं।
गणेश उत्सव के क्रम को समझने के लिए तिथियों को एक स्थान पर देखना उपयोगी रहता है।
| कार्यक्रम | तिथि और वार |
|---|---|
| गणेश चतुर्थी स्थापना | सोमवार, 14 सितंबर 2026 |
| गणपति विसर्जन दिवस | बुधवार, 23 सितंबर 2026 |
| अनंत चतुर्दशी | शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 |
सामान्य परंपरा में गणेश चतुर्थी से लेकर विसर्जन तक घरों, पंडालों और मंदिरों में लगातार पूजा, कीर्तन, भजन, आरती और प्रसाद वितरण का क्रम चलता है। कुछ परिवार एक दिन, कुछ ढाई दिन, कुछ पाँच या सात दिन तथा अनेक भक्त पूरे दस दिन बप्पा को अपने घर पर विराजमान रखते हैं। अन्तिम दिन नियत मुहूर्त में गणपति विसर्जन कर अगले वर्ष पुनः आगमन का निवेदन किया जाता है।
गणपति विसर्जन केवल मूर्ति को जल में प्रवाहित करने की क्रिया नहीं है। यह भगवान गणेश के आकार से निराकार स्वरूप की ओर वापसी का प्रतीक है। उत्सव की शुरुआत में बप्पा को घर या पंडाल में आमंत्रित कर उनकी मूर्ति स्थापित की जाती है। दस दिनों तक उन्हें साक्षात अतिथि की तरह पूजा जाता है। जब विसर्जन होता है तो वह इस भाव को प्रकट करता है कि भगवान का वास्तविक स्वरूप सदैव अदृश्य, सूक्ष्म और सर्वव्यापी है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार विसर्जन भगवान गणेश की कैलाश पर्वत की ओर वापसी को भी सूचित करता है, जहां उनके माता पिता भगवान शिव और मां पार्वती विराजते हैं। भक्त यह मानकर बप्पा को विदा करते हैं कि वे अगले वर्ष पुनः उतने ही प्रेम और उत्साह के साथ लौटेंगे। इसी कारण विदाई के समय भी वातावरण में आभार, समर्पण और आशा का भाव प्रमुख रहता है।
गणपति उत्सव जन्म, जीवन और मृत्यु की क्षणभंगुरता की ओर भी संकेत देता है। मिट्टी की मूर्ति जल में विलीन होकर प्रकृति में लौटती है, उसी मिट्टी से फिर नयी प्रतिमा बनती है। यह चक्र समझाता है कि रूप बदलते रहते हैं पर दिव्य सत्ता निरंतर बनी रहती है।
धार्मिक दृष्टि से बप्पा को विघ्नहर्ता माना जाता है। घर में उनकी स्थापना से लेकर विसर्जन तक भक्त यह विश्वास रखते हैं कि इस अवधि में गणेश जी घर और परिवार के समस्त अवरोधों को दूर करने वाले रूप में विराजमान रहे। विसर्जन के समय भक्त अपने मन की बातें, सफलता के संकल्प और जीवन की चुनौतियां उनके चरणों में रखकर विदा करते हैं।
सामाजिक स्तर पर गणेश चतुर्थी और गणपति विसर्जन समुदायिक एकता को मजबूत करने वाला पर्व है। बड़ी संख्या में लोग पंडालों में एकत्र होकर आरती और दर्शन करते हैं। उत्सव के दौरान भजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामाजिक सेवा, रक्तदान शिविर और अन्नदान जैसे कार्य भी अनेक स्थानों पर होते हैं। विसर्जन के दिन विशाल शोभायात्राएं निकलती हैं जिनमें सभी वर्ग और आयु के लोग सम्मिलित होते हैं।
विशेष रूप से महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और आसपास के क्षेत्रों में गणपति विसर्जन का दृश्य अद्भुत होता है। डोल ताशे, लेज़ीम, नृत्य मंडली और गणपति बाप्पा मोरया के घोष से वातावरण गूंज उठता है। धीरे धीरे यह उत्सव देश के अन्य भागों और विदेशों तक भी फैल चुका है, जहां भारतीय समुदाय बड़े भाव से गणेश उत्सव मनाता है।
विसर्जन से पूर्व की अंतिम पूजा बहुत भावपूर्ण मानी जाती है। इस दिन को कई स्थानों पर अनंत चतुर्दशी या केवल विसर्जन दिवस कहा जाता है। प्रातःकाल से ही घर और पंडालों में विशेष तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें। स्वच्छ और संभव हो तो पारंपरिक वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर या पंडाल में विराजमान गणेश जी के सम्मुख दीपक, धूप, पुष्प और नैवेद्य सजाएं।
पूजा के समय परिवार के सभी सदस्य मिलकर गणेश जी की आरती करें। आरती के बाद गणेश चालीसा, गणपति स्तोत्र या सरल भजन गाए जा सकते हैं। इस अंतिम पूजा में कृतज्ञता का भाव विशेष रूप से जागृत रखा जाता है।
पूजा के पश्चात जब मूर्ति को स्थान से उठाने की बारी आती है तो सबसे पहले बप्पा को थोड़ा सा अपनी ओर खींच कर प्रणाम किया जाता है। यह छोटा सा संकेत इस बात का प्रतीक है कि घर में अतिथि स्वरूप विराजमान गणेश जी को प्रेम से विदा किया जा रहा है।
इसके बाद
इस दौरान घर के सदस्य गणपति बाप्पा के प्रति आभार और धन्यवाद का भाव व्यक्त करते हैं। बीते दस दिनों में प्राप्त हुई सुखद घटनाओं, सफलताओं और मन की शांति के लिए भी कृतज्ञता प्रकट की जाती है।
जब मूर्ति घर से या पंडाल से बाहर निकाली जाती है तो गणपति बाप्पा मोरया और अगले वर्ष जल्दी आना जैसे भावपूर्ण नारे गूंजते हैं। ढोल, ताशे, नगाड़े, शंखध्वनि और संगीत से वातावरण मंगलमय हो जाता है। कुछ स्थानों पर पारंपरिक नृत्य, लेज़ीम और दंडिया की झांकी भी निकलती है।
यात्रा के दौरान
यात्रा का उद्देश्य केवल उत्साह दिखाना नहीं बल्कि यह भावना प्रकट करना है कि समाज मिलकर अपनी सामूहिक भक्ति और प्रेम के साथ गणेश जी को विदा कर रहा है। एक तरह से यह पूरे वर्ष के लिए सामूहिक संरक्षण और आशीर्वाद लेने का भी अवसर बन जाता है।
जलाशय तक पहुंचने के बाद विधिपूर्वक विसर्जन क्रिया की जाती है। जहां संभव हो वहां प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाना आज के समय की आवश्यकता है। पारंपरिक दृष्टि से निम्न क्रम अपनाया जाता है।
विसर्जन के बाद कुछ लोग उस स्थान की मिट्टी अथवा जल को थ थोड़ा भाग घर ले आते हैं। अगली बार गणेश स्थापना से पहले इसी मिट्टी से प्रतिमा स्थान को स्पर्श कराया जाता है, जो निरंतरता और कृपा का प्रतीक माना जाता है।
यह पर्व यह याद दिलाता है कि हर शुभ कार्य की शुरुआत गणेश वंदना से होनी चाहिए। जीवन में आने वाली बाधाएं केवल बाहरी स्थितियों से नहीं बल्कि मन के संदेह, भय और आलस्य से भी उत्पन्न होती हैं। दस दिनों तक गणेश जी के समक्ष बैठकर की गई आरती और प्रार्थना व्यक्ति के आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को बढ़ाती है।
विसर्जन के समय जो भाव उमड़ता है वह भी बहुत अर्थपूर्ण होता है। मन जानता है कि बप्पा की मूर्ति तो जा रही है, पर उनका आशीर्वाद और स्मरण हमारे भीतर ही रहेगा। यह अनुभव सिखाता है कि हर सुंदर संबंध और अनुभव समयबद्ध है, पर उनसे मिली सीख और प्रेरणा स्थायी रहती है।
गणपति विसर्जन के बाद भी यदि व्यक्ति प्रतिदिन थोड़ी देर गणेश मंत्र जप, ध्यान या सरल प्रार्थना को दिनचर्या का भाग बना ले, तो उत्सव के दौरान बनी पवित्र लय पूरे वर्ष बनी रह सकती है। यही इस पर्व का गहरा आध्यात्मिक संदेश है।
गणपति विसर्जन 2026 किस दिन होगा?
गणपति विसर्जन का मुख्य दिवस बुधवार, 23 सितंबर 2026 को रहेगा, जबकि अनंत चतुर्दशी शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को पड़ेगी।
गणेश चतुर्थी 2026 कब से शुरू होगी?
गणेश चतुर्थी की स्थापना सोमवार, 14 सितंबर 2026 को होगी, इसी दिन से दस दिवसीय उत्सव की शुरुआत मानी जाएगी।
क्या गणपति विसर्जन केवल दसवें दिन ही करना आवश्यक है?
परंपरा में ढाई दिन, पांच दिन, सात दिन और दस दिन तक की स्थापना प्रचलित है। जो परिवार पूरे दस दिन बप्पा को विराजमान रखते हैं उनके लिए दसवें दिन या अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन शुभ माना जाता है।
विसर्जन से पहले मूर्ति के आभूषण उतारने का क्या कारण है?
आभूषण और कृत्रिम सजावट हटाकर साधारण रूप में मूर्ति विसर्जित करने का भाव यह है कि केवल मिट्टी प्रकृति में लौटे, बाकी सामग्री पुनः सेवा के लिए उपयोग हो सके। यह सम्मान और सरलता का प्रतीक भी है।
गणपति विसर्जन के बाद क्या संकल्प लेना अच्छा माना जाता है?
कई भक्त इस दिन आने वाले वर्ष के लिए स्वच्छ जीवन, नशामुक्ति, नियमित पूजा, दान, सत्संग और परस्पर सद्भाव जैसे संकल्प लेते हैं, ताकि गणेश जी की कृपा जीवन में स्थायी रूप से अनुभव हो सके।
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