हरियाली अमावस्या 2026: तिथि, महत्व और श्रावण मास की पूजा विधि

By पं. संजीव शर्मा

सावन की अमावस्या पर मनाई जाने वाली हरियाली अमावस्या का धार्मिक महत्व, तिथि और पूजा विधि जानें

हरियाली अमावस्या 2026: तिथि, महत्व और पूजा विधि

सामग्री तालिका

मानसून के आगमन के साथ ही भारतीय त्योहारों की पावन श्रृंखला शुरू हो जाती है और इन्हीं में से एक है हरियाली अमावस्या। सावन मास की अमावस्या तिथि पर आने वाला यह पर्व प्रकृति की हरियाली, वर्षा की ठंडक और पूजा के साथ जीवन में नई ऊर्जा भरता है। वर्ष 2026 में हरियाली अमावस्या का यह विशेष पर्व बुधवार 12 अगस्त 2026 के दिन मनाया जाएगा।

हरियाली अमावस्या 2026 की तिथि और अमावस्या का समय

सावन मास की अमावस्या को ही हरियाली अमावस्या कहा जाता है। वर्ष 2026 के लिए संबंधित तिथि और समय को सारणी के रूप में देखा जा सकता है।

विवरण तिथि समय
हरियाली अमावस्या 12 अगस्त 2026, बुधवार दिन भर श्रद्धानुसार पूजन
अमावस्या तिथि प्रारंभ 12 अगस्त 2026 प्रातः 1 बजकर 55 मिनट पर
अमावस्या तिथि समाप्त 12 अगस्त 2026 रात्रि 11 बजे के आसपास

पूरे दिन को हरियाली अमावस्या के रूप में शुभ माना गया है। प्रातःकाल स्नान, संध्या के समय दीपदान और दिन भर में दान, वृक्षारोपण तथा पितृ तर्पण जैसे कर्म विशेष फलदायी माने जाते हैं।

हरियाली अमावस्या का महत्व क्या है?

हरियाली अमावस्या श्रावण मास की अमावस्या होने के कारण अन्य अमावस्याओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्षा ऋतु के चरम पर जब धरती हरी चादर से ढकी होती है तब यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और भगवान शिव की आराधना का सुंदर संगम बन जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा और पितरों का स्मरण शुभ माना जाता है।

उत्तर भारत के राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश सहित अनेक राज्यों में हरियाली अमावस्या बड़े उत्साह से मनाई जाती है। देश के अलग अलग हिस्सों में इसे अलग नामों से भी जाना जाता है। महाराष्ट्र में इसे गटारी अमावस्या, आंध्र प्रदेश में चुक्कल अमावस्या और ओडिशा में चिटलागी अमावस्या के नाम से भी पहचाना जाता है। नाम और स्थानीय परंपराएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन मूल भावना प्रकृति, पितरों और देवताओं के प्रति आभार की ही होती है।

हरियाली अमावस्या पर प्राकृतिक सौंदर्य और भक्ति का संगम

सावन मास में हरियाली अमावस्या के दिन लोग प्रकृति के अधिक निकट जाने की कोशिश करते हैं। खेत, बाग और उद्यान नई हरीतिमा से भर उठते हैं। इस दिन परिवार सहित पार्क, बगीचे और नदी तटों पर जाकर प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेना भी एक प्रकार की साधना माना जा सकता है, क्योंकि यह भोग नहीं बल्कि सृष्टि के प्रति सम्मान और संतुलन की ओर संकेत करता है।

कई स्थानों पर इस दिन मेले, भजन कीर्तन और झूले आदि की भी परंपरा होती है। स्त्रियां हरे वस्त्र, चूड़ियां और श्रृंगार धारण कर सावन के इस पर्व को और भी सुहावना बना देती हैं। हरियाली अमावस्या का वातावरण स्वयं ही मन को शांत और सकारात्मक बनाने की क्षमता रखता है।

हरियाली अमावस्या पर कौन से क्षेत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं?

हरियाली अमावस्या का उत्सव केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत के साथ साथ देश के अनेक हिस्सों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मंदिरों, नदियों के तट और धार्मिक स्थलों पर विशेष भीड़ देखी जाती है। हिमाचल प्रदेश में भी इस दिन देवस्थानों पर विशेष पूजन और मेलों की परंपरा मिलती है।

इस दिन केवल शिव मंदिर ही नहीं बल्कि कृष्ण मंदिरों में भी विशेष कार्यक्रम देखे जाते हैं। विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन में इस अमावस्या का उत्सव अत्यंत सुंदर रूप ले लेता है। भगवान कृष्ण के प्रमुख मंदिरों, जैसे बांके बिहारी मंदिर और द्वारकाधीश मंदिर में श्रावण के अवसर पर फूलों से सजे बंगले और विशेष दर्शन की व्यवस्था भक्तों को आकर्षित करती है। इसके साथ ही अनेक शिवालयों में शृंगार, अभिषेक और आरती के दर्शन भी किए जाते हैं।

हरियाली अमावस्या पर क्या करें?

हरियाली अमावस्या का दिन पितृ तर्पण, शिव पूजा और दान के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। जो साधक इस दिन थोड़ी सी भी तैयारी के साथ दिन बिताना चाहें, उनके लिए कुछ सरल मार्गदर्शन उपयोगी हो सकता है।

हरियाली अमावस्या के दिन पितृ पूजा

  • प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय के आसपास उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • पितरों के नाम से जल, तिल और कुश से तर्पण करें। यह तर्पण आंगन, नदी तट या किसी पवित्र स्थान पर किया जा सकता है।
  • पितरों के नाम पर ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन और दान देना शुभ माना जाता है।

इस प्रकार की पितृ साधना से कुल में शांति और मार्गदर्शन की अनुभूति होने की मान्यता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि पितृ प्रसन्न होने पर परिवार के कई अटके हुए कार्य धीरे धीरे सुगम होने लगते हैं।

भगवान शिव की पूजा और जप

हरियाली अमावस्या के दिन भगवान शिव की पूजा करने से जीवन में स्थिरता और सुरक्षा के भाव को बल मिल सकता है।

  • शिवलिंग पर जल, दूध, शहद, दही और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है।
  • बिल्वपत्र, धतूरा, फल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर शांत मन से शिव नाम का जप किया जाता है।
  • शिव के अष्ट मंत्र या पंचाक्षर मंत्र “Om Namah Shivaya” का जप इस दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

जो साधक सामर्थ्य रखते हों, वे दिन भर संयमित रहकर शाम या रात्रि में एक समय सात्विक भोजन लेकर व्रत पूर्ण कर सकते हैं।

हरियाली अमावस्या और देवियों की पूजा

इस दिन भगवती पार्वती की पूजा का भी विशेष महत्व है। विवाहित महिलाएं सुहाग के रूप में सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और अन्य श्रृंगार सामग्री के साथ देवी की आराधना करती हैं। हरी चूड़ियां और हरा वस्त्र सौभाग्य और हरियाली का सूचक माना जाता है।

कई परंपराओं में विवाहित स्त्रियां हरी चूड़ियां, सिंदूर और बिंदी जैसी सुहाग सामग्री अन्य सुहागिनों में बांटती हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से वैवाहिक जीवन की आयु और स्थिरता में वृद्धि होती है और घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है। पुरुष भी अपनी ओर से घर की स्त्रियों को वस्त्र, चूड़ियां या अन्य छोटे उपहार देकर इस ऊर्जा को मजबूत कर सकते हैं।

हरियाली अमावस्या पर वृक्षारोपण क्यों विशेष है?

हरियाली अमावस्या के नाम में ही हरियाली का संदेश छिपा है। यह पर्व याद दिलाता है कि मानव जीवन के लिए वृक्ष कितने आवश्यक हैं। श्वास के लिए आवश्यक प्राणवायु, छाया, औषधि और फल जैसे अनगिनत वरदान हमें पेड़ों से ही मिलते हैं। इसी कारण प्राचीन आचार्यों ने इस दिन वृक्षारोपण को पुण्य कर्म के रूप में बताया है।

किस उद्देश्य के लिए कौन सा पौधा लगाएं?

नीचे दी गई सारणी में जीवन की अलग अलग इच्छाओं के अनुरूप सुझावित पौधों का उल्लेख किया जा सकता है।

उद्देश्य सुझाए गए पौधे
लक्ष्मी कृपा के लिए तुलसी, आँवला, बिल्वपत्र, केला
स्वास्थ्य के लिए आँवला, पलाश, ब्राह्मी, अर्जुन, तुलसी, सूरजमुखी
सौभाग्य के लिए अर्जुन, अशोक, नारियल, बरगद
संतान सुख के लिए बेल, नीम, नागकेसर, पीपल, अश्वगंधा
पारिवारिक सुख के लिए कदंब, नीम, बड़े छायादार वृक्ष
आनंद और प्रसन्नता के लिए पारिजात, मोगरा, रातरानी, गुलाब

इस दिन यदि कोई व्यक्ति अपने घर, खेत या किसी सार्वजनिक स्थान पर पौधा लगाकर उसकी देखभाल का संकल्प लेता है, तो यह केवल धार्मिक पुण्य नहीं बल्कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भी सुंदर प्रतीक बन जाता है।

हरियाली अमावस्या और रुद्राभिषेक

वैदिक परंपरा के अनुसार हर अमावस्या की रात को चंद्रमा के अदृश्य होने से एक विशेष प्रकार की सूक्ष्म ऊर्जा सक्रिय मानी जाती है। हरियाली अमावस्या की रात्रि में भी यह स्थिति रहती है। यह समय साधना, जप और रुद्राभिषेक के लिए उपयुक्त माना गया है, ताकि बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार की नकारात्मकता से रक्षा मजबूत हो सके।

कई लोग यह मानते हैं कि अमावस्या की रात को तामसिक ऊर्जा अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय रहती है। इसी कारण इस रात रुद्राभिषेक और देवी काली की आराधना को भी विशेष महत्व दिया गया है। भगवान शिव और देवी के नाम का स्मरण, दीपक जलाना और घर में प्रार्थना का वातावरण बनाना इस समय सुरक्षा और संतुलन की भावना को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।

हरियाली अमावस्या की कथा का संदेश

हरियाली अमावस्या से जुड़ी अनेक लोककथाएं देश के विभिन्न भागों में प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के माध्यम से इस दिन की महत्ता को सरल भाषा में समझा जा सकता है।

कथा में एक घर परिवार का उल्लेख मिलता है जिसमें पुत्र और पुत्रवधू रहते थे। एक दिन पुत्रवधू ने चोरी छिपे कुछ मिठाई खा ली। जब उससे पूछा गया तो उसने सच स्वीकार करने के बजाय चूहा पर दोष लगा दिया। यह सुनकर चूहा अत्यंत क्रोधित हो गया और मन ही मन उसने निश्चय किया कि वह सच्चाई सबके सामने लाएगा।

कुछ समय बाद राजा के यहां मेहमान ठहरे। चूहा बदला लेने के भाव से पुत्रवधू के कुछ वस्त्र लेकर उन अतिथियों के कमरे में रख आया। सुबह जब वहां से उन वस्त्रों का मिलना सामने आया तो तरह तरह की बातें होने लगीं। राजा को जब पता चला तो उसने बिना पूरी सच्चाई जाने बहू को घर से निकाल दिया।

राजा के घर के निकट एक पेड़ था जिसकी अनेक महिलाएं पूजा करती थीं और वहां पर गुड़ से बनी हुई एक विशेष प्रसाद, गुड़धानी, बांटती थीं। यही पेड़ उस पुत्रवधू की भी श्रद्धा का केंद्र था। एक दिन राजा वहां से गुजरा तो उसे दीपकों के बीच संवाद जैसा कुछ सुनाई दिया। जब उसने ध्यान से देखा तो सभी दीप जल रहे थे पर एक दीप बुझा हुआ था। अन्य दीपों ने उससे पूछा कि तू जल क्यों नहीं रहा। उसने उत्तर दिया कि मैं राजा के घर का दीप हूं। राजपुत्र की पत्नी मुझे तेल चढ़ाती थी लेकिन उसके ऊपर झूठा आरोप लगाकर उसे घर से निकाल दिया गया। तब से कोई यहां पूजा करने नहीं आता।

राजा ने यह बात सुनकर परिस्थिति को नए दृष्टिकोण से समझा। उसे अपनी भूल का आभास हुआ और उसने बहू को वापस सम्मान सहित घर बुलाया। धीरे धीरे परिवार का जीवन पुनः व्यवस्थित हो गया। यह कथा संकेत देती है कि हरियाली अमावस्या जैसे पावन दिनों पर सत्य, सेवा और श्रद्धा का फल अंततः परिवार को स्थिरता और सम्मान के रूप में वापस मिलता है।

हरियाली अमावस्या 2026 से जीवन के लिए संकेत

हरियाली अमावस्या 2026 केवल प्रकृति की हरियाली देखने का अवसर नहीं बल्कि अंतःकरण को भी हरा भरा करने का निमंत्रण है। यह दिन पूछता है कि जीवन में कहां सच्चाई की जगह समझौते ने ले ली, कहां वृक्षों के महत्व को भूलकर केवल अपने स्वार्थ पर ध्यान रह गया और कहां पितरों तथा देवी देवताओं के प्रति कृतज्ञता कम हो गई।

जो साधक इस दिन थोड़ा समय निकालकर वृक्षारोपण, पितृ तर्पण, शिव पूजा और सरल दान का अभ्यास करता है, उसके लिए यह अमावस्या आने वाले समय में नई शुरुआत का प्रतीक बन सकती है। हरियाली अमावस्या का सार यही है कि जब धरती हरी होती है तब मन भी हरा रहना चाहिए, जिसमें करुणा, सत्य और संतुलन स्वाभाविक रूप से फलते फूलते रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरियाली अमावस्या 2026 कब मनाई जाएगी?
हरियाली अमावस्या 2026 वर्ष के सावन मास में बुधवार 12 अगस्त 2026 के दिन मनाई जाएगी।

हरियाली अमावस्या का मुख्य महत्व क्या माना जाता है?
यह पर्व सावन मास की अमावस्या होने के कारण विशेष माना जाता है। इसमें पितृ तर्पण, भगवान शिव की पूजा, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और वृक्षारोपण का महत्व प्रमुख रूप से सामने आता है।

हरियाली अमावस्या पर कौन से धार्मिक कार्य करना शुभ रहता है?
इस दिन प्रातः स्नान, पितरों के लिए तर्पण, शिवलिंग अभिषेक, सुहागिनों द्वारा देवी पार्वती की पूजा, ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और दान तथा वृक्षारोपण शुभ माने जाते हैं।

इस दिन वृक्षारोपण को इतना पुण्यकारी क्यों कहा गया है?
क्योंकि हरियाली अमावस्या प्रकृति की हरियाली के बीच मनुष्य को याद दिलाती है कि जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य हैं। तुलसी, आँवला, नीम, पीपल और अन्य पौधों का रोपण धरती और जीवन दोनों के लिए लाभकारी है।

क्या हरियाली अमावस्या पर रुद्राभिषेक और देवी पूजा करना उचित है?
हाँ, अमावस्या की रात्रि में रुद्राभिषेक, शिव नाम जप और देवी की आराधना से नकारात्मकता, भय और असंतुलन को शांत करने की परंपरा प्रचलित है। इससे मन में साहस, शांति और सुरक्षा का भाव मजबूत होता है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


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