By पं. संजीव शर्मा
गुप्त नवरात्रि का महत्व और व्रत पालन

आषाढ़ मास में आने वाली गुप्त नवरात्रि 2026 की शुरुआत बुधवार, 15 जुलाई 2026 से होगी और इसका समापन बुधवार, 22 जुलाई 2026 को माना जाएगा। यह गुप्त नवरात्रि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है, जब चंद्रमा बढ़ती हुई अवस्था में रहता है और साधना के लिए सूक्ष्म किन्तु अत्यंत प्रभावशाली ऊर्जा सक्रिय मानी जाती है। इस पूरे आठ दिन के चरण में देवी उपासना, मंत्र साधना, नियमपूर्वक व्रत, स्तोत्र पाठ और विशेष रूप से शक्ति साधना के लिए अनुकूल समय माना जाता है।
गुप्त नवरात्रि को आषाढ़ नवरात्रि या कुछ परंपराओं में गायत्री नवरात्रि भी कहा जाता है। यह नवरात्रि चैत्र और शारदीय नवरात्रि की तरह सार्वजनिक रूप से बहुत प्रसिद्ध नहीं होती बल्कि अपेक्षाकृत शांत और अंतरंग साधना के रूप में मानी जाती है।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक, कुल नौ दिनों तक, मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है। इस अवधि में साधक मुख्य रूप से मां की दश महाविद्या या नौ रूपों की शक्ति की उपासना कर सकते हैं। कई परंपराओं में इसे विशेष रूप से उन लोगों के लिए उत्तम माना जाता है जो मंत्र सिद्धि, साधना की गहराई और मौन भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं।
गुप्त नवरात्रि के नियम मुख्य रूप से हिंदी भाषी क्षेत्रों में अधिक प्रचलित हैं। विशेषकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में इसे श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं इस नवरात्रि में विशेष व्रत रखती हैं और प्रतिदिन देवी की आराधना करती हैं।
नौ दिनों के दौरान रोज अलग अलग रूपों में शक्ति की पूजा की जाती है। किसी स्थान पर दुर्गा के नव रूप, तो कहीं दश महाविद्या, तो कहीं विशेष रूप से वराहि देवी की उपासना प्रमुख मानी जाती है। हिमाचल प्रदेश आदि कुछ क्षेत्रों में इसे गुह्य नवरात्रि के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यहां साधना अधिक अंतरंग और निजी रूप से की जाती है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से वराहि देवी के उपासकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। वराहि देवी, देवी माहात्म्य में वर्णित सप्तमातृकाओं में से एक मानी जाती हैं। उनकी उपासना गुप्त नवरात्रि में की जाए तो घर के अन्न, धन और सुरक्षा से जुड़े आशीर्वाद प्राप्त हो सकते हैं, ऐसा विश्वास प्रचलित है।
कई साधक इस समय को दश महाविद्या की साधना के लिए भी चुनते हैं। यह साधना सामान्य गृहस्थ जीवन से थोड़ा हटकर गहन मंत्र जप, पूजन और संयम के सहारे की जाती है। इसलिए इसे खुले उत्सव की अपेक्षा शांत, गुप्त और एकाग्रता वाले वातावरण में करने की परंपरा रही है।
परंपरा में यह भी वर्णित है कि वर्ष में केवल आषाढ़ शुक्ल पक्ष ही नहीं बल्कि माघ मास के शुक्ल पक्ष में भी एक गुप्त नवरात्रि मानी जाती है। माघ शुक्ल पक्ष में आने वाली यह नवरात्रि भी मुख्य रूप से साधकों, मंत्र जप और शक्ति उपासना के लिए अनुकूल मानी जाती है।
फिर भी, सामान्य रूप से जो नवरात्रि सर्वाधिक प्रसिद्ध है, वह आश्विन मास में आने वाली शारदीय नवरात्रि है, जो सितंबर और अक्टूबर के बीच होती है और पूरे भारत में उत्सव, गरबा, रास, दुर्गा पूजा और विजयादशमी के रूप में बड़े स्तर पर मनाई जाती है। गुप्त नवरात्रियां इसके विपरीत अपेक्षाकृत शांत, आंतरिक और साधना केंद्रित मानी जाती हैं।
गुप्त नवरात्रि में पूजा विधि का मूल भाव सरल, सात्त्विक और नियमितता पर आधारित है। यहां अत्यधिक दिखावे की अपेक्षा मन की एकाग्रता को अधिक महत्व दिया जाता है।
नवरात्रि के सभी दिनों में प्रातःकाल स्नान करना, घर और पूजा स्थान की शुद्धि करना महत्वपूर्ण माना जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ, यथासंभव लाल या हल्के रंग के वस्त्र पहनकर देवी आराधना के लिए तैयार होना शुभ रहता है।
पूजा स्थल किसी शांत कोने में बनाया जाए जहां नौ दिनों तक दीप, कलश या चित्र को बिना बाधा के स्थापित रखा जा सके। यदि संभव हो तो रोज थोड़ा समय मौन में बैठकर भी मन को शांत करना लाभकारी माना जा सकता है।
नवरात्रि के दौरान कई साधक नियमित व्रत रखते हैं। कुछ लोग प्रतिदिन फलाहार करते हैं, कुछ केवल दिन में एक बार सात्त्विक भोजन करते हैं। मांसाहार, मद्यपान, तामसिक भोजन, नशा और अशुद्ध आचरण से दूरी रखना इस पूरे समय में विशेष रूप से आवश्यक माना जाता है।
प्रातः और सायंकाल दोनों समय साधारण पूजा करना, दीपक जलाना, धूप दिखाना और देवी के मंत्र, स्तोत्र या नाम जप करना गुप्त नवरात्रि की मूल साधना है। यहां जटिल कर्मकांड की अपेक्षा नियमितता और श्रद्धा को अधिक महत्व दिया गया है।
देवी पूजा के लिए साधक को संभव हो तो लाल वस्त्र बिछाकर उस पर बैठकर पूजा करनी चाहिए। जो साधक विशेष सिद्धि या मोक्षमार्ग की साधना कर रहे हों, उनके लिए कुशा या दुर्वा से बने आसन पर बैठकर जप करना श्रेष्ठ माना जाता है।
पूजा में प्रयुक्त दीपक पीतल, चांदी या स्वर्ण जैसे धातु के हो सकते हैं, पर भाव प्रधान है। दीपक में गाय का घी प्रयोग करने को अत्यंत पवित्र माना गया है। सामान्य साधना में एक बत्ती और यदि कोई विशेष विस्तृत पूजा कर रहे हों, तो नवरात्रि के प्रतीक रूप में नौ बत्तियां जलाने की परंपरा भी देखी जाती है।
भोग के रूप में खिचड़ी, हलवा, फल या कोई भी सरल सात्त्विक व्यंजन चढ़ाया जा सकता है। परंपरा यह भी कहती है कि विस्तृत पकवान अनिवार्य नहीं बल्कि यदि केवल फल या थोड़ा मीठा ही श्रद्धा से अर्पित किया जाए, तो भी देवी प्रसन्न होती हैं। पूजा के बाद वही प्रसाद परिवार और पड़ोसियों में बांटना मंगलकारी माना गया है।
गुप्त नवरात्रि में मंत्र जप का विशेष महत्व माना जाता है। कई साधक लाल चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला से देवी मंत्रों का जप करते हैं। मंत्र चाहे छोटा हो या बड़ा, महत्वपूर्ण यह है कि उसे नियमपूर्वक, निश्चित संख्या में और एकाग्रता के साथ जपा जाए।
जो साधक गायत्री मंत्र, दुर्गा सप्तशती, सप्तश्लोकी दुर्गा या किसी विशेष देवी बीज मंत्र का जप कर रहे हों, उनके लिए यह नवरात्रि साधना की प्रगति के लिए अत्यंत अनुकूल मानी गई है।
कथा के अनुसार एक समय ऋषि श्रंगी पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर भक्तों को उपदेश दे रहे थे। उसी सभा में एक स्त्री उठी और उसने विनम्र होकर कहा कि वह कितनी भी पूजा करना चाहती है, फिर भी मां दुर्गा की कृपा उसे प्राप्त नहीं हो पा रही। कारण यह था कि उसका पति गलत कामों, अनैतिक आचरण और भोगों में अत्यधिक डूबा हुआ था और स्त्री पर भी दबाव डालता था कि वह उन कार्यों में उसकी सहभागी बने।
पति के इस आचरण के कारण वह स्त्री कोई भी व्रत, पूजा या साधना शांति से नहीं कर पाती थी। वह भीतर से मां दुर्गा की शरण लेना चाहती थी, लेकिन परिस्थितियां उसे अनुमति नहीं दे रही थीं। उसने ऋषि श्रंगी से मार्गदर्शन मांगा कि ऐसी स्थिति में मां दुर्गा की कृपा कैसे प्राप्त की जा सकती है।
तब ऋषि श्रंगी ने कहा कि सामान्य रूप से लोग चैत्र और शारदीय नवरात्रि को ही जानते हैं। पर वर्ष में दो और नवरात्रियां भी होती हैं, जिन्हें गुप्त नवरात्रि कहा गया है। इन गुप्त नवरात्रियों में विशेष रूप से दश महाविद्या स्वरूपों की साधना की जाती है और जो साधक परिस्थितियों से बाधित हों, उनके लिए यह समय अत्यंत कृपामयी हो सकता है।
ऋषि ने उसे आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का व्रत और देवी साधना करने का मार्ग बताया। स्त्री ने गुप्त नवरात्रि के नौ दिनों तक मन, वाणी और कर्म से यथाशक्ति शुद्धता रखकर मां दुर्गा की आराधना की।
कथा के अनुसार नवरात्रि की साधना के फलस्वरूप उसके जीवन में शांति और समृद्धि आई। उसके पति के जीवन में भी परिवर्तन हुआ, उसने अनैतिक जीवन छोड़कर गृहस्थ धर्म को समझा और जिम्मेदार बन गया। इस प्रकार गुप्त नवरात्रि की साधना ने न केवल स्त्री के भीतर संतुलन और शक्ति दी बल्कि पूरे परिवार की दिशा बदल दी।
गुप्त नवरात्रि में साधना करने वाले साधक के लिए कुछ नियम बताए गए हैं, जिन्हें यदि सहजता से अपनाया जाए तो साधना की ऊर्जा अधिक सघन रूप से अनुभव हो सकती है।
गुप्त नवरात्रि के दौरान चमड़े से बनी वस्तुओं का उपयोग, जैसे चमड़े की बेल्ट, पर्स या जूते, यथासंभव न करने की सलाह दी जाती है। यह नियम केवल बाहरी शुद्धि नहीं बल्कि अहिंसा और संवेदनशीलता की भावना से भी जुड़ा है।
इस अवधि में क्रोध, ईर्ष्या, वासना और अत्यधिक भोग की इच्छा से बचना साधक के लिए विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। इन भावों को यदि जागरूकता से रोका जाए, तो मंत्र जप और पूजा का प्रभाव अधिक गहराई से हृदय पर उतर सकता है।
दिवस में अधिक सोना, सुस्ती और आलस्य साधना की गति को धीमा कर सकते हैं। इसलिए दिन में अनावश्यक निद्रा से बचकर समय का उपयोग जप, पाठ, सेवा या आत्मचिंतन में करना श्रेष्ठ रहता है।
नवरात्रि के इन दिनों में कन्या पूजन भी शुभ माना गया है। छोटी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनके चरण स्पर्श करना, उन्हें भोजन, वस्त्र या फल देना, भक्ति और कृतज्ञता को जीवन में स्थापित करने वाला सुंदर अभ्यास है।
जो साधक कर सकें, वे प्रतिदिन या कुछ दिनों में दुर्गा सप्तशती या कम से कम सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ कर सकते हैं। यह पाठ साधना के लिए एक मजबूत मानसिक और आध्यात्मिक आधार बनाता है।
गुप्त नवरात्रि के व्रत और साधना से छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, बहुत वृद्ध व्यक्ति या गंभीर रोग से पीड़ित लोग कठोर रूप में दूर रह सकते हैं। ऐसे लोग यदि मन चाहे तो केवल सामान्य पूजा, थोड़ा नामजप या सरल सात्त्विक आहार के साथ देवी स्मरण कर सकते हैं, पर अपने स्वास्थ्य के विरुद्ध कठोर व्रत न करें।
इस अवधि में बाल और नाखून काटना, मुंडन संस्कार या ऐसे कार्य जिनमें शरीर को अनावश्यक रूप से काटने छांटने की प्रक्रिया हो, उनसे दूर रहने की सलाह दी जाती है। यह भी एक प्रकार से शरीर को मंदिर मानकर उसकी स्वाभाविक अवस्था का सम्मान करने का संकेत है।
काले रंग के वस्त्रों से बचने, अत्यधिक आडंबर, शोर, विवाद और कटु भाषा से दूर रहने को भी गुप्त नवरात्रि की साधना के अनुकूल माना गया है।
गुप्त नवरात्रि का सार यह है कि यह समय बाहरी प्रदर्शन से अधिक भीतर की साधना के लिए रखा गया है। जो व्यक्ति अपने जीवन में बदलाव, निर्णय क्षमता, मानसिक मजबूती और आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में सचेत होकर कदम बढ़ाना चाहता है, उसके लिए यह नौ दिन एक विशेष अवसर हो सकते हैं।
जो साधक नवरात्रि के दौरान संयम, नियमित जप, देवी स्तुति, सेवा और दया का अभ्यास करते हैं, उनके लिए यह समय केवल उत्सव नहीं बल्कि भीतर जागने की प्रक्रिया बन सकता है। माना गया है कि गुप्त नवरात्रि में की गई साधना निष्फल नहीं जाती और समय आने पर अवश्य परिणाम देती है, चाहे वह मन की शांति हो, परिस्थितियों में परिवर्तन हो या आत्मबल में वृद्धि हो।
गुप्त नवरात्रि 2026 कब से कब तक रहेगी
गुप्त नवरात्रि 2026 की शुरुआत 15 जुलाई 2026 से होगी और 22 जुलाई 2026 तक आषाढ़ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह विशेष साधना काल माना जाएगा।
क्या गुप्त नवरात्रि में घटस्थापना करना आवश्यक है
आम मान्यता के अनुसार गुप्त नवरात्रि में घटस्थापना या जौ, गेहूं बोना आवश्यक नहीं है। यदि कोई साधक इच्छा से करना चाहे, तो कर सकता है, पर साधना का मुख्य आधार रोज की सरल पूजा, जप और संयम ही है।
क्या गुप्त नवरात्रि में केवल वराहि देवी की ही पूजा करनी चाहिए
जरूरी नहीं। कई परंपराओं में वराहि देवी को विशेष महत्व दिया जाता है, पर साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार दुर्गा, दश महाविद्या, गायत्री या किसी भी देवी स्वरूप की उपासना कर सकता है।
क्या इस नवरात्रि में कठोर व्रत सभी को रखना चाहिए
ऐसा आवश्यक नहीं। छोटे बच्चे, वृद्ध, गर्भवती महिलाएं और गंभीर बीमारी से पीड़ित लोग कठोर व्रत से बचें। वे केवल हल्का सात्त्विक भोजन, थोड़ा जप और साधारण पूजा से भी गुप्त नवरात्रि की भावना से जुड़ सकते हैं।
गुप्त नवरात्रि के व्रत और साधना से क्या लाभ हो सकते हैं
परंपरा के अनुसार गुप्त नवरात्रि में शक्ति उपासना से घर में अन्न और धन की कमी नहीं रहती, राजनीति या प्रशासन में आगे बढ़ने वालों को साहस और समर्थन मिलता है, साधक को नकारात्मक शक्तियों, दुर्भावना और दृष्टिदोष से सुरक्षा मिल सकती है और जीवन की दिशा अधिक स्पष्ट तथा संतुलित हो सकती है।
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