By पं. सुव्रत शर्मा
गुढी पाडवा 2026 का इतिहास, पूजा विधि और नए साल के आशीर्वाद

पारंपरिक हिंदू पंचांग में गुड़ी पड़वा 2026 को उस पवित्र क्षण के रूप में देखा जाता है जब नया हिंदू नववर्ष शुरू होता है और जीवन को नए संकल्प, नई आशा और नई व्यवस्था के साथ देखने का अवसर मिलता है। विशेष रूप से महाराष्ट्र और कोकण क्षेत्र में इसे वर्षारंभ का औपचारिक दिन माना जाता है, जबकि दक्षिण और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में यही तिथि अलग अलग नामों से नए वर्ष की शुरुआत का संकेत देती है।
गुड़ी पड़वा को चैतन्य, समृद्धि और विजय के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है। इस दिन घर के बाहर जो गुड़ी स्थापित की जाती है, वह केवल परंपरा नहीं बल्कि जीवन में नई ऊर्जा, उत्साह और आत्मविश्वास को ऊँचा उठाने का प्रतीक मानी जाती है। वर्ष 2026 में भी यह पर्व लोगों को एक बार फिर अपनी दिशा, विचारों और संबंधों को संतुलित दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान करेगा।
गुड़ी पड़वा हमेशा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है, जो हिंदू चांद्र माह चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि होती है। यह तिथि चांद्र वर्ष के प्रारंभ की सूचक है और इसी दिन से नया संवत्सर आरंभ माना जाता है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व | गुड़ी पड़वा 2026 |
| तिथि | चैत्र शुक्ल प्रतिपदा |
| दिन और तारीख | गुरुवार, 19 मार्च 2026 |
| प्रतिपदा तिथि प्रारंभ | 19 मार्च 2026, प्रातः लगभग 06:52 बजे |
| प्रतिपदा तिथि समाप्त | 20 मार्च 2026, प्रातः लगभग 04:52 बजे |
| पंचांग संकेत | चैत माह का शुक्ल पक्ष, नए वर्ष की शुरुआत |
तिथि की दृष्टि से देखा जाए तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की शुरुआत 19 मार्च की सुबह से होती है और यह तिथि अगले दिन प्रातः तक बनी रहती है। चूँकि तिथि का आरंभ ही सूर्योदय के आसपास हो रहा है, इसलिए अधिकांश स्थानों में गुरुवार, 19 मार्च 2026 को ही गुड़ी पड़वा का उत्सव मनाया जाएगा। अलग अलग क्षेत्रों में सूर्योदय समय के छोटे अंतर के कारण स्थानीय पंचांग के अनुसार सूक्ष्म अंतर हो सकते हैं, पर मूल तिथि यही रहेगी।
गुड़ी पड़वा जैसे वर्षारंभ के पर्व में प्रातःकाल को अत्यंत शुभ माना जाता है। यह समय वातावरण की ताजगी, मन की शांति और नए संकल्पों की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसलिए गुड़ी की स्थापना और वर्षारंभ की पूजा प्रायः सुबह के समय ही करने की परंपरा है।
| क्रिया | अनुशंसित समय |
|---|---|
| स्नान, घर की शुद्धि | सूर्योदय के आसपास प्रातःकाल |
| गुड़ी स्थापना और संकल्प | प्रातः से पूर्वाह्न के बीच, सूर्योदय के बाद |
| वैकल्पिक पूजा समय | दिन में किसी भी समय सूर्यास्त से पहले |
गुड़ी पड़वा पर पूजा के लिए सबसे अच्छा समय वह माना जाएगा जब घर की सफाई, स्नान और तैयारियाँ पूर्ण होकर मन सहज रूप से शांत हो चुका हो। यदि किसी कारण अत्यंत प्रातःकाल में पूजा संभव न हो, तो दिन में किसी भी समय सूर्यास्त से पहले गुड़ी की स्थापना और संकल्प कर सकते हैं। यही ध्यान रखना पर्याप्त है कि यह कार्य शुभ तिथि के भीतर हो और मन में जल्दबाज़ी के बजाय शांत सजगता बनी रहे।
गुड़ी पड़वा शब्द दो भागों से मिलकर बना है। गुड़ी का अर्थ है ध्वज या पताका। यह वह सुसज्जित डंडा होता है जिसे घर के बाहर ऊँचाई पर स्थापित किया जाता है और जिसके ऊपर धातु का पात्र रखा जाता है। पड़वा शब्द चंद्रपक्ष की प्रथम तिथि, अर्थात प्रतिपदा, के लिए प्रयोग होता है। इस प्रकार गुड़ी पड़वा का शाब्दिक अर्थ हुआ प्रतिपदा के दिन गुड़ी की स्थापना।
गुड़ी को घर के मुख्य द्वार के पास ऊँचा रखा जाता है। उस पर स्वच्छ वस्त्र, पुष्प और अन्य सजावटी वस्तुएँ लगाई जाती हैं और ऊपर प्रायः तांबे या चाँदी के पात्र जैसे किसी धातु के कलश को स्थापित किया जाता है। यह गुड़ी विजय, स्पष्टता और संतुलन का प्रतीक मानी जाती है। परंपरा है कि जैसे गुड़ी आकाश की ओर ऊँची उठती है, वैसे ही घर के लोगों का मनोबल और जीवन की दिशा भी ऊर्ध्वगामी रहे।
महाराष्ट्र और कोकण क्षेत्र में गुड़ी पड़वा को नए वर्ष की औपचारिक शुरुआत के रूप में स्वीकार किया जाता है। यही दिन देश के अन्य भागों में अलग नामों से भी मनाया जाता है।
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे युगादि या युगादी के नाम से,
कश्मीरी पंडितों के बीच नवरेह के रूप में,
और सिंधी समुदाय में चेटीचंद के रूप में सम्मान दिया जाता है।
नाम भिन्न हो सकते हैं, पर भाव एक ही है, नए वर्ष को आदर, आशा और सकारात्मक दृष्टि के साथ स्वागत करना।
गुड़ी पड़वा के साथ कई आदरपूर्ण परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। कई मान्यताओं के अनुसार यह वही दिन माना जाता है जब सृष्टि की रचना का क्रम प्रारंभ हुआ। इस दृष्टि से यह दिन समय के नए चक्र, नई सृष्टि और कर्म के प्रति जागरूकता से जुड़ा हुआ माना जाता है।
कुछ परंपराएँ इस पर्व को भगवान राम के लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने से भी जोड़ती हैं। उस प्रसंग में यह दिन धर्म की पुनः स्थापना और अधर्म पर विजय का संकेत माना जाता है। इस भाव से गुड़ी को विजयध्वज के रूप में भी देखा जाता है जो यह स्मरण कराता है कि जीवन की कठिनाइयों के बाद भी यदि धैर्य और धर्म का साथ न छोड़ा जाए, तो अंततः संतुलन और न्याय की स्थापना हो सकती है।
महाराष्ट्रीय इतिहास में गुड़ी पड़वा को मराठा वीरता और विजय के प्रतीक के रूप में भी याद किया जाता है। कई वर्णनों में उल्लेख मिलता है कि विजयी अवसरों पर गुड़ी उठाकर समाज के सामने सफलता, आत्मविश्वास और सम्मान का प्रदर्शन किया जाता था। इस प्रकार धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तीनों स्तरों पर गुड़ी पड़वा 2026 को एक गहरे अर्थ के साथ देखा जा सकता है।
गुड़ी पड़वा के दिन सबसे पहले घर की साफ सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। पुराने वर्ष की धूल, अव्यवस्था और जड़ता को हटाने का भाव लेकर घर के कमरों, आँगन और प्रवेश द्वार को अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद लोग स्नान कर स्वच्छ या नए वस्त्र धारण करते हैं और वर्षारंभ की सरल पूजा के लिए तैयार होते हैं।
गुड़ी तैयार करने के लिए सामान्यतः एक लंबा डंडा या बाँस लिया जाता है। उस पर सुसज्जित वस्त्र, जैसे रेशमी या चमकीले रंग का कपड़ा, बाँधा जाता है। इसके ऊपर पुष्पमाला, नीम या आम की पत्तियाँ और प्रायः शुचिता का संकेत देने वाले अन्य प्रतीक लगाए जाते हैं। सबसे ऊपर एक चमकदार धातु पात्र, जैसे तांबे या चाँदी का कलश रखा जाता है, जो गुड़ी को एक विशिष्ट पहचान देता है। इसके बाद इसे घर के बाहर ऊँचे स्थान पर इस प्रकार स्थापित किया जाता है कि दूर से भी इसका दर्शन हो सके।
घर के भीतर पूजा स्थल पर दीप जलाकर इष्टदेव, कुलदेवता या भगवान विष्णु जैसे देव रूप की पूजा की जाती है। कुछ परिवार पहले देवस्थान में पूजा करते हैं और इसके बाद गुड़ी की दिशा में प्रणाम कर उन्हें वर्षारंभ का मौन साक्षी बनाते हैं। कई लोग इस दिन विशेष पकवान भी बनाते हैं, जिनमें पुरण पोळी, श्रीखंड और अन्य पारंपरिक व्यंजन प्रमुख हैं। यह भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं बल्कि परिवार के साथ मिलकर साझा आनंद का अनुभव करने के लिए भी तैयार किया जाता है।
गुड़ी पड़वा की विशेषता यह भी है कि यह पर्व सांस्कृतिक विविधता को एक धागे में पिरो देता है। महाराष्ट्र में यह गुड़ी पड़वा के नाम से, दक्षिण भारत में युगादि के रूप में और कश्मीरी समाज में नवरेह के रूप में मनाया जाता है, पर सभी रूपों में अर्थ यही है कि नया वर्ष आशीर्वाद, स्वास्थ्य और समृद्धि लेकर आए।
इस दिन लोग एक दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ देते हैं, आशीर्वाद लेते हैं और देते भी हैं। मराठी परंपरा में अक्सर यह शुभकामना सुनने को मिलती है कि गुड़ी पड़व्याच्या हार्दिक शुभेच्छा। इसका भाव यही है कि जीवन में नई शुरुआत हो, हर्ष और स्वास्थ्य रहे और परिवार पर ईश्वर की कृपा बनी रहे।
गुड़ी पड़वा से जुड़े कुछ सुंदर शुभकामना संदेश इस प्रकार हो सकते हैं
गुड़ी पड़वा 2026 आपके जीवन में आनंद, अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि लेकर आए, ऐसी मंगलकामना।
इस नववर्ष पर आपके हर प्रयास को दिशा और सफलता मिले, यही शुभकामना।
गुड़ी की तरह आपका आत्मविश्वास भी ऊँचा रहे और जीवन में संतुलन, प्रेम और शांति बनी रहे।
बसंत की तरह आपके जीवन में भी नए रंग, नई आशाएँ और नए अवसर खिलते रहें।
इन शुभकामनाओं के माध्यम से लोग एक दूसरे को यह स्मरण कराते हैं कि नया वर्ष केवल बाहरी परिवर्तन का संकेत नहीं बल्कि आपसी संबंधों में भी नई गर्माहट और विश्वास जगाने का अवसर है।
गुड़ी पड़वा 2026 को केवल कैलेंडर की तारीख की तरह देखने के बजाय यदि इसे जीवन के लिए संकेत के रूप में देखा जाए, तो यह दिन बहुत गहरा संदेश दे सकता है। गुड़ी की ऊँचाई यह याद दिलाती है कि परिस्थिति कैसी भी हो, आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टि को ऊँचा रखना आवश्यक है। वर्षारंभ की साफ सफाई यह सिखाती है कि नए समय में प्रवेश से पहले भीतर और बाहर दोनों स्तर पर अनावश्यक बोझ को छोड़ना उपयोगी है।
जो परिवार गुड़ी पड़वा 2026 के दिन मिलकर घर की साफ सफाई, गुड़ी स्थापना, सरल पूजा, साझा भोजन और स्नेहपूर्ण शुभकामनाओं को महत्व देगा, उसके लिए यह दिन पूरे वर्ष की दिशा को सकारात्मक बनाने वाली शुरुआत बन सकता है। गुड़ी पड़वा यह प्रेरणा भी देता है कि जैसे हर वर्ष का आरंभ नए उत्साह से किया जाता है, वैसे ही जीवन के कठिन चरणों के बाद भी पुनः उठना और आगे बढ़ना संभव है।
गुड़ी पड़वा 2026 कब मनाया जाएगा और यह किस तिथि की प्रतिपदा से जुड़ा है
गुड़ी पड़वा 2026 गुरुवार, 19 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। यह चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत 19 मार्च को प्रातः लगभग 06 बजकर 52 मिनट पर होगी और समाप्ति 20 मार्च को प्रातः लगभग 04 बजकर 52 मिनट के आसपास होगी।
गुड़ी पड़वा के लिए कोई निश्चित पूजा मुहूर्त या समय तय है या नहीं
गुड़ी पड़वा पर पूजा के लिए प्रातःकाल का समय सबसे शुभ माना जाता है। स्नान, घर की सफाई और तैयारी के पश्चात सूर्योदय के बाद से पूर्वाह्न तक गुड़ी स्थापना और वर्षारंभ की पूजा करना उत्तम माना जाता है। आवश्यकता पड़ने पर दिन में सूर्यास्त से पहले भी पूजा की जा सकती है।
गुड़ी क्या दर्शाती है और इसे घर के बाहर क्यों स्थापित किया जाता है
गुड़ी एक सुसज्जित ध्वज के रूप में विजय, स्पष्टता और संतुलन का प्रतीक है। इसे घर के बाहर ऊँचा स्थापित करने का भाव यह है कि जीवन में भी आत्मविश्वास, धर्म और सकारात्मक सोच का ध्वज ऊँचा रहे और परिवार पर कृपा तथा सुरक्षा की अनुभूति बनी रहे।
गुड़ी पड़वा 2026 का संबंध अन्य नववर्ष पर्वों से कैसे जुड़ता है
गुड़ी पड़वा 2026 को महाराष्ट्र और कोकण में हिंदू नववर्ष के रूप में मनाया जाएगा। यही तिथि कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में युगादि, कश्मीरी पंडितों में नवरेह और सिंधी समाज में चेटीचंद के रूप में भी महत्व रखती है। नाम भिन्न हैं, पर उद्देश्य नए वर्ष का आदरपूर्ण स्वागत है।
गुड़ी पड़वा 2026 को व्यक्तिगत स्तर पर अधिक सार्थक कैसे बनाया जा सकता है
इस दिन घर की साफ सफाई, गुड़ी स्थापना, सरल पूजा, परिवार के साथ मिलकर पारंपरिक व्यंजन बनाना और एक दूसरे को शुभकामनाएँ देना इस पर्व को गहराई दे सकता है। यदि साथ ही यह संकल्प भी रखा जाए कि नए वर्ष में जीवन को अधिक संतुलन, कृतज्ञता और सकारात्मकता के साथ जिया जाएगा, तो गुड़ी पड़वा 2026 वास्तव में अर्थपूर्ण वर्षारंभ बन सकता है।
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अनुभव: 27
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